Thursday, June 21, 2018

“मेरा पूर्वोत्तर”... गुवाहाटी से शिवसागर

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9 नवंबर 2017
यहाँ दिन जल्दी निकलता है और जल्दी छिपता भी है। दिल्ली से एक घंटा पहले ही दिन निकल आता है। हमें वही दिल्ली वाली आदत थी उठने की, लेकिन आज जल्दी उठ गए। आज हमें कम से कम तिनसुकिया तो पहुँचना ही था, जो यहाँ से 470 किलोमीटर दूर है। मुझे जानकारी थी कि 100 किलोमीटर दूर नगाँव तक चार-लेन का हाईवे है और उसके बाद दो-लेन का। दो-लेन वाली सड़क पर थोड़ी मुश्किल तो होती है, लेकिन फिर भी उम्मीद थी कि दिन ढलने तक तिनसुकिया तो पहुँच ही जाएँगे।
आज ही तिनसुकिया पहुँचने का एक मुख्य कारण था कि कल अरुणाचल में पांगशू पास आम लोगों के लिये खुला रहेगा। सुनने में आया था कि हर महीने की 10, 20 और 30 तारीख को भारत और म्यांमार के बीच स्थित पांगशू पास आम लोगों के लिये खुलता है और दोनों देशों में एक दिन के लिए दोनों देशों के नागरिक आ-जा सकते हैं। हम कल पांगशू पास भी अवश्य जाना चाहते थे।
तो साढ़े छह बजे अमेरीगोग से निकल पड़े। अच्छी ठंड थी और हाथों में दस्ताने पहनने पड़ रहे थे। मेघालय में पेट्रोल सस्ता है, इसलिये सड़क के उस पार से पेट्रोल भरवा लिया। खानापारा से जोराबाट तक की सड़क असम और मेघालय की सीमा बनाती है और इस दूरी में बहुत सारे पेट्रोल पंप हैं। जब गुवाहाटी जैसे बड़े शहर के नजदीक ही पेट्रोल सस्ता मिलेगा, तो सभी यहीं से अपनी टंकी भरवाएँगे। पूर्वी असम और शिलोंग की तरफ जाने वाली प्रत्येक गाड़ी तो निश्चित ही यहीं से टंकी भरवाएगी।
जोराबाट से एक सड़क दाहिने मुड़कर शिलोंग और सिलचर चली जाती है। त्रिपुरा, मिजोरम और मणिपुर जाने वाला सारा ट्रैफिक यहीं से होकर जाता है। हम सीधे नगाँव की ओर चलते रहे और जोराबाट से निकलते ही एकदम खाली सड़क से सामना हुआ और कोहरे से भी। सर्दियों में कोहरा तो हमारे यहाँ भी पड़ता है, लेकिन यह कोहरा बड़ा अजीब-सा लगा। यह उतना घना तो नहीं था, लेकिन इसने थोड़ी ही देर में हमें पूरा भिगो दिया। इसका कारण है यहाँ बगल में ‘समुद्र’ का होना। ब्रह्मपुत्र नद किसी समुद्र से कम नहीं और इसकी वजह से पूरा वातावरण नम रहता है। रात में तापमान कम होते ही कोहरा बन जाता है और हल्का कोहरा भी आपको भिगो देता है। जहाँ आसपास पहाड़ियाँ हों, वहाँ यह कोहरा ज्यादा होता है। जोराबाट से कुछ आगे तक पहाड़ियाँ हैं, इसलिये इस इलाके में अच्छा कोहरा था।
लेकिन वो नजारा मुझे अभी भी याद है, जब हम इस कोहरे से बाहर निकलने ही वाले थे। कोहरे से बाहर निकले नहीं थे; हम भीगे हुए थे; सूरज एकदम सामने था और धूप बड़े ही जादुई तरीके से आधा किलोमीटर आगे सड़क पर पड़ रही थी। इससे ज्यादा मैं इस नजारे का वर्णन करने में असमर्थ हूँ।
सड़क किनारे एक बड़ा तालाब दिखा तो बाइक अपने आप ही रुक गई। इसमें बहुत सारे कमल खिले थे और नजारा वाकई स्वर्गीय था। बड़ी देर तक हम यहाँ रुके रहे और कैमरे को तरह-तरह से जूम करके और आड़ा-तिरछा करके फोटो लेते रहे।
बाइक यात्राओं में नींद आना सबसे बड़ी समस्या होती है। और इसका समाधान बड़ा आसान है। बाइक रोकिए, कैमरा निकालिए और फोटो लेने शुरू कर दीजिए। कुछ भी, कैसे भी, किसी के भी। और आप पाएँगे कि नींद गायब हो गई। वैसे हमें इस समय नींद नहीं आ रही थी, लेकिन जब इतने बड़े तालाब में कमल ही कमल खिले हों, तो फोटोग्राफी अपने आप हो ही जाती है। कुछ पक्षी भी बैठे थे, लेकिन वे कैमरे की रेंज से बाहर थे।
कई ‘रॉयल एनफील्ड’ हमसे आगे निकल गईं। मैंने कोई बहुत ध्यान नहीं दिया। लेकिन कुछ आगे चलकर जब एक और ‘रॉयल एनफील्ड’ आगे निकली तो ध्यान दिया कि इस पर टैंट, स्लीपिंग बैग और मैट्रेस भी बंधे थे। असम नंबर की बाइक थी। मेरी जिज्ञासा जगी। टैंट है तो जरूर हमारा भाई लंबी और दुर्गम यात्रा पर जा रहा है। पूछताछ करनी चाहिए।
एक ढाबे पर जब वह चाय पीने रुका तो हम भी वहीं रुक गए। बातचीत हुई। पता चला कि पासीघाट में ‘एनफील्ड राइडर्स क्लब’ का सालाना सम्मेलन हो रहा है - 10 से 12 नवंबर तक। वहीं जा रहे हैं सभी। देश से भी और विदेश से भी। वो तो चाय पीकर चला गया, लेकिन मुझे काम मिल गया। इंटरनेट का सहारा लिया और इसके बारे में काफी जानकारी मिल गई। यह ‘नॉर्थ-ईस्ट राइडर्स क्लब’ की तरफ से आयोजन था। केवल ‘रॉयल एनफील्ड’ वाले ही इसमें भाग ले सकते थे। इस बार यह नौवाँ आयोजन था। हर बार अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग स्थानों पर होता है यह। इस बार अरुणाचल के पासीघाट में था।
अच्छा है। ऐसे आयोजन होते रहने चाहिएं। कम से कम पूर्वोत्तर में तो जरूरी हैं। शेष भारत के लोगों को भी पता चलना चाहिए कि पूर्वोत्तर भी भारत का ही हिस्सा है। बल्कि ऐसा हिस्सा है, जहाँ से भारत शुरू होता है। लेकिन मुझे दुख इस बात का हुआ कि हम इसमें भाग नहीं ले सकते, क्योंकि हमारे पास ‘रॉयल एनफील्ड’ नहीं थी। ‘डिस्कवर’ थी और आयोजकों का अंग्रेजी में सख्त निर्देश था कि किसी भी अन्य बाइक को आयोजन-स्थल पर आने भी नहीं देंगे। उस समय तो मैंने सोच लिया था कि दिल्ली लौटकर एक ‘डिस्कवर क्लब’ बनाऊँगा और उसमें सख्ती से नियम बनाऊँगा - ‘रॉयल एनफील्ड’ की नो एंट्री।
लेकिन दिल्ली लौटकर किसे फुरसत होती है, इन सबके बारे में सोचने की!

ये हाल ही में प्रकाशित हुई मेरी किताब ‘मेरा पूर्वोत्तर’ के ‘असम के आर-पार’ चैप्टर के कुछ अंश हैं। इस किताब को हमने स्वयं ही प्रकाशित किया है। किताब खरीदने के लिए नीचे बटन पर क्लिक करें:



असम की पहली सुबह...







बुल्ट के साथ खड़ी अपनी डिस्कवर... लेकिन डिस्कवर इस बुल्ट के साथ अरुणाचल नहीं जा सकती...

और आजकल तो सेल्फी किंग बनना जरूरी होता है...

फिर उसे फेसबुक पर अपलोड करना भी जरूरी होता है...



इस सड़क के बाईं ओर काजीरंगा नेशनल पार्क है...

और दाहिनी ओर कर्बी आंगलोंग की पहाड़ियाँ हैं, जिनमें जंगल भी हैं और चाय की खेती भी...



चाय पीने के ठिकाने...








शिवसागर में शिवडोल मंदिर...












अगला भाग: “मेरा पूर्वोत्तर” - शिवसागर

5 comments:

  1. विश्वास नहीं होता कि ऐसा सुनहरा दृश्य हो सकता है और ऐसा सुनहरा राज्य हो सकता है। लाजबाब।

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  2. आपके ब्लॉग के माध्यम से में बिना जाए हुए ही यात्रा का आनंद ले लेता हूँ। अगर में यूँ कहूँ की यात्रा वर्णन आपसे अच्छा कोई और नहीं करता तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं हैं। आप यात्रा ब्लॉग में सर्वश्रेष्ठ हैं।

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  3. वाह ! बढ़िया वृतांत नीरज ...

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