Skip to main content

फोटो-यात्रा-5: एवरेस्ट बेस कैंप - फाफलू से ताकशिंदो-ला

इस यात्रा के फोटो आरंभ से देखने के लिये यहाँ क्लिक करें
15 मई 2016
“समय देखा - चार बजे थे। हम फाफलू से ग्यारह बजे चले थे। दूरी तय की केवल 17 किलोमीटर। डेढ घंटा रिंगमो में खड़ा रहा। इस तरह इस 17 किलोमीटर की दूरी को तय करने में साढ़े तीन घंटे लग गये। इसी से इस रास्ते की कठिनाईयों का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। पता होता, तो हम बाइक फाफलू में ही छोड़कर यहाँ तक पैदल आते।
लेकिन एक सुकून अवश्य मिला। अब हमें कई दिनों तक बाइक नहीं चलानी है। अब यहाँ से एवरेस्ट बेस कैंप की ट्रैकिंग आरंभ होगी। अब वो समय शुरू हुआ है, जिसके लिये हम इतने उत्साहित थे, जिसके लिये इतनी दूर आये थे।”





एवरेस्ट बेस कैंप ट्रैक पर आधारित मेरी किताब ‘हमसफ़र एवरेस्ट का एक अंश। किताब तो आपने पढ़ ही ली होगी, अब आज की यात्रा के फोटो देखिये:




फाफलू में काठमांडू जाने को तैयार बसें

फाफलू से आगे रास्ता मुश्किल होने लगता है...




फाफलू एयरपोर्ट


आपको यकीन नहीं आयेगा... बिल्कुल भी यकीन नहीं आयेगा... कैमरा एकदम सीधा था... पचास मीटर तक रास्ता इतना ही ढलान वाला था और मोटरसाइकिल को कई लोगों ने धक्का लगाकर आगे बढ़ाया था...




















होटल का डाइनिंग हॉल...


ताकशिंदो-ला

ताकशिंदो-ला के बाद पैदल रास्ता





ताकशिंदो-ला पर बना द्वार

ताकशिंदो-ला से इधर रिंगमो, उधर दूधकुंड और उधर नुनथला...

इन सबको खच्चरों पर लादकर आगे भेजा जायेगा...








1. फोटो-यात्रा-1: एवरेस्ट बेस कैंप - दिल्ली से नेपाल
2. फोटो-यात्रा-2: एवरेस्ट बेस कैंप - काठमांडू आगमन
3. फोटो-यात्रा-3: एवरेस्ट बेस कैंप - पशुपति दर्शन और आगे प्रस्थान
4. फोटो-यात्रा-4: एवरेस्ट बेस कैंप - दुम्जा से फाफलू
5. फोटो-यात्रा-5: एवरेस्ट बेस कैंप - फाफलू से ताकशिंदो-ला
6. फोटो-यात्रा-6: एवरेस्ट बेस कैंप - ताकशिंदो-ला से जुभिंग
7. फोटो-यात्रा-7: एवरेस्ट बेस कैंप - जुभिंग से बुपसा
8. फोटो-यात्रा-8: एवरेस्ट बेस कैंप - बुपसा से सुरके
9. फोटो-यात्रा-9: एवरेस्ट बेस कैंप - सुरके से फाकडिंग
10. फोटो-यात्रा-10: एवरेस्ट बेस कैंप - फाकडिंग से नामचे बाज़ार
11. फोटो-यात्रा-11: एवरेस्ट बेस कैंप - नामचे बाज़ार से डोले
12. फोटो-यात्रा-12: एवरेस्ट बेस कैंप - डोले से फंगा
13. फोटो-यात्रा-13: एवरेस्ट बेस कैंप - फंगा से गोक्यो
14. फोटो-यात्रा-14: गोक्यो और गोक्यो-री
15. फोटो-यात्रा-15: एवरेस्ट बेस कैंप - गोक्यो से थंगनाग
16. फोटो-यात्रा-16: एवरेस्ट बेस कैंप - थंगनाग से ज़ोंगला
17. फोटो-यात्रा-17: एवरेस्ट बेस कैंप - ज़ोंगला से गोरकक्षेप
18. फोटो-यात्रा-18: एवरेस्ट के चरणों में
19. फोटो-यात्रा-19: एवरेस्ट बेस कैंप - थुकला से नामचे बाज़ार
20. फोटो-यात्रा-20: एवरेस्ट बेस कैंप - नामचे बाज़ार से खारी-ला
21. फोटो-यात्रा-21: एवरेस्ट बेस कैंप - खारी-ला से ताकशिंदो-ला
22. फोटो-यात्रा-22: एवरेस्ट बेस कैंप - ताकशिंदो-ला से भारत
23. भारत प्रवेश के बाद: बॉर्डर से दिल्ली




Comments

  1. बड़ा खतरनाक रास्ता है, कहाँ से इतनी हिम्मत आती है भाई
    पहाड़ मुझे भी बहुत भाते हैं लेकिन सही सलामत अपने ठिकाने पर आकर

    ReplyDelete
  2. mount kailash restaurant के बोर्ड पर जो chapatti ( रोटी ) का दाम रु १५० लिखा हुआ है क्या सच में इतने का ही मिलता है ? इस हिसाब से लगभग १००० रूपये का भोजन एक बार में बहुत ज्यादा है /

    ReplyDelete
    Replies
    1. हाँ जी, जितनी कीमत मेन्यू में लिखी है, उतने ही नेपाली रुपये लगते हैं...

      Delete
  3. 24 फरवरी को amazon के द्वारा आपकी तीनो पुस्तकें प्राप्त हुई और उसी दिन ही हमसफर एवेरेस्ट पेज संख्या 50 तक पढ़ भी ली। बहुत ही रोचक लेख हैं। जैसे लग रहा है कि स्वयं ही घूम रहे हों। बहुत ही सुंदर लेख।

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

रोरिक आर्ट गैलरी, नग्गर

इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । नग्गर का जिक्र हो और रोरिक आर्ट गैलरी का जिक्र न हो, असम्भव है। असल में रोरिक ने ही नग्गर को अन्तर्राष्ट्रीय पहचान दी है। निकोलस रोरिक एक रूसी चित्रकार था। उसकी जीवनी पढने से पता चलता है कि एक चित्रकार होने के साथ-साथ वह एक भयंकर घुमक्कड भी था। 1917 की रूसी क्रान्ति के समय उसने रूस छोड दिया और इधर-उधर घूमता हुआ अमेरिका चला गया। वहां से वह भारत आया लेकिन नग्गर तब भी उसकी लिस्ट में नहीं था। पंजाब से शुरू करके वह कश्मीर गया और फिर लद्दाख, कराकोरम, खोतान, काशगर होते हुए तिब्बत में प्रवेश किया। तिब्बत में उन दिनों विदेशियों के प्रवेश पर प्रतिबन्ध था। वहां किसी को मार डालना फूंक मारने के बराबर था। रोरिक भी मरते-मरते बचा और भयंकर परिस्थितियों का सामना करते हुए उसने सिक्किम के रास्ते भारत में पुनः प्रवेश किया और नग्गर जाकर बस गये। एक रूसी होने के नाते अंग्रेज सरकार निश्चित ही उससे बडी चौकस रहती होगी।

जनवरी में स्पीति: किब्बर भ्रमण

8 जनवरी 2016 बारह बजे के आसपास जब किब्बर में प्रवेश किया तो बर्फबारी बन्द हो चुकी थी, लेकिन अब तक तकरीबन डेढ-दो इंच बर्फ पड चुकी थी। स्पीति में इतनी बर्फ पडने का अर्थ है कि सबकुछ सफेद हो गया। मौसम साफ हो गया। इससे दूर-दूर तक स्पीति की सफेदी दिखने लगी। गजब का नजारा था। किब्बर लगभग 4200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इसे दुनिया का सबसे ऊंचा गांव माना जाता है। हालांकि लद्दाख में एकाध गांव इससे भी ऊंचा मिल जायेगा, लेकिन फिर भी यह सबसे ऊंचे गांवों में से तो है ही। यहां पहला कदम रखते ही एक सूचना लिखी दिखी - “आमतौर पर यह परांग ला दर्रा (18800 फीट) माह जून से सितम्बर के बीच खुला रहता है। फिर भी जाने से पहले इसकी सूचना प्रशासन काजा से जरूर लें (दूरभाष संख्या 1906-222202) तथा खास कर 15 सितम्बर के पश्चात दर्रे को पार करने की कोशिश घातक हो सकती है। यदि आप स्थानीय प्रदर्शक को साथ लें तो यह आपकी सुरक्षा के लिये उचित होगा।”

2016 की यात्राओं का लेखा-जोखा

यह साल बड़ा ही उलट-पुलट भरा रहा। जहाँ एवरेस्ट बेस कैंप जैसी बड़ी और यादगार यात्रा हुई, वहीं मणिमहेश परिक्रमा जैसी हिला देने वाली यात्रा भी हुई। इस वर्ष बाकी वर्षों के मुकाबले ऑफिस से सबसे ज्यादा छुट्टियाँ लीं और संख्यात्मक दृष्टि से सबसे कम यात्राएँ हुईं। केवल नौ बार बाहर जाना हुआ, जिनमें छह बड़ी यात्राएँ थीं और तीन छोटी। बड़ी यात्राएँ मलतब एक सप्ताह या उससे ज्यादा। इस बार न छुटपुट यात्राएँ हुईं और न ही उतनी ट्रेनयात्राएँ। जबकि दो-दिनी, तीन-दिनी छोटी यात्राएँ भी कई बार बड़ी यात्रा से ज्यादा अच्छे फल प्रदान कर जाती हैं।  ज्यादा न लिखते हुए मुख्य विषय पर आते हैं: