Skip to main content

फोटो-यात्रा-9: एवरेस्ट बेस कैंप - सुरके से फाकडिंग

इस यात्रा के फोटो आरंभ से देखने के लिये यहाँ क्लिक करें
19 मई 2016
आज का दिन हमारे लिये भावनात्मक रूप से बड़ा मुश्किल रहा। हमारे साथी कोठारी जी ने वापस जाने का निर्णय लिया। एक बार तो हम भी उनके साथ ही वापस चल देने का मन बना चुके थे।
“अक्सर वापस लौटने का भी कई बार मन कर जाता था, लेकिन हमें बेस कैंप भी जाना था। एक ही बात हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रही थी - ज़िंदगी में एवरेस्ट बेस कैंप जाने का इसके बाद कभी भी मौका नहीं मिलेगा। अपना पसंदीदा काम करने के मौके सबको मिलते हैं, लेकिन आप उन्हें पहचान नहीं पाते। हमें बड़ी मुश्किलों से यह मौका मिला था, इसे गँवा नहीं सकते थे।”
“यह काफ़ी निराशाजनक समय था। हमारे भी मन में आया कि उनके साथ ही लौट चलते हैं। दुनिया में और भी अनदेखे स्थान हैं। क्या हासिल होगा एवरेस्ट बेस कैंप जाकर? लेकिन इस तरह का कोई भी त्वरित निर्णय लेने से पहले थोड़ा रुक जाना चाहिये। हम तात्कालिक परिस्थितियों से प्रभावित होकर निर्णय लेते हैं और बाद में पछताते हैं। रुक जाने से, आराम करने से, शांत हो जाने से हमारे सोचने का दायरा बढ़ जाता है और हम तात्कालित परिस्थितियों के प्रभाव में नहीं आते। वापस हमें भी लौटना था, लेकिन आज हम जल्दी रुककर इस निर्णय के बारे में और ज्यादा पुनर्विचार करना चाहते थे।”

एवरेस्ट बेस कैंप ट्रैक पर आधारित मेरी किताब ‘हमसफ़र एवरेस्ट का एक अंश। किताब तो आपने पढ़ ही ली होगी, अब आज की यात्रा के फोटो देखिये:








सुरके में प्रयोग के तौर पर लिये ‘फ्राइड पोटैटो’, जिन्होंने हमें आगे की यात्रा के लिये नया स्वाद दे दिया...


कोठारी जी फैसला कर चुके थे कि वे वापस लौटेंगे... और हम कई कोशिशों के बाद भी उनके इस निर्णय को बदलवा नहीं सके...

बायें नामचे, दाहिने लुकला... यहीं से कोठारी जी अलग हो गये...






‘मैन इन ब्लू’... कोठारी जी के साथ आख़िरी फोटो...











चलती-फिरती दुकानें...

छेपलुंग... 






इस दुकान से हमने केले लिये... 500 रुपये के एक दर्जन...

इस दिन हमने केवल केलों का ही लंच किया...

होटलों की भरमार... और एक से बढ़कर एक आलीशान...





चलती-फिरती दुकानें आराम कर रही हैं...

यहीं आज हम रुके...










अगला भाग: फोटो-यात्रा-10: एवरेस्ट बेस कैंप - फाकडिंग से नामचे बाज़ार


1. फोटो-यात्रा-1: एवरेस्ट बेस कैंप - दिल्ली से नेपाल
2. फोटो-यात्रा-2: एवरेस्ट बेस कैंप - काठमांडू आगमन
3. फोटो-यात्रा-3: एवरेस्ट बेस कैंप - पशुपति दर्शन और आगे प्रस्थान
4. फोटो-यात्रा-4: एवरेस्ट बेस कैंप - दुम्जा से फाफलू
5. फोटो-यात्रा-5: एवरेस्ट बेस कैंप - फाफलू से ताकशिंदो-ला
6. फोटो-यात्रा-6: एवरेस्ट बेस कैंप - ताकशिंदो-ला से जुभिंग
7. फोटो-यात्रा-7: एवरेस्ट बेस कैंप - जुभिंग से बुपसा
8. फोटो-यात्रा-8: एवरेस्ट बेस कैंप - बुपसा से सुरके
9. फोटो-यात्रा-9: एवरेस्ट बेस कैंप - सुरके से फाकडिंग
10. फोटो-यात्रा-10: एवरेस्ट बेस कैंप - फाकडिंग से नामचे बाज़ार
11. फोटो-यात्रा-11: एवरेस्ट बेस कैंप - नामचे बाज़ार से डोले
12. फोटो-यात्रा-12: एवरेस्ट बेस कैंप - डोले से फंगा
13. फोटो-यात्रा-13: एवरेस्ट बेस कैंप - फंगा से गोक्यो
14. फोटो-यात्रा-14: गोक्यो और गोक्यो-री
15. फोटो-यात्रा-15: एवरेस्ट बेस कैंप - गोक्यो से थंगनाग
16. फोटो-यात्रा-16: एवरेस्ट बेस कैंप - थंगनाग से ज़ोंगला
17. फोटो-यात्रा-17: एवरेस्ट बेस कैंप - ज़ोंगला से गोरकक्षेप
18. फोटो-यात्रा-18: एवरेस्ट के चरणों में
19. फोटो-यात्रा-19: एवरेस्ट बेस कैंप - थुकला से नामचे बाज़ार
20. फोटो-यात्रा-20: एवरेस्ट बेस कैंप - नामचे बाज़ार से खारी-ला
21. फोटो-यात्रा-21: एवरेस्ट बेस कैंप - खारी-ला से ताकशिंदो-ला
22. फोटो-यात्रा-22: एवरेस्ट बेस कैंप - ताकशिंदो-ला से भारत
23. भारत प्रवेश के बाद: बॉर्डर से दिल्ली




Comments

  1. आनंद आ गया जी, धन्यवाद।

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

हल्दीघाटी- जहां इतिहास जीवित है

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । हल्दीघाटी एक ऐसा नाम है जिसको सुनते ही इतिहास याद आ जाता है। हल्दीघाटी के बारे में हम तीसरी चौथी कक्षा से ही पढना शुरू कर देते हैं: रण बीच चौकडी भर-भर कर, चेतक बन गया निराला था। राणा प्रताप के घोडे से, पड गया हवा का पाला था। 18 अगस्त 2010 को जब मैं मेवाड (उदयपुर) गया तो मेरा पहला ठिकाना नाथद्वारा था। उसके बाद हल्दीघाटी। पता चला कि नाथद्वारा से कोई साधन नहीं मिलेगा सिवाय टम्पू के। एक टम्पू वाले से पूछा तो उसने बताया कि तीन सौ रुपये लूंगा आने-जाने के। हालांकि यहां से हल्दीघाटी लगभग पच्चीस किलोमीटर दूर है इसलिये तीन सौ रुपये मुझे ज्यादा नहीं लगे। फिर भी मैंने कहा कि यार पच्चीस किलोमीटर ही तो है, तीन सौ तो बहुत ज्यादा हैं। बोला कि पच्चीस किलोमीटर दूर तो हल्दीघाटी का जीरो माइल है, पूरी घाटी तो और भी कम से कम पांच किलोमीटर आगे तक है। चलो, ढाई सौ दे देना। ढाई सौ में दोनों राजी।

डोडीताल यात्रा- उत्तरकाशी से अगोडा

इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 31 मार्च 2015 दोपहर बाद दो बजे हम उत्तरकाशी से पांच किलोमीटर आगे गंगोरी में थे। यहां असी गंगा पर पुल बना हुआ है। यहीं से डोडीताल का रास्ता अलग हो जाता है। दस किलोमीटर आगे संगमचट्टी तक तो सडक बनी है, उसके बाद 23 किलोमीटर पैदल चलना पडता है, तब हम डोडीताल पहुंच सकते हैं। गंगोरी में एक जीप वाले से संगमचट्टी के रास्ते की बाबत पूछा तो उसने बताया कि यह रास्ता बहुत खराब है। बाइक जानी भी मुश्किल है, आप बाइक यहीं खडी कर दो और संगमचट्टी के लिये टैक्सी कर लो। हम अभी थोडी ही देर पहले धरासू बैंड से उत्तरकाशी आये थे। वहां भी कई जगह बडी खराब सडक थी। हम दोनों ने एक दूसरे को देखा और कहा- उससे भी ज्यादा खराब सडक मिलेगी क्या? और बाइक पर ही चल पडे।

लद्दाख साइकिल यात्रा- चौथा दिन- मढी से गोंदला

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 7 जून 2013, स्थान मढी पांच बजे आंख खुली। सोच रखा था कि आज जितनी जल्दी हो सके, निकल जाना है। बाद में रोहतांग जाने वाली गाडियों का जबरदस्त रेला हमें चलने में समस्या पैदा करेगा। फिर भी निकलते निकलते साढे छह बज गये। सचिन को साइकिल का अच्छा अभ्यास है, वो आगे निकल गया। कुछ आगे चलकर खराब सडक मिली। इस पर कीचड ही कीचड था। जहां तक हो सका, साइकिल पर बैठकर ही चला। बाद में नीचे भी उतरना पडा और पैदल चला। पीछे से गाडियों का काफिला आगे निकलता ही जा रहा था, वे ठहरे जल्दबाज जैसे कि रोहतांग भाग जायेगा, कीचड के छींटे मुझ पर और साइकिल पर भी बहुत पडे। मढी समुद्र तल से 3300 मीटर की ऊंचाई पर है और रोहतांग 3900 मीटर पर, दोनों की दूरी है सोलह किलोमीटर। शुरू में सडक लूप बनाकर ऊपर चढती है। जिस तरह आगे सरचू के पास गाटा लूप हैं, उसी तरह इनका भी कुछ नाम होना चाहिये था जैसे कि मढी लूप। साढे आठ बजे चाय की गाडी मिली। यहां संकरी सडक की वजह से जाम भी लगा था। पन्द्रह मिनट बाद यहां से चल पडा।