Wednesday, September 7, 2011

जलोडी जोत के पास है रघुपुर किला

जुलाई में जब हम श्रीखण्ड जा रहे थे तो इसी यात्रा में जलोडी जोत देखने का कार्यक्रम भी बनाया। शिमला से करीब 90 किलोमीटर आगे सैंज है। यहां से एक सडक कुल्लू जाती है जो जलोडी जोत (JALORI PASS) को पार करके ही जाती है। जलोडी जोत की ऊंचाई तकरीबन 3200 मीटर है। यहां से एक रास्ता चार किलोमीटर दूर सेरोलसर झील जाता है तो इसके ठीक विपरीत दिशा में दूसरा रास्ता रघुपुर किले की तरफ जाता है।
रघुपुर किला- इसके बारे में इंटरनेट पर जानकारी बस इतनी ही मिली है जो मैंने ऊपर वाले पैरा में दी है। किसने बनाया, कब बनाया- कोई जानकारी नहीं है। लेकिन इस स्थान के कुल्लू जिले में होने के कारण ऐसा लगता है कि इसे कुल्लू के राजा ने या उसके अधीन किसी बडे अधिकारी ने ही बनवाया होगा। पहले जो भी रियासतें थीं, उन्हें एकीकृत भारत में जिले का दर्जा दे दिया गया है।
जलोडी जोत से यह करीब तीन किलोमीटर दूर है। दुकान वाले से रास्ता पूछकर हम चारों- मैं, सन्दीप पंवार, नितिन जाट और विपिन गौड निकल पडे। मैं दिल्ली से ही चार स्पेशल लठ लेकर चला था लेकिन बाकी किसी को भी लठ की महिमा पल्ले नहीं पडी। जब सेरोलसर झील गये तो मेरे अलावा सभी ने अपने नाम के लठ जोत पर एक दुकान में ही रख दिये थे। रास्ते में जब बारिश पडी और रास्ता रपटीला हो गया, तब बाकियों को लठ का गुणगान करना पडा। नतीजा यह हुआ कि रघुपुर किले पर जाते समय सबसे पहले लठ ही उठाये गये। बाइक वही दुकान के सामने खडी कर दी थी और बाकी सामान बैग, हेलमेट दुकान के अन्दर रख दिया था।
पहले तो हल्की सी उतराई है फिर चढाई। जब हम उतरते उतरते निम्नतम बिन्दु पर पहुंचे तो एक छोटा सा घास का मैदान मिला। चारों ओर दूर दूर तक बादल तैर रहे थे इसलिये धौलाधार, किन्नौर और स्पीति की बर्फीली पहाडियां नहीं दिखाईं पडीं। यहां फोन नेटवर्क भी काम कर रहा था, इसका पता मुझे तब चला जब तरुण गोयल साहब का फोन आया। हालांकि कम नेटवर्क तीव्रता के कारण ढंग से बात नहीं हुई।
इस मैदान से निकले तो एक अदभुत नजारा मिला। हां, यह जगह चारों ओर पेडों से घिरी हुई है। हम पहाडी धार पर चल रहे थे। सामने धार की चढाई और कठिन हो रही थी लेकिन वहां कुछ ऊबड-खाबड पत्थर भी पडे थे। धार के बायें तरफ से एक बडी सी पगडण्डी भी जा रही थी। सीधी सी बात है कि हम उस पगडण्डी पर हो लिये। जबकि किले पर जाने का असली रास्ता उन ऊबड-खाबड पत्थरों से ही था। तब तो इतनी बडी पगडण्डी को देखकर सोचा गया कि यह बारिश की वजह से हो गया होगा लेकिन अब सोचता हूं कि धार पर वो भी जंगल में बारिश का पानी नीचे कैसे आ सकता है जबकि हम चोटी के नजदीक ही थे।
