Wednesday, December 24, 2014

जांस्कर यात्रा- रांगडुम से अनमो

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अगले दिन सुबह साढे तीन बजे ही ड्राइवर ने आवाज लगा दी। कसम से इस समय उठने का बिल्कुल भी मन नहीं था। सर्दी में रजाई छोडने का क्षण मेरे लिये बडा दुखदाई होता है। लेकिन उठना तो था ही। चार बजते बजते यहां से निकल चुके थे। अभी भी रात काफी थी। पांच बजे जाकर कहीं उजाला होना शुरू होगा।
आगे चलकर सूरू का पाट अत्यधिक चौडा हो गया और सडक छोडकर ड्राइवर ने गाडी सीधे पत्थरों में घुसा दी। ऊबड-खाबड रास्ता अभी तक था, ऊबड खाबड अभी भी है तो कुछ भी फर्क पता नहीं चला। पत्थरों से कुछ देर में पुनः सडक पर आ गये। कुछ ही आगे एक जगह गाडी रोक दी। यहां एक सन्तरी खडा था। यह असल में रांगडुम गोम्पा था। बडा प्रसिद्ध गोम्पा है यह। इसी के पास एक चेकपोस्ट है। यह पता नहीं सेना की चेकपोस्ट है या बीएसएफ की या किसी और बल की। पुलिस की तो नहीं है। ड्राइवर ने रजिस्टर में एण्ट्री की। हम सन्तरी को देखकर हैरान थे। आंखों में नींद का नामोनिशान तक नहीं था। जबकि यहां न कोई पाकिस्तान की सीमा है, न किसी चीन की। यहां ट्रैफिक भी बिल्कुल नहीं था। आखिरी गाडी कल दिन रहते ही गुजरी होगी। हमारे बाद जो गाडी आयेगी, वो भी उजाला होने के बाद ही आयेगी।

