भारत परिक्रमा- दूसरा दिन - दिल्ली से प्रस्थान

August 25, 2012
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देखा जाये तो आज यात्रा का पहला दिन है लेकिन चूंकि ट्रेन रात पौने ग्यारह बजे की थी, इसलिये कल का दिन पहला दिन माना गया। अगर ट्रेन सही समय पर चलती तो कल यानी 8 अगस्त को पन्द्रह मिनट की यात्रा होती। 
चार बजे अलार्म बजा, मेरी आंख खुली। दस मिनट बाद ही आवाज गूंजी कि पूर्वोत्तर सम्पर्क क्रान्ति प्लेटफार्म नम्बर बारह पर खडी है। अब इतना तो पक्का हो गया कि ट्रेन तैयार है, अब इससे ज्यादा लेट नहीं होगी। मैं वेटिंग रूम से अपना बोरिया बिस्तर समेटकर ट्रेन में जा घुसा। ठीक साढे चार बजे गाडी चल दी और अपनी भारत परिक्रमा की विधिवत शुरूआत हो गई- पौने पांच घण्टे लेट।
साढे नौ बजे आंख खुली। गाडी अच्छलदा से निकल चुकी थी। घण्टे भर में कानपुर पहुंच जायेगी। और पहुंच भी गई। नई दिल्ली से चलने के छह घण्टे बाद मैं कानपुर में था।
मैं कानपुर तक कई बार आ चुका हूं, दो बार इलाहाबाद तक और एक बार मुगलसराय और गया होते हुए हावडा तक। इस रूट पर खासकर इलाहाबाद तक कोई खास प्राकृतिक दृश्य ना होने के कारण यात्रा करने में उतना मजा भी नहीं आता। फिर मुझे जो मजा नये रूट पर आता है, उतना पुराने रूट पर नहीं आता। इसलिये ज्यादातर समय अपनी ऊपर वाली बर्थ पर पडे पडे ही बिताया।
विन्ध्याचल देखने की इच्छा थी लेकिन इलाहाबाद में यमुना पुल से गुजरते ही ऐसी नींद आई कि चुनार जाकर आंख खुली। विन्ध्याचल गया इस बार। पिछली बार जब हावडा गया था, तो विन्ध्याचल की पहाडी की एक झलक देखी थी।
चुनार से एक लाइन चोपन चली जाती है। चोपन फिर से जंक्शन है जहां से एक लाइन मध्य प्रदेश में कटनी और दूसरी झारखण्ड में बरकाकाना जाती है। अपन सीधे मुगलसराय की ओर बढते रहे।
मुगलसराय भी सोते सोते ही गुजर गया। आज का दिन बडा बोरिंग बीत रहा था। अगर ऐसा ही होता रहा तो यात्रा का मजा खत्म हो जायेगा। ना किसी सहयात्री से बातचीत हुई, ना जान-पहचान। हां, एक बात जरूर हुई कि इलाहाबाद में मुझे अपनी बर्थ की अदला-बदली करनी थी। मेरा बर्थ नई दिल्ली से इलाहाबाद तक एस-पांच में 27 नम्बर थी, जबकि इलाहाबाद के बाद उसी डिब्बे में 19 नम्बर। करना इतना था कि अपना सामान उठाकर बराबर वाले कूपे में रख लेना था।
यहां एक गडबड हो गई। मैंने फेसबुक पर लिख ही दिया था कि ट्रेन नई दिल्ली से पौने पांच घण्टे लेट चली है तो एक मित्र का सन्देश आया कि तुम्हारी इस यात्रा का मकसद क्या है। क्या तुम सचिन तेन्दुलकर की तरह रिकार्ड बनाना चाहते हो। तुम अगर किसी स्टेशन से बाहर नहीं निकलोगे तो क्या फायदा हुआ तुम्हारी इस भारत परिक्रमा का? इतना पढते ही दिमाग सनक गया मेरा। आग तो पहले से ही लगी हुई थी, अब घी का काम भी हो गया। मैं इलाहाबाद तक का सफर रात में पूरा करना चाहता था, लेकिन यह बे-मुराद सफर दिन में करना पड रहा है, तो मुझे सिर मुण्डाते ही ओले पडने का एहसास होने लगा। यात्रा शुरू करते ही भयंकर बोरियत होने लगी। इस पर मित्र साहब का सन्देश कि तुम्हारी यात्रा बेकार है तो सनकना पडा मुझे। माफ करना मित्र साहब अगर मेरी बात दिल पर जा लगी हो तो।
