Skip to main content

अंडमान में बाइक यात्रा: माउंट हैरियट नेशनल पार्क

23 जनवरी, 2017
तो हम बंबू-फ्लैट पहुँच गये। बढ़िया रोचक नाम है - बंबू-फ्लैट। यहाँ से चाथम बहुत नज़दीक है और नियमित बोट चलती हैं। हम बोट में रखकर भी बाइक को इधर ला सकते थे, लेकिन अंडमान की सड़कों को भी नापना चाहते थे। बंबू-फ्लैट से थोड़ा आगे एक तिराहा है, जहाँ से एक रास्ता नोर्थ-बे जाता है। रास्ता टूटा-फूटा था, लेकिन शायद बाइक तो चली ही जाती होगी। हम कुछ दिन पहले नोर्थ-बे जा चुके थे, तो आज वहाँ जाने की आवश्यकता नहीं थी।
25-25 रुपये की हमारी और 20 रुपये की बाइक की पर्ची कटी। आख़िरी दो-तीन किलोमीटर तक चढ़ाई बड़ी जोरदार है, लेकिन सड़क अच्छी बनी है। रास्ता - ऑफ़ कोर्स - घने जंगल से होकर गुज़रता है। फिर एक जगह पार्किंग है और बाइक यहीं खड़ी करके हम आगे चल दिये।




यहाँ कुछ विश्राम-गृह भी बने थे। सुना है कि इनकी बुकिंग पोर्ट ब्लेयर से होती है। समुद्र तल से 300 मीटर से भी ऊपर है यह स्थान। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की तीसरी सबसे ऊँची चोटी। कुछ व्यू-पॉइंट बने हैं, जहाँ से रॉस द्वीप, नोर्थ-बे और यहाँ तक कि नील द्वीपहैवलॉक द्वीप भी देखे जा सकते हैं।
एक पगडंडी जाती दिखी। लिखा था - वेलकम टू कालापत्थर, ढाई किलोमीटर। होगी कोई जगह कालापत्थर नाम की। इधर घना जंगल ही है। अवश्य यह जंगल वॉक है। कालापत्थर नाम का न कोई गाँव होगा और न ही कुछ और। इरादा बनाया तकरीबन एक किलोमीटर इस पर जाकर वापस आ जाने का। आख़िर हम नेशनल पार्क में थे, कुछ जंगल-वंगल तो होना ही चाहिये।
थोड़ा आगे बढ़े। एक जगह लिखा था - गन पॉइंट 80 मीटर। यहाँ कोई गन तो नहीं थी, लेकिन कुछ बना था। नीचे फोटो में देख लेना।
जंगल भ्रमण के लिये यह पगडंडी एकदम उपयुक्त है। पेड़ एक-दूसरे में बुरी तरह गुँथे हुए थे। अचानक एक गिरगिट ने रास्ता काटा। भला गिरगिट से क्या डरना? पास ही कोई पक्षी बड़ी डरावनी आवाज़ में बोल रहा था। सामने से दो लोग आते दिखे। वे भी पर्यटक ही थे - हमारी तरह। बताने लगे कि वे कालापत्थर तक गये थे, ऐसा ही जंगल है।
तकरीबन एक किलोमीटर बाद हम वापस मुड़ गये। बाइक उठायी और फिर से अंडमान की सड़कों को नापने लगे।












अंडमान का राजकीय पक्षी - अंडमानी कबूतर




हैरियट से दिखता नॉर्थ-बे बीच


अच्छी चीज है ... हैरियट आने वाले प्रत्येक यात्री को इस रास्ते पर चहलकदमी अवश्य करनी चाहिये...


बस, यही है गन पॉइंट...














बंबू-फ्लैट जेट्टी के पास समुद्र

बंबू-फ्लैट से दिखता चाथम द्वीप


फ़रारगंज से दूरियाँ

अंडमान की लाइफ-लाइन - अंडमान ट्रंक रोड़







1. अंडमान यात्रा - दिल्ली से पोर्ट ब्लेयर
2. अंडमान यात्रा: सेलूलर जेल के फोटो
3. रॉस द्वीप - ऐसे खंड़हर जहाँ पेड़ों का कब्ज़ा है
4. नॉर्थ-बे बीच: कोरल देखने का उपयुक्त स्थान
5. नील द्वीप में प्राकृतिक पुल के नज़ारे
6. नील द्वीप: भरतपुर बीच और लक्ष्मणपुर बीच
7. राधानगर बीच @ हैवलॉक द्वीप
8. हैवलॉक द्वीप - गोविंदनगर बीच और वापस पॉर्ट ब्लेयर
9. अंडमान में बाइक यात्रा: चाथम आरा मशीन
10. अंडमान में बाइक यात्रा: माउंट हैरियट नेशनल पार्क
11. वंडूर बीच भ्रमण
12. अंडमान यात्रा की कुछ वीडियो



Comments

  1. प्रकृति के बीच रहकर कब समय निकल जाता है पता ही नहीं चलता

    ReplyDelete
    Replies
    1. सही कहा कविता जी आपने, धन्यवाद आपका...

      Delete
  2. Fursat ke lamhe bitane ke liye acha sthan hai yah.

    Achi photography

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत बहुत धन्यवाद उमेश भाई...

