सेरोलसर झील और जलोडी जोत

September 04, 2011
बहुत दिन पहले मैं कुल्लू जिले का नक्शा देख रहा था और उसमें भी कुल्लू का वो इलाका जो पर्यटकों में बिल्कुल भी मशहूर नहीं है लेकिन घुमक्कडों में लोकप्रिय है- तीर्थन घाटी। आमतौर पर कुल्लू जिला जहां से शुरू होता है, वहीं पर तीर्थन घाटी खत्म हो जाती है। चलो, सीधी सी बात बताता हूं। जब हम कुल्लू जाते हैं तो हमारे पास लगभग एकमात्र रास्ता मण्डी होकर ही है। मण्डी से आगे पण्डोह, हणोगी माता, औट, भून्तर और कुल्लू। यह जो औट है ना, यह मण्डी और कुल्लू की सीमा पर है। यहां से एक रास्ता ब्यास नदी के साथ-साथ कुल्लू और आगे मनाली चला जाता है जबकि दूसरा रास्ता तीर्थन नदी के साथ बंजार, शाजा होते हुए जलोडी जोत पार करके आनी, लुहरी, सैंज जा पहुंचता है। सैंज, शिमला-रामपुर मार्ग पर है।
इसी तीर्थन घाटी की हम बात कर रहे हैं। यहां कोई पर्यटक नहीं जाता, और यह जगह पर्यटकों के लायक है भी नहीं। ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क (GHNP) का नाम तो सुना होगा, उसका रास्ता भी इसी घाटी के बंजार कस्बे से जाता है। इस नेशनल पार्क में किसी को हाथी पर या जीप में बैठाकर नहीं घुमाया जाता। इसमें घूमने के लिये मजबूत पैर चाहिये, मजबूत हौसला चाहिये। मजबूत पैर और हौसला केवल घुमक्कडों की ही बपौती हैं, पर्यटकों की नहीं।
अच्छा, मैं उस दिन इसी इलाके के नक्शे को गौर से देख रहा था कि तभी सेरोलसर झील पर निगाह पडी। वैसे तो इस झील तक जाने के लिये जलोडी जोत तक सडक बनी हुई है। आगे जोत पार करके सैंज तक सडक है। हां, जोत कहते हैं दर्रे को- यानी जलोडी दर्रा (JALORI PASS)। लेकिन नक्शे में इस दर्रे का नाम नहीं लिखा था। नजदीकी गांव शाजा दिखाई दे रहा था। ऊंचाई करीब 3000 मीटर लिखी हुई थी।
अब गूगल पर खोजबीन शुरू हुई। जैसे ही serolsar lake लिखकर एण्टर मारते, गूगल महाराज कहते कि भाई, तुम गलत झील को ढूंढ रहे हो। फिर पूछते कि do you mean rewalsar lake? रिवालसर झील का तो मुझे पता है, मण्डी जिले में है और बेहद सुगम भी है। खैर, फिर भी सेरोलसर के बारे में कामचलाऊ जानकारी मिल ही गई- मेहनत करते हैं तो फल ठीक ही मिलता है। और पता भी क्या चला? कि यह झील जलोडी पास से चार किलोमीटर दूर है। झील का एकाध फोटो भी दिख गया जिसने मेरे होश उडा दिये। चारों ओर बर्फ से ढकी हुई बर्फीली जमी हुई झील। उन दिनों अपनी अक्ल इतनी विकसित नहीं थी। समझ लिया गया कि जब झील का ही यह हाल है तो दर्रे का क्या हाल होगा। ऐसे दर्रे पर सडक बनाना भी टेढी खीर है, इसलिये नक्शे में दिखाई जा रही उस सडक को भी खारिज कर दिया।
फिर भी सेरोलसर झील मेरे लिये खास आकर्षण की चीज थी। इसकी वजह थी इसकी ऊंचाई 3000 मीटर से ज्यादा होना। समय बीतता गया और इस झील के बारे में मेरी जानकारी भी बढती गई। जानकारी यहां तक बढ गई कि मैं कुल्लू से दिन भर में झील देखकर वापस लौटने का प्लान बनाने लगा। तभी सन्दीप भाई ने घोषणा की कि श्रीखण्ड महादेव चलना है- बाइक पर। यह घोषणा सुनते ही मुंह में पानी आ गया। अब मैं सेरोलसर झील को जरूर देख लूंगा। सडक बनी हुई है, यह जानकारी तो मुझे थी ही लेकिन जलोडी जोत पर बसों की कैसी सुविधा है, इसका अन्दाजा मुझे नहीं था। इसलिये बाइक का नाम आते ही इस यात्रा में सेरोलसर को भी शामिल कर लिया गया। हमारे श्रीखण्ड जाने से कुछ ही दिन पहले तरुण गोयल साहब ने बाइक से ही कुल्लू की तरफ से जलोडी जोत पर पहुंचकर मेरे लिये नगाडा बजा दिया कि ओये, जोत तेरा इंतजार रहा है।
