Thursday, July 5, 2018

“मेरा पूर्वोत्तर” - नामदफा नेशनल पार्क

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12 नवंबर 2017
हमारे उठते ही चाय आ गई और एक फोरेस्ट गार्ड भी आ गया - “आज आप लोग कहाँ घूमने जाएँगे?”
“हमें तो इधर का कुछ भी नहीं पता।”
“उधर पाँच किलोमीटर आगे एक व्यू पॉइंट है। बाकी सभी लोग उधर ही जा रहे हैं।”
“उधर मतलब विजयनगर वाली सड़क की तरफ?”
“हाँ जी, हमें उस सड़क पर ही चलना होगा। बहुत तरह की चिड़ियाँ मिलेंगी और तमाम तरह की तितलियाँ भी।”
“फिलहाल उस तरफ जाने की इच्छा नहीं है। नदी के दूसरी तरफ भी कोई रास्ता है क्या?”
“हाँ जी, उधर हल्दीबाड़ी है।”
“तो हम उधर ही चलेंगे।”
पानी, बिस्कुट और कैमरे लेकर हम नदी की ओर चल दिए। एक मल्लाह भी साथ था। नाव इस तरफ ही बँधी थी। एकदम पारदर्शी पानी और उस पर नाव से नदी पार करने में आनंद आ गया।
पार करके गाइड ने मल्लाह को बोल दिया कि एक बजे इधर आ जाना हमें लेने। नदी का पाट बहुत चौड़ा है। ज्यादातर रेतीला। धूप तेज थी, लेकिन वातावरण में शीतलता थी। पाट से बाहर निकले तो लकड़ी की एक सीढ़ी मिली। इस पर चढ़े तो आगे जंगल में जाती पगडंडी दिखाई पड़ गई।
“तुम्हारा नाम क्या है?”
“किलिंग रीका।”
“अएँ? क्या?”
“किलिंग रीका।”
“बड़ा खतरनाक नाम है। रहने वाले कहाँ के हो?”
“जिरो का।”
“भोत बढ़िया। आपातानी हो?”
“हाँ जी।”
“भोत बढ़िया। हिंदू हो या क्रिश्चियन?”
“क्रिश्चियन।”
“भोत बढ़िया।”
रीका एकदम चुप रहने वाला इंसान था। आप उसके साथ घंटों रह सकते हो, लेकिन जब तक आप कुछ पूछेंगे नहीं, वह नहीं बोलेगा। वह हमारा गाइड था। हम उम्मीद कर रहे थे कि वह जंगल के बारे में, पक्षियों के बारे में, जानवरों के बारे में, उनके निशानों के बारे में कुछ हमें बताएगा। लेकिन वह चुप चलता जा रहा था। आँखें शून्य में झाँकती हुई-सी। शायद कोई बड़ी चिंता थी उसे। लेकिन फिलहाल हम उसकी इन चिंताओं के बारे में नहीं पूछने वाले थे और अगर पूछते भी, तो वह हमें नहीं बताने वाला था। कम से कम अभी तो नहीं बताने वाला था, जबकि हमें और उसे मिले हुए बमुश्किल एक घंटा ही हुआ है।
हम जो-जो पूछते गए, रीका उत्तर देता गया।
“यह रास्ता हर अक्टूबर में हम लोग साफ करते हैं। अप्रैल से सितंबर तक बारिश होती है, तो कोई भी इधर नहीं आता। हम भी नहीं। तब यह रास्ता झाड़ियों और बाँसों से अट जाता है। अक्टूबर में इसे साफ करके पेट्रोलिंग के लिये खोलते हैं। पाँच किलोमीटर आगे हल्दीबाड़ी है, जहाँ हम जा रहे हैं। उससे इतना किलोमीटर आगे राजा ताल है, फिर रानी ताल है, फिर एक और ताल है। 15-20 किलोमीटर का यह रास्ता है। लेकिन आखिर तक जाने के लिए हमें राशन भी चाहिए और कपड़े भी।”
“नहीं, टाइगर का कोई डर नहीं है। भालू बहुत हैं, लेकिन वे आदमी से दूर ही रहते हैं। उन्हें पता चल जाता है कि आदमी आ रहा है तो वे रास्ता छोड़ देते हैं और आदमी को पता भी नहीं चलता। हाँ, हूलोक गिब्बन जरूर हैं इस जंगल में। वे भी पेड़ों पर ही रहते हैं।”
अचानक दीप्ति ने रुकने को कहा। जूते उतारे तो जुराबों के अंदर से तीन जोंकें निकलीं। छोटी-छोटी जोंकें। रीका नमक साथ लाया था। तीनों जोंकों को हटा दिया। यह देखकर मुझे भी जुराब में चुभन-सी महसूस हुई। एक जोंक चिपकी हुई थी।
हल्दीबाड़ी में एक ‘हट’ बनी हुई थी। एकदम खाली हट। जंगल वालों ने ही बना रखी थी। फोरेस्ट गार्ड या कोई भी यहाँ रुक सकता था। बाँस की बनी थी, जमीन से ऊपर। नीचे आग जलाने का स्थान था। धुआँ ऊपर एकमात्र कमरे में भर जाता है, जिससे मच्छर नहीं आते। अन्यथा मच्छरदानी लगानी पड़ती है। कमरे में जोंकें नहीं आतीं।
यहाँ मैंने जूते खोले, तो एक में तीन और दूसरे में चार जोंकें मिलीं। इन्होंने कुछ खून भी पी लिया था, जिसका मुझे पता नहीं चला। लेकिन सभी चमड़े के इन ‘सेफ्टी शूज’ की रगड़ से अपने आप ही मर गईं।
हम रास्ते में कहीं भी नहीं रुके थे, लगातार चलते आ रहे थे। इसके बावजूद भी जोंकें हमारे ऊपर चढ़ गईं। यह अरुणाचल के जंगलों में यात्रा करने का सबसे बड़ा नकारात्मक पहलू है। जंगल जोंकों से भरे हुए हैं। एक भी जोंक आपके जूते पर चिपक गई तो यह बड़ी तेजी से ऊपर चढ़ती है। और जहाँ भी इसे जगह मिलती है, यह कपड़ों के भीतर घुस जाती है। जुराबों के रेशों के बीच घुस जाना तो इसके लिए बाएँ हाथ का काम है। कोई छोटी जोंक तो आपकी पैंट के रेशों के भी आर-पार हो सकती है।
इस स्थान का नाम हल्दीबाड़ी इसलिए है क्योंकि यहाँ हल्दी उगती है। रीका ने हल्दी खोदकर भी दिखाई।
इन जंगलों में पैदल यात्रा करने का हमारा एक अनुभव पूरा हो चुका था, लेकिन अभी भी एक अनुभव बाकी था। वापस लौट रहे थे तो हूलोक गिब्बनों ने जंगल को अपनी ‘हुक्कू-हुक्कू’ से गुंजायमान कर रखा था। हमने पहली बार गिब्बन देखे थे। इनकी इस पेड़ से उस पेड़ और एक डाली से दूसरी डाली पर धमाचौकड़ी बड़ी प्रभावशाली थी। अपने हाथों का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं ये और ज्यादातर समय हाथों पर ही लटके रहते हैं।
गिब्बन के बाद एक बंदर और दिखा। बल्कि रीका ने चुप रहने और धीरे से इशारा करने के बाद दिखाया। छोटा-सा बंदर था। ‘मकाक’ नाम बताया। लेकिन ‘मकाक’ तो शायद उत्तर भारत में पाए जाने वाले आम बंदरों को भी कहा जाता है। जो भी हो, हम इसे देखकर भी खुश हो गए।
और होर्नबिल के बिना तो नामदफा की यात्रा अधूरी है। अरुणाचल का राजकीय पक्षी है यह। ऊँचे पेड़ों पर इनके झुंड के झुंड बैठे रहते हैं। जरा-सी आहट मिलते ही पंखों से आवाज करते हुए उड़ जाते हैं। हमने यह आवाज बहुत सुनी; दूर बैठे होर्नबिल देखे भी; लेकिन फोटो नहीं ले पाए।