पौने छह बजे पंजी-ला पहुंचे। इसे पेंसी-ला भी कह देते हैं। यह एक दर्रा है जो सूरू और जांस्कर घाटियों को अलग करता है व कारगिल-पदुम सडक का उच्चतम स्थान है। इसकी ऊंचाई लगभग 4400 मीटर है। इसके बाद हम जांस्कर घाटी में प्रवेश कर जायेंगे और आगे पूरा रास्ता ढलान भरा है।
पंजी-ला का मुख्य आकर्षण इसकी छोटी छोटी झीलें हैं। अब तक काफी उजाला हो चुका था। यहां एक वाच टावर भी है जहां खडे होकर चारों तरफ का नजारा लिया जा सकता है। वाच टावर की सीढियां चढने में बुरी तरह सांस चढ गई। बडी भयंकर ठण्ड भी थी।
जांस्कर भी कारगिल जिले का ही हिस्सा है। अगर हम नदी के साथ साथ चलते जायें तो पदुम से काफी आगे जंगला नामक स्थान है। फिर नेरक व और आगे चिलिंग गांव है। चिलिंग वही स्थान है जहां पहली लद्दाख यात्रा में मैंने जनवरी में शून्य से पच्चीस डिग्री नीचे के तापमान में गुफा में रात बिताई थी। तो जंगला व नेरक के बीच में कहीं यह नदी कारगिल जिले से लेह जिले में प्रवेश करती है।
पंजी-ला पार करते ही इस मार्ग का सबसे बडा ग्लेशियर मिलता है- द्रांग-द्रंग ग्लेशियर। भारत में अमूमन ग्लेशियरों तक सडक नहीं जाती लेकिन यह सडक एक अपवाद है। द्रांग-द्रंग ग्लेशियर हैरान कर देने वाला ग्लेशियर है। पहली बार निगाह में आने के बाद से लेकर कई किलोमीटर बाद तक यह दिखता रहता है। हर मोड पर इसकी अलग ही सुन्दरता दिखती है। आगे के समय का भी हमें ध्यान रखना था, इसलिये बार बार गाडी नहीं रुकवा सकते थे। इसी ग्लेशियर से जांस्कर नदी निकलती है जो एक लम्बा सफर तय करके निम्मू में सिन्धु में जा मिलती है।
एक बार पंजी-ला से उतर जाते हैं तो करीब 4000 मीटर तक पहुंच जाते हैं। फिर पदुम तक मामूली सा ढलान है और दूरी ज्यादा होने के कारण यह समतल ही दिखता है। पदुम 3600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। जांस्कर बेहद चौडी घाटी बनाकर बहती है तो नदी के दोनों तरफ दूर दूर तक समतल मैदान दिखते हैं। इन्हीं मैदानों में एक नन्हा सा जीव मिलता है जो जांस्कर की पहचान है। वो है फ्यांग। प्रकाश जी ने इसका अंग्रेजी नाम बताया- मरमेड। यह आपको पत्थरों पर व घास पर धूप सेंकता मिलेगा। बेहद शर्मीला खरगोश व चूहे की मिली-जुली प्रजाति जैसा दिखने वाला यह जीव आपको पास आते देख भागकर अपने बिल में दुबक जाता है। लेकिन सडकों पर दौडती गाडियों से यह परिचित है।
सवा सात बजे एक गांव में पहुंचे, नाम था अबरान। भूख लग रही थी। ड्राइवर से बता रखा था कि कहीं भी चाय की दुकान मिले, बता देना। उसने एक जगह गाडी रोक दी। हमें पचास मीटर आगे एक दुकान दिखी तो पैदल ही उस दुकान की तरफ बढ चले। चार कप चाय बनवा ली। तीन हम और एक ड्राइवर। चाय बन गई तो हमने ड्राइवर को आवाज दी। तभी दुकान वाले ने कहा कि वो नहीं आयेगा। क्यों? क्योंकि वह मुसलमान है। ये लोग बौद्धों के यहां कुछ भी नहीं खाते। खायेंगे तो सिर्फ मुसलमानों की ही दुकान पर। जहां उसने गाडी रोकी थी, वहां एक मुसलमान की दुकान है। उसने वहां चाय पी है। हमने पूछा कि इस तरह का खान-पान का विचार आप लोग भी करते हो क्या? बोला कि नहीं, हम ऐसा नहीं करते। कारगिल जाते हैं तो इन्हीं लोगों के यहां खाते हैं।
