“मेरा पूर्वोत्तर” - शिवसागर

June 25, 2018
इस यात्रा-वृत्तांत को आरंभ से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
10 नवंबर 2017
हम शिवसागर में थे। मुझे और दीप्‍ति किसी को भी असम के बारे में कुछ नहीं पता था। शिवसागर का क्या महत्व है, वो भी नहीं पता। चार साल पहले लामडिंग से सिलचर जाते समय ट्रेन में एक साधु मिले थे। वे शिवसागर से आ रहे थे। उन्होंने शिवसागर की धार्मिक महत्‍ता के बारे में जो बताया था, तब से मन में अंकित हो गया था कि शिवसागर असम का हरिद्वार है। आज हम ‘हरिद्वार’ में थे। सोने से पहले थोड़ी देर इंटरनेट चलाया और हमें शिवसागर के बारे में काफी जानकारी हो गई। साथ ही यह भी पता चल गया कि कल हमें कहाँ-कहाँ जाना है और क्या-क्या देखना है।
हमें असम के बारे में कभी नहीं पढ़ाया गया। असम का इतिहास हमारे पाठ्यक्रम में कभी रहा ही नहीं। असम के नाम की उत्पत्‍ति बताई गई कि यहाँ की भूमि असमतल है, इसलिये राज्य का नाम अ-सम है। जबकि ऐसा नहीं है। यह असल में असोम है, जो अहोम से उत्पन्न हुआ है। सन् 1228 से सन् 1826 तक यानी लगभग 600 सालों तक यहाँ अहोम राजवंश का शासन रहा है। जब मुगल पूर्वोत्‍तर में पैर पसारने की जी-तोड़ कोशिश कर रहे थे, तो अहोम राजवंश ही था जिसने मुगलों को असम में घुसने भी नहीं दिया। लेकिन हमें मुगलों के बारे में सबकुछ बता दिया जाता है, अहोमों के बारे में कुछ नहीं बताया जाता।
यही कारण था कि हमें अपनी इस यात्रा के दौरान असम का कुछ भी नहीं पता था। कल जब पांगशू पास जाना मना हो गया तो शिवसागर के दर्शनीय स्थलों को देखने के लिए इंटरनेट का सहारा लिया। ज्यों-ज्यों ‘सर्फिंग’ करता चला गया, त्यों-त्यों आँखें खुलती चली गईं। अचरज हुआ कि हम तो अहोमों की राजधानी में थे। शिवसागर भी उनकी राजधानी रही है। अहोमों की पहली राजधानी चराइदेव थी जो शिवसागर से ज्यादा दूर नहीं। अभी भी चराइदेव में कुछ अवशेष बचे हैं। तय कर लिया कि हम जाएँगे चराइदेव भी। लेकिन पहले शिवसागर घूमेंगे।
तो 1699 में अहोम राजा रुद्र सिंह ने शिवसागर में कुछ निर्माण कार्य कराए। मुझे अभी भी ज्यादा कुछ नहीं पता है यहाँ के इतिहास के बारे में। तो इंटरनेट से टीपकर मैं फिलहाल इसका कच्चा-पक्का हिंदी अनुवाद नहीं करूँगा। कल जब हम शिवसागर आए थे तो इसके मुख्य तालाब ‘शिवसागर’ के किनारे-किनारे होकर आए थे। बगल में शिवडोल मंदिर भी देखा था, चलती बाइक से।
आज सबसे पहले वहीं पहुँचे। शिवसागर तालाब काफी बड़ा तालाब है। चारों ओर सड़क बनी है। खास बात यह है कि यह शहर से कुछ ऊपर बना है। हम जब पहुँचे तो पुलिस के बैरियर लगे थे। सुबह का समय पैदल चलने वालों और व्यायाम करने वालों का होता है। इसलिये इस समय इस परिक्रमा पथ पर कोई भी वाहन आ-जा नहीं सकता था। पुलिसवाले ने बड़े सलीके से हमें शिवडोल जाने का रास्ता समझा दिया।
मंदिर के सामने लगा असम टूरिज्म का बोर्ड बता रहा था कि यह मंदिर 1734 में बनवाया गया था। यह 104 फीट ऊँचा है, जो भारत का सबसे ऊँचा शिव मंदिर है। हम किसी दूसरे मंदिर को इसके बराबर में खड़ा नहीं करेंगे और न ही इस बहस में पड़ेंगे कि यह सबसे ऊँचा है या नहीं। फिलहाल जूते उतारकर मंदिर में चलते हैं। भीड़ तो छोड़िए, एक-दो आदमी भी मंदिर में नहीं दिख रहे। हाँ, पीछे तालाब की सड़क पर बहुत सारे नर-नारी ‘जॉगिंग’ करते दिख रहे हैं।
वास्तुकला की मेरी अज्ञानता जगजाहिर है। मुझे कुछ भी नहीं पता इसके बारे में। और यहाँ सुदूर पूरब में यह अज्ञानता और भी भयानक बन जाती है। मैंने प्रतिज्ञा तो कर ली कि दिल्ली लौटकर वास्तुकला के बारे में कुछ जानकारी हासिल करूँगा, लेकिन दिल्ली लौटकर इतनी फुरसत होती किसे है?
बहुत सारे सफेद कबूतर निर्भीक घूम रहे थे। सुबह-सुबह का समय था। भक्‍त लोग और व्यायामार्थी कुछ दाना-पानी भी डालते जाते हैं। बहुत सारे कबूतर थे। और कुत्‍ते को बिल्कुल भी मेहनत नहीं करनी पड़ी, उसके नाश्ते का प्रबंध हो गया। किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा। दो-तीन कबूतर ही उड़े; कुछ दो फीट इधर-उधर हो गए; बाकी दाना चुगते रहे। कुत्‍ता एक कबूतर को मुँह में दबोचकर मंदिर परिसर से बाहर चला गया।
हम भी अविचलित ही रहे। भगवान के दरबार में सबका हक है।

ये हाल ही में प्रकाशित हुई मेरी किताब ‘मेरा पूर्वोत्तर’ के ‘असम के आर-पार’ चैप्टर के कुछ अंश हैं। इस किताब को हमने स्वयं ही प्रकाशित किया है। किताब खरीदने के लिए नीचे बटन पर क्लिक करें:


होटल से दिखता शिवसागर शहर...


शिवडोल


शिवसागर झील



शिवडोल मंदिर की दीवारें इसकी प्राचीनता का एहसास कराती हैं।





रंगघर





तलातल घर के प्रवेश द्वार पर रखी तोपें


तलातल घर की छत से...


तलातल घर के अंदर... बारिश ज्यादा होने के कारण नमी ज्यादा रहती है और काई जम जाती है...






पर्यटक कहीं भी जाएँ... अपना नाम लिखना नहीं भूलते... यह तलातल घर के एक कमरे में नर्म पत्थर का फर्श है...













अगला भाग: “मेरा पूर्वोत्तर” - चराईदेव: भारत के पिरामिड

Share this

Related Posts

Previous
Next Post »

5 Comments

Write Comments
June 25, 2018 at 4:37 PM delete

अतिसुन्दर अभिव्यक्ति...

Reply
avatar
June 30, 2018 at 1:24 PM delete

wildlife photography bhi kamaal hi hai

Reply
avatar
June 30, 2018 at 1:37 PM delete

हमेशा की तरह शानदार....

Reply
avatar
July 16, 2018 at 11:03 AM delete

वाह ..... हमेशा की तरह एक जानदार लेख ।

Reply
avatar