Monday, July 16, 2018

“मेरा पूर्वोत्तर” - गोल्डन पैगोडा, नामसाई, अरुणाचल

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15 नवंबर 2017
अभी इनकी आरा मशीन में कोई काम नहीं हो रहा था। सभी कई दिनों से बंद थीं। असल में ये जो ‘प्रोडक्ट’ बनाते हैं, उनकी असम में घर बनाने के लिए बड़ी मांग है, तो इनका सारा माल असम में खप जाता है। दो महीनों बाद ‘पीक सीजन’ आएगा। बारिश से पहले सभी अपने-अपने घरों की मरम्मत और निर्माण पूरा कर लेना चाहेंगे।
“अरुणाचल में पैदा हुई चाय, असम चाय के नाम से बिकती है या अरुणाचल चाय के नाम से?”
“असम चाय के नाम से।”
“अरुणाचल चाय के नाम से बिकनी चाहिए।”
“कौन करेगा ऐसा? किस अरुणाचली को इतनी समझ है? चाय बागानों के मालिक सब बाहरी हैं। उन्हें क्या पड़ी है कि चाय अरुणाचल के नाम से बिके?”
इनके घर की बगल में भी एक बागान था। तसल्ली से फोटो खींचने के लिए कुछ देर इसमें भी गए। यह जानकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि चाय का एक पौधा 70 से 100 सालों तक चलता है। उसे कुछ देखभाल चाहिए और वह लगातार पत्तियाँ देता रहेगा।
हमारी आज की योजना थी कि सदिया पुल और भीष्मकनगर देखते हुए आज रात रोइंग रुकेंगे। कल की कल देखेंगे और परसों रात तक गुवाहाटी पहुँचना ही है। उससे अगले दिन हमारी दिल्ली की फ्लाइट है।
चौखाम तक रास्ता बहुत खराब था, लेकिन चौखाम में तिनसुकिया वाली सड़क मिल गई। हम कल ही इस सड़क से गए थे। सदिया पुल जाने के एक विकल्प के तौर पर इधर आलूबारी पुल होते हुए लोहित के उत्तरी किनारे-किनारे चलते जाना था, लेकिन हमने दक्षिण वाला रास्ता ही पकड़ा।
कल तो गोल्डन पैगोड़ा छोड़ दिया था, लेकिन आज नहीं छोड़ा। इसके पास ही ट्रैफिक पुलिस ने रोक लिए। हम रुके – “हाँ जी, कौन-से कागज दिखाने हैं?”
“आप दिल्ली से ही बाइक पर आए हो?”
“नहीं सर, गुवाहाटी से।”
“कागज तो पूरे ही होंगे?”
“आपको क्या लगता है?”
“हाँ, पूरे ही होंगे। फिर भी ‘पॉल्यूशन’ दिखा दो।”


ये हाल ही में प्रकाशित हुई मेरी किताब ‘मेरा पूर्वोत्तर’ के ‘असम के आर-पार फिर से’ चैप्टर के कुछ अंश हैं। किताब खरीदने के लिए नीचे बटन पर क्लिक करें:




मनोज जोशी और उनकी माताजी के साथ

मेदू में चाय के बागान




यह वो गोल्डन पैगोडा नहीं है, लेकिन देखने में उससे कम भी नहीं है।


ये कौन लोग हैं? हैं तो बाहरी ही... शायद अरुणाचल में काम के सिलसिले में जा रहे हैं...

और वो रहा गोल्डन पैगोडा












गोल्डन पैगोडा से दिखती बर्फ से ढकी दाफाबुम चोटी







अगला भाग: “मेरा पूर्वोत्तर” - ढोला-सदिया पुल - 9 किलोमीटर लंबा पुल

7 comments:

  1. वाकई शानदार, नीरज मुसाफिर जी

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  2. बेहद सुंदर चित्र,

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  3. वाकई,ये देखने लायक है।साथ ही बेहतरीन क्लिक,नीरज

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  4. इस देश के छिपे हुए खजानों को सामने ला रहे हैं। आप बधाई के पात्र हैं

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  5. neeraj g aap budde hote ja rahe ho, aapki body par changing dikh rahi hai, tour ke liye 500year age honi jaruri hai...

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  6. भारत के पूर्वोतर राज्यों के बारे में जो भ्रांतियां फैली है वो आपके लेख पढ़कर टूट रही है, वाकई मेरा पूर्वोतर खूबसूरती के मामले में किसी अन्य प्रदेश से कम नहीं है ! ऐसे खूबसूरत चित्र देखकर जो सुकून मिलता है वाकई वो बयाँ कर पाना मुश्किल है !

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