Skip to main content

कुल्लू के चरवाहे और मलाना

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें
बिजली महादेव ऐसी जगह पर है जहां से ब्यास घाटी और पार्वती घाटी दूर-दूर तक दिखाई देती है। कुल्लू और भून्तर भी दिखते हैं। यहां आने का एकमात्र रास्ता कुल्लू से ही है। मैं भी कुल्लू की तरफ से ही गया था लेकिन वापस कुल्लू की तरफ से नहीं लौटा। इरादा था कि भून्तर की तरफ से लौटूंगा। हालांकि इस तरफ कोई रास्ता नहीं है।
जब मैं भून्तर की तरफ नीचे उतरने लगा तो कुछ दूर दो चरवाहे और कुछ गायें-भैंसें दिखीं। सोचा कि ये चरवाहे कुछ ना कुछ सहायता तो कर ही देंगे। अगर इन्होंने मना कर दिया तो बिजली महादेव अभी ज्यादा दूर भी नहीं है, वापस कुल्लू चला जाऊंगा। मैने इनसे पूछा कि भाई, इधर से कोई भून्तर जाने का रास्ता है?
“रास्ता तो नहीं है, लेकिन नीचे उतरते चले जाओगे तो पहुंच जाओगे।”

“आप कहां के रहने वाले हो?”
“हमारा तो यहीं थोडा नीचे एक गांव है।”
“अच्छा, ये बताओ कि यहां से मलाना कितना दूर है?”
“है तो काफी दूर। क्यों, जाना है क्या आपको?’
“तुम गये हो कभी?”
“हां, हम तो गये हैं। पशुओं को चराते-चराते कई बार गये हैं।”
“बताओ यार, उधर की कुछ बातें।”
“क्या बताएं, वो इलाका सही नहीं है। सुट्टा मारने के चक्कर में अंग्रेज लोग बहुत जाते हैं। लोग भी होते हैं और लोगणी भी। साले, हमारा माहौल खराब करते हैं। छोटे-छोटे कपडे पहनकर आते हैं।”
“सुट्टा मारने? मतलब?”
“मतलब कि उधर भांग बहुत होती है। अफीम भी होती है। मलानी भी इनका खूब बीपार करते हैं। सालों को पैसा मिलता है। पता नहीं, गोरमेण्ट भी कुछ नहीं कर रही है।”
“आज के अखबार में तो लिखा था कि कल कुछ अधिकारी मलाना गये थे। उन्होंने मलानियों को अफीम बोने से मना किया है। वे उन्हे गोभी और फल-सब्जियों के बीज देकर भी आये हैं।”
“ये तो बहुत अच्छी बात है। पर ये मलानी भी बडे अजीब होते हैं। एक तो इनकी भाषा किसी से भी नहीं मिलती है। पूरे कुल्लू में इनकी जैसी भाषा बोलने वाला कोई नहीं है।”
“फिर ये दूसरों से अफीम का व्यापार कैसे कर लेते हैं? अधिकारी कैसे इनसे बात कर लेते हैं?”
“एकाध मलानी घर से भाग जाते हैं। इधर आकर रहते हैं तो इधर की भाषा भी सीख लेते हैं। अब तो मलानियों की नई पीढी हिन्दी भी बोलती है। एक बार किसी अंग्रेज ने मलाना में कुछ गडबड कर दी। सब मलानी इकट्ठे होकर नदी के साथ-साथ जरी पहुंच गये। मणिकर्ण वाली रोड बन्द कर दी और जरी बाजार भी बन्द कर दिया। अपनी ही भाषा में पता नहीं क्या-क्या बके जा रहे थे।”
“मैं भी मलाना जाने की सोच रहा हूं।”
“क्यों?”
“बस ऐसे ही। घूमने।”
“तो फिर एक काम करो। यहीं से सीधे चले जाओ। वहां सामने जो बरफ दिख रही है, तीन-चार घण्टे में पहुंच जाओगे। वहां से नीचे मलाना ही दिखाई देगा। उतर जाना।”