पदुम से कारगिल जाने वाली गाडियों का काफिला मिलने लगा। रास्ता खराब तो था ही, सामने से गाडी के आ जाने से धूल भी बहुत उडती थी। ये दो घण्टे बेहद बोरियत भरे बीते। सवा नौ बजे हम पदुम में थे।
पदुम अर्थात जांस्कर का मुख्यालय। जांस्कर एक नदी का नाम होने के साथ साथ इस लम्बे चौडे इलाके का नाम भी है। यहां कई छोटे छोटे गांव हैं। पदुम इनमें सबसे बडा है। यह तहसील भी है। पूरी आबादी बौद्ध है। बौद्ध होने के नाते इसे लेह जिले में मिला देना चाहिये था।
पदुम से आगे रारू गांव है जहां से मेरी जानकारी के अनुसार ट्रेक शुरू होता है। रारू तक सडक बनी है। जिस तरह कारगिल से यहां पदुम तक कोई बस नहीं चलती, उसी से अन्दाजा लगा लिया था कि रारू तक भी कोई बस नहीं मिलने वाली। शेयर्ड सूमो भी मुश्किल ही मिलेगी। हमने इसी ड्राइवर से बात की तो इसने मना कर दिया। जोर दिया तो पांच हजार मांगने लगा। सोचा कि हो सकता है कि रारू तक जाने का किराया पांच हजार ही हो। कोई असम्भव बात नहीं थी। विदेशी बहुत आते हैं और सडक नहीं है और जनसंख्या तो लगभग नगण्य। चालीस किलोमीटर के पांच हजार हो सकते हैं। लेकिन हमें भूख भी लगी थी। पदुम बडा गांव है, इसलिये जैसा खाना यहां मिल सकता था, वैसा आगे नहीं मिलने वाला। आखिरकार हम उतर गये।
एक साफ-सुथरे और शीशे लगे रेस्टॉरेंट में गये। यहां वेटर बिहारी थे। साफ-सुथरे कपडे पहन रखे थे। लग ही नहीं रहा कि बिहारी हैं। लेकिन शक्ल पर परमानेण्ट ठप्पा लगा था कि उत्तर भारतीय हैं। हमने पूछा, उसने बताया। हैरानी हुई। अच्छा भी लगा। आदमी कहां कहां रोजी-रोटी कमाने जाता है! आलू के परांठे नहीं मिले तो मोमो ले लिये।
जब तक खाना खत्म हुआ, तब तक हमारी जानकारी अपडेट हो चुकी थी। रारू से आगे अनमो गांव तक सडक बन चुकी है। मैंने नक्शे में देखा। खुशी से झूम उठा- अनमो तो पूरने के बिल्कुल नजदीक है। इसका मतलब है कि हम फुकताल गोम्पा को आज ही देख सकते हैं। फुकताल इस शिंगो-ला ट्रेक से पांच किलोमीटर हटकर है। सुविधाजनक रास्ता पूरने से जाता है। योजना बन गई कि पूरने में सामान छोडकर खाली हाथ ही फुकताल चले जायेंगे। वापस पूरने आने में अन्धेरा भी हो जायेगा तो भी कोई बात नहीं। अगर अनमो तक सडक न बनी होती तो हमें रारू से पैदल चलना पडता। अन्धेरा होने तक पूरने पहुंचते। आज फुकताल नहीं जा पाते।
यह भी पता चला कि वो सामने वाली दुकान का चबूतरा अनमो जाने वाले यात्रियों का ठिकाना है। जब भी कोई सूमो वाला देखता है कि पर्याप्त सवारी हैं, तो वह आकर गाडी लगा देता है और अनमो चला जाता है। हम भी वहीं जाकर बैठ गये। अभी हम तीनों के अलावा यहां कोई नहीं था। दो विदेशी दिखे तो विधान लपककर उनके पास गया। कुछ गुफ्तगू की और वे विदेशी भी उसी चबूतरे पर आकर बैठ गये। विधान ने बताया कि ये भी अनमो ही जायेंगे। फुकताल गोम्पा विदेशियों में काफी लोकप्रिय है।