ये हाल ही में प्रकाशित हुई मेरी किताब ‘मेरा पूर्वोत्तर’ के ‘नामदफा नेशनल पार्क’ चैप्टर के कुछ अंश हैं। किताब खरीदने के लिए नीचे बटन पर क्लिक करें:




नो-दिहिंग नदी और उस पार जाने के लिए तैयार नाव


हमारा गाइड किलिंग रीका

नो-दिहिंग का साफ पारदर्शी पानी



नदी का रेतीला तट, जो किसी ‘बीच’ जैसा एहसास कराता है



नदी तट से जंगल में प्रवेश करने की सीढ़ी

जंगल बहुत घना है...


जूतों में जोंकें घुस गईं, तो रीका ने नमक की सहायता से उन्हें हटा दिया

थोड़ी दूर ही चले थे कि जोंकों ने तांडव मचा दिया

एक जोंक मेरी पैंट पर ऊपर चढ़ती हुई

‘हल्दीबाड़ी’ में फोरेस्ट की हट


हट के अंदर का नजारा




पता नहीं यह सपोला है या केंचुआ... इसकी चाल सपोले जैसी थी, जबकि रीका ने इसे केंचुआ बताया था




रीका गिब्बनों और होर्नबिल का मुआयना करते हुए





फिर से नदी किनारे

फिर से नाव में

देबान फोरेस्ट रेस्ट हाउस...

गिलहरी...








अगला भाग: “मेरा पूर्वोत्तर” - नामदफा से नामसाई तक

8 comments:

  1. शानदार,जानदार,वजनदार और खतरनाक। न तो समझ में आता है और न ही विश्वास होता है कि अपने देश के एक भाग में ऐसा भी हो सकता है। कुछ कुछ डिस्कवरी चैनल पर आने वाले खतरनाक यात्रा के जैसा प्रतीत होता है। अब तो आप को डिस्कवरी मैन कहने में कोई बड़ी बात नहीं है।

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  2. जयहिन्द वन्देमातरम।

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  3. इन जोकों ने तो खून पीने वाले भूत प्रेत को भी पीछे छोड़ दिया।

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  4. इतना साफ़ पानी देखकर मजा आ गया
    बहुतै लाजवाब :D

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  5. गर्मी में ऐसे पानी में स्नान करने मिले जो मजे आ जाएँ :)

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