“नहीं यार, बहुत मुश्किल पडेगा। ठण्ड लगेगी और कोई इन्सान भी नहीं दिखेगा।”
“हां, ऐसा तो है। हम तो इसी रास्ते से जाते हैं। फिर आप जरी से चले जाओ।”
“मैं भी ऐसा ही सोच रहा हूं। जरी से रास्ता कैसा है?”
“अब तो डैम तक बढिया सडक बनी है। आगे भी ठीक ही रास्ता है।”
“अच्छा ये बताओ। यहां बिजली महादेव पर बिजली गिरती हुई आपने देखी है?”
“हां, हर साल सावन में यहां बिजली गिरती है। लेकिन लगता है कि इस बार नहीं गिरेगी।”
“इस बार नहीं गिरेगी? क्यों?”
“यहां दो मोबाइल टावर जो लग गये हैं। टावरों की वजह से बिजली शिवलिंग पर ना गिरकर इन्ही पर गिरेगी और अर्थ हो जायेगी।”
“हां, बात तो बिल्कुल सही कह रहे हो।”
“आपको कैसा लगा बिजली महादेव?”
“भई, मजा आ गया। वाकई में, आज तक ऐसी जगह नहीं देखी थी।”
“अब हमारे भी चलने का टाइम हो गया है। चलो, आज हमारे यहां ही चलिये।”
“बस भाई, धन्यवाद। चलूं मैं भी भून्तर। फिर वहां से मणिकर्ण जाऊंगा।”
“आप ऐसा करना। यहां से थोडा नीचे उतरकर सीढियां मिलेंगीं। वैसे तो वे गांव वालों ने अपने लिये बना रखी हैं, लेकिन अगर आप फिर भी रास्ता ढूंढते हुए जायें तो बडी ही आसानी से भून्तर पहुंच सकते हैं।”
______
वे दोनों पशुओं को लेकर अपने रास्ते चले गये। मैं भी हरे मखमली ढलान पर नीचे उतरने लगा। कुछ दूर चलकर मुझे वे सीढियां मिल गयीं।
और हां, मलाना के बारे में मैं आपको कुछ बता दूं। यह कुल्लू जिले का एक गुमनाम सा गांव है। इस गांव की अपनी लोकतान्त्रिक प्रणाली है जो विश्व में प्राचीनतम है। इस गांव की बोली, रीति-रिवाज, पहनावा सब कुछ बाकी कुल्लू से अलग है। यहां जाना दुर्गम है। जाने के दो रास्ते हैं। एक तो नग्गर से जो मनाली के रास्ते में पडता है। नग्गर से चन्द्रखनी दर्रा पार करके मलाना पहुंचा जा सकता है। दूसरा रास्ता है जरी से, जो मणिकर्ण के रास्ते में पडता है। जरी वाला रास्ता नग्गर वाले रास्ते से सुगम है। एक तीसरा रास्ता भी है जो बिजली महादेव से जाता है। बिजली महादेव से तीन तरफ नदी घाटी है यानी ढलान है। चौथी तरफ एक चढाई भरी चोटी है। इस चोटी पर अगर चढते जायें तो भी मलाना पहुंच सकते हैं। मुझे मलाना के बारे में सबसे पहले मुनीश जी ने बताया था।

SAM_0201

SAM_0202

SAM_0207

SAM_0212
यहां से भून्तर जितना पास दिखता है, असल में यह उतना ही दूर है। अगर सीधे उतरें तो कम से कम तीन घण्टे लगेंगे।

SAM_0218
कुछ पशु चर रहे हैं, दो चरवाहे भी बैठे हैं। चलूं, उन्ही के पास चलू। वे रास्ता तो बता देंगे।

SAM_0219
ये रहे दोनों पहाडवासी

SAM_0220

SAM_0221

SAM_0223

SAM_0224
वापस बिजली महादेव की दिशा में देखता हूं तो डूबता सूरज और मोबाइल के दो टावर दिखते हैं।

