Monday, June 18, 2018

“मेरा पूर्वोत्तर”... यात्रारंभ

1.
हम पूर्वोत्‍तर से इतना क्यों डरते हैं?
अपनी अवधारणाओं के कारण।
हम तक छँटी हुई खबरें मिर्च-मसाला लगकर पहुँचती हैं और हम उन पर भरोसा कर लेते हैं और भारत के इतने खूबसूरत हिस्से से डरने लगते हैं। हमने अपने मन में अवधारणा बना ली है कि पूर्वोत्‍तर सुरक्षित नहीं है।
जबकि ऐसा नहीं है। यह भारत के ज्यादातर हिस्सों से ज्यादा सुरक्षित है।
इस यात्रा में हम पूर्वोत्‍तर के उन स्थानों पर होकर आए, जहाँ अमूमन कोई नहीं जाता। इस किताब को एक ‘ट्रैवल गाइड’ की तरह नहीं लिखा गया है। इसमें केवल हमारे कुछ अनुभव हैं और वे बातें हैं, जो हमने देखीं और महसूस कीं। पूरी यात्रा के दौरान हमारे मन में किसी भी तरह की असुरक्षा की भावना नहीं थी; हम सकारात्मक ऊर्जा से भरे थे और स्थानीय लोगों का व उनके रिवाजों का, खान-पान का सम्मान भी करते थे। यही कारण रहा कि हमें भी अच्छे लोग ही मिले।