      Delete
  3. दिनों दिन आपकी पोस्ट छोटी होती जा रही है । कुछ और बताते तो और मजा आता । फोटो बहुत ही खूबसूरत है ।

    ReplyDelete
    Replies
    1. क्षमा करना सर जी, अंडमान यात्रा की सभी पोस्टें छोटी ही हैं और इसके बारे में पहले ही फेसबुक पर भी और ब्लॉग पर भी सूचित कर दिया था। व्यक्तिगत कारणों से ऐसा करना आवश्यक था।

      Delete
  4. बीच के साथ ही हराभरा घना जंगल क्या खूबसूरत नज़ारे पेश करता है,और ऊपर से आपके द्वारा सजीव वरणन ,वाह क्या बात है।

    ReplyDelete
  5. अधिकत्तर ब्लागर सिर्फ चर्चित जगहो को स्थान देते है । आपने कुछ कम चर्चित अनछूआ जगहो को सामने से लिए है ।

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद कपिल भाई...

      Delete
    2. संतुलित लेखनी और शानदार फोटोग्राफी, एक बार फिर बधाई।

      Delete
  6. बढ़िया जंगल सफारी ! ये आखिर के फोटो में फल कौन सा है , एक दो पका हुआ है और बाकी हरे ? क्या फल है वो

    ReplyDelete
  7. नील और हैवलॉक पर रूम बुक कहाँ से करना ठीक है

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

पुरी यात्रा- जगन्नाथ मन्दिर और समुद्र तट

इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 23 अगस्त 2011 को दोपहर तक कोणार्क से मैं वापस पुरी आ गया। टम्पू वाले ने सीधा जगन्नाथ मन्दिर के सामने ही जा पटका। नीचे उतरते ही पण्डों ने घेर लिया कि आ गया शिकार। मैं खुद कभी पूजा-पाठ करता नहीं हूं, पण्डों की क्या मजाल कि यहां भी मुझसे करवा दें। पता चला कि अन्दर मन्दिर में जूते-चप्पल, मोबाइल, कैमरा नहीं ले जा सकते। चप्पल निकालकर मैंने मन्दिर के सामने ही जूताघर में रख दिये। जेब में मोबाइल और कैमरा, पीछे कमर पर बैग लादकर मैं मन्दिर में घुसने लगा। ‘सुरक्षाकर्मियों’ ने सीधे जेब पर हाथ मारा और कहा कि इसे अन्दर नहीं ले जा सकते। वापस जाओ। वापस गया और कैमरा, मोबाइल भी वही जूताघर में रख आया। अब धर्म के इन ठेकेदारों का कायदा-कानून देखिये कि किसी भी कथित सुरक्षाकर्मी ने मेरा भारी-भरकम बैग चेक तक नहीं किया, चेक करना तो दूर कन्धे से उतारने तक को नहीं कहा। मैं आश्चर्यचकित रह गया कि जिस सुरक्षा के नाम पर परम सुरक्षित मोबाइल, कैमरे को अन्दर नहीं ले जाने देते, वही घोर असुरक्षित बैग को कुछ नहीं कह रहे हैं। बस, एक इसी घटना के कारण भारत ...

मुगलसराय से गोमो पैसेंजर ट्रेन यात्रा

दिल्ली से मुगलसराय 1 सितम्बर 2014, सोमवार सितम्बर की पहली तारीख को मेरी नंदन कानन एक्सप्रेस छूट गई। सुबह साढे छह बजे नई दिल्ली से ट्रेन थी और मुझे ऑफिस में ही सवा छह बज गये थे। फिर नई दिल्ली जाने की कोशिश भी नहीं की और सीधा कमरे पर आ गया। इस बार मुझे मुगलसराय से हावडा को अपने पैसेंजर ट्रेन के नक्शे में जोडना था। ऐसा करने से दिल्ली और हावडा भी जुड जाते। दिल्ली-मुम्बई पहले ही जुडे हुए हैं। पहले भी हावडा की तरफ जाने की कोशिश की थी लेकिन पीछे हटना पडता था। इसका कारण था कि भारत के इस हिस्से में ट्रेनें बहुत लेट हो जाती हैं। चूंकि स्टेशनों के फोटो भी खींचने पडते थे, इसलिये सफर दिन में ही कर सकता था। इस तरह मुगलसराय से पहले दिन चलकर गोमो तक जा सकता था और दूसरे दिन हावडा तक। हावडा से वापस दिल्ली आने के लिये वैसे तो बहुत ट्रेनें हैं लेकिन शाम को ऐसी कोई ट्रेन नहीं थी जिससे मैं अगले दिन दोपहर दो बजे से पहले दिल्ली आ सकूं। थी भी तो कोई भरोसे की नहीं थी सिवाय राजधानी के। राजधानी ट्रेनें बहुत महंगी होती हैं, इसलिये मैं इन्हें ज्यादा पसन्द नहीं करता।

मैं जंगल में भटक गया

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । कुल्लू के पास बिजली महादेव का मन्दिर है। यहां से पूरा कुल्लू शहर और भून्तर साफ-साफ दिखाई देते हैं। जाने का एकमात्र रास्ता कुल्लू से ही है। लेकिन मैने इरादा किया भून्तर की तरफ से उतरने का। उतरने लगा तो कुछ चरवाहे मिले। उन्होने रास्ता बता दिया। उनके बताये रास्ते पर चलते हुए कुछ दूर जाने पर नीचे उतरती सीढियां मिलीं। सामने बहुत दूर पार्वती नदी दिख रही थी और मणिकर्ण जाने वाली सडक भी। सडक पर चलती हुईं कारें, बसें बहुत नन्ही-नन्ही दिख रही थीं। शाम के पांच बजे के आसपास का टाइम था। मैने अपना लक्ष्य रखा दो घण्टे में यानी सात बजे तक नीचे नदी तक उतरने का। पहाडों का जो थोडा बहुत अनुभव था, उससे अन्दाजा लगाया कि दो घण्टे में नदी तक उतरना बहुत मुश्किल काम है। इसीलिये चलने की स्पीड भी बढा दी।