Friday, January 2, 2015

फुकताल गोम्पा की ओर

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सुबह आठ बजे आंख खुली। आज हम जमकर सोये। रात ही तय हो गया था कि आज क्या करना है। तय ये हुआ था कि आज एक आदमी विधान और प्रकाश जी का सामान लेकर पुरने जायेगा। मैं अपना सामान अपने साथ ही रखूंगा। वे दोनों खाली हाथ फुकताल गोम्पा जायेंगे और शाम को पुरने में सामान ले लेंगे। चा से पुरने लगभग दो किलोमीटर है। सारा ढलान है, फिर भी उस आदमी ने सामान के आठ सौ रुपये मांगे। मजबूरी थी इसलिये देने पडे। साथ ही उसे यह भी बता दिया कि पुरने जाकर घोडे या खच्चर का इंतजाम करके रखना। हमें उनकी सख्त आवश्यकता थी।
पिछली पोस्ट में बताया था कि पुरने में सारप में एक नदी और आकर मिलती है। यह नदी शिंगो-ला से आती है, इसलिये चलिये इसे सुविधा के लिये शिंगो नदी कह देते हैं। सारप नदी बारालाचा-ला से निकलती है और सरचू होते हुए लम्बा चक्कर लगाकर यहां तक आती है। हमें शिंगो-ला जाने के लिये पुरने में सारप को छोड देना है और अपना सफर शिंगो नदी के साथ साथ तय करना है। लेकिन पुरने से पांच किलोमीटर दूर सारप नदी की घाटी में अदभुत फुकताल गोम्पा है। हम फुकताल गोम्पा को अवश्य देखना चाहते थे। उसके लिये सबसे प्रचलित और सुविधाजनक रास्ता पुरने से जाता है। उधर हम पुरने नहीं पहुंचे थे, उससे कुछ पहले चा में थे। गोम्पा का एक रास्ता चा से भी जाता है। चा वाला रास्ता सारप नदी के इस तरफ से है तो पुरने वाला उस तरफ से। हम इस तरफ से फुकताल जायेंगे और उस तरफ वाले रास्ते से होते हुए पुरने चले जायेंगे। पुरने में हमें सामान भी मिल जायेगा और घोडे भी। अच्छा हां, हम इस बात को भूल ही गये थे कि कल हमने एक घोडे वाले से भी बात की थी और उसे पुरने मिलने को कहा था। अब वह हमें पुरने में ढूंढ रहा होगा। चलिये, उसका किस्सा बाद में बताऊंगा।

चा से भी फुकताल उतना ही दूर है जितना पुरने से यानी पांच किलोमीटर। पहले मामूली सी चढाई है, फिर उतराई है। कहीं कहीं तो बडी तेज उतराई है। हम यह देखकर हैरान थे कि प्रकाश जी अभी भी उसी रफ्तार से चल रहे थे, जिससे वे कल चले थे। यानी बिल्कुल नगण्य; चींटी से भी कम। हालांकि आज उनके पास पन्द्रह किलो का बैग नहीं था। पानी की एक बोतल और मोबाइल, बस। विधान भी पन्द्रह किलो से आजाद हो गया था, इसका असर साफ दिख रहा था। वह तेजी से चल रहा था और फोटो भी खींच रहा था। चा गांव बडी खुली जगह पर बसा है। इससे दो किलोमीटर दूर जब हम उच्चतम बिन्दु पर होते हैं तो दूर-दूर का शानदार नजारा दिखता है। लद्दाख-जांस्कर के वे रंग-बिरंगे पहाड और नीला आसमान जिसके लिये विधान यहां आया था; वो भी।
विधान के आगे निकल जाने से मुझे प्रकाश जी के साथ रहना था। आज हमें समतल रास्ते पर केवल दस किलोमीटर ही चलना था, इसलिये मैं देरी से निश्चिन्त था। हालांकि योजनानुसार हमें रात ही पुरने रुकना था, आज फुकताल गोम्पा देखकर पुरने से आगे निकल जाना था। उस योजना में एक दिन की भी गुंजाइश नहीं थी। आज अगर पुरने ही रुकते हैं तो हम अपने कार्यक्रम से पीछे हो जायेंगे। इसे कवर करने के लिये आने वाले दिनों में जी-तोड मेहनत करनी पडेगी। इसी वजह से मैंने आज चलते समय कहा था कि मैं आजाद होना चाहता हूं। इसका अर्थ यह नहीं था कि मैं सबको छोडकर चला जाऊंगा। बल्कि इससे उन दोनों पर दबाव बनता कि वे कुछ सोचें। प्रकाश जी की दिल्ली से रायपुर की फ्लाइट थी। अगर हम एक दिन भी लेट होते हैं तो उनकी वह फ्लाइट छूट जायेगी और अगले दिन हाथोंहाथ फ्लाइट बुक करने के लिये उन्हें बहुत ज्यादा पैसे खर्च करने पडेंगे। विधान भी सीमित छुट्टियां लेकर आया था। उसे जितनी भी छुट्टियां मिली थीं, वे बहुत जद्दोजहद के बाद मिली थीं। अगर वह लेट होता है तो उसे ही परेशानी होनी थी। जबकि मैं ऑफिस में कहकर आया था कि जिस दिन मुझे लौटकर पहली ड्यूटी करनी है, उससे एक दिन पहले फोन करके पूछ लेना। 5000 मीटर ऊंचे दर्रे को पार करते समय आप कभी भी भरोसा नहीं कर सकते कि फलां दिन फलां समय पार कर ही लोगे। फिर मानसून का मौसम। अगर पहले दिन फोन न मिले तो समझ लेना कि अगले दिन मैं ड्यूटी नहीं करूंगा। जिस दिन भी फोन मिल जाये, उससे अगले दिन ड्यूटी पर आऊंगा। चाहे एक दिन बाद या चार दिन बाद।
मैं आजाद होना चाहता हूं- यह एक चेतावनी थी कि हम बहुत लेट हो रहे हैं। अगर अभी भी ठोस निर्णय नहीं लिया गया तो आगे चलकर नुकसान होगा।
प्रकाश जी की हालत अभी भी बहुत खराब थी। मैं सौ मीटर चलता, दो सौ मीटर चलता और बैठ जाता। बडी देर बाद प्रकाश जी आते। फिर चलता और बैठ जाता। यही क्रम चलता रहा। हर बार जब भी हम मिलते, एक बार जरूर कहा जाता- विधान तो फुकताल पहुंच गया होगा। और वास्तव में विधान हमें रास्ते में कहीं नहीं मिला। इसका भी एक कारण था। उसने अपने यात्रा-वृत्तान्त में लिखा भी है कि वो मेरी तरफ से निश्चिन्त था और मेरे व प्रकाश जी के साथ होने के कारण प्रकाश जी की तरफ से भी निश्चिन्त ही था। इसी बात पर अब हम दोनों चर्चा भी करते थे। हमें भी पता था कि मेरे व प्रकाश जी के साथ होने की वजह से वह बिल्कुल बेफिक्र था।
खैर, चलते रहे। चा के बाद जो मामूली चढाई थी, उसके बाद ढलान आया। नदी के उस तरफ पुरने वाला रास्ता भी दिखने लगा। रास्ते पर चलते लोग भी दिखने लगे। इस रास्ते से भी आना-जाना लगा था। ग्रुप आते जिनमें ज्यादातर विदेशी होते। फुकताल गोम्पा भारतीयों के लिये बिल्कुल अनजान है जबकि विदेशियों के लिये नहीं।
एक जगह थोडा सा भू-स्खलन था। ज्यादा दूर तक नहीं था। यहां पहाड का ढाल बहुत ज्यादा था और भू-स्खलन की वजह से बजरी रास्ते में आ गई थी। इस ढलान पर उन बजरियों पर ही पैर रखकर आगे बढना था। यह मेरे लिये तो उतना मुश्किल नहीं था लेकिन प्रकाश जी के लिये जरूर मुश्किल हो सकता था। जरा सा दाहिने देखने से लगता था कि आप आसमान में टंगे हैं। प्रकाश जी की प्रतीक्षा की। उनका हौंसला बढाया कि आपका पैर बजरियों पर पडेगा तो वे नीचे को सरकेंगीं। आप घबराना मत। आपका पैर थोडा सा धंस जायेगा, धंसने देना। धंसने का अर्थ है कि आपके फिसलने के चांस कम हो गये। पहले मैं पार करने बढा और उन्हें ‘डेमो’ दिखाया। मेरे पास डण्डा नहीं था और कमर पर तेरह किलो सामान भी लदा था, इसलिये मैं यहां थोडा सा असन्तुलित भी हुआ लेकिन प्रकाश जी को कहानी सुनाई कि कुछ नहीं होता। मेरे बाद वे पार करने चले। घबराहट थी, ढलान था और जैसे ही पैर हल्का सा फिसला; वे पूरे हिल उठे। हालांकि इसकी चौडाई इतनी ही थी कि दो के बाद तीसरा कदम ठोस जमीन पर आना था।
प्यास लगने लगी थी और हमारे पास पानी कभी का खत्म हो गया था। तभी ताजे पानी का एक झरना मिला। जी भरकर पीया और बोतलें भी भर लीं। यहां से एक पाइप लाइन देखकर अन्दाजा हो गया कि गोम्पा अब ज्यादा दूर नहीं। इस झरने से ही पानी गोम्पा में पहुंचाया जाता है। सामने एक पुल भी दिख रहा था। लग रहा था कि गोम्पा उस तरफ है और पुल पार करना पडेगा लेकिन ऐसा नहीं था।
झरने से फुकताल गेस्ट हाउस करीब सौ मीटर ही है लेकिन ये सौ मीटर चढाई भरे हैं। मैं चढकर ऊपर पहुंचा तो सामने ही गेस्ट हाउस दिख गया। यहां नदी के उस तरफ वाला रास्ता भी पुल पार करता हुआ मिल जाता है। झरने से यहां तक सौ मीटर आने में प्रकाश जी को आधे घण्टे से ज्यादा लग गया। चा से यहां तक आने में चार घण्टे लगे, पांच किलोमीटर के चार घण्टे जबकि पूरा रास्ता समतल है।
विधान गेस्ट हाउस की दीवार के पास बैठा हुआ था। उसने बताया कि वो दो घण्टे पहले यहां आ गया था। गेस्ट हाउस के सामने लॉन में एक घण्टे तक सोया। अब जब कुछ विदेशी आये तो आवाज सुनकर आंख खुली। यहां मैंने देखा कि विदेशी मटर-पनीर खा रहे हैं। कसम से जी खुश हो गया मेरा। भूख लगी थी। लद्दाख में आपको मटर-पनीर मिल जाये तो तुरन्त ले लेना चाहिये। गेस्ट हाउस में मैं इसी का ऑर्डर देना चाहता था लेकिन विधान ने यह बताकर सब कबाडा कर दिया- यह एक बडा ग्रुप है। इनके साथ कई पॉर्टर और खच्चर हैं। मटर-पनीर ये लोग अपने साथ लाये हैं।
गेस्ट हाउस में खाने के लिये केवल कोल्ड ड्रिंक और बिस्कुट ही थे। चावल और राजमा बनने में समय लगेगा। हमने कोल्ड ड्रिंक और बिस्कुट खाकर ही काम चलाया।
प्रकाश जी के बारे में इतना ही कहूंगा कि वे जिन्दा थे और यहां तक आ भी गये थे। बाकी हालत बडी खराब थी उनकी। ऐसे में कौन फुकताल, कैसा फुकताल? उन्होंने गेस्ट हाउस में ही कुर्सी पर बैठे रहने का इरादा किया। हमने कई बार कहा लेकिन वे नहीं चले। मैं और विधान एक किलोमीटर दूर दिख रहे गोम्पा को देखने चल दिये जबकि प्रकाश जी वहीं बैठे रह गये। उनका साथ देने को एक फ्रांसीसी लडकी बिल्कुल मरणासन्न हालत में कुर्सी पर रखी थी।


