Monday, April 2, 2018

फोटो-यात्रा-16: एवरेस्ट बेस कैंप - थंगनाग से ज़ोंगला

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26 मई 2016
आज का दिन हमारी इस यात्रा का सबसे मुश्किल दिन रहा। बर्फ़बारी के बीच ख़राब मौसम में 5320 मीटर ऊँचा चो-ला दर्रा पार करना आसान नहीं रहा। रही-सही कसर इसके उस तरफ ग्लेशियर ने पूरी कर दी।
“बर्फ़ होने के बावज़ूद भी हमें रास्ता मिल रहा था। कारण था कि ठीकठाक पगडंड़ी बनी थी। फिर हमसे एक-डेढ़ घंटे पहले पाँच लोग यहाँ से गुज़रे थे, तो उनके पैरों के निशान भी मिल रहे थे। ऐसा ही चलता रहा, तो उत्तम होगा। लेकिन यदि मामूली-सी बर्फ़ भी पड़ गयी, तो ये निशान मिट जायेंगे। क्या पता आगे दर्रे के पास कैसी पगडंड़ी हो? हो या न हो।”
“थोड़ी देर के लिये थोड़े-से बादल इधर-उधर हो गये और हमें सामने बिल्कुल सिर के लगभग ऊपर तीन चोटियाँ दिखायी पड़ीं। इनके बीच में दो दर्रों जैसी आकृतियाँ भी दिखीं। इनमें से एक चो-ला है। इसे देखना भर ही सिहरन पैदा कर रहा था। यह एक ‘रॉक-फ़ाल जोन’ था, जहाँ खड़े ढाल पर आपको ढीले पत्थरों पर चढ़ना होगा और कभी भी कोई भी पत्थर आपके चलने से या अपने-आप भी नीचे गिर सकता था। अभी तक हम बादलों की उपस्थिति को कोस रहे थे। अब खुश हुए कि बादल रहें, तो अच्छा हो। हमें यह ‘रॉक-फ़ाल जोन’ दूर तक नहीं दिखेगा और सिहरन व डर भी कम लगेगा। हमारा यह विचार ऊपर वाले से सुन लिया और अगले एक मिनट में फिर से सबकुछ ढक गया।”
“लेकिन अब एक नयी मुसीबत सामने आ गयी, जिसका सामना इस समय हम नहीं करना चाहते थे। यह एक ग्लेशियर था और झील ग्लेशियर के ऊपर ही बनी थी। ताज़ा बर्फ़बारी हो जाने से और घने बादल होने से चारों तरफ़ सबकुछ सफ़ेद ही दिख रहा था। हम दोनों की साँसें तब यकायक रुक गयीं, जब एक ‘क्रेवास’ पार किया।”

एवरेस्ट बेस कैंप ट्रैक पर आधारित मेरी किताब हमसफ़र एवरेस्ट का एक अंश। किताब तो आपने पढ़ ही ली होगी, अब आज की यात्रा के फोटो देखिये:




चो-ला के रास्ते में 

थंगनाग... यहीं से हमने आज का ट्रैक आरंभ किया...

रात बर्फ़बारी हुई थी, इसलिए थंगनाग से ही हमें बर्फ़ में चलना पड़ा...


गोरक पक्षी

मानवरहित इलाके में आगे बढ़ते कदम...

मुझे ट्रैकिंग में बर्फ़ से कोई लगाव नहीं है... लेकिन एक बात माननी पड़ेगी... ताजी बर्फ़ खूबसूरत होती है...

और बर्फ़ की छत तोड़कर झाँकते नन्हें पौधे

इस तिनके पर जमी ‘आइस’ से आप हवा की रफ़्तार, दिशा और ठंडक का अनुमान लगा सकते हैं...




यह चो-ला नहीं है, बल्कि उससे कुछ पहले चो-ला का भ्रम कराता एक अन्य स्थान है


एकदम सामने दिख रहा है चो-ला दर्रा... जहाँ पहुँचने के लिए एकदम सीधी खड़ी चढ़ाई चढ़नी पड़ेगी...

वो रहा सामने चो-ला

कदम कदम बढ़ाये जा...


5300 मीटर की ऊँचाई पर चलना आसान नहीं होता... और बैठना तो कतई नहीं...

ज्यादातर हाई एल्टीट्यूड दर्रों के पास एकदम खड़ी दीवार होती है। चो-ला भी अपवाद नहीं है।

यहाँ से उन झंडियों के दिखने की जो खुशी हुई, उसे बयां नहीं किया जा सकता। झंडी मतलब चो-ला। मतलब चढ़ाई खत्म।

5320 मीटर ऊँचे चो-ला पर चढ़ते ही एकदम ढलान शुरू हो जाता है। और यह ढलान कहाँ तक है, कुछ नहीं पता।

चो-ला का जी.पी.एस. डाटा

यह है चो-ला। हम बायीं तरफ से आये थे और अब हमें दाहिनी तरफ जाना है।

चो-ला से नीचे उतरते ही ग्लेशियर शुरू हो जाता है।

इसी ग्लेशियर में स्थित है यह झील। इस समय यह ज्यादातर जमी हुई थी।


ग्लेशियर पर छोटे-छोटे क्रेवासों के बीच में

क्रेवासों से भरा ग्लेशियर... यकीन नहीं होता कि हमने इसे पार किया है...



बर्फ़ में ऐसा ढलान पार करने में साँस रुक जाती है।

बर्फ़ में नीलिमा दिख रही है।


और इस यात्रा का सबसे खतरनाक हिस्सा पार कर लिया...

ज़ोंगला में मेन्यू कार्ड








अगला भाग: फोटो-यात्रा-17: एवरेस्ट बेस कैंप - ज़ोंगला से गोरकक्षेप

5 comments:

  1. खतरनाक :O गज़ब भाई

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  2. तस्वीरें देख कर कुछ क्षण निःशब्द से हो गया था।
    साहसिक व रोमांचक यात्रा... शानदार तस्वीरें।

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  3. क्या कहूँ-नो शब्द। दीप्ति की हिम्मत को प्रणाम।

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  4. आप दोनो की हिम्मत और धैर्य को सलाम

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