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भारत परिक्रमा- छठा दिन- पश्चिमी बंगाल व ओडिशा

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये
13 अगस्त 2012
आंख खुली अण्डाल पहुंचकर। वैसे तो ट्रेन का यहां ठहराव नहीं है लेकिन दुर्गापुर जाने के लिये ट्रेन यहां सिग्नल का इंतजार कर रही थी। आसनसोल से जब हावडा की तरफ चलेंगे तो पहले अण्डाल आयेगा, फिर दुर्गापुर। ट्रेन रामपुर हाट के रास्ते आई है। मुझे समझ नहीं आ रहा कि रामपुर हाट से गाडी सीधे आसनसोल जा सकती थी, फिर क्यों पचास किलोमीटर का फालतू चक्कर लगाकर दुर्गापुर में भी ठहराव दिया गया? रामपुर हाट से गाडी पहले अण्डाल आती है, फिर हावडा की तरफ चलकर दुर्गापुर जाती है, दुर्गापुर में इसका डीजल इंजन हटाकर इलेक्ट्रिक इंजन लगाया जाता है, फिर गाडी विपरीत दिशा में चलती है, अण्डाल होते हुए आसनसोल पहुंचती है। अगर मात्र इंजन बदलने के लिये गाडी को दुर्गापुर ले जाया जाता है तो यह काम तो आसनसोल में भी हो सकता है। नहीं तो रामपुर हाट में भी हो सकता है।
दुर्गापुर में अपने एक मित्र को मिलना था लेकिन वे नहीं आये।
आसनसोल के बाद गाडी आदरा की तरफ चल दी, वहां से बांकुडा, मेदिनीपुर होते हुए हिजली। हिजली खडगपुर का विकल्प है। अगर खडगपुर जाते तो फिर से गाडी का इंजन इधर से उधर लगाना पडता, कम से कम बीस मिनट लगते, अब एक मिनट से ही काम चल गया।
आसनसोल के आसपास रेल लाइनों का बेहद घना जाल बिछा हुआ है। इसका कारण यहां खनन व उद्योग-धंधे हैं। मैंने पूरी कोशिश कर ली इस जाल को समझने की लेकिन अभी तक आंशिक सफलता ही मिली है। चलिये इधर की मोटी मोटी बातें आपको भी समझा देता हूं। इसके लिये आपको कागज पेन लेकर बैठना पडेगा।
एक वर्ग बनाइये- स्क्वायर। ऊपर बायें कोने पर लिखिये- गोमो, दाहिने कोने पर लिखो- आसनसोल। गोमो और आसनसोल के बीच में धनबाद लिख दो। गोमो, धनबाद व आसनसोल; दिल्ली-हावडा मुख्य लाइन पर हैं। अब इस वर्ग के निचले बायें कोने पर लिखो- टाटानगर, दाहिने पर लिखो- खडगपुर। टाटानगर व खडगपुर मुम्बई-हावडा मुख्य लाइन पर हैं।
अब गोमो से खडगपुर को मिला दो व आसनसोल से टाटानगर को मिला दो। ये दोनों लाइनें जहां एक दूसरे को काटेंगी, वो आदरा है। आदरा व खडगपुर के बीच में बांकुडा व मेदिनीपुर हैं। अब गोमो-टाटा लाइन के बीच में लिखो- मुरी। मुरी से एक लाइन बायें खींचो- रांची पहुंच जाओगे। एक लाइन रांची से नीचे व टाटा से बायें खींचो, जहां दोनों काटेंगी, वही राउरकेला है। मुरी व गोमो के बीच में एक स्टेशन और है- चन्द्रपुरा। धनबाद से सीधे चन्द्रपुरा को मिला दो....।
मामला जटिल होने लगा ना? यह तो कुछ भी नहीं है। यहां जाल बिछा हुआ है रेलों का।
मेदिनीपुर पहुंचे तो एक फोटो ले लिया और अपनी बर्थ पर पसर गया। हिजली यानी खडगपुर से पहले ट्रेन को हावडा-मुम्बई मुख्य रेल लाइन पार करनी थी, इसलिये काफी देर तक रुकी रही लेकिन लेट नहीं हुई। 2000 किलोमीटर का सफर तय कर लिया, भद्रक से आगे निकल गई लेकिन लेट नहीं हुई। लेट हुई कटक पहुंचकर और भुवनेश्वर में तो सवा घण्टे लेट थी। और भारतीय रेल का जादू देखिये कि विशाखापटनम से गाडी अपने निर्धारित समय पर ही रवाना हुई।
भद्रक के पास एक एसएमएस आया कि मैं भुवनेश्वर से डीके चौधरी हूं। मैं तुम्हें स्टेशन पर मिलूंगा। एसएमएस से पहले उन्होंने फोन किया था लेकिन इस निद्रालय को पता नहीं चला। फिर मैंने फोन करके बताया कि आ जाओ, ट्रेन बिल्कुल सही समय पर चल रही है। उस समय क्या पता था कि गाडी अचानक इतनी लेट हो जायेगी। सवा पांच का टाइम था भुवनेश्वर का लेकिन पहुंची साढे छह बजे। खैर, तीन मिनट के लिये मुलाकात हुई, उन्होंने घर की बनी एक मिठाइयों का डिब्बा दिया, कुछ कुछ हमारे मीठे पुए जैसी थी मिठाईयां। मैंने उनका फोटो खींचा। जैसे ही दोनों का ग्रुप फोटो खींचने के लिये कैमरा तीसरे को दिया तो गाडी चल पडी। ग्रुप फोटो खिंच तो गया लेकिन कैमरे व हमारे बीच में अचानक कोई आ गया जिससे फोटो खिंची ना खिंची बराबर हो गई। वैसे उन्हें हिन्दी पढने में परेशानी होती है, उनका आग्रह था कि मैं अंग्रेजी में लिखूं।
खोरधा रोड तो अपना जाना-पहचाना स्टेशन है। पिछले साल पुरी गया था तो खोरधा रोड से जान पहचान हो गई थी।
असोम, पश्चिमी बंगाल व ओडिशा में एक समानता है कि चारों तरफ पानी ही पानी दिख रहा है। धान की रोपाई चल रही है। एक समानता और भी है कि डिब्रुगढ से खोरधा रोड तक कहीं भी समुद्र तल से ऊंचाई 100 मीटर से ज्यादा नहीं है।
फिर क्यों असोम में ही चाय होती है?
बंगाल तो दोनों के बीच में पड गया। जहां असोम से मिला, वहां चाय पैदा कर दी। जहां ओडिशा से मिला, चाय को भूल गया। ओडिशा व दक्षिण बंगाल की जलवायु समुद्री जलवायु है। शायद चाय को समुद्री हवा पसन्द नहीं। पहाड पसन्द हैं लेकिन पहाडों पर ऊपर चढना भी पसन्द नहीं है। अगर चाय पहाडों पर ऊपर चढ जाती तो आज कश्मीर केसर के साथ चाय का उत्पादन करता।
हिजडों का बडा भयंकर आतंक मिला तीनों राज्यों में। हालात ये हो गये कि कोई ताश भी फेंटता तो लगता कि हिजडे आ गये।
बाल्टी भर-भर अण्डे बेचने वाले आते- उबले अण्डे। कभी खुद छिलका उतारकर देते, कभी कहते कि मेहनत करना सीखो। अण्डा बिरयानी भी खूब मिली। ट्रेन में भी पैण्ट्री वाले वेज बिरयानी व अण्डा बिरयानी परोस रहे थे। कमी एक है कि अक्सर बिना तले अण्डे आ जाते हैं बिरयानी में। ओडिशा के स्टेशनों पर मछली बिरयानी व चिकन बिरयानी की आवाज भी सुनाई दे जाती। असोम व बंगाल में तो ठीक था लेकिन ओडिशा में अण्डे का आण्डा हो गया।
लोगबाग देखने में तो मरियल से लगते हैं लेकिन जब वे ‘बांग’ देते कि आण्डा बिरयानी तो उनकी बांग से पूरा डिब्बा दहल जाता। जिन्दा आदमी मरणासन्न हो जाता लेकिन अगर ये लोग मरे हुए के पास जाकर बांग दें तो वो उठकर भाग जायेगा।
बुखार चढ गया। दुर्गापुर से कहीं भी सूरज महाराज नहीं दिखे। कहीं कहीं बारिश भी मिली। फिर बिजली का इंजन लग जाने से गाडी की स्पीड भी बढ गई। थोडी देर फोटो खींचने के लिये खिडकी वाली सीट पर बैठा तो बुखार चढ गया। ठण्डी हवा लगती गई, शरीर को तापमान बढाने के लिये ‘हीटर’ चलाना पड गया। हीटर अनियन्त्रित हो गया व तापमान सामान्य से ऊपर पहुंच गया। कटक स्टेशन पर टहल रहा था तो चक्कर आ रहे थे। चक्कर आने का मतलब है कि भूख लग रही है लेकिन पता नहीं चल रहा। खाने को भी मन नहीं कर रहा है। फिर खोरधा रोड पर चार रोटियां ली गईं। एक पन्नी भी साथ रख ली क्योंकि बुखार में खाना खाने से अक्सर उल्टी हो जाती है। खैर, सही सलामत खाना पेट में पहुंच गया। खाना खत्म होते ही रबडी वाला आ गया। बीस-बीस रुपये की छोटी छोटी पैक्ड प्लास्टिक की कटोरियों में रबडी थी, तुरन्त ले ली। साथ में नन्हीं सी चम्मच भी मिली। जैसे ही रबडी का पहला स्वाद लिया, बीस रुपये वसूल हो गये। मावे की रबडी थी, बेहद स्वादिष्ट।
बुखार के कारण कुछ सावधानियां बरतनी पड गईं। स्टेशनों की टोंटियों का पानी पीना बन्द कर दिया। 15-15 रुपये की रेल नीर की बोतलें लेनी पड गईं। अभी तक बनियान में घूम रहा था, अब शर्ट भी पहन ली। एक चादर भी है, जो अब तक सिर के नीचे रखी जा रही थी, उसे ओढना शुरू कर दिया।
रात डेढ बजे विशाखापटनम पर ट्रेन खडी थी। ना कोई उतरा, ना कोई चढा, ना कोई चां-चां वाला। और आंख भी क्यों खुली? क्योंकि बुखार ठीक हो गया था- गर्मी लगने लगी थी। टॉयलेट गया और चक्कर भी नहीं आये। हालांकि कमजोरी महसूस हो रही थी।























महानदी

महानदी

महानदी पर तीसरी लाइन के लिये नया पुल बन रहा है।



महानदी



भुवनेश्वर में डी के चौधरी

अगला भाग: भारत परिक्रमा- सातवां दिन- आन्ध्र प्रदेश व तमिलनाडु

ट्रेन से भारत परिक्रमा यात्रा
1. भारत परिक्रमा- पहला दिन
2. भारत परिक्रमा- दूसरा दिन- दिल्ली से प्रस्थान
3. भारत परिक्रमा- तीसरा दिन- पश्चिमी बंगाल और असोम
4. भारत परिक्रमा- लीडो- भारत का सबसे पूर्वी स्टेशन
5. भारत परिक्रमा- पांचवां दिन- असोम व नागालैण्ड
6. भारत परिक्रमा- छठा दिन- पश्चिमी बंगाल व ओडिशा
7. भारत परिक्रमा- सातवां दिन- आन्ध्र प्रदेश व तमिलनाडु
8. भारत परिक्रमा- आठवां दिन- कन्याकुमारी
9. भारत परिक्रमा- नौवां दिन- केरल व कर्नाटक
10. भारत परिक्रमा- दसवां दिन- बोरीवली नेशनल पार्क
11. भारत परिक्रमा- ग्यारहवां दिन- गुजरात
12. भारत परिक्रमा- बारहवां दिन- गुजरात और राजस्थान
13. भारत परिक्रमा- तेरहवां दिन- पंजाब व जम्मू कश्मीर
14. भारत परिक्रमा- आखिरी दिन

9 comments:

  1. यात्रा में बुखार वाकई बहुत थकानदेह होता है ।

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  2. हिम्मत हैं आपकी जो बुखार में भी लगे रहे, सही कहा हैं किसी ने की हिम्मते मर्दा मददे खुदा. बहुत अच्छे..वन्देमातरम..

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  3. मुर्दा खाना खायेगे तो मुर्दा जेसे ही लगेगे । जामनगर के इन्तजार मेँ । आपको जामनगर मेँ भी बुखार था पर आप हिँमतवाले हे लग नही रहा था ।

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  4. Thanks to surindar ji sharma ka

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  5. बुखार से निकलना आवश्यक है, जमकर सोना चाहिये था ट्रेन में।

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  6. गेट वेल सून ......यात्रा के लिए शुभकामनायें

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  7. डी.के.चौधरी (दिलीप) मेरे साथ 55 लोगों के जत्थे में जुलाई- अगस्त में कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गये थे. एक दिन ट्रेकिंग पर चर्चा में सभी साथियों को आपके ब्लॉग के बारे में मैंने बताया था और वापस लौटने के बाद एक दिन दिलीप भाई का मेसेज आया कि ज़रा लिंक भेजिये नीरज के ब्लॉग का. लगता है, एक और फैन मिल गया आपको :-)

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  8. भाई ये आपने बढ़िया किया, विवरण के साथ रूट मेप भी दिया

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  9. बुखार में इतनी लम्बी यात्रा काबिले तारीफ है

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