जब वो पगडण्डी नीचे उतरने लगी तो कान खडे होने शुरू हो गये। क्योंकि किला इसी पहाडी की उच्चतम जगह पर बताया गया था। मन में खदके भी उठने लगे कि हम रास्ता भटक गये हैं। उस जंगल में कौन था जो हमें रास्ता बताता? हममें से एक ‘अनाडी’ था- नितिन, उसने शोर मचाना शुरू कर दिया कि कोई है जो हमें किले का रास्ता बताये। एक गडरिया मिल गया। कुछ ऊपर बैठा था। उसने बताया कि तुमने काफी पीछे से ही असली रास्ता छोड दिया है, अब तो एकमात्र तरीका यही है कि नाक की सीध में ऊपर चढना शुरू कर दो। हालांकि झाड-झंगाड काफी थे, चढाई भी तेज थी लेकिन चढना तो था ही। सन्दीप भाई ने उस गडरिये से पूछा कि असली रास्ता कहां से था। उसने बताया कि वो इस पहाडी के पीछे से था। सन्दीप ने कन्फर्म कर लिया कि हम विपरीत दिशा में चले आये हैं, रास्ता दूसरी तरफ से था। अच्छा हां, तेज चढाई और कोई रास्ता भी ना होने के कारण सभी के सभी अपने हिसाब से इधर-उधर से चढ रहे थे, सन्दीप और गडरिये के बीच जो भी बातें हुईं, वे मुझे बाद में पता चलीं।
और अचानक, पेड खत्म, झाड खत्म, झंगाड खत्म। सामने था एक विशाल मैदान। मानसून होने के कारण इस पर छोटी-छोटी घास उग आई थी। बडा ही मादक नजारा था। ज्यादा लिखने की जरुरत नहीं है, फोटू भी लगाऊंगा। हम इसका दूसरा छोर तलाशने निकल पडे। आखिर में किले पर पहुंच गये।
इस इलाके में जैसे घर होते हैं, वैसा ही किला था। लेकिन बेहद भग्नावस्था में। सलेटी पत्थरों का बना, मोटी-मोटी दीवारों वाला। एक कोने में मन्दिर भी है। केवल मन्दिर ही सही सलामत है। बाकी किले में बस दीवारें ही हैं, छत कहीं नहीं है।
हमें वापस चलना था। तभी सन्दीप भाई किले की दीवार से दूसरी तरफ कूद गये। उधर दूर तक ढलान ही ढलान दिख रहा था। फिर चिल्लाकर बोले कि ओये, हमें वापस भी चलना है। आ जाओ। मैंने पहले तो सोचा कि मौजमस्ती के लिये कूदे होंगे लेकिन जब देखा कि वे तो वापसी के लिये बुला रहे हैं तो मैंने पूछा कि भाई, हम आये तो पूरब से थे, अब पश्चिम में कहां जाना है। बोले कि जलोडी जोत। मैंने कहा कि दिमाग खराब हो गया है क्या? रास्ता पूरब की ओर है। बोले कि नहीं, मुझसे गडरिये ने बताया था रास्ता इस पहाडी के दूसरी तरफ से है। अब हमें दूसरी तरफ से ही वापस चलना है।
हम ऐसी जगह पर खडे थे जहां से जलोडी जोत दिखता भी है लेकिन हम जानबूझकर विपरीत दिशा में चल पडे। मैंने सोचा कि सन्दीप भाई ‘एडवेंचरस’ हैं, इसलिये पहाडी के दूसरी तरफ से उतरकर जंगलों से होकर इसका चक्कर काटकर जलोडी जोत पहुंचेंगे। लेकिन इससे मुझे क्या? ऐसा करने से हमें रास्ता ही नहीं मिलेगा, अगर मिलेगा तो कहीं का कहीं पहुंचेगा। अब मुसीबतें आयेंगीं सभी पर, मैं अकेला थोडे ही भुगतूंगा। फिर असल बात ये थी कि गडरिये ने अपने हिसाब से बताया था कि इसी धार के दूसरी तरफ से रास्ता है जिसे सन्दीप ने सोचा कि वो पहाडी की बात कर रहा है। धार कहने का मतलब था कि हमारी करण्ट पोजीशन से बीस तीस मीटर दूर, और पहाडी का मतलब था कि दो-तीन किलोमीटर दूर। उसने ठीक ही बताया था लेकिन हमने गलत अर्थ लगाया।
अब जो मुझे यकीन था वही होने लगा। हम पश्चिम में थोडा सा नीचे उतरे, फिर ख्याल किया कि जोत पूरब में है, हम पश्चिम में जा रहे हैं, इसलिये अपना रुख मोडकर उत्तर कर लिया। सोचा गया कि उत्तर की तरफ थोडा बहुत चलने पर पूरब में जाने का रास्ता मिल जायेगा। लेकिन ना तो रास्ता था, ना ही मिला। जंगल में घुस गये। अभी तक हम एक पगडण्डी के सहारे चले आ रहे थे। लेकिन बाद में पता चला कि वो पगडण्डी ही नहीं है, बल्कि बारिश के पानी का रास्ता है। हमारे दाहिनी ओर यानी पूरब की ओर एक धार थी। चारों के चारों उस पर जा चढे, घने जंगल की वजह से उस तरफ कुछ नहीं दिखा। मैं बराबर कहता आ रहा था कि हम गलत आ गये हैं लेकिन मुझे चिन्ता कुछ भी नहीं थी क्योंकि मैं अकेला थोडे ही था। सोचने का अधिकार केवल मुझे और सन्दीप को ही था बाकी दोनों तो बस पीछे पीछे चलने वाले थे।
जब सन्दीप भाई को पक्का विश्वास हो गया तब उन्होंने मेरी राय पूछी। मैंने कहा कि एकमात्र तरीका यही है कि वापस किले पर चलो और जैसे आये थे, वैसे उतरते जाओ। हम काफी नीचे उतर गये थे। अब फिर परेशानी की बात कि दोबारा किले पर चढना पडेगा। और आखिर के आधे किलोमीटर की चढाई तो वाकई जान निकाल देने वाली थी।
वापस किले पर पहुंचे। जिस रास्ते से आये थे, उसी से वापस जाने लगे। एक गडरिये से सही रास्ता पूछा तो यह गनीमत रही कि ठीक रास्ते से उतर गये। अन्धेरा होते-होते जोत पर पहुंचे। जिस दुकान में हमारा सामान रखा था, वो हमारे सामान को दुकान के बाहर रखकर दुकान में ताला लगाकर हमारी बाट देख रहा था। उसका हिसाब चुकता किया और वो अपने गांव चला गया। भयंकर भूख लग रही थी। हालांकि सन्दीप ने मैगी बनवा ली थी लेकिन तभी आनी के लिये एक जीप मिल गई। छोड मैगी मैं और विपिन जीप से आनी पहुंचे। सन्दीप और नितिन दो-दो प्लेट मैगी खाकर बाइक से आनी पहुंचे। उस रात हम आनी में ही रुके थे।


