Skip to main content

नील द्वीप में प्राकृतिक पुल के नज़ारे

20 जनवरी 2017
फोनिक्स-बे जेट्टी - हाँ यही नाम है इस जेट्टी का गूगल मैप में। नील और हैवलॉक जाने वाली बोट यहीं से चलती हैं। हमारी आज की नील द्वीप जाने की बुकिंग थी। सुबह सात बजे जहाज को चलना था, हम साढ़े छह बजे ही पहुँच गये। सुरक्षा-जाँच और चेक-इन के बाद वातानुकूलित जहाज में अपनी-अपनी सीटों पर जा बैठे।
दो घंटे की यह यात्रा थी। समुद्र अशांत था - शायद यह शांत ही कभी-कभार होता होगा। बड़ी-बड़ी लहरें आ रही थीं। भारी-भरकम जहाज को भी अच्छी तरह हिला देतीं। जी.पी.एस. चलाकर जहाज की गति नापी। यह बीस किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से चल रहा था। वैसे समुद्री दूरियों को ‘नॉटिकल मील’ में नापते हैं, लेकिन मुझे किलोमीटर ही समझ आता है।
इससे पहले कि हमें समुद्री बीमारी होती और उल्टी आती, हमने मोबाइलों में अपने-अपने पसंदीदा गेम खेलने शुरू कर दिये। मैंने अपने गेम में न जाने कितनी लंबी रेलवे लाइन बिछाकर इस पर ट्रेनें चलायीं और दीप्ति ने ‘सबवे सर्फ़र’ में न जाने कितनी ट्रेनों में टक्कर मारी। इस जहाज पर डेक पर जाने की मनाही थी।





बड़ी दूर से ही नील द्वीप दिखने लगा। इसका आधा चक्कर लगाकर जहाज जेट्टी पर जा लगा। बाहर निकलकर सामने ही लिखा था - नील द्वीप में आपका स्वागत है।
हमारे उतरने के बाद इस जहाज में हैवलॉक के यात्री बैठने लगे। अब यह जहाज हैवलॉक जायेगा। कल हमें भी इसी से हैवलॉक जाना है। इस तरह नील में घूमने के लिये हमारे पास पूरे चौबीस घंटे का समय था।
आलू की सब्जी, पूरियाँ और नारियल की चटनी - आनंद आ गया। ऊपर से बंगाली रसगुल्ले। जेट्टी के पास ही यह दुकान थी।
जिस होटल में हमारी बुकिंग थी, उसका कालापानी करके कुछ नाम था। जेट्टी से दो किलोमीटर दूर। शेयर्ड़ ऑटो चलते हैं, लेकिन जानकारी के अभाव में हमने यह दूरी पैदल तय की। रामनगर में यह होटल स्थित है और समुद्र के एकदम किनारे। बाँस की कॉटेज बनी थीं। एक का किराया था 800 रुपये। यह जनवरी में जाने का नुकसान है।
साइकिल किराये पर लेने की योजना बनायी, लेकिन 400 रुपये प्रति साइकिल प्रतिदिन किराया था। दो साइकिलें लेनी पड़तीं, इरादा टाल दिया। नील द्वीप है ही कितना बड़ा? पैदल घूमेंगे।
शेयर्ड़ ऑटो में दस-दस रुपये देकर वापस मुख्य बाज़ार आये - जेट्टी के पास ही। यहाँ से करीब दो किलोमीटर दूर ‘नैचुरल ब्रिज’ है। पक्की सड़क बनी थी, लेकिन हम पैदल ही गये। थक गये।
यहाँ भी कोरल तट है। कुछ दूर तट के साथ-साथ पैदल चलना होता है और हम पहुँचते हैं ‘नैचुरल ब्रिज’ के नीचे। अच्छी जगह है। प्राकृतिक आश्चर्य। प्रत्येक भारतीय को अपने देश में स्थित ऐसे स्थानों को अवश्य देखना चाहिये। ज्यादा वर्णन नहीं करेंगे, नीचे फोटो लगे हैं, उनका भी आनंद लेना है।
इससे भी करीब आधा किलोमीटर आगे एक पुल और दिख रहा था। वहाँ तक भी जाने की इच्छा थी, लेकिन कोरल तट व बड़ी-बड़ी लहरों के कारण यह इच्छा त्यागनी पड़ी। याद रखिये - यदि आप कोरल तट पर पानी में घुसे तो कितना भी सावधान हो जाओ, आपको चोटिल होना ही होना है। जो बच जाता है, वो भाग्यशाली होता है। हम पानी में घुसकर उस पुल तक पहुँच तो सकते थे, लेकिन चोटिल नहीं होना चाहते थे। यहीं खड़े होकर एक बुजुर्ग विदेशी से ‘वन फोटो प्लीज’ कहकर दो फोटो खिंचवा लिये।


इसी जहाज में बैठकर हम नील गये।




बस, इतना ही बड़ा है नील द्वीप...






मुख्य बाज़ार से नैचुरल ब्रिज जाने का रास्ता

एक विशेष प्रकार का कोरल








वो आख़िर में एक और पुल दिख रहा है... लेकिन कोरल होने के कारण वहाँ पहुँचना मुश्किल था...
















1. अंडमान यात्रा - दिल्ली से पोर्ट ब्लेयर
2. अंडमान यात्रा: सेलूलर जेल के फोटो
3. रॉस द्वीप - ऐसे खंड़हर जहाँ पेड़ों का कब्ज़ा है
4. नॉर्थ-बे बीच: कोरल देखने का उपयुक्त स्थान
5. नील द्वीप में प्राकृतिक पुल के नज़ारे
6. नील द्वीप: भरतपुर बीच और लक्ष्मणपुर बीच
7. राधानगर बीच @ हैवलॉक द्वीप
8. हैवलॉक द्वीप - गोविंदनगर बीच और वापस पॉर्ट ब्लेयर
9. अंडमान में बाइक यात्रा: चाथम आरा मशीन
10. अंडमान में बाइक यात्रा: माउंट हैरियट नेशनल पार्क
11. वंडूर बीच भ्रमण
12. अंडमान यात्रा की कुछ वीडियो



Comments

  1. Itni sundar jagah hai. Yaqeen nahi hota ki aisa sthan apne desh me hi hai. Duniya me sabse khoobsoorat desh mera, par pata nahi kyu kuch log din-raat Europe, USA aadi ke gungan karte rahte hai aur Bharat ki burai. Unhe dekhna chahiye aise sthan, taki pata chale ki duniya me jannat hamara hi desh hai.
    Aap ki lekhni ke gum kaayal hain. Photography ka to jawab hi nahi.

    Umesh Pandey

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

डायरी के पन्ने- 30 (विवाह स्पेशल)

ध्यान दें: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं। 1 फरवरी: इस बार पहले ही सोच रखा था कि डायरी के पन्ने दिनांक-वार लिखने हैं। इसका कारण था कि पिछले दिनों मैं अपनी पिछली डायरियां पढ रहा था। अच्छा लग रहा था जब मैं वे पुराने दिनांक-वार पन्ने पढने लगा। तो आज सुबह नाइट ड्यूटी करके आया। नींद ऐसी आ रही थी कि बिना कुछ खाये-पीये सो गया। मैं अक्सर नाइट ड्यूटी से आकर बिना कुछ खाये-पीये सो जाता हूं, ज्यादातर तो चाय पीकर सोता हूं।। खाली पेट मुझे बहुत अच्छी नींद आती है। शाम चार बजे उठा। पिताजी उस समय सो रहे थे, धीरज लैपटॉप में करंट अफेयर्स को अपनी कापी में नोट कर रहा था। तभी बढई आ गया। अलमारी में कुछ समस्या थी और कुछ खिडकियों की जाली गलकर टूटने लगी थी। मच्छर सीजन दस्तक दे रहा है, खिडकियों पर जाली ठीकठाक रहे तो अच्छा। बढई के आने पर खटपट सुनकर पिताजी भी उठ गये। सात बजे बढई वापस चला गया। थोडा सा काम और बचा है, उसे कल निपटायेगा। इसके बाद धीरज बाजार गया और बाकी सामान के साथ कुछ जलेबियां भी ले आया। मैंने धीरज से कहा कि दूध के साथ जलेबी खायेंगे। पिताजी से कहा तो उन्होंने मना कर दिया। यह मना करना मुझे ब...

जाटराम की पहली पुस्तक: लद्दाख में पैदल यात्राएं

पुस्तक प्रकाशन की योजना तो काफी पहले से बनती आ रही थी लेकिन कुछ न कुछ समस्या आ ही जाती थी। सबसे बडी समस्या आती थी पैसों की। मैंने कई लेखकों से सुना था कि पुस्तक प्रकाशन में लगभग 25000 रुपये तक खर्च हो जाते हैं और अगर कोई नया-नवेला है यानी पहली पुस्तक प्रकाशित करा रहा है तो प्रकाशक उसे कुछ भी रॉयल्टी नहीं देते। मैंने कईयों से पूछा कि अगर ऐसा है तो आपने क्यों छपवाई? तो उत्तर मिलता कि केवल इस तसल्ली के लिये कि हमारी भी एक पुस्तक है। फिर दिसम्बर 2015 में इस बारे में नई चीज पता चली- सेल्फ पब्लिकेशन। इसके बारे में और खोजबीन की तो पता चला कि यहां पुस्तक प्रकाशित हो सकती है। इसमें पुस्तक प्रकाशन का सारा नियन्त्रण लेखक का होता है। कई कम्पनियों के बारे में पता चला। सभी के अलग-अलग रेट थे। सबसे सस्ते रेट थे एजूक्रियेशन के- 10000 रुपये। दो चैप्टर सैम्पल भेज दिये और अगले ही दिन उन्होंने एप्रूव कर दिया कि आप अच्छा लिखते हो, अब पूरी पुस्तक भेजो। मैंने इनका सबसे सस्ता प्लान लिया था। इसमें एडिटिंग शामिल नहीं थी।

लद्दाख बाइक यात्रा- 1 (तैयारी)

बुलेट निःसन्देह शानदार बाइक है। जहां दूसरी बाइक के पूरे जोर हो जाते हैं, वहां बुलेट भड-भड-भड-भड करती हुई निकल जाती है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि लद्दाख जाने के लिये या लम्बी दूरी की यात्राओं के लिये बुलेट ही उत्तम है। बुलेट न हो तो हम यात्राएं ही नहीं करेंगे। बाइक अच्छी हालत में होनी चाहिये। बुलेट की भी अच्छी हालत नहीं होगी तो वह आपको ऐसी जगह ले जाकर धोखा देगी, जहां आपके पास सिर पकडकर बैठने के अलावा कोई और चारा नहीं रहेगा। अच्छी हालत वाली कोई भी बाइक आपको रोहतांग भी पार करायेगी, जोजी-ला भी पार करायेगी और खारदुंग-ला, चांग-ला भी। वास्तव में यह मशीन ही है जिसके भरोसे आप लद्दाख जाते हो। तो कम से कम अपनी मशीन की, इसके पुर्जों की थोडी सी जानकारी तो होनी ही चाहिये। सबसे पहले बात करते हैं टायर की। टायर बाइक का वो हिस्सा है जिस पर सबसे ज्यादा दबाव पडता है और जो सबसे ज्यादा नाजुक भी होता है। इसका कोई विकल्प भी नहीं है और आपको इसे हर हाल में पूरी तरह फिट रखना पडेगा।