Skip to main content

केदारनाथ-तुंगनाथ का कुल खर्चा- 1600 रुपये

मेरी केदारनाथ यात्रा को पढने के लिये यहां क्लिक करें। मैं केदारनाथ के अलावा त्रियुगी नारायण और तुंगनाथ भी गया। दिल्ली से निकलने के बाद और घूम-घामकर वापस दिल्ली तक कुल कितना खर्चा हुआ, आज यह बताता हूं। मेरे साथ सिद्धान्त भी था।

19 अप्रैल 2011
मोहन नगर से हरिद्वार बस से = 244 रुपये
हरिद्वार से श्रीनगर बस से = 240 रुपये
ऋषिकेश में एक दर्जन केले = 40 रुपये
देवप्रयाग में लंच = 35 रुपये
श्रीनगर से रुद्रप्रयाग बस से = 60 रुपये
रुद्रप्रयाग से गुप्तकाशी जीप से = 100 रुपये
गुप्तकाशी में कमरा = 150 रुपये
गुप्तकाशी में चाय = 10 रुपये
गुप्तकाशी में डिनर = 70 रुपये
19 अप्रैल का कुल खर्चा (दो आदमी) = 949 रुपये
19 अप्रैल का कुल खर्चा (एक आदमी) = 474.5 रुपये या 475 रुपये

20 अप्रैल 2011
गुप्तकाशी में सुबह को चाय = 10 रुपये
गुप्तकाशी से गौरीकुण्ड जीप से = 100 रुपये
गौरीकुण्ड में चाय मैगी = 40 रुपये
गौरीकुण्ड में डिनर = 100 रुपये
गौरीकुण्ड में दो कमरे = 300 रुपये
गौरीकुण्ड में हम दोनों में कुछ गलतफहमी हो गई थी जिससे हमें दो अलग-अलग कमरे लेने पडे। इससे 150 रुपये का खर्चा ज्यादा हो गया।
20 अप्रैल का कुल खर्चा (दो आदमी) = 550 रुपये
20 अप्रैल का कुल खर्चा (एक आदमी) = 275 रुपये

21 अप्रैल 2011
गौरीकुण्ड से सोनप्रयाग जीप से = 20 रुपये
सोनप्रयाग में लंच = 50 रुपये
त्रियुगी नारायण में चाय = 10 रुपये
सोनप्रयाग से गुप्तकाशी जीप से = 80 रुपये
गुप्तकाशी में चाय = 10 रुपये
गुप्तकाशी में कोल्ड ड्रिंक व चिप्स = 44 रुपये
गुप्तकाशी में कमरा = 150 रुपये
गुप्तकाशी में डिनर = 70 रुपये
21 अप्रैल का कुल खर्चा (दो आदमी) = 434 रुपये
21 अप्रैल का कुल खर्चा (एक आदमी) = 217 रुपये

22 अप्रैल 2011
आज मैं और सिद्धान्त अलग-अलग हो गये। मैं तुंगनाथ चला गया और सिद्धान्त वापस दिल्ली। अब जो भी खर्चा होगा, वो मेरा अकेले का होगा।
गुप्तकाशी से चोपता बस से = 40 रुपये
चोपता में लंच = 35 रुपये
तुंगनाथ से वापस आकर चोपता में चाय-पकौडे = 15 रुपये
चोपता से कुण्ड वाया ऊखीमठ बस से = 35 रुपये
कुण्ड से अगस्त्यमुनि बस से = 20 रुपये
अगस्त्यमुनि से ऋषिकेश जीप से = 150 रुपये
रुद्रप्रयाग में हल्का भोजन = 22 रुपये
देवप्रयाग में डिनर = 40 रुपये
देवप्रयाग में कमरा = 100 रुपये
22 अप्रैल का कुल खर्चा = 457 रुपये

23 अप्रैल 2011
देवप्रयाग में चाय बिस्कुट = 10 रुपये
ऋषिकेश से हरिद्वार बस से = 22 रुपये
हरिद्वार से मोहन नगर बस से = 122 रुपये
खतौली में हल्का भोजन = 30 रुपये
मोहन नगर से सीमापुरी बॉर्डर टम्पू से = 7 रुपये
आगे मेट्रो फ्री
23 अप्रैल का कुल खर्चा = 191 रुपये

पूरी यात्रा का कुल खर्चा एक आदमी का:
19 अप्रैल = 475 रुपये
20 अप्रैल = 275 रुपये
21 अप्रैल = 217 रुपये
22 अप्रैल = 457 रुपये
23 अप्रैल = 191 रुपये
कुल खर्च = 1615 रुपये

पांच दिन और मात्र 1615 रुपये का खर्चा, वो भी केदारनाथ-त्रियुगी नारायण-तुंगनाथ घूमते हुए। सारा सफर बस या जीप से तय किया। रात को रुकने के लिये कमरे भी लिये। हां, खाने में हमने बहुत कंजूसी दिखाई। असल में सिद्धान्त अपने साथ किलोभर भुने चने, किशमिश और बादाम लेकर आया था। इसलिये चने खाकर पानी पीकर भूख लगती ही नहीं थी। इन पांच दिनों में हमने कभी भी भरपेट लंच किया ही नहीं। यह सब चनों का ही कमाल था।

इस कंजूसी में सबसे बडा योगदान केदारनाथ-तुंगनाथ के कपाटों का भी रहा। हम ऑफ सीजन में गये थे, तब तक कपाट नहीं खुले थे। सबकुछ काफी सस्ता था- खासतौर पर कमरे। वापस आकर जब मैंने हिसाब लगाया और देखा कि कुल सोलह सौ रुपये खर्च किये हैं मैंने इन पांच दिनों में और घुमक्कडी क्या शानदार करके आया हूं- एक बार तो विश्वास ही नहीं हुआ। नहीं हो रहा ना आपको भी?


केदारनाथ तुंगनाथ यात्रा
1. केदारनाथ यात्रा
2. केदारनाथ यात्रा- गुप्तकाशी से रामबाडा
3. केदारनाथ में दस फीट बर्फ
4. केदारनाथ में बर्फ और वापस गौरीकुण्ड
5. त्रियुगी नारायण मन्दिर- शिव पार्वती का विवाह मण्डप
6. तुंगनाथ यात्रा
7. चन्द्रशिला और तुंगनाथ में बर्फबारी
8. तुंगनाथ से वापसी भी कम मजेदार नहीं
9. केदारनाथ-तुंगनाथ का कुल खर्चा- 1600 रुपये

Comments

  1. आफ़ सीजन का सबसे बडा फ़ायदा यही है, कि पैसे बचाओ,
    अरे एक बात इन जगहों पर खाने का ३५ रु कई साल से चल रहे है, लगता है कि अबकी बार जरुर बढा देंगे,

    ReplyDelete
  2. मुसाफिरी ज़िन्दाबाद!

    ReplyDelete
  3. वाकई, बहुत किफायती यात्रा रही...एक रात गलतफहमी न होती तो १५०० के अन्दर रहते.... :)

    ReplyDelete
  4. आपका खर्चा देख ईर्ष्या होती है, यहाँ तो एक दिन में हजारों उड़ा देते हैं, वह भी घर में बैठे बैठे।

    ReplyDelete
  5. अराउण्ड द वर्ल्ड इन एट डालर,हा हाहा हा हा मज़ेदार किफ़ायती भी।

    ReplyDelete
  6. कैसे होगा भाई
    आपके साथ हम तो कभी गये नहीं :)

    प्रणाम

    ReplyDelete
  7. इतने से पैसे में अनुभव अनमोल कमाया....और फोटो के माध्यम से हमने भी अतुलनीय आनंद पाया.
    जिंदगी का असली लुत्फ़ तो आप ले रहे हैं...अक्सर मल्टीप्लेक्स में युवा कुछ घंटो में ही इस से ज्यादा पैसे उड़ा देते हैं....और याद करने को कुछ भी नहीं बचता.

    ReplyDelete
  8. सचमुच अविश्‍वसनीय.

    ReplyDelete
  9. पर्यटन और अल्‍प बचत जैसे विभागों को ध्‍यान देना चाहिए.

    ReplyDelete
  10. बहुत किफायती यात्रा

    ReplyDelete
  11. यह होटल का फ़ंडा समझ मे नही आया इतना सस्ता? रोहतक सडा सा शहर हे यहां ही होटल वाले १२०० रुपये मांगते हे एक दिन के,ओर बिना नाश्ते के, आप को गुरु बनाना ही पडेगा तभी बचत सीख जायेगे:)

    ReplyDelete
  12. भाई जी आप जो करो कम है...कौन कहता है घूमने के लिए मोटी रकम चाहिए...आप बेजोड़ हो भाई जी.
    नीरज

    ReplyDelete
  13. अच्छा बताया आपने। कभी प्लान बना,तो काम आएगा।

    ReplyDelete
  14. \नीरज जी आप असली टूरिस्ट हैं ...आपके funde एकदम clear हैं ......आप पूरा enjoy करते हैं tourism को ......लोगों ने तो पता नहीं क्या क्या ग्रंथियां पाल राखी है मन में ...कार से ही जायेंगे ....5 स्टार में ही ठहरेंगे ......breakfast में आलू का परांठा ही चाहिए ......अरे भाई बनारस आये हो तो बनारसी नाश्ता करो यार ....कचौड़ी जलेबी का ....आलू का परांठा तो रोज खाते ही हो अपने घर .........लोगों को tourism सिखाना पड़ेगा ......अब भैया ५ स्टार तौरिस्म तो साल में एक बार ही हो पायेगा ...और आप वाला तो हर हफ्ते हो सकता है ......बधाई हो ...मेरी नै पोस्ट पढ़िए
    \नीरज जी आप असली टूरिस्ट हैं ...आपके funde एकदम clear हैं ......आप पूरा enjoy करते हैं tourism को ......लोगों ने तो पता नहीं क्या क्या ग्रंथियां पाल राखी है मन में ...कार से ही जायेंगे ....5 स्टार में ही ठहरेंगे ......breakfast में आलू का परांठा ही चाहिए ......अरे भाई बनारस आये हो तो बनारसी नाश्ता करो यार ....कचौड़ी जलेबी का ....आलू का परांठा तो रोज खाते ही हो अपने घर .........लोगों को tourism सिखाना पड़ेगा ......अब भैया ५ स्टार तौरिस्म तो साल में एक बार ही हो पायेगा ...और आप वाला तो हर हफ्ते हो सकता है ......बधाई हो ...मेरी nai पोस्ट पढ़िए
    http://akelachana.blogspot.com/

