Wednesday, January 7, 2015

अदभुत फुकताल गोम्पा

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   जब भी विधान खुश होता था, तो कहता था- चौधरी, पैसे वसूल हो गये। फुकताल गोम्पा को देखकर भी उसने यही कहा और कई बार कहा। गेस्ट हाउस से इसकी दूरी करीब एक किलोमीटर है और यहां से यह विचित्र ढंग से ऊपर टंगा हुआ दिखता है। इसकी आकृति ऐसी है कि घण्टों निहारते रहो, थकोगे नहीं। फिर जैसे जैसे हम आगे बढते गये, हर कदम के साथ लगता कि यह और भी ज्यादा विचित्र होता जा रहा है।

   गोम्पाओं के केन्द्र में एक मन्दिर होता है और उसके चारों तरफ भिक्षुओं के कमरे होते हैं। आप पूरे गोम्पा में कहीं भी घूम सकते हैं, कहीं भी फोटो ले सकते हैं, कोई मनाही व रोक-टोक नहीं है। बस, मन्दिर के अन्दर फोटो लेने की मनाही होती है। यह मन्दिर असल में एक गुफा के अन्दर बना है। कभी जिसने भी इसकी स्थापना की होगी, उसी ने इस गुफा में इस मन्दिर की नींव रखी होगी। बाद में धीरे-धीरे यह विस्तृत होता चला गया। भिक्षु आने लगे और उन्होंने अपने लिये कमरे बनाये तो यह और भी बढा। आज इसकी संरचना पहाड पर मधुमक्खी के बहुत बडे छत्ते जैसी है। पूरा गोम्पा मिट्टी, लकडी व पत्थरों का बना है। जांस्कर में बारिश नहीं होती इसलिये मिट्टी का बना होने के बावजूद भी यह अभी तक टिका है।

   यहां एक ऐसा छोटा सा सोता भी है जिसका पानी पवित्र माना जाता है। इसी पानी को स्थानीय लोग प्रसाद के तौर पर ग्रहण करते हैं। इस सोते को बडी गुप्त जगह पर छिपाकर रखा गया है और वहां महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। पता नहीं कैसे हमें भी उस सोते की जानकारी हो गई। एक भिक्षु माने की परिक्रमा कर रहा था, उससे हमने उसके बारे में पूछा तो बताया कि यहां अभी विदेशी महिलाएं हैं, ये चली जायेंगी तब बताऊंगा। अगर वो हमें बता देता, हम जाते तो वे महिलाएं भी जातीं। उन्हें समझाना पडना। चिक-चिक से बचने के लिये उसने ऐसा कहा। कुछ देर बाद जब वे महिलाएं चली गईं तो उसने एक बेढंगे से दरवाजे की ओर इशारा किया। मैं और विधान झुककर उसमें घुसे। सिवाय अन्धेरे के कुछ भी नहीं दिखा। बाद में कुछ आंखें अभ्यस्त हुईं, कुछ मोबाइल की टॉर्चें जलाईं, तो छोटे से कुण्ड में पानी भरा दिखा। हालांकि हमारे लिