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वुड़ फॉसिल पार्क, आकल, जैसलमेर

20 दिसंबर 2012
हम तनोट में थे। सुबह उठे तो मंदिर में आरती समाप्त होने वाली थी। जाकर एक बार फिर दर्शन किये और प्रसाद लिया। कैंटीन में चाय पी और निकल पड़े - अपने दिल्ली वापसी के सफ़र पर। तनोट से निकलते ही घंटियाली माता का मंदिर है। रेत का ऊँचा धोरा भी है। अच्छी लोकेशन पर है यह मंदिर। इसकी भी देखरेख बी.एस.एफ. ही करती है। इसलिये फोटो लेने पर कोई रोक नहीं।
सड़क दो-लेन की है, बेहद शानदार बनी है। पिछली बार जब मैं साइकिल से आया था, तो यह सिंगल थी और इसे दोहरा बनाने का काम चल रहा था।
रास्ते में रणाऊ गाँव आता है। यह भी रेत के टीलों से घिरा है और इसकी स्थिति भी फोटोग्राफी के लिये शानदार है। कहते हैं कि यहाँ कुछ फिल्मों की भी शूटिंग हो चुकी है।

आप तनोट जायें और रामगढ़ न रुकें, ऐसा नहीं हो सकता। और अगर ऐसा हो गया तो समझिये कि आपकी तनोट यात्रा अधूरी है। यहाँ खाने-पीने की कई दुकानें हैं। कोई अगर भूखे पेट हो और उसे समोसे, ब्रेड़-पकौड़े, मिर्ची-बड़े आदि दिख जायें तो वो यहाँ रुकेगा क्यों नहीं? इस यात्रा में हमारा सामना पहले दिन से ही मिर्ची-बड़े से होता आ रहा था, लेकिन इसका स्वाद लिया आज रामगढ़ आकर। मिर्ची के नाम से ही हम सबको मिर्ची लगती थी, इसलिये कहीं भी इसे लेने की हिम्मत नहीं जुटा सके। आज हिम्मत जुटा ली। पहले एक मिर्ची-बड़ा लिया। और जाते-जाते छह मिर्ची-बड़े और खा चुके थे।
रामगढ़ से चले तो सीधे जैसलमेर रुके और जैसलमेर से चले तो सीधे आकल वुड़ फॉसिल पार्क। यह बाड़मेर रोड़ पर जैसलमेर से 18 किलोमीटर दूर है। इस राष्ट्रीय राजमार्ग को चार-लेन बनाने का काम चल रहा है, इसलिये सड़क भी अच्छी नहीं है और डायवर्जन भी बहुत हैं।
फॉसिल पार्क का द्वार बंद था। कई बार हॉर्न बजाया, लेकिन कोई नहीं दिखा। हारकर दरवाजे के ही फोटो लिये और वापस मुड़ लिये। तभी अंदर से कोई आता दिखा। दरवाजा खुला, 5-5 रुपये की हमारी और 10 रुपये की बाइक की पर्ची कटी और हम अंदर प्रवेश कर गये। दरवाजा फिर से उसी तरह बंद कर दिया गया।
राजस्थान सरकार द्वारा लगायी गयी सूचना के अनुसार:
“पश्चिमी राजस्थान का जैसलमेर का शुष्क-रेतीला मरु क्षेत्र लगभग 18 करोड़ वर्ष पूर्व एक अत्यंत नम उष्ण जलवायु का क्षेत्र था। इस पूरे क्षेत्र में घने वन थे। उस समय के इन ऊँचे वृक्षों के तनों के जीवाश्म (Wood Fossils) आज भी जैसलमेर से 17 किलोमीटर दूर अतीत की याद दिलवाते हैं।
हरी-भरी वनस्पति व जीव के मरते ही उसका ह्रास होना प्रारंभ हो जाता है और कुछ ही समय में वे बिलकुल नष्ट हो जाते हैं। किंतु यदि ह्रास प्रारंभ होने से पहले ही वे अचानक मिट्टी की परत में किसी सागर या झील के तल में दब जाते हैं तो उनके कठोर भाग जैसे तना, बीज व फल शनै-शनै पत्थर के हो जाते हैं। इस प्रक्रिया में इनके ओरगेनिक (Organic) पदार्थ, इन-ओरगेनिक पदार्थों में रूपांतरित हो जाते हैं। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे काफी समय लेती है। पर यह रूपांतरण इतना संपूर्ण होता है कि वृक्ष की संरचना की सूक्ष्म से सूक्ष्म कोशिका भी संधारित हो जाती है। इस प्रक्रिया को जीवाश्म (Petrification) कहते हैं।
कालांतर में भौमिकी गतिविधियों के कारण यह जीवाश्म पुनः पृथ्वी की सतह पर आ जाते हैं। आकल वुड़ फॉसिल पार्क भी इसी प्रकार का एक स्थल है। वुड़ फॉसिल के अध्ययन से इनकी आयु, उस समय की वनस्पति तथा क्षेत्र के उस समय के जलवायु व अन्य विषयों की जानकारी प्राप्त करना संभव होता है।
फॉसिल हमारी राष्ट्रीय विरासत है। आने वाली पीढ़ियों को भी इन्हें देखना है। कृपया यहाँ से केवल ज्ञान प्राप्त करें, फॉसिल नहीं।
यह पार्क लगभग एक किलोमीटर लंबाई में फैला है। मोटरसाइकिल से घूमा जा सकता है। जहाँ-जहाँ भी वुड़ फॉसिल हैं, वहाँ-वहाँ उसके ऊपर लोहे की जाली लगा रखी है, ताकि कोई इन्हें नुकसान न पहुँचा सके। वुड़ फॉसिल का यह पूरा इलाका पूरी तरह पथरीला है।
एक संग्रहालय भी बना हुआ है। इसमें छोटे-छोटे वुड़ फॉसिल रखे हैं। इसमें सबसे अच्छी बात यह लगी कि यहाँ प्रत्येक फॉसिल का नाम, उसका प्राप्ति स्थान और प्राप्ति वर्ष भी लिखा हुआ है।
एक लोकल सड़क से हम जोधपुर रोड़ पर आ गये। भादरिया माता के मंदिर पहुँचे। यहाँ मेरी इच्छा पुस्तकालय देखने की थी। बताते हैं कि यहाँ का पुस्तकालय बहुत बड़ा है और देश के बड़े पुस्तकालयों में इसकी गिनती होती है। लेकिन पुस्तकालय से संबंधित यहाँ एक भी सूचना-पट्ट नहीं लगा है। आपको पहले से ही इसके बारे में पता होगा, तो ठीक है। अन्यथा सीधे यहाँ आकर आपको कभी भी इसकी जानकारी नहीं हो सकती।
एक दुकान वाले से पुस्तकालय की स्थिति की जानकारी ली, तो उसने बताया कि ऑफिस में जाओ और वहाँ से चाबी ले लेना। पूछते-पाछते ऑफिस में गये, बाहर एक जोड़ी चप्पलें रखी थीं, अंदर कोई नहीं था। फिर दूसरे कमरे से निकल रहे एक आदमी से पूछा तो उसने हमें डाँट दिया - “तुम्हें दिखायी नहीं देता क्या? वहाँ बाहर चप्पलें निकली हैं, तो साहब अंदर ही हैं।” कोई और जगह होती, तो मैं ‘भाड़ में जाओ’ कहकर यहाँ से चला जाता, लेकिन पुस्तकालय देखने का लालच था।
थोड़ी देर में साहब नंगे पैर बाहर से आये। चाबी माँगने पर बोले - “पुस्तकालय खुला है, ऊपर जाओ।” सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर पहुँचे, पुस्तकालय बंद था। वहीं बैठे एक कर्मचारी ने बताया - “पुस्तकालय तो बंद है। उधर नीचे जाकर ऑफिस में साहब मिलेंगे, उनसे चाबी लेकर आ जाओ।” अब तक दिमाग ख़राब हो चुका था। फिर भी ऑफिस में गये, चाबी माँगी तो साहब ने रूखा-सा जवाब दे दिया - “क्या चाबी-चाबी लगा रखी है! पुस्तकालय खुला है, ऊपर जाओ।”
अब पुस्तकालय नहीं देखना। “भाड़ में जाओ और आग लगे तुम्हारे इस पुस्तकालय को।”
हज़ारों-लाखों किताबें केवल इसलिये संग्रहीत किये जा रहे हैं ताकि यह देश की, दुनिया की सबसे बड़ी लाइब्रेरी बन जाये। लाखों, करोड़ों रुपये सरकार इस पर खर्च करती होगी, केवल इसलिये ताकि पुस्तकें ताले में बंद रहें।
रात होने तक रामदेवरा पहुँच गये और एक धर्मशाला में 300 रुपये का कमरा लेकर सो गये।





















टिटहरी
भादरिया माता जाने वाली सड़क








(आपको कौन-सा फोटो सबसे अच्छा लगा? अवश्य बताएँ।)

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8 comments:

  1. 4 5 6 no. Photo ache aaye hain blog k liye. Personal photos bhi ache hain.

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  2. अकल फॉसिल पार्क बहुत बढ़िया तो नही लगा लेकिन इसके आसपास की जगह सुन्दर और देखने लायक हैं !!

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