2.
मोटरसाइकिल पैक हो चुकी थी और इसके साथ ही इसकी टंकी पर चिपकने वाला मैग्‍नेटिक बैग भी और हवा भरने वाला पंप भी। इसका सारा तेल हम पहले ही निकाल चुके थे। आड़ी-तिरछी करके एक-एक बूंद निचोड़ चुके थे, लेकिन शास्‍त्री पार्क से नई दिल्ली तक की सात किलोमीटर की दूरी इसने स्वयं तय की। कैसे तय की, हमें नहीं पता। इसमें इतना तेल कहाँ से आया, हमें नहीं पता।
“बाइक भेजनी है क्या? लाओ, हम पैक कर देंगे।”
“कितने पैसे लोगे?”
“डेढ़ सौ रुपये।”
और बाइक पैक होकर नई दिल्ली स्टेशन के पार्सल कार्यालय के एक कोने में खड़ी हो गई।
एक घनिष्‍ठ मित्र के माध्यम से यहाँ एक अधिकारी से जान-पहचान हो गई थी। वैसे तो हमें नियमों की पूरी जानकारी थी, लेकिन भीड़-भाड़ वाली रेलवे में हमेशा लिखित नियमों से काम नहीं चला करता। और जब पता चला कि ‘फलाना सिंह’ जी ही पार्सल अधिकारी हैं, तो राहत की साँस ली। अब सब काम वे ही करेंगे। हम सिर्फ देखेंगे।
“हमें बाइक डिब्रुगढ़ भेजनी है। नई दिल्ली से डिब्रुगढ़ की केवल दो ही ट्रेनें हैं और दोनों ही राजधानी हैं। बाकी दो ट्रेनें पुरानी दिल्ली से हैं, लेकिन हमें अपनी बाइक राजधानी से ही भेजनी है।”
“लेकिन राजधानी में तो किराया ज्यादा लगेगा।”
“पच्चीस परसेंट ज्यादा लगेगा। लेकिन सही पहुँच जाएगी और समय से भी पहुँच जाएगी।”
“टिकट?”
“हम फ्लाइट से जाएँगे। ट्रेन का टिकट नहीं है। बाइक पार्सल से भेजनी है।”
“क्या? टिकट नहीं है? लेकिन… देखो नीरज भाई, दिल्ली एन.सी.आर. में रेलवे, पार्सल से सामान नहीं भेजता। इस काम को लीज पर दे रखा है। हाँ, आपके पास टिकट होता, तो हम लगेज में बुक कर देते।”
“पार्सल को ठेकेदार भेजता है? क्या रेट हैं उसके?”
“अभी पता करता हूँ।… ओ, ओये राजू, कोल्ड ड्रिंक लेकर आ, ये ले पैसे।”
फलाना सिंह जी ने कहीं फोन किया – “हाँ भाई, क्या हाल है? बीवी-बच्चे कैसे हैं?”
“…”
“अच्छा सुनो, राजधानी में तुम ही करते हो ना, पार्सल की बुकिंग?”
“…”
“एक बाइक भेजनी है। मेरी अपनी ही बाइक है।”
“..”
“नहीं, आज की ट्रेन तो छूटने वाली है। कल लोड़ कर देना।”
“..”
“पैसे बताओ, पैसे।”
“…”
“अबे हमसे भी दस हजार लोगे? कम करो कुछ।”
‘दस हजार’ सुनते ही मैंने दीप्‍ति की ओर देखा और दीप्‍ति ने मेरी ओर। आँखों ही आँखों में तय कर लिया कि इतनी महंगी बुकिंग नहीं करानी।
“देखो नीरज भाई, ठेकेदार दस हजार से कम नहीं कर रहा। कह रहा है कि राजधानी में डिब्रुगढ़ जाने के लिए बहुत सारा सामान पड़ा है और वह किसी भी हालत में दस हजार से कम नहीं करेगा।”
“अब?”
“ना, तुम चिंता मत करो। निकलेगा कुछ न कुछ रास्ता। अगर तुम्हारे पास राजधानी का टिकट होता तो रेलवे के किराये पर लगेज में बुक हो जाती।”
मैंने मोबाइल निकाला। राजधानी का टिकट देखने का तो सवाल ही नहीं। तीन हजार से ऊपर ही होगा। लेकिन यहाँ से संपर्क क्रांति गुवाहाटी तक जाती है। स्लीपर में 200 से ज्यादा वेटिंग थी और किराया था 755 रुपये। उधर पार्सल कार्यालय में मेरे सामने एक चार्ट लगा था, जिसमें लगेज भेजने के रेलवे के रेट लिखे थे। गुवाहाटी के रेट थे, 2700 रुपये। टिकट और लगेज दोनों मिलाकर लगभग 3500 रुपये हुए।
“सर, तो हम एक काम करते हैं। संपर्क क्रांति में गुवाहाटी तक लगेज में बुक कर लेते हैं। अभी काउंटर पर जाकर मैं टिकट ले आता हूँ। आप फटाफट बुक कर देना। 3500 रुपये ही लगेंगे।”
“लेकिन आप तो डिब्रुगढ़ भेजना चाहते हो?”
“कोई बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। दस हजार रुपये में डिब्रुगढ़ भेजना बहुत महंगा है।”
“तो एक मिनट रुको। अब मैं संपर्क क्रांति के पार्सल ठेकेदार से बात करके देखता हूँ।”
उन्होंने फोन मिला दिया – “हाँ भई, क्या हाल है? अच्छा सुन, अपनी एक बाइक गुवाहाटी जाएगी। कितने पैसे लगेंगे?”
“…”
“अरे नहीं, तू पैसे बता।”
“…”
“तो ठीक है, भेज अपने एक आदमी को इधर।”
और 2500 रुपये में बाइक बुक हो गई।

3.
7 नवंबर 2017 की सुबह सात बजे दिल्ली धुंध में डूबी हुई थी। गले में खराश और आँखों में जलन – खतरनाक धुंध थी। अखबारों में लिखा था कि यह ‘एयर-लॉक’ है। तीन दिनों तक ऐसा ही रहेगा। हवा चलेगी तो प्रदूषित हवा बाहर निकलेगी। गैस चैंबर बनी हुई थी दिल्ली। सोच रहा हूँ, हम जीवित कैसे रह लेते हैं ऐसे में! शरीर ने भी खुद को समझा लिया है कि बिना साफ हवा के कैसे जिया जाए।
और फ्लाइट में सबकुछ ठीक चल रहा था। सही समय पर बोर्डिंग भी हो गई, विमान में बैठ भी गए और परिचारिकाओं ने ‘सेफ्टी डेमो’ भी दिखा दिया, लेकिन उसके बाद प्लेन हिला तक नहीं। आधा घंटा ऊपर हो गया। पता चला एक रन-वे बंद है और वी.आई.पी. लोगों का आना-जाना भी है, जिसके कारण हमारी फ्लाइट लेट हो रही है। मेरे पीछे वाली सीट पर बैठे यात्री ने किसी को फोन करके बताया – “ढाई बजे तक पहुँचूंगा।”
हमारे बगल में एक अमेरिकी महिला बैठी थीं। हिंदी जानती थीं, इसलिये हमारा संवाद हो गया। बातचीत की शुरूआत उन्होंने ही हिंदी में की। सात साल से भारत में रह रही हैं। फिलहाल शिलोंग जा रही हैं।
डेढ़ घंटा हो गया। यात्रियों ने हंगामा शुरू कर दिया। पायलट ने उद्घोषणा की कि उन्हें भी नहीं पता कि कितना समय लगेगा। ऐसे-ऐसे मामला है, अब जिसको उतरना है, वह उतर सकता है। प्लेन के दरवाजे खोल दिए गए और सीढ़ियाँ लगा दी गईं। पाँच यात्री उतरकर चले गए। पीछे बैठे यात्री ने फिर से फोन किया – “पता नहीं कितना समय लगेगा।”
ये पूर्वोत्तर की यात्राएँ अजीबो-गरीब क्यों होती हैं? वहाँ की यात्राएँ बाकी देश की तरह सुगम क्यों नहीं होतीं?

4.
अगले दिन 8 नवंबर को ट्रेन दोपहर 11 बजे गुवाहाटी आई – 26 घंटे लेट। सभी यात्रियों के चेहरे दर्शनीय थे। लेकिन हम दर्शनीय चेहरों को देखने यहाँ स्टेशन पर नहीं आए थे। हम आए थे अपनी बाइक लेने। ठेकेदार के आदमी आए। पार्सल वाला डिब्बा खोला और हमारी आँखें फटी रह गईं। दीप्‍ति ने तुरंत कहा – “हे भगवान! यह क्या कर रखा है इन्होंने! बाइक को अब कभी ट्रेन से नहीं भेजना।”
डिब्बे में बाइक एकदम ऊर्ध्वाधर खड़ी थी। पिछला पहिया फर्श पर था, तो अगला पहिया छत को छू रहा था। मैंने राहत की साँस ली – “चलो, पहुँची तो सही।”
बाइक हमारे हाथ में आने में दो घंटे लग गए। पहले उन्होंने डिब्बे का सारा सामान उतारा। डिब्बे के नन्हें-से हिस्से में कितना सामान आ सकता है, आज पहली बार जाना। प्लेटफार्म पर भी इसे रखने की जगह नहीं बची, तो ट्रेन बीस-तीस मीटर आगे सरकवाई गई। आठ-दस लोग सामान पटकने में ही लगे थे। उनके कुछ भी हाथ आता, डिब्बे के भीतर से बाहर फेंक देते। कई सामानों पर लिखा था – “हैंडल विद केयर।”
हाँ, हम सामने खड़े थे तो शायद इस वजह से बाइक इज्जत से उतारी गई, अन्यथा क्या पता उसे भी चार लोग उठाकर बाहर ही फेंक देते। अब बाइक में एक भी खरोंच तक नहीं लगी।

ये हाल ही में प्रकाशित हुई मेरी किताब ‘मेरा पूर्वोत्तर’ के पहले चैप्टर के कुछ अंश हैं। इस किताब को हमने स्वयं ही प्रकाशित किया है। किताब खरीदने के लिए नीचे बटन पर क्लिक करें:



फ्लाइट से दिखता नीचे का नजारा... स्थान अब ध्यान नहीं...

शायद एवरेस्ट... फोटो की खराब क्वाल्टी जिंदाबाद...

एक नदी और उस पर बना पुल

ब्रह्मपुत्र

ब्रह्मपुत्र पर गोवालपाड़ा के पास बना नरनारायण सेतु...


अब एक फोटो सीधे ट्रेन के अंदर से... यह हमारी बाइक खड़ी है, जिसकी पहचान केवल हैंडल (विद केयर) से हो रही है...








अगला भाग: “मेरा पूर्वोत्तर”... गुवाहाटी से शिवसागर

5 comments:

  1. शानदार शुरुआत

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  2. दिल से जब कोई काम होता है तो उसका जिक्र भी दिलचस्प होता है।

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  3. मजेदार और रोचक पूर्ण शुरुआत

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  4. आगाज इतना शानदार है तो अंजाम भी मजेदार ही होगा

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  5. आपकी यात्राएं विस्मय से भर देती हैं।
    अद्भुत! शानदार!

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