अनमो का एक स्थानीय लडका भी आकर बैठ गया। अब छह यात्री हो गये। विधान और प्रकाश जी टैक्सी स्टैण्ड पर गये। उसने कहा कि तीन हजार रुपये लेगा। तीन हजार का मतलब था कि छह लोगों में बंटकर पांच पांच सौ प्रति सवारी पडेंगे। उन्होंने यह बात सबको बताई। स्थानीय लडके ने कहा कि वो केवल दो सौ ही देगा। नहीं तो पूरे दिन यहीं बैठा रहेगा, शाम को उसका कोई जानकार कारगिल से आयेगा और वह फ्री में अपने गांव जा सकता है। उधर विदेशियों ने कहा कि वे तीन-तीन सौ ही देंगे। इसका मतलब था कि हमारे ऊपर बाईस सौ का बोझ पडेगा। पता नहीं विदेशियों को किस गधे ने पढा दिया कि तीन सौ से ज्यादा मत देना? वे अपनी जिद से टस से मस नहीं हुए। हमारा सारा उत्साह खत्म हो गया।
फिर से एक घण्टा बीत गया और सवा ग्यारह बज गये। हम चबूतरे पर ही बैठे रहे। समय तेजी से निकलता जा रहा था। हमारे पास योजनानुसार कोई मार्जिन नहीं था लेकिन रारू की बजाय अनमो तक सडक बन जाने से हमें बहुत मामूली सा मार्जिन मिल गया था। अगर आज फुकताल न जा पाये तो यह मार्जिन भी समाप्त हो जायेगा।
बडी जद्दोजहद के बाद विदेशी चार-चार सौ यानी 800 देने को राजी हुए। उधर उस लडके ने जाने से मना कर दिया। उसका जानकार आयेगा और वह अब फ्री में जायेगा। हमारे लिये बात वही की वही रह गई। हमने तय किया कि इनसे 800 ही ले लेते हैं, बाकी 2200 हम दे देंगे। आज हमें लगा कि ऐसी जगहों पर जो चायवाला हमसे एक चाय के दस रुपये लेता है, इनसे पच्चीस-तीस रुपये लेता है; ठीक ही करता है।
आखिरकार साढे ग्यारह बजे यहां से रवाना हो गये। पदुम से निकलते ही सडक सारप नदी की संकरी घाटी में घुस गई। कारगिल से अभी तक बडी चौडी घाटियां मिलीं- पहले सूरू की और फिर जांस्कर की। सारप की घाटी बहुत संकरी है। सीधे खडे बंजर हरियाली-विहीन पहाड और बाहर उडती धूल।
रारू में नदी पार की। रास्ता नया बना है। पुराना रास्ता ही बहुत खतरनाक था, नये का अन्दाजा लगा सकते हो। ड्राइवर अत्यधिक कुशल था, नहीं तो एक जगह सामने से आती गाडी को रास्ता देने के लिये सौ मीटर पीछे चलाना लगभग असम्भव काम था। उधर नदी के उस तरफ रारू से आती वो पगडण्डी भी दिख रही थी, जो सडक बनने से पहले रास्ते का काम करती थी। सडक बन गई लेकिन गाडियां नहीं चलती इसलिये वह पगडण्डी आज भी जीवित है। बहुत सारे ट्रैकर आते-जाते दिखे।
ढाई घण्टे बाद यानी दो बजे अनमो पहुंचे। दूरी पचास किलोमीटर से ज्यादा नहीं है। सडक भी बस यहीं तक बनी है। सीमा सडक संगठन का एक कैम्प यहां है और आगे सडक बनाने का काम चल रहा है। यहां ऊपर से आती जलधारा भी है जिससे अनमो को पीने का पानी मिलता है। इसकी वजह से थोडी हरियाली भी है। पूरे गांव में चार-पांच घर ही हैं। जलधारा के किनारे एक तम्बू लगा है जहां खाना मिलता है। पैदल यात्रा शुरू करने से पहले हमने भी कुछ खाने का इरादा कर लिया।