चा गांव






चा गांव

पुरने गांव


चा से फुकताल जाने वाली पगडण्डी













फुकताल गोम्पा की स्थिति। नक्शे को छोटा व बडा करके भी देखा जा सकता है।





अगला भाग: अदभुत फुकताल गोम्पा

पदुम दारचा ट्रेक
1. जांस्कर यात्रा- दिल्ली से कारगिल
2. खूबसूरत सूरू घाटी
3. जांस्कर यात्रा- रांगडुम से अनमो
4. पदुम दारचा ट्रेक- अनमो से चा
5. फुकताल गोम्पा की ओर
6. अदभुत फुकताल गोम्पा
7. पदुम दारचा ट्रेक- पुरने से तेंगजे
8. पदुम दारचा ट्रेक- तेंगजे से करग्याक और गोम्बोरंजन
9. गोम्बोरंजन से शिंगो-ला पार
10. शिंगो-ला से दिल्ली वापस
11. जांस्कर यात्रा का कुल खर्च

33 comments:

  1. ''मैं और विधान एक किलोमीटर दूर दिख रहे गोम्पा को देखने चल दिये जबकि प्रकाश जी वहीं बैठे रह गये। उनका साथ देने को एक फ्रांसीसी लडकी बिल्कुल मरणासन्न हालत में कुर्सी पर रखी थी।''
    पढकर मज़ा आ गया. अब असली नज़ारे दिखने लगे हैं.नंगे पहाड़ लद्दाख की पहचान हैं. लगे रहिये अगली कड़ी का इंतज़ार रहेगा.

    नए टेम्पलेट में फॉण्ट साइज़ छोटा हो गया है और ब्लॉग से चारो तरफ काफी खली जगह छुट रही है फॉण्ट पहले जितना बड़ा रहता और किनारे का गैप भरा होता तो अच्छा होता. बाकि सब ठीक है.

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    1. धन्यवाद चन्द्रेश भाई, अभी आपके सुझाव के अनुसार बदलाव किया है। अब बताना।

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  2. मार्मिक वर्णन तथा मोहक चित्रण. नए कलेवर में ब्लॉग और भी निखर रहा है. नए वर्ष की शुभकामनाओं के साथ।

    मुकेश.....

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    1. धन्यवाद मुकेश जी...

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  3. blog ka background pehle jaisa rakhe..words dark rakhein......pehle jaisa badhiya nahi aa raha he.....thanks..ANURAG

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    1. अनुराग जी, बैकग्राउंड तो पहले जैसा ही है। शब्द पूरे काले हैं। साइज भी ठीक ही है। और ज्यादा डार्क का अर्थ है कि मुझे इन्हें बोल्ड करना होगा। लेकिन बोल्ड नहीं करूंगा। नया टैम्पलेट है, इतना परिवर्तन तो बनता है।

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    1. धन्यवाद गुप्ता जी...

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  5. प्रकाश जी की भी नईया पार लगा ही दि आपने..
    आपने एक ग्रुप लिडर का काम बहुत अच्छे ढंग से किया..

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    1. धन्यवाद सचिन भाई...

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  6. Bade size me photo dekhan bada accha lag raha.. shaandaar photos hai..
    Wo Bhu-skhalan ki photo dhoondh raha tha nahi mili...

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    1. उसकी वीडियो बनाई थी लेकिन कुछ तकनीकी असफलता के कारण मैं उसमें से फोटो नहीं लिकाल पाया।

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  7. Bhai comment likh ker jub publish karte hain tho google account login karna padta hai aur comment gayab ho jata hai.
    Pehle bhi maine bataya tha, Kya upaay hai.

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    1. पता नहीं क्या मामला है? मैंने टिप्पणी पर कोई प्रतिबन्ध नहीं लगा रखा है। कोई भी टिप्पणी कर सकता है यहां तक कि बेनामी भी। गूगल एकाउंट के लिये नहीं कहना चाहिये लेकिन... सही में... नहीं बता सकता कुछ।

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  8. kya baat hai sir ji, ads dikh rae apke blog par..mujhe khushi hai kyuki money bhi jaruri hai :) sirf shauk se pet nae bhrta ..khud ka anubhav hai

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    1. बिल्कुल सही कह रहे हो सर जी... सिर्फ शौक से पेट नहीं भरता।

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  9. बढ़िया जानकारी और अदभूत फोटो।

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  10. Bahut badhiya yatra chal rahi hai Neeraj bhai.photo bhi bahut khubsurat hain,par sath hi darr bhi lag raha hai ki aisi durgam jagah par pahunch jaate ho aap bhi.

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    1. हां शर्मा जी... मजा आता है ऐसी जगहों पर।

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  11. बहुत ही रोचक व मजेदार वर्णन !
    :-)

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    1. धन्यवाद मुकेश जी...

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  12. भाई वो नदी शिंगो ला नहीं है ये है Lungnak (Lingti-Tsarap) River.

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    1. शिंगो-ला से जो नदी निकलती है, मुझे उसका नाम नहीं पता। यह मैंने इस पोस्ट में भी लिखा है। चलिये, उसका नाम लुगनक नदी ही सही। धन्यवाद आपका।

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  13. jat ji... iss yatra me kul kitna kharch aaya ???

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    1. मेरा दिल्ली से दिल्ली तक खर्च लगभग 15000 रुपये आया। उसके बारे में आगे विस्तार से बताऊंगा।

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  14. नीरज भाई
    ऐसे शानदार फोटो देखकर अपना भी दिल मचल जाता है..
    बहुत बढ़िया.!

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    1. धन्यवाद अरुण भाई...

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  15. yuhin kat jaayega safar saath chalne se..............................................................
    happy new year neerajji
    lage raho

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  16. अद्भुत .. सचमुच एक अलग दुनिया . अलग रंग अलग ढंग . अनजानी सी और विस्मयकारी . ... पहाड़ों का ऐसा रंग पहली बार देखा है .छायांकन बहुत खूबसूरत है .

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  17. नीरज भाई,
    फोटो ग्राफ्स बहुत सुन्दर , यात्रा वृतांत पढ़ कर मजा आ गया।

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  18. Jab bhi aap k blog ko padhta hu jindgi me ek naya-pan aa jata h aur jindgi rangin lagne lgti h :-) Dhanyavad

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