फेसबुक से याद आया कि आजकल बडे पैमाने पर एक भयंकर बेवकूफी वाला काम कर रहे हैं बहुत सारे लोग। साईं बाबा का, हनुमान का फोटो लगा देंगे और लिख देंगे कि इसे शेयर करो, थोडी देर में अच्छा फल मिलेगा। पढे-लिखे लोगों की जमात द्वारा किया जा रहा यह काम मेरे द्वारा अक्षम्य है।
एक दिन गाय का फोटो लगा मिला और उसके नीचे लिखा था कि गाय एकमात्र ऐसा प्राणी है, जो जितनी ऑक्सीजन वातावरण से ग्रहण करती है, उसका 60 प्रतिशत वापस वातावरण में छोड देती है। यह भी बेवकूफी भरा सन्देश है। फिर आदमी तो गाय से भी ऊपर है, जो ज्यादातर समय सौ प्रतिशत ऑक्सीजन वापस वातारवण को दे देता है। 
क्यों? कैसे? बताता हूं।
आप जानते ही होंगे कि हवा नाक के रास्ते सांस नली में प्रवेश करती है और करीब एक फुट का रास्ता तय करती हुई फेफडों में चली जाती है। यानी हमारी सांस नली में करीब आधा लीटर हवा हमेशा होती है। 
जम हम आराम कर रहे होते हैं तो हमारी सांस धीरे धीरे चल रही होती है। इतनी धीरे धीरे कि सांस के साथ ली गई हवा नली में ही रह जाती है। सांस बाहर निकालते समय वही हवा बाहर निकल जाती है। नली फेफडों से आई बासी हवा से भर जाती है। जब हम दोबारा सांस लेते हैं तो सबसे पहले यही बासी हवा फेफडों में जायेगी, ताजी हवा नली तक ही रह जायेगी। यही क्रम चलता रहता है। सोचिये कि हम जितनी ऑक्सीजन वातावरण से लेते हैं, उतनी ही उसे देते भी हैं।
असल में हमें ज्यादा ऑक्सीजन की जरुरत तब पडती है, जब हम कठिन कार्य कर रहे होते हैं। शारीरिक मेहनत कर रहे होते हैं, तब सबसे ज्यादा जरुरत पडती है शरीर को ऑक्सीजन की। चूंकि मनुष्य ज्यादातर समय आराम की मुद्रा में बैठा रहता है, तो ज्यादा जरुरत नहीं पडती। और सोते समय तो यह जरुरत नगण्य है।
गौर किया होगा कि अक्सर बैठे बैठे हम फुल सांस लेते हैं और झटके से छोड देते हैं। हम पांच पांच दस दस मिनट में एक सांस ऐसी लेते हैं कि फेफडे ताजी हवा से भर जाये और उसकी बासी हवा बाहर निकल जाये। 
प्राणायाम इसीलिये किया जाता है ताकि रातभर की बासी हवा फेफडों से निकल जाये। चूंकि सोते समय हमें ऑक्सीजन की नगण्य जरुरत पडती है, फेफडों में पूरी रात बासी हवा घूमती रहती है। सोते समय सांस बेहद धीरे धीरे चलती है तो उस बासी हवा का निकलना सम्भव नहीं हो पाता। सुबह उठकर प्राणायाम की सलाह इसीलिये दी जाती है कि वो बासी हवा निकल जाये और उसकी जगह ताजी हवा चली जाये। मान लो कि हमारी सांस नली में आधा लीटर हवा आ सकती है तो फेफडों की आधा लीटर बासी हवा निकालने के लिये हमें एक लीटर हवा बाहर फेंकनी पडेगी। इसी तरह अगर हम एक लीटर हवा अन्दर लेंगे तो उसमें से आधा लीटर तो नली में ही रह जायेगी, बाकी आधा लीटर ही फेफडों तक पहुंचेगी।
मात्र गाय पर यह सारी जिम्मेदारी थोपना बेवकूफी है, और कुछ नहीं।
और हां, हवा में 70 प्रतिशत नाइट्रोजन होती है जो हमारी सांस के साथ अन्दर जाती है और फेफडों में घूम-फिरकर बाहर चली आती है।





लम्बी दूरी की गाडियों में यात्रा करते समय नहाने का एक अचूक तरीका




इलाहाबाद में संगम से कुछ पहले यमुना





रमजान चल रहे हैं, तो नमाज भी पढी जायेगी।



अगला भाग:  भारत परिक्रमा- तीसरा दिन- पश्चिमी बंगाल और असोम


ट्रेन से भारत परिक्रमा यात्रा
1. भारत परिक्रमा- पहला दिन
2. भारत परिक्रमा- दूसरा दिन- दिल्ली से प्रस्थान
3. भारत परिक्रमा- तीसरा दिन- पश्चिमी बंगाल और असोम
4. भारत परिक्रमा- लीडो- भारत का सबसे पूर्वी स्टेशन
5. भारत परिक्रमा- पांचवां दिन- असोम और नागालैण्ड
6. भारत परिक्रमा- छठा दिन- पश्चिमी बंगाल व ओडिशा
7. भारत परिक्रमा- सातवां दिन- आन्ध्र प्रदेश व तमिलनाडु
8. भारत परिक्रमा- आठवां दिन- कन्याकुमारी
9. भारत परिक्रमा- नौवां दिन- केरल व कर्नाटक
10. भारत परिक्रमा- दसवां दिन- बोरीवली नेशनल पार्क
11. भारत परिक्रमा- ग्यारहवां दिन- गुजरात
12. भारत परिक्रमा- बारहवां दिन- गुजरात और राजस्थान
13. भारत परिक्रमा- तेरहवां दिन- पंजाब व जम्मू कश्मीर
14. भारत परिक्रमा- आखिरी दिन

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9 Comments

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August 25, 2012 at 6:58 AM delete

श्री नीरज जी , नाव , नमाज , लड़के वाले फोटो . अति सुंदर . दाद्दी वाले व्यक्ति अच्छे लगे

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August 25, 2012 at 8:15 AM delete

बढिया पोस्ट, आगे की यात्रा में भी साथ हैं। राम राम

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August 25, 2012 at 8:55 AM delete

पढ़ने का आनन्द आ रहा है, सब जाना जाना सा लग रहा है।

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August 25, 2012 at 10:52 AM delete

लगे रहो भारत यात्रा में, पढ़ने में मज़ा आ रहा हैं, वन्देमातरम..

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August 25, 2012 at 11:47 AM delete

जामनगर के इन्तजार मेँ ।

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August 25, 2012 at 12:30 PM delete

नीरज जी नमस्कार, यात्रा कि शुरुवात तो हो गयी है अब जैसे जैसे आगे बढती जायेगी मज़ा आता जायेगा. विन्ध्याचल हमारे मिर्ज़ापुर जिले में पड़ता है, और चुनार भी, आपको याद होगा एक फिल्म आई थी अभिषेक बच्चन कि "बंटी और बबली" इस फिल्म कि कुछ शूटिंग यही चुनार में हुई थी. और स्टेशन का नाम बदलकर फुर्सतगंज कर दिया गया था.चुनार से मेरा घर १५ किमी. आगे है चुनार से आगे कैलहत फिर अहरौरा रोड स्टेशन पड़ता है उसी के पास में मेरा घर है. फिर आगे जिवनाथपुर फिर मुगलसराय. जो लाइन चुनार से चोपन जाती है वो सोनभद्र से होकर जाती है.और ये रास्ता बहुत ही मस्त है.
लगे रहिये ऐसे ही लिखते रहिये मज़ा आ रहा है..... अगली कड़ी का इन्तेजार रहेगा.

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August 25, 2012 at 3:16 PM delete

Apane apane mitra ki baat ka jabab nahi diya.

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mehta
August 25, 2012 at 4:56 PM delete

mere khayaal mein yeh yaatra bekaar ki sirdardi hai, jo aapne mol le li hai

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August 26, 2012 at 11:22 AM delete

.क्या बढ़िया फोटू है नीरज इसे प्रोफाइल पर लगा दे ...दाढ़ी बनाने का भी टाइम नहीं मिला ?

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