लेकिन हम तय करते रह गये कि क्या खाएंगे, खाएंगे भी या नहीं; तब तक हमारे साथ आये विदेशियों ने खाने का ऑर्डर दे दिया। जब तक हमारा फैसला हुआ, तब तक एक ही प्लेट चावल बने थे और वे उन विदेशियों के लिये थे। दुकान की मालकिन ने दोबारा चावल बनाने को कहा लेकिन मैंने मना कर दिया। मैं अच्छी तरह जानता हूं कि 3900 मीटर की इस ऊंचाई पर कितनी देर में चावल बनेंगे। हालांकि कुकर से ज्यादा फर्क नहीं पडता लेकिन कम तापमान, जलधारा का अत्यधिक ठण्डा व खुला पानी; इनसे पकने में ज्यादा समय लगेगा। मना कर दिया। इसके बदले चाय, आमलेट, बिस्कुट, नमकीन व कोल्ड ड्रिंक रुक रुककर पीते रहे। यहां एक बंगाली दम्पत्ति भी बैठे थे जो आज पूरने जायेंगे और कल फुकताल।
इतने में बीआरओ के इंजीनियर राजकुमार यहां आये। बातचीत हुई तो वे बुलन्दशहर के निकले। भला यहां कहां उन्हें दिल्ली वाले मिलते थे? बडे खुश हुए। और यह जानकर कि मैं मेरठ का हूं और जाट हूं तो और भी खुश हुए। वे भी जाट ही थे। अपने कैम्प में ले गये। उन्होंने जान ही लिया था कि हम भूखे हैं और हमें यहां भरपेट खाना नहीं मिला है। पहले मैगी बनवा ली। सबके लिये बडे बडे कटोरे भरकर मैगी आई। मैं मैगी नहीं खाता हूं लेकिन धीरे धीरे बात करते करते खा गया। उसके बाद बडे बडे आमलेट आ गये। हम उन्हें भी खा गये।
बीआरओ के कैम्प में फाइबर की बनी हट थीं, जो गर्म रहती हैं। इन्हीं के एक तरफ बाथरूम व टॉयलेट था। मेरा प्रेशर बना तो मैं अन्दर चला गया। हाथ धोने लगा तो पाया कि गर्म पानी आ रहा है। असल में यह उसी जलधारा का पानी था जिसे एक टंकी में इकट्ठा करके रख लेते हैं। लद्दाख व जांस्कर में भले ही कितनी ठण्ड पडती हो लेकिन अगर धूप निकली है तो भीषण गर्मी भी हो जाती है। पानी उसी गर्मी से गर्म हो गया था। यह कम से कम चालीस डिग्री रहा होगा। मैं कल सुबह कारगिल में नहाया था। आगे का कोई भरोसा नहीं कि कब नहाना हो। फिर भीषण गर्मी, लगातार ऊबड-खाबड रास्तों पर की यात्रा से थकान और धूल भरा वातावरण होने के कारण मुझे नहाने की जरुरत महसूस हो रही थी। शीघ्र ही यह जरुरत भी पूरी कर ली।
ऐसे वातावरण में बीआरओ वाले लगातार काम करते हैं। निश्चित ही राजकुमार भी इससे तंग आ गया होगा। घर पर बात करने के लिये केवल एक सैटेलाइट फोन था। अगर अचानक घर पर कुछ हो जाये तो वह कितनी भी जल्दी कर ले, तीन दिन से पहले घर नहीं पहुंच सकता। उसने कहा- यहां जहां न कुछ पैदावार होती है, न मौसम ही अच्छा है, न हवा में ऑक्सीजन है, बंजर, पथरीला इलाका; अंग्रेज बहुत आते हैं। अंग्रेज माने विदेशी। फिर कहने लगा कि इनके पास एक नक्शा होता है जिसे वे बार-बार देखते हैं। पैसे भी बहुत होते हैं इनके पास। सैटेलाइट उपकरण होते हैं इनके बैग में ताकि इनकी सरकार देख सके कि ये कहां हैं, किसी मुसीबत में तो नहीं है। असल में यहां कहीं कोई भारी खजाना गडा है। हमें उसकी जानकारी नहीं है लेकिन इन्हें पता है। उसे लेने आते हैं ये लोग। सुना है कि उसका कुछ हिस्सा कुछ लोगों के हाथ भी लगा है। नहीं तो यहां आने की जरुरत ही क्या?
हम तीनों उसकी बात पर मुस्कुराते रहे। हमने कहा- हमारे पास भी यहां के चप्पे-चप्पे का नक्शा है। हमारे पास भी जीपीएस है। हम भी यहां खजाना लेने आये हैं और याद रखना, खजाना लेकर ही लौटेंगे। बोला कि तुम उसे नहीं ढूंढ पाओगे।