    ReplyDelete
  15. प्यारे नीरज,

    पढ़ कर मज़ा आ गया. सब समझ आ गया एक बात के सिवा. वो यह कि आखिरी एंट्री में मेट्रो फ्री कैसे यात्रा की.

    शैलेन्द्र

    ReplyDelete
  16. मतलब 2018 में 3गुना या 5000 में ये यात्रा की जा सकती है

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

रोरिक आर्ट गैलरी, नग्गर

इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । नग्गर का जिक्र हो और रोरिक आर्ट गैलरी का जिक्र न हो, असम्भव है। असल में रोरिक ने ही नग्गर को अन्तर्राष्ट्रीय पहचान दी है। निकोलस रोरिक एक रूसी चित्रकार था। उसकी जीवनी पढने से पता चलता है कि एक चित्रकार होने के साथ-साथ वह एक भयंकर घुमक्कड भी था। 1917 की रूसी क्रान्ति के समय उसने रूस छोड दिया और इधर-उधर घूमता हुआ अमेरिका चला गया। वहां से वह भारत आया लेकिन नग्गर तब भी उसकी लिस्ट में नहीं था। पंजाब से शुरू करके वह कश्मीर गया और फिर लद्दाख, कराकोरम, खोतान, काशगर होते हुए तिब्बत में प्रवेश किया। तिब्बत में उन दिनों विदेशियों के प्रवेश पर प्रतिबन्ध था। वहां किसी को मार डालना फूंक मारने के बराबर था। रोरिक भी मरते-मरते बचा और भयंकर परिस्थितियों का सामना करते हुए उसने सिक्किम के रास्ते भारत में पुनः प्रवेश किया और नग्गर जाकर बस गये। एक रूसी होने के नाते अंग्रेज सरकार निश्चित ही उससे बडी चौकस रहती होगी।

जनवरी में स्पीति: किब्बर भ्रमण

8 जनवरी 2016 बारह बजे के आसपास जब किब्बर में प्रवेश किया तो बर्फबारी बन्द हो चुकी थी, लेकिन अब तक तकरीबन डेढ-दो इंच बर्फ पड चुकी थी। स्पीति में इतनी बर्फ पडने का अर्थ है कि सबकुछ सफेद हो गया। मौसम साफ हो गया। इससे दूर-दूर तक स्पीति की सफेदी दिखने लगी। गजब का नजारा था। किब्बर लगभग 4200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इसे दुनिया का सबसे ऊंचा गांव माना जाता है। हालांकि लद्दाख में एकाध गांव इससे भी ऊंचा मिल जायेगा, लेकिन फिर भी यह सबसे ऊंचे गांवों में से तो है ही। यहां पहला कदम रखते ही एक सूचना लिखी दिखी - “आमतौर पर यह परांग ला दर्रा (18800 फीट) माह जून से सितम्बर के बीच खुला रहता है। फिर भी जाने से पहले इसकी सूचना प्रशासन काजा से जरूर लें (दूरभाष संख्या 1906-222202) तथा खास कर 15 सितम्बर के पश्चात दर्रे को पार करने की कोशिश घातक हो सकती है। यदि आप स्थानीय प्रदर्शक को साथ लें तो यह आपकी सुरक्षा के लिये उचित होगा।”

2016 की यात्राओं का लेखा-जोखा

यह साल बड़ा ही उलट-पुलट भरा रहा। जहाँ एवरेस्ट बेस कैंप जैसी बड़ी और यादगार यात्रा हुई, वहीं मणिमहेश परिक्रमा जैसी हिला देने वाली यात्रा भी हुई। इस वर्ष बाकी वर्षों के मुकाबले ऑफिस से सबसे ज्यादा छुट्टियाँ लीं और संख्यात्मक दृष्टि से सबसे कम यात्राएँ हुईं। केवल नौ बार बाहर जाना हुआ, जिनमें छह बड़ी यात्राएँ थीं और तीन छोटी। बड़ी यात्राएँ मलतब एक सप्ताह या उससे ज्यादा। इस बार न छुटपुट यात्राएँ हुईं और न ही उतनी ट्रेनयात्राएँ। जबकि दो-दिनी, तीन-दिनी छोटी यात्राएँ भी कई बार बड़ी यात्रा से ज्यादा अच्छे फल प्रदान कर जाती हैं।  ज्यादा न लिखते हुए मुख्य विषय पर आते हैं: