Monday, January 12, 2015

पदुम-दारचा ट्रेक- तेंगजे से करग्याक और गोम्बोरंजन

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16 अगस्त 2014
सुबह साढे आठ बजे सोकर उठा। हालांकि रात जब सोने जा रहा था तो दुकान मालकिन से यही कहकर सोया था कि सुबह छह बजे चल पडूंगा। सुबह छह बजे आंख भी खुली थी लेकिन बाहर बूंदाबांदी हो रही थी। मैं फिर सो गया। अबकी उठा तो साढे आठ बज चुके थे और तेज धूप टेंट पर पडने लगी थी। दुकान भी खुल चुकी थी। सरचू जाने वाले विदेशियों के ग्रुप का साजो-सामान उखड चुका था और खच्चरों पर लादा जा रहा था।
मैं तय कार्यक्रम से काफी पीछे था। सुबह सवेरे चलने का मकसद इतना ही था ताकि कुछ समय व दूरी की पूर्ति कर सकूं। परसों शाम तक हर हाल में दारचा पहुंचना है। दारचा में मुझे विधान व प्रकाश जी मिलेंगे, कल ही इस बारे में सबकुछ तय हो गया था। अगर मैं न पहुंचा तो वे दारचा में मेरी प्रतीक्षा करते रह जायेंगे। लेकिन बुरी आदत है देर तक सोने की, सोता ही रह गया।

चाय पीकर सवा नौ बजे प्रस्थान कर गया। रास्ता समतल ही था इसलिये चलने में काफी तेजी दिखाई। एक घण्टे में ही थाबले गांव पहुंच गया। छोटा सा गांव है यह। रास्ता गांव के अन्दर से जाता है। ऐसा लगता है कि हम घरों के भीतर से होकर चल रहे हों। रास्ते पर ही याक बंधे थे और महिलाएं दूध दुह रही थीं। हमारे यहां मैदान में रिवाज है कि दूध दुहने वाले से टोका-टाकी नहीं करते हैं। कभी कभी ऐसा करने से गायें अजनबी व्यक्ति को देखकर बिदक जाती हैं। याक भी गाय की ही प्रजाति है। फिर वे पुराने संस्कार; मैं चुपचाप आगे बढ गया।
आखिरी घर को पार करके बैठ गया। पिछले एक घण्टे से मैं लगातार चलता आ रहा था, आराम करने की इच्छा हो रही थी। उस घर की एक खिडकी जिस पर कांच लगा हुआ था, मेरी तरफ ही थी। भीतर कम प्रकाश था, इसलिये मुझे भीतर का कुछ भी नहीं दिख रहा था, जबकि भीतर वालों को मैं दिख रहा होऊंगा। तभी तो एक वृद्ध महिला आईं और पूछा- ओ! चाय पीयेगा? मैंने तुरन्त हां कह दी। उन्होंने मुझे घर के भीतर आने का इशारा किया।
भीतर घुसा। पहले तो घुप्प अन्धेरे से सामना हुआ। कुछ देर में आंखें अभ्यस्त हुईं तो एक कमरे में जाने का दरवाजा दिखा। बाहर जूतियां निकली हुईं थीं। मैं भी जूते उतारकर भीतर कमरे में चला गया। यह वही कमरा था जिसकी खिडकी बाहर मेरी तरफ थी। कमरे में एक बुजुर्ग भी थे और आराम से आसन पर बैठकर अपनी धर्म-पुस्तक पढ रहे थे। मैंने ‘जुले’ कहा, उन्होंने बैठने का इशारा किया, मैं भी बैठ गया।
मैं पहले भी लद्दाखी घरों में जा चुका हूं। यह भी उसी तरह का घर था। बीच में बडी लोहे की अंगीठी, उस पर चिमनी जो छत से होती हुई बाहर जा रही थी। चारों तरफ बिछे गद्दे। महिला ने एक पतीली में दूध गर्म किया, चीनी डाली और गिलास में भरकर मुझे दे दिया। बुलाया चाय के लिये था, दे दूध रही हैं। यह बडी अच्छी बात थी। साथ में एक थाली और सरका दी जिसमें टूटे हुए बिस्कुट और चूरा था। मैंने दूध पीया और बिस्कुट खाये। औपचारिक बातचीत भी हुई। चलते समय पैसे देने लगा तो उन्होंने लेने से मना कर दिया।
सुबह एक गिलास चाय पी थी, एक घण्टा चला और वो शीघ्र ही हजम हो गई। अब दो गिलास दूध पी लिया, शीघ्र ही यह भी हजम हो जायेगा। इसलिये अगले गांव करग्याक में कुछ खाना पडेगा। एक घण्टे तक लगातार चला। सामने एक संगम दिख रहा था। एक नदी सामने से आ रही थी, एक नदी बायीं ओर से आ रही थी। बायीं वाली पर एक पुल था और उस तरफ एक गांव था- ‘की’ गांव।
नदी घाटी यहां बहुत चौडी है। इसकी वजह से खूब तेज हवा लग रही थी। फिर कल से मौसम भी खराब था। धूप निकलती तो अच्छा लगता, बादल आ जाते तो ठण्ड लगने लगती। पुल के पास एक माने का सहारा लेकर बैठ गया। ऐसी जगह बैठा कि हवा मुझे नहीं लग रही थी। बडा आराम मिला।
अजीब जगह है यह लद्दाख भी। धूप निकले तो झुलसा देती है और धूप न निकले तो ठण्ड लगने लगती है। फिर हवाएं भी इतनी तुनकमिजाज कि बात-बात पर बिगड उठती हैं। एक बार चलना शुरू होती हैं तो चलती ही जाती हैं, और ज्यादा व और तेज चलती हैं। खराब मौसम के साथ तो इनका जबरदस्त याराना है। उधर मैं चाहता था कि मौसम तो खराब ही रहे क्योंकि बारिश तो पडनी नहीं है। बादल रहेंगे तो धूप भी नहीं लगेगी। लेकिन तूफानी हवाओं ने सब खराब कर दिया। आगे रास्ता ऊंचाई की तरफ बढने वाला है, इसी तरह हवाएं चलती रहीं तो कौन जानता है कि बर्फीला तूफान ही शुरू हो जाये?
कुछ देर यहां बैठकर फिर चल पडा। अब सामने पवित्र गोम्बोरंजन पर्वत दिखाई देना शुरू हो गया था। लेकिन यह अभी बहुत दूर था और मुझे इसके पास से ही निकलना था। बिल्कुल सीधी घाटी थी और कोई ज्यादा चढाई भी नहीं दिख रही थी।
पौने एक बजे करग्याक गांव में प्रवेश कर गया। यह अपेक्षाकृत बडा गांव है और इस ट्रेक पर जम्मू-कश्मीर राज्य का आखिरी गांव भी। इसके बाद अगला गांव शिंगो-ला पार करके हिमाचल प्रदेश में ही मिलेगा।
एक खेत में दो महिलाएं गेहूं काट रही थीं। मैंने ‘जुले’ कहा और कुछ खाने के बारे में पूछा। उनमें से एक महिला ने बताया कि उनके घर पर मैगी मिल जायेगी और चाय भी। इसके अलावा कुछ नहीं। मुझे मैगी बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगती, फिर भी समय का तकाजा देखते हुए मैगी ही खाना स्वीकृत कर लिया। वह महिला गेहूं छोडकर अपने घर की ओर चल पडी। ज्यादा नहीं चलना पडा, मुख्य रास्ते पर ही उनका घर था। प्रवेश द्वार इतना छोटा था कि पूरा झुकने पर कमर पर टंगा बैग दरवाजे के ऊपर अटक गया। बैग उतारा, तब घर में प्रवेश करना पडा। झुके झुके ही संकरी अन्धेरी भूल-भुलैया में चलता हुआ एक कमरे में पहुंचा और जमीन पर बिछे गद्दे पर बैठ गया।
सबसे पहले चाय बनाई, फिर मैगी। मुझे जोर की भूख लगी थी। घण्टे भर पहले पीया दो गिलास दूध कभी का हजम हो चुका था। यह आखिरी गांव है, इसलिये यहां से पेट भरकर ही आगे बढना उचित है। पसन्द न होने के बावजूद भी एक बडा कटोरा भरकर मैगी खानी पडी। एक बार जब लगा कि नहीं खाई जायेगी, उल्टी हो जायेगी तो कुछ देर रुक गया; बातचीत करने लगा, हिलने लगा और लेटा भी; पुनः चाय बनवाई और आधे घण्टे बाद और मैगी खाई। कुल मिलाकर जितना खा सकता था, करग्याक से उससे ज्यादा ही खाकर चला।
इन महिला का नाम स्तैनजिन अंगमो था। इनके मामा जिंग्मे यांग्तू की दिल्ली कश्मीरी गेट स्थित तिब्बती मार्किट में ल्हासा रेस्टॉरेंट के सामने एक दुकान भी है। सर्दियों का समय अंगमो वहीं दिल्ली में ही बिताती हैं। अक्टूबर में वह शिंगो-ला पार करके मनाली जायेगी और वहां से दिल्ली। मैंने भी उनसे दिल्ली मिलने का वादा तो किया है, देखते हैं मिलना होगा या नहीं। अभी तक तो गया नहीं हूं। हालांकि हमारे यहां से चन्द कदम ही दूर है। मैंने अंगमो से पूछा था कि तिब्बती मार्किट में तो तिब्बती व्यापारी होने चाहिये, तुम लद्दाखी कैसे? बताया कि केवल दो ही दुकानें लद्दाखियों की हैं, बाकी सभी तिब्बतियों की।
जब करग्याक से निकला तो दो बज चुके थे। हालांकि इसके बाद भी आगे शिंगो-ला से पहले लाखांग नामक जगह पर एक ढाबा है। लेकिन पता नहीं कितना दूर है, आज पहुंचूंगा भी या नहीं और जब तक पहुंचूंगा, वहां कुछ खाने को मिलेगा भी या नहीं; यही सब बातें ध्यान में थीं।
सामने पवित्र गोम्बोरंजन पर्वत दिख ही रहा था। और यह ऐसे ही पवित्र नहीं बन गया। इसकी स्थिति ही इसे सम्मानजनक बनाती है। इसके पीछे और अगल-बगल भी कोई पहाड नहीं दिखता। अकेला डटकर खडा है।
करग्याक पीछे छूट गया और नदी घाटी और भी चौडी हो गई। रास्ता घास के लगभग समतल मैदान से होकर था। घास में जगह-जगह पत्थरों पर बैठे फ्यांग धूप सेंकते मिलते हैं। फ्यांग खरगोश व चूहे की मिली-जुली प्रजाति जैसा होता है। यह धरती के अन्दर बिलों में रहता है। आदमी को दूर से देखते ही चीखने लगता है और अपने दूसरे साथियों को सचेत कर देता है। एक बार जब मुझे आराम करने की जरुरत थी तो मैं इसी तरह के एक फ्यांग की तरफ बढा। वह दौडकर अपने बिल में जा घुसा। मैं भी उस बिल के पास ही पालथी मारकर बैठ गया।
कुछ देर बाद बिल में हलचल हुई। सिर्फ आंखें ही दिख रही थीं। मैं भी बिना हिले-डुले बैठा रहा। कैमरा मैंने पहले ही इस तरह पकड रखा था कि जब वह मेरी पसन्द की स्थिति में आ जायेगा तो बिना हिले कैमरा ऑन कर लूं और फोटो ले लूं। लेकिन वो तो बिना हिले-डुले पडे रहने का जन्मजात महारथी है। आधा घण्टा हो गया जब वह और थोडा सा बाहर निकला। अब उसकी गर्दन से ऊपर का हिस्सा दिखने लगा- कान, आंखें और काली नाक। मुझे यहां एक ही स्थिति में बैठे पौन घण्टा हो गया था, इतने समय में यह इतना सा ही बाहर निकला है, मुझे अभी भी बहुत दूरी तय करनी है। इसलिये कैमरा ऑन किया और उसका इतने का ही एक फोटो लिया। उठा तो पता चला कि दोनों पैर एक ही स्थिति में इतनी देर तक होने की वजह से बिल्कुल सुन्न हो गये हैं। धीरे धीरे पैर ठीक हुए और मैं आगे बढा।
एक आदमी मिला। पूछा तो उसने बताया कि अभी भी लाखांग के तीन घण्टे और लगेंगे। अभी पांच बजे थे। यह तीन घण्टे बता रहा है तो मुझे कम से कम चार घण्टे लगने हैं। यानी नौ बज जायेंगे। फिर भी समतल मैदान में कदम बढाता गया। दूर-दूर तक कोई आदमजात नहीं थी। मुझे उम्मीद थी कि कोई ग्रुप तो आज लाखांग जायेगा ही। मैं रात तेंगजे में था, वहां जो ग्रुप था उसे सरचू जाना था यानी इस रास्ते से नहीं आना था। शाम हो रही थी, अभी तक कोई नहीं मिला तो इसका अर्थ यही है कि आज कोई ग्रुप नहीं आने वाला।
एक घण्टे बाद लाखांग की तरफ से दो घुडसवार आये। मैंने उनसे भी पूछा तो उन्होंने बताया कि दो घण्टे लगेंगे। यह सुनकर मैंने और तेजी से कदम बढाये। सुबह से मैं आधा घण्टा थाबले में रुका था, एक घण्टा करग्याक में और पौन घण्टा फ्यांग के यहां। अन्यथा लगातार चल ही रहा था। चढाई भी कोई ज्यादा नहीं थी। फिर भी थकान हो गई थी। मन था कि यहीं इसी मैदान में टैंट लगा लूं। लेकिन दूरी तय करने का बहुत दबाव था।
रास्ते में एक धारा पडी। कोई ज्यादा चौडी नहीं थी, उथली भी थी लेकिन फिर भी इतनी थी कि इसे पार नहीं किया जा सकता था। शाम का समय होने के कारण बहाव भी ज्यादा ही था। चाहता तो जूते उतारकर यहीं से इसे पार कर जाता लेकिन अत्यधिक ठण्डे पानी से भी बचना चाहता था। सोचा कि कुछ ऊपर चलकर इसे पार करना चाहिये। ऊपर देखने पर लग भी रहा था कि पत्थरों पर पैर रख-रखकर पार कर जाऊंगा। लेकिन यह मृगमरीचिका थी। इसी मृगमरीचिका ने बडी दूर तक चला दिया। फिर सोचने लगा कि जब इतनी दूर आ ही गया हूं तो बिना जूते उतारे ही पार करूंगा। आखिरकार कम से कम आधे किलोमीटर दूर जाकर ऐसी जगह मिली और मैं पार हो गया। फिर उधर से धारा के साथ साथ ही नीचे आना पडा।
पौने सात बज गये थे। सूरज दिखना बन्द हो गया हालांकि अभी भी वातावरण में उजाला था। चलने की बिल्कुल भी इच्छा नहीं थी। अब मैं गोम्बोरंजन पर्वत के बिल्कुल नीचे था। गर्दन उठाकर पर्वत को देखना पडता था। समुद्र तल से ऊंचाई थी 4250 मीटर। तेंगजे 4000 मीटर पर था। तभी नजर पडी पर्वत के बिल्कुल नीचे बने एक कमरे पर। यह बस एक ही कमरा था। पक्का था, इसमें टीन का दरवाजा था और दो तरफ बडी बडी खिडकियां थीं जिनमें शीशा लगा था। इसे देखते ही तय हो गया कि आगे नहीं बढना है, यहीं रुकना है। बराबर में साफ पानी की एक धारा बह रही थी। इसके पीछे कुछ झण्डियां थीं जैसे कि अमूमन लद्दाखी बौद्ध अपने पवित्र स्थानों पर लगा देते हैं। जाहिर है कि यह स्थान पवित्र गोम्बोरंजन पर्वत को पूजने का स्थान होगा।
मैं अन्दर घुसा। कोई नहीं था। लकडी के फर्श पर मिट्टी व धूल जमी थी। दरवाजे में भीतर कुण्डी नहीं थी। एक खिडकी पर पूरा शीशा था जबकि दूसरी का शीशा एक कोने में इतना टूटा था कि कोई छोटा जानवर जैसे फ्यांग भीतर आ सकता था। इनके अलावा एक टूटा हुआ स्टोव रखा था और कुछ खाली बोतलें थीं। इनमें शराब की बोतलें भी थीं। गौरतलब है कि लद्दाख व जांस्कर में शराब बिल्कुल साधारण चीज है। यह देवताओं को भी चढाई जाती है।
मैंने बाहर से एक बडा पत्थर उठाया और इसे दरवाजा बन्द करके अन्दर इस तरह लगा दिया कि तेज हवा या कोई जानवर इसे न खोल सके। फिर अपना बैग खोला। टैंट को बिछाया और स्लीपिंग बैग में घुस गया। कुछ बिस्कुट खाये, पानी पीया और लेट गया।
बाहर सांय सांय हवा चल रही थी। पानी की मद्धिम आवाज आ रही थी। दूर-दूर तक कोई इंसान नहीं था। चांदनी रात थी। थोडी सी रोशनी कमरे में भी आ रही थी और पर्याप्त उजाला कर रही थी। इन सबके बावजूद सन्नाटा भी अपने चरम पर था।

तेंगजे से प्रस्थान






‘की’ गांव जाने के लिये पुल

पवित्र गोम्बोरंजन पर्वत के प्रथम दर्शन

की गांव


करग्याक गांव



अब तो गोम्बोरंजन के साये में ही चलना है।


फ्यांग



यही वो फ्यांग था जिसने मुझे पौने घण्टे तक बैठाये रखा।









यह है मेरी आज की शरणस्थली।


गोम्बोरंजन पर्वत की स्थिति। नक्शे को छोटा व बडा भी किया जा सकता है।





अगला भाग: गोम्बोरंजन से शिंगो-ला पार

पदुम दारचा ट्रेक
1. जांस्कर यात्रा- दिल्ली से कारगिल
2. खूबसूरत सूरू घाटी
3. जांस्कर यात्रा- रांगडुम से अनमो
4. पदुम दारचा ट्रेक- अनमो से चा
5. फुकताल गोम्पा की ओर
6. अदभुत फुकताल गोम्पा
7. पदुम दारचा ट्रेक- पुरने से तेंगजे
8. पदुम दारचा ट्रेक- तेंगजे से करग्याक और गोम्बोरंजन
9. गोम्बोरंजन से शिंगो-ला पार
10. शिंगो-ला से दिल्ली वापस
11. जांस्कर यात्रा का कुल खर्च

27 comments:

  1. adhbhut.ab aaya asli INDIANA JONES type vivran.rahasya or romanch se bharpur.itni khatarnaak yaatra wo bhi akele .kya baat hai.KY gano ki photo samajh nahi aata ki aapki yatra jyadaa shaandaar hai ki likhne ka dhang .itni himmat ,itna dhairya ,itni mansik kshmta ko shat shat naman.
    GHUMMAKARI ZINDABAAD

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    1. धन्यवाद मनीष कुमार जी...

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  2. adhbhut.ab aaya asli INDIANA JONES type vivran.rahasya or romanch se bharpur.itni khatarnaak yaatra wo bhi akele .kya baat hai.KY gano ki photo bahut hi shandaar aayi hai. samajh nahi aata ki aapki yatra jyadaa shaandaar hai ki likhne ka dhang .itni himmat ,itna dhairya ,itni mansik kshmta ko shat shat naman.
    GHUMMAKARI ZINDABAAD

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  3. नीरज भाई सम्पूर्ण उत्तरी पहाड़ी राज्यों को चाहिए कि आप को उनके राज्य का टूरिज्म ब्रांड एम्बेसडर बना दें | आपने जितना उनके राज्य के बारे में विस्तार पूर्वक लिखा है उतना शायद ही किसी और ने लिखा होगा| बच्चन साहब अगर कुछ विज्ञापन दिखाकर गुजरात के टूरिज्म को बुलंदियों पर पंहुचा सकते हैं तो आपने तो इन राज्यों के एक एक फीट को दिखा डाला है अपने ब्लॉग के माध्यम से .............................................

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    1. ब्रांड एम्बसेडर काम से नहीं बल्कि ‘फेस वैल्यू’ से बनते हैं। अपनी तो कुछ भी फेस वैल्यू नहीं है।

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    1. धन्यवाद गुप्ता जी...

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  5. नीरज जी , बहुत सुन्दर यात्रा वृतांत। जितना चाहें मन भरकर घुमक्कडी कर लीजिये, शादी के बाद न कोई कर पाता है न ही समय मिल पाता, अपनी जिम्मेदारियों से। हां. कभी पत्नी को घूमने ले जाना हो तब जा सकते हैं। लेकिन वो भी जिम्मेदारियों के साथ.
    ये मस्ती नहीं आ पाती।

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  6. आपकी जिजीविषा को प्रणाम है।

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    1. धन्यवाद बडोला साहब...

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    1. धन्यवाद भवारी साहब...

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    1. धन्यवाद विशाल जी...

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  9. बहुत ही शानदार और रोमांचकारी यात्रा के साथ साथ शानदार फोटो ... गोम्बोरंजन पर्वत के सभी फोटो बहुत अच्छा लगे....

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    1. धन्यवाद गुप्ता जी...

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  10. इतना घुमने के लिए तो 100 जन्‍म भी कम पडेगे । अदभुत यात्रा वृतांत है आपको देश का ब्राईट एम्‍बेसडर बना देना चाहिए । पधारो म्‍हारे देश का

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    1. धन्यवाद धरद साहब...

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  11. उत्कृष्ट वर्णन तथा अद्भुत छायाचित्रकारी .....गोंबोरन्जन पर्वत के चित्र बड़े ही मनोहारी लगे।

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    1. धन्यवाद भालसे साहब...

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  12. bhai bahut achha vratant hai ...jungal me akele is tarah sona .....bahut adbhut ..nice dear...

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  13. उफ़ ! ये वीराना ! तुझे डर नहीं लगता क्या नीरज। … पर इतने खूबसूरत पर्वत और पहाड़ दिखाने का शुक्रियां ---तेरे साथ हम भी नदी नाले पार करते है। । सच, बड़ा डर लगता है ,अकेले घर में क्या कोई जानवर नहीं आता होगा ?

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