SAM_0225
हर चित्र की अपनी कहानी होती है।

bijali
यह मलाना की स्थिति को दर्शाता नक्शा है। कुल्लू और मनाली के बीच में है नग्गर। नग्गर और मलाना के बीच में जो बर्फीली चोटियां दिख रही हैं, वह चन्द्रखनी दर्रा है। भून्तर और मणिकर्ण के बीच में है जरी। जरी में मणिकर्ण की तरफ से आती पार्वती नदी में एक और नदी आकर मिलती है। इसे मलाना नाला या मलाना नदी कहते हैं। जरी से मलाना नाला के साथ-साथ दस-पन्द्रह किलोमीटर चलकर फिर दो-तीन किलोमीटर की खडी चढाई चढकर मलाना पहुंचा जा सकता है। तीसरा रास्ता बिजली महादेव से भी बन सकता है। पहाड की चोटी यानी धार पर चलकर मलाना के ऊपर चन्द्रखनी दर्रे तक पहुंचा जा सकता है, फिर नीचे उतरकर मलाना जा सकते हैं।


मणिकर्ण खीरगंगा यात्रा
1. मैं कुल्लू चला गया
2. कुल्लू से बिजली महादेव
3. बिजली महादेव
4. कुल्लू के चरवाहे और मलाना
5. मैं जंगल में भटक गया
6. कुल्लू से मणिकर्ण
7. मणिकर्ण के नजारे
8. मणिकर्ण में ठण्डी गुफा और गर्म गुफा
9. मणिकर्ण से नकथान
10. खीरगंगा- दुर्गम और रोमांचक
11. अनछुआ प्राकृतिक सौन्दर्य- खीरगंगा
12. खीरगंगा और मणिकर्ण से वापसी

Comments

  1. बिजली महादेव की जय हो!
    बहुत सुन्दर, सचित्र वृत्तान्त. मलाना की जानकारी और चित्रों का इंतज़ार है - क्या नाम है वहां की भाषा का?

    ReplyDelete
  2. bahut sundar photo... malanaa chale jaate.... ek do sutte maar aate...

    ReplyDelete
  3. ब्लॉग जगत के मायने सही तरह से आप ही जैसे लेखक साबित कर रहे हैं। वरना आजकल ब्लॉग जगत में ऐसे भी कई लेखक हैं जो रोज थोक में भाव में पोस्ट डालते हैं और उनमें ना जाने क्या लिखते हैं वो खुद ही समझ सकते हैं। या तो किसी को गाली देते हैं या रोना रोते हैं। ब्लॉग को अपना राज्य समझते हैं और अपने आपको राजा, जो जी में आये लिखते हैं..आल-पताल कुछ भी। लेकिन आप जो काम कर रहे हैं कमाल का है।

    ReplyDelete
  4. बिजली महादेव...जिन्दाबाद!!

    अपने नाम के साथ:


    प्रस्तुतकर्ता..नीरज जाट जी


    सम्मान में आत्मनिर्भरता का अनुकरणीय एवं साहसी उदाहरण!!

    ReplyDelete
  5. सुन्दर वर्णन. चरवाहों की फोटो पहले की पोस्ट पर भी डाली थी.

    ReplyDelete
  6. वाह नीरज बहुत सुंदर विवरण ओर अति सुंदर चित्र, मेने भी इस मलाना के बारे एक बार कही पढा था, ओर यहां इजरायल के लोग बहुत आते है जो नशा बगेरा खुब करते है तो हद से ज्यादा संस्कारो की धज्जियां उडाते है, गंदगी हद से ज्यादा डालते है, ओर बात बात बात पर लडने को तेयार रहते है, जब कि कि हमारी सरकार को सब पता है, लेकिन फ़िर भी आंखे बन्द किये बेठी है... ओर यह लोग बिना वीजा भी कई कई साल रहते है

    ReplyDelete
  7. हम अपने स्वर्ग में व्यस्त हैं, आप अपने में मस्त हैं । आनन्द आ गया ।

    नया ब्लॉग प्रारम्भ किया है, आप भी आयें । http://praveenpandeypp.blogspot.com/2010/06/blog-post_23.html

    ReplyDelete
  8. नीरज, ये मलाना वही है न जहां इसाईली लोग बस रहे हैं?

    बढिया वर्णन किया है, और फ़ोटो बहुत प्यारे हैं।
    आगे भी इंतज़ार करेंगे।

    बहुत अच्छी पोस्ट लगी।

    बधाई।

    ReplyDelete
  9. मलाना के बारे में आपकी सुनी-सुनाई बातें सच हैं मगर आधा -सच और आधा सच झूठ से ज़्यादा खतरनाक होता है . ब्लौग आपका डोमेन है और आप यहाँ जो ठीक लगे वो कह सकते हैं मगर किसी मलाना-वासी से बात किये बिना एक-पक्षीय बात कहना भी जल्दबाज़ी है खासकर ऐसी बात जिस से वो बेचारे बदनाम होते हों .
    १. वहां चरस नामक मादक-द्रव्य का अवैध व्यापार वाकई होता है मगर अफ़ीम का नहीं और मलाना-वासी खुद कभी किसी मादक द्रव्य का इस्तेमाल नहीं करते और इस्तेमाल करने वाले को गाँव से निकाल देते हैं .
    २. वे स्वयं को क्षत्रिय भी बताते हैं लेकिन पश्चिमी इतिहासकारों का बड़ा तबका उनका रिश्ता सिकंदर के उन सैनिकों से जोड़ता हैं जो वापस यूनान न जाकर यहीं बस गए .
    ३.उनके चेहरे में कुछ यूनान की झलक है भी और वो अपने हर निर्णय को आम सहमति से वोटिंग के आधार पे लेते हैं और इसीलिए वो समाज शास्त्रियों के लिए बहुत अचरज और अध्ययन का विषय हैं चूंकि मुख्य-धरा से कटा कोई गाँव इतना सभ्य कैसे है ?
    ४. उनकी भाषा 'राक्षस ' परिवार की मानी जाती है जिसमें कई शब्द संस्कृत के भी हैं .
    .........वगैरह...वगैरह ! मलाना को इतनी आसानी से सुनी सुनाई ,एक पक्षीय बात के आधार पे निपटाना मुझे खला चूंकि मैं एक डॉक्यूमेंट्री की शूटिंग के सिलसिले में वहां रह चुका हूँ , बाकी आपकी पोस्ट हमेशा की तरह मस्त है , घुमक्कड़ी मुबारक , घुमक्कड़ी जिंदाबाद !

    ReplyDelete
  10. मुनीश जी,
    मलाना के बारे में मेरे विचार पहले चित्र के ऊपर वाले पैराग्राफ में लिखे हैं। सुनी सुनाई बातों पर मैं भी भरोसा नहीं करता। ये मलाना के पास के एक गांव के रहने वाले बन्दे के विचार हैं। मलाना के पडोसी मलाना के बारे में क्या सोचते हैं, मैने केवल वही लिखा है। उस चरवाहे ने जो बात मुझसे की, उसी को यहां लिख दिया है।
    कभी मलाना जाना होगा तो किसी मलानी से जो बात होगी, उसे भी इन मंच पर लिखने का प्रयास करूंगा।

    ReplyDelete
  11. ग़लत चरवाहे भी नहीं कह रहे थे मगर उनकी बातों में भले मानुस मलाना वासियों की चरस -जन्य सम्पन्नता से उपजी जलन है . वैसे २००८ की जनवरी में हुए भीषण अग्नि काण्ड में वहां के पुराने ,शानदार घर जल गए . मेरे पास उनके चित्र अभी भी हैं !

    ReplyDelete
  12. भाई स्वर्ग जाने का मौका तो पता नहीं कब मिले या फिर मिले ना मिले इसलिए आपके ब्लॉग पर आ कर जब तस्वीरें देखते हैं तो सोचते हैं अगर स्वर्ग होगा तो ऐसा ही होगा...बेहतरीन पोस्ट और जानकारी...मलाना गए क्या आप? अगली पोस्ट का अभी से इंतज़ार शुरू...
    नीरज

    ReplyDelete
  13. आपकी घुमक्कड़ी देखकर मुझे रश्क होता है।
    ---------
    क्या आप बता सकते हैं कि इंसान और साँप में कौन ज़्यादा ज़हरीला होता है?
    अगर हाँ, तो फिर चले आइए रहस्य और रोमाँच से भरी एक नवीन दुनिया में आपका स्वागत है।

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

हल्दीघाटी- जहां इतिहास जीवित है

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । हल्दीघाटी एक ऐसा नाम है जिसको सुनते ही इतिहास याद आ जाता है। हल्दीघाटी के बारे में हम तीसरी चौथी कक्षा से ही पढना शुरू कर देते हैं: रण बीच चौकडी भर-भर कर, चेतक बन गया निराला था। राणा प्रताप के घोडे से, पड गया हवा का पाला था। 18 अगस्त 2010 को जब मैं मेवाड (उदयपुर) गया तो मेरा पहला ठिकाना नाथद्वारा था। उसके बाद हल्दीघाटी। पता चला कि नाथद्वारा से कोई साधन नहीं मिलेगा सिवाय टम्पू के। एक टम्पू वाले से पूछा तो उसने बताया कि तीन सौ रुपये लूंगा आने-जाने के। हालांकि यहां से हल्दीघाटी लगभग पच्चीस किलोमीटर दूर है इसलिये तीन सौ रुपये मुझे ज्यादा नहीं लगे। फिर भी मैंने कहा कि यार पच्चीस किलोमीटर ही तो है, तीन सौ तो बहुत ज्यादा हैं। बोला कि पच्चीस किलोमीटर दूर तो हल्दीघाटी का जीरो माइल है, पूरी घाटी तो और भी कम से कम पांच किलोमीटर आगे तक है। चलो, ढाई सौ दे देना। ढाई सौ में दोनों राजी।

भंगायणी माता मन्दिर, हरिपुरधार

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 10 मई 2014 हरिपुरधार के बारे में सबसे पहले दैनिक जागरण के यात्रा पृष्ठ पर पढा था। तभी से यहां जाने की प्रबल इच्छा थी। आज जब मैं तराहां में था और मुझे नोहराधार व कहीं भी जाने के लिये हरिपुरधार होकर ही जाना पडेगा तो वो इच्छा फिर जाग उठी। सोच लिया कि कुछ समय के लिये यहां जरूर उतरूंगा। तराहां से हरिपुरधार की दूरी 21 किलोमीटर है। यहां देखने के लिये मुख्य एक ही स्थान है- भंगायणी माता का मन्दिर जो हरिपुरधार से दो किलोमीटर पहले है। बस ने ठीक मन्दिर के सामने उतार दिया। कुछ और यात्री भी यहां उतरे। कंडक्टर ने मुझे एक रुपया दिया कि ये लो, मेरी तरफ से मन्दिर में चढा देना। इससे पता चलता है कि माता का यहां कितना प्रभाव है।

स्टेशन से बस अड्डा कितना दूर है?

आज बात करते हैं कि विभिन्न शहरों में रेलवे स्टेशन और मुख्य बस अड्डे आपस में कितना कितना दूर हैं? आने जाने के साधन कौन कौन से हैं? वगैरा वगैरा। शुरू करते हैं भारत की राजधानी से ही। दिल्ली:- दिल्ली में तीन मुख्य बस अड्डे हैं यानी ISBT- महाराणा प्रताप (कश्मीरी गेट), आनंद विहार और सराय काले खां। कश्मीरी गेट पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास है। आनंद विहार में रेलवे स्टेशन भी है लेकिन यहाँ पर एक्सप्रेस ट्रेनें नहीं रुकतीं। हालाँकि अब तो आनंद विहार रेलवे स्टेशन को टर्मिनल बनाया जा चुका है। मेट्रो भी पहुँच चुकी है। सराय काले खां बस अड्डे के बराबर में ही है हज़रत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन। गाजियाबाद: - रेलवे स्टेशन से बस अड्डा तीन चार किलोमीटर दूर है। ऑटो वाले पांच रूपये लेते हैं।