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“मेरा पूर्वोत्तर” - माजुली से काजीरंगा की यात्रा

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17 नवंबर 2017
आज शाम तक हमें गुवाहाटी पहुँचना है। कल हमारी दिल्ली की फ्लाइट है। बीच में काजीरंगा नेशनल पार्क पड़ेगा। देखते हुए चलेंगे। उधर ब्रह्मपुत्र पार करके कुछ ही दूर गोलाघाट में एक मित्र कपिल चौधरी रेलवे में नौकरी करते हैं। कल ही वे उत्तराखंड से घूमकर आए थे। आज जैसे ही उन्हें पता चला कि हम माजुली में हैं और काजीरंगा देखते हुए जाएँगे तो हमारे साथ ही काजीरंगा घूमने का निश्चय कर लिया। तो हम इधर से चल पड़े, वे उधर से चल पड़े।
फिर से ब्रह्मपुत्र नाव से पार करनी पड़ेगी। कमलाबाड़ी घाट। बड़ी चहल-पहल थी। ढाबे वाले झाडू वगैरा लगा रहे थे। पहली नाव सात बजे चलेगी। वह पहले उधर से आएगी, तब इधर से जाएगी। समय-सारणी लगी थी। ज्यादातर लोग दैनिक यात्री लग रहे थे। कोई चाय पी रहा था, कोई आराम से बे-खबर बैठा था। बहुत सारी मोटरसाइकिलें भी उधर जाने वाली थीं।
जैसे ही उधर से नाव आई और मोटरसाइकिलों का रेला नाव पर चढ़ने लगा तो हमें लगने लगा कि कहीं जगह कम न पड़ जाए और हमारी मोटरसाइकिल यहीं न छूट जाए। लेकिन नाववालों का प्रबंधन देखकर दाँतों तले उंगली दबानी पड़ गई। पचास-साठ मोटरसाइकिलें तो नाव की छत पर ही आ गईं। छत पर ऐसा इंतजाम किया गया था कि मोटरसाइकिलें फिसलकर ब्रह्मपुत्र में न गिर पड़ें। और जब नाव चलने लगी तो इसमें मोटरसाइकिलों के अलावा चार गाड़ियाँ, ढेरों साइकिलें, नीचे यात्री, ऊपर छत पर भी यात्री और मोटरसाइकिलों पर भी यात्री। और किराया नाम-मात्र का – बीस-पच्चीस रुपये।




डेढ़ घंटे लगे ब्रह्मपुत्र को पार करने में। यात्रियों से बातचीत हुई। यहाँ पुल बनेगा, पता नहीं कब। अभी तो पुल का नाम भी नहीं है। बन जाए तो अच्छा है। दैनिक यात्रियों को रोजाना तीन घंटे से ज्यादा आने-जाने में लगाने पड़ते हैं।
दूसरी तरफ निमातीघाट है। सड़क है और कुछ ही दूर जोरहाट। वर्तमान में जोरहाट में रेल है। पहले कभी निमातीघाट में भी रेल हुआ करती थी। ब्रह्मपुत्र की बाढ़ में एक बार तबाह हुई, तो बंद ही हो गई।
जोरहाट से कोहोरा की 100 किलोमीटर की दूरी को तय करने में दो घंटे लगे। नुमालीगढ़ के पास तक तो रास्ता अभी भी वैसा ही था, जैसा कुछ दिन पहले था अर्थात् खराब और टूटा हुआ, लेकिन इस बार यह खराब नहीं लगा। इसका कारण था कि अरुणाचल में हम बहुत ज्यादा खराब रास्तों पर चले थे। अब रास्ता जैसा भी था, उससे कई गुना अच्छा था।

ये हाल ही में प्रकाशित हुई मेरी किताब ‘मेरा पूर्वोत्तर’ के ‘असम के आर-पार फिर से’ चैप्टर के कुछ अंश हैं। किताब खरीदने के लिए नीचे क्लिक करें:



कमलाबाड़ी घाट पर जमीन पर खड़ी एक नाव... कैसे आई होगी यह यहाँ?... बाढ़ से...

कमलाबाड़ी घाट पर लगी समय-सारणी

किराया सूची... याद रखिए कि एक तरफ की यात्रा डेढ़ घंटे की है...




नाव की छत पर मोटरसाइकिलें जमाते कर्मचारी...

और नाव चल पड़ी... इतनी सारी मोटरसाइकिलें और यात्री छत पर हैं... नीचे भी पूरी नाव भारी गाड़ियों से, कारों से और यात्रियों से भरी हुई है...




निमातीघाट






निमातीघाट के बाद खूबसूरत रास्ता








अगला भाग: “मेरा पूर्वोत्तर” - काजीरंगा नेशनल पार्क






1. “मेरा पूर्वोत्तर”... यात्रारंभ
2. “मेरा पूर्वोत्तर”... गुवाहाटी से शिवसागर
3. “मेरा पूर्वोत्तर” - शिवसागर
4. “मेरा पूर्वोत्तर” - चराईदेव: भारत के पिरामिड
5. “मेरा पूर्वोत्तर” - अरुणाचल में प्रवेश
6. “मेरा पूर्वोत्तर” - नामदफा नेशनल पार्क
7. “मेरा पूर्वोत्तर” - नामदफा से नामसाई तक
8. “मेरा पूर्वोत्तर” - तेजू, परशुराम कुंड और मेदू
9. “मेरा पूर्वोत्तर” - गोल्डन पैगोडा, नामसाई, अरुणाचल
10. “मेरा पूर्वोत्तर” - ढोला-सदिया पुल - 9 किलोमीटर लंबा पुल
11. “मेरा पूर्वोत्तर” - बोगीबील पुल और माजुली तक की यात्रा
12. “मेरा पूर्वोत्तर” - माजुली से काजीरंगा की यात्रा
13. “मेरा पूर्वोत्तर” - काजीरंगा नेशनल पार्क




Comments

  1. नावों में मोटर साइकलों को लादकर ले जाते हुए तो वृन्दावन में भी देखा है लेकिन कारों को देखना भी काफी रोमांचक है ! वैसे ब्रहमपुत्र नदी पर बना ये पुल वर्तमान में चालू हो चुका है या अभी भी कुछ काम बाकि है, शायद कहीं पढ़ा था कि प्रधानमंत्री जी ने इस पुल का उदघाटन किया था !

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