और उस दिन दोपहर बारह बजे जब हम चारों जोत पर पहुंचे तो लगा कि वाकई, जोत हमारा इंतजार कर रहा था। यहां से झील की दूरी चार किलोमीटर है। साढे बारह बजे हम चल पडे। रास्ता ढूंढने की कोई दिक्कत नहीं हुई क्योंकि यह मात्र पगडण्डी ही नहीं बल्कि पगडण्डा था। रास्ता पहाडी है तो जाहिर सी बात है कि उतार-चढाई वाला है लेकिन यह उतराई-चढाई इतनी तुच्छ है कि जलोडी जोत और सेरोलसर झील को एक ही ऊंचाई पर माना जाता है। उस दिन बारिश हो रही थी इसलिये हम सभी के सभी रेनकोट के अन्दर पैक थे।
यहां मैंने एक बात गौर की जिसकी मुझे बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी। इस चार किलोमीटर के रास्ते में हमें लोगबाग आते जाते मिले जिनमें से लगभग सभी नये चकाचक कपडों में थे और परिवार समेत आ जा रहे थे। पहले तो लगा कि झील के उस तरफ भी कोई गांव होगा, जहां से ये लोग आ जा रहे हैं। लेकिन मुझे मालूम है कि ऐसे इलाके में गांव कितने होते हैं, कितनी दूर दूर होते हैं। इसीलिये मुझे आश्चर्य भी हुआ। बाद में पता चला कि आज झील पर मेला लगा हुआ था। ये सभी लोग स्थानीय थे और मेले में हिस्सा लेने जा रहे थे।
यह एक बेहद छोटी सी झील है। इतनी छोटी झील मैंने आजतक कभी नहीं देखी थी। फिर चारों तरफ से पेडों से घिरी हुई भी। बाईं तरफ एक छोटा सा मन्दिर भी बना है। मन्दिर के उस तरफ कुछ कमरे बने हैं जिनमें देर-सबेर होने पर शरण मिल जाती है। इसी मन्दिर के सामने काफी सारे लोगबाग बैठे थे। वहां ना तो कोई दुकान थी, ना ही कुछ प्रसाद वगैरह। इसके अलावा जिस चीज ने मुझे आकर्षित किया, वो थी एक डोली। मुझे मालूम था कि हिमाचल से लेकर उत्तराखण्ड तक के लोग अपने ग्राम देवता को डोली में बैठाकर घुमाते हैं। एकाध उदाहरण देता हूं- कुल्लू दशहरा इन्हीं डोलियों की वजह से प्रसिद्ध है, गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ का तो सभी को पता ही है।
गंगोत्री-यमुनोत्री आदि तो अलग हैं जबकि ग्राम देवता अलग। इनमें देवता के अलावा देवी भी होती हैं- सराहन की देवी इसका उदाहरण है। अगर किसी को इनमें दिलचस्पी हो तो बडे मजेदार किस्से बनकर आते हैं। पहली बात तो यही है कि ये देवता गांव के ही किसी आदमी के सिर आते हैं, उस आदमी को गुर कहा जाता है। देवता गुर के माध्यम से अपनी बात कहते हैं। जिस समय हम वहां पहुंचे तो देवता गुर के माध्यम से लोगों को कुछ कह रहा था। बोली अपनी समझ से परे थी, लेकिन हावभाव देखकर लग रहा था कि देवता नाराज है। मैंने इधर उधर नजर दौडाकर देखा कि कुछ लोग रो रहे थे जिनमें महिलाएं ज्यादा थीं। सभी के चेहरे लटके हुए थे।
वार्तालाप खत्म हुआ, देवता ने गुर का पिण्ड छोडा, गुर थोडी देर बाद सामान्य हो गया। डोली को मन्दिर के सामने से हटाकर एक तरफ रख दिया गया। बडे-बडे रौबदार दिखने वाले लोग कुछ मशविरा करने लगे। हमने भीड में से एक को पकडा और पूछा कि भाई, ये बताओ कि मामला क्या है? उसने बताया कि देवता नाराज है। क्यों? देवता कह रहा है कि पूजा में लापरवाही बरती जा रही है। आज के दिन भी पूरे आदमी और पूरा सामान नहीं आया है। असल में यह कई गांवों का देवता है। कुछ लोग इसे मानते हैं कुछ नहीं मानते। जो इसे मानते हैं, उन्हें सभी को या परिवार में से एक आदमी को यहां आना था लेकिन काफी सारे लोग नहीं आये। यही पर देवता अपना अगला गुर चुनता है। आज उसे इस गुर को छोडकर दूसरा गुर चुनना था। अब हम वापस गांवों में चले जायेंगे। वहां देवता ही बतायेगा कि इस झील के किनारे अगला ‘सम्मेलन’ कब होना है।
साढे तीन बजे तक हम वापस जलोडी जोत पहुंच गये। हमें यहां से झील तक जाने और आने में तीन घण्टे लगे।


यह है जलोडी पास। यह उच्चतम बिन्दु है, यहां से दोनों तरफ ढलान हैं।


जलोडी जोत से रघुपुर किले की तरफ का नजारा। अगली बार रघुपुर किला भी दिखाया जायेगा।


अब हम सेरोलसर झील की तरफ चलने लगे हैं। पीछे मुडकर देखने पर जलोडी जोत ऐसी दिखती है।



हां, याद आया- चण्डाल चौकडी। बायें से- नीरज, विपिन, नितिन और सन्दीप। और हां, यह हमारी श्रीखण्ड यात्रा का एक ऐसा बेहद दुर्लभ फोटो है जिसमें नीरज मुस्करा रहा है और सन्दीप भाई उदास से खडे हैं। बेहद दुर्लभ क्षण।




सेरोलसर के रास्ते में, कोई ज्यादा उतार-चढाई नहीं है।





मेले में जाते स्थानीय लोग। वेशभूषा देखकर टूरिस्ट लगते हैं।



छोटी सी नन्ही सी झील।


झील के किनारे मन्दिर और देवता की डोली




देवता आज नाराज है। अरे जाट देवता नहीं, उनका स्थानीय देवता।



इसी झील के रास्ते में यह अनोखा पेड पडता है।






अगला भाग: जलोडी जोत के पास है रघुपुर किला


श्रीखण्ड महादेव यात्रा
1. श्रीखण्ड महादेव यात्रा
2. श्रीखण्ड यात्रा- नारकण्डा से जांव तक
3. श्रीखण्ड महादेव यात्रा- जांव से थाचडू
4. श्रीखण्ड महादेव यात्रा- थाचडू से भीमद्वार
5. श्रीखण्ड महादेव यात्रा- भीमद्वार से पार्वती बाग
6. श्रीखण्ड महादेव के दर्शन
7. श्रीखण्ड यात्रा- भीमद्वारी से रामपुर
8. श्रीखण्ड से वापसी एक अनोखे स्टाइल में
9. पिंजौर गार्डन
10. सेरोलसर झील और जलोडी जोत
11. जलोडी जोत के पास है रघुपुर किला
12. चकराता में टाइगर फाल
13. कालसी में अशोक का शिलालेख
14. गुरुद्वारा श्री पांवटा साहिब
15. श्रीखण्ड यात्रा- तैयारी और सावधानी

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15 Comments

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September 4, 2011 at 6:54 AM delete

शामली एक्सप्रेस वाली बात तो रह ही गयी?

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September 4, 2011 at 8:12 AM delete

मन न भरे ऐसा नजारा. सभी देवताओं को प्रणाम.

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September 4, 2011 at 9:07 AM delete

abhi abhi kamrunag se lauta hun, trek ne paanv haath sab sooja diye hain.

aapne bataya nahin ki jalori himachal ki sabse jyada dhalaan waali [steepest] jot hai.

ye jo doliyan hain inhi mein himachal ke dev ghoomte hain. kullu ka dashehra, mandi ki shivratri in melon mein ek head devta hota hai, aur jab tak wo apne team ke saath nahin pahunchta, tab tak mela nahin shru hota, fir chahe mukhyamantri intejar kar raha ho ya pradhan mantri.

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September 4, 2011 at 9:53 AM delete

वाह, यह पूरा प्रकरण तो बहुत ही रोचक था।

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September 4, 2011 at 10:16 AM delete

संजोग से बहुत अच्छे समय पर पहुंचे इस झील पर जो स्थानीय मेला भी देख लिया.

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September 4, 2011 at 12:17 PM delete

JAT UDAAS

kyon ??

बहुत सुन्दर प्रस्तुति ||

सादर --

बधाई |

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September 4, 2011 at 12:17 PM delete

मनमोहक प्रस्तुति. लगता है पूरा पुण्य कुंवारे रहते ही कमा लेंगे आप.

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September 5, 2011 at 11:24 AM delete

शामली एक्सप्रेस की बात तुमने कह दी संदीप ...? हमें मालुम पड़ गया -
पहाड़ पर बने मकान विशेष दिलचस्प लगे ...और झील का तो क्या कहना ?

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September 5, 2011 at 12:19 PM delete

नीरज जी , बहुत बढ़िया सुन्दर फोटो, लेख भी मज़ेदार.............. नन्ही झील बहुत सुन्दर लगी ....



माउन्ट आबू : पर्वतीय स्थल के मुख्य आकर्षण (1)..............3
herf="http://safarhainsuhana.blogspot.com/2011/09/13.html"

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September 5, 2011 at 6:25 PM delete

अच्छी यात्रा फोटो भी मनमोहक है ....

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September 6, 2011 at 3:07 PM delete

mai iske baare mei apne papa se sun chuki thi... wo waha gaye the unke training time mein... aur ye baat sahi hai ki log iske baare mei bahut kam jante hain...
kahir papa bahut pahle gaye the, ab to bahut se badlaav aa gaye hai... n ye doli waali baat se ham anbhigya the, so thank you so much... :)

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September 6, 2011 at 8:05 PM delete

आनन्द आ गया अद्भुत नज़ारा देखकर....

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September 7, 2011 at 5:01 PM delete

अच्छी फोटो
बहुत सुन्दर प्रस्तुति |

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April 26, 2013 at 8:24 AM delete

भाई कमाल कर दिया

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