सामने वाली चोटी पर है रघुपुर किला। यह फोटो जलोडी जोत से लिया गया है।


किले के रास्ते में





यह छोटी सी चढाई नितिन को इतनी भारी पडी कि बन्दा हांफने लगा था।




यह किले का अवशेष ही है।






एक बार तो यकीन नहीं होता कि यहां कहीं किला भी है।




सामने है सम्पूर्ण किला। बायें दो पक्के कमरे बने हैं, बाकी सब ध्वस्त हो चुका है। कमरे चूंकि आजकल के ही बने हैं, इसलिये इन्हें किले का हिस्सा ना मानें तो अच्छा। एक साबुत मन्दिर भी दिख रहा है।



सामने जलोडी जोत पर दुकानें दिख रही हैं।



किले की दीवार



किले के पीछे से उतरते हुए सन्दीप और विपिन


रास्ता खूबसूरत है लेकिन गलत भी है।




अटक-भटक कर वापस आये तो अब चढना था।


और अब एक स्पेशल फोटो

आगे बाद में देखना, पहले यह बताओ कि यह मामला क्या है? कुछ गडबड लग रही है। सन्दीप भाई ने भी यही फोटो लगाकर पूछा था कि बताओ क्या गडबड है? किसी ने बताया कि कैमरा पन्नी में लिपटा था किसी ने कुछ।



यह था असली मामला।

अगला भाग: चकराता में टाइगर फाल


श्रीखण्ड महादेव यात्रा
1. श्रीखण्ड महादेव यात्रा
2. श्रीखण्ड यात्रा- नारकण्डा से जांव तक
3. श्रीखण्ड महादेव यात्रा- जांव से थाचडू
4. श्रीखण्ड महादेव यात्रा- थाचडू से भीमद्वार
5. श्रीखण्ड महादेव यात्रा- भीमद्वार से पार्वती बाग
6. श्रीखण्ड महादेव के दर्शन
7. श्रीखण्ड यात्रा- भीमद्वारी से रामपुर
8. श्रीखण्ड से वापसी एक अनोखे स्टाइल में
9. पिंजौर गार्डन
10. सेरोलसर झील और जलोडी जोत
11. जलोडी जोत के पास है रघुपुर किला
12. चकराता में टाइगर फाल
13. कालसी में अशोक का शिलालेख
14. गुरुद्वारा श्री पांवटा साहिब
15. श्रीखण्ड यात्रा- तैयारी और सावधानी

15 comments:

  1. फ़ोटॊ डबल हो गया है एक हटाओ, असली मामला बताकर मामला ही खत्म कर दिया।

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  2. बहुत सुन्दर चित्र, आभार!

    रघुपुर गढ के बारे में दो जानकारियाँ हैं:

    1. ऐतिहासिक: इस किले पर 19वीं शताब्दी की शुरुआत तक गुरखा सरदारों की पकड थी और भारत में अंग्रज़ों के पाँव जमने के बाद गुरखों ने यह किला छोड दिया।

    2. परम्परागत: यह किला कुल्लू के शासकों ने बनवाया था जो अपना राज्य राजा बनकर नहीं बल्कि रघुनाथ भगवान राम के प्रतिनिधि बनकर चलाते थे और इस किले का नाम भी रामचन्द्र जी के सम्मान में ही रखा गया था। कहा जाता है कि कुल्लू के शासकों ने भगवान राम के जीवनकाल में बनी उनकी मूर्तियाँ भी अयोध्या से मंगवाकर अपने राज्य क्षेत्र में स्थापित कराई थीं।

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  3. सुंदर चित्र और जानकारी! आप की इन यात्राओं से बहुत रश्क होता है।

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  4. किला तो मानों मिला नहीं, लेकिन राह भटक कर भी कुछ तो मिलता ही है, कभी बहुत कुछ तो कभी क्‍या नहीं.

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  5. बहुत सुन्दर चित्र, आभार|

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  6. खूबसूरत नजारा ||

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  7. सुंदर चित्रावली देख कर मन प्रसन्न हो गया ..इतनी सुंदर हैं हमारी प्रकृति ..क्या कहने ---? किले के खंडहर देख कर लगता हैं की कभी वहां बुलंद चारदीवारी थी ---

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  8. राजा का मन तो सदा ही शीतल रहता होगा इस मनोहारी स्थान में।

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  9. बहुत बढ़िया रहे आपके यात्रा संस्मरण!

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  10. बढ़िया यात्रा संस्मरण!

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  11. बेहद खूबसूरत चित्र और वर्णन...कमाल किया है...आनंद आ गया...वाह...

    नीरज

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  12. रोचक सफरनामा. किले की फोटो डाल कर अच्छा किया. विदेशियों की तरह अपनी विरासत को सम्मान देने की आदत हम भी सीख पाते तो और भी अच्छा होता.

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  13. नीरज जी

    बहुत ही हरे भरे और सुन्दर फोटो हैं.

    http://safarhainsuhana.blogspot.com/

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