सुबह सवेरे पंजी-ला की ओर


पंजी-ला से आती सूरू नदी

पंजी-ला पर वाच टावर


पंजी-ला पर दो छोटी-छोटी झीलें भी हैं।






द्रांग-द्रंग ग्लेशियर


पंजी-ला के दूसरी तरफ जांस्कर घाटी है।

विधान




परात में चाय




पदुम

अनमो के लिये प्रस्थान


नदी के इस तरफ सडक है तो दूसरी तरफ पुराना ट्रैकिंग मार्ग है जहां आज भी ट्रैकिंग की जाती है।

अनमो में




और ट्रेकिंग शुरू...

कुछ फोटो विधान के कैमरे से...

अबरान में चाय पीते हुए


प्रकाश जी के साथ


पंजी-ला पर

पदुम में दुकान के चबूतरे पर इंतजार



अनमो की स्थिति दर्शाता हुआ नक्शा। इसे जूम-इन व जूम-आउट भी किया जा सकता है।





अगला भाग: पदुम दारचा ट्रेक- अनमो से चा

पदुम दारचा ट्रेक
1. जांस्कर यात्रा- दिल्ली से कारगिल
2. खूबसूरत सूरू घाटी
3. जांस्कर यात्रा- रांगडुम से अनमो
4. पदुम दारचा ट्रेक- अनमो से चा
5. फुकताल गोम्पा की ओर
6. अदभुत फुकताल गोम्पा
7. पदुम दारचा ट्रेक- पुरने से तेंगजे
8. पदुम दारचा ट्रेक- तेंगजे से करग्याक और गोम्बोरंजन
9. गोम्बोरंजन से शिंगो-ला पार
10. शिंगो-ला से दिल्ली वापस
11. जांस्कर यात्रा का कुल खर्च


24 comments:

  1. ye hasin wadiyaa ye khula aasman .aa gaye hum...................................................................... photo of glacier is awesome

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  2. नीरज भाई की एक और अदभुद ,शानदार, रहस्मई ,विविधताओं से भरी यात्रा -लगता है हम कही स्वप्नलोक मे है। फोटो पुनः शानदार है। विधान भाई के फोटो भी शानदार है। लेकिन लगता है की यह ट्रैक खर्च के हिसाब से आपको महंगा पड रहा है। एक फोटो फ्यांग का भी होता तो ……………………………खैर शायद जल्दी की वजह से नही हो पाया।

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    1. महंगा तो पडा लेकिन जितना बजट था, उससे मामूली ही महंगा था। फ्यांग के फोटो आपको आगे कभी दिखाऊंगा। जरूर...

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    2. ""लगता है हम कही स्वप्नलोक मे है। " :) विनय जी क्या आपको नीरज जी की पोस्ट इतनी बोरिंग और पकाऊ लगती है की आप तुरंत ही निंद्रावस्था (स्वप्नलोक) में पहुँच जाते हो।

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  3. बेहद ही शानदार यात्रा और फोटो..... पढ़ते पढ़ते हम भी रोमांचक हो गए.... आपके इस लेख के साथ मैंने गूगल अर्थ भी खोल रखा था , कहाँ-कहाँ से हो गए आप....

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    1. धन्यवाद गुप्ता जी...

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  4. Replies
    1. धन्यवाद गुप्ता जी...

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  5. प्रभु जी आपने मेरे फोटो को अपने ब्लॉग पर जगह दी मैं कृतार्थ हुआ ! वैसे आपके फोटो मेरे फोटोज से ज्यादा सुन्दर हैं !

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    1. नहीं भाई, ऐसी बात नहीं है। दूसरे के फोटो अच्छे ही लगते हैं। मुझे आपके और प्रकाश जी के फोटो स्वयं से ज्यादा अच्छे लगे थे।

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  6. अद्भुत फोटोज हैं सच में
    और अब तो नीरज जाट आपकी खुद की फोटो भी खूबसूरत आने लगी हैं, प्रोफाइल की फोटो चेंज कर लो भाई............ :-)
    चाय परात में नही कपों में ही तो है

    जै राम जी की

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    1. हां अमित भाई, प्रोफाइल फोटो बदलूंगा। धन्यवाद आपका।

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  7. आपके साथ जांसकर घाटी घूमना अच्छा रहा . वर्णन व् चित्र दोनों मनमोहक हैं

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    1. धन्यवाद गिरिजा जी...

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  8. Maza aa gya neeraj bhai aapka ye blog padh ke.
    Aapka blog romanchit kar deta h neeraj bhai
    Thanku nd best of luck

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    1. धन्यवाद रिंकू भाई...

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  9. नीरज भाई बात यह है की यात्रा वृतांत कैसा भी हो पढने में मजा आता है,यात्रा करने वाले ने यह सफर कैसे तय किया?
    कहां रूका ? किन हालातो मे रूका ओर भी बहुत सी बाते है जो यात्रा को रोमांचित कर देती है,कुछ बाकी जो रह जाता है वह फोटो देखकर पूरी हो जाती है.
    धन्यवाद

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  10. सूंदर मनमोहक

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  11. क्या कहें नीरज जी. . . . . . . . शब्द समाप्त| अवाक् . . . . . .

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  12. खतरनाक यात्रा का जानदार फोटो । क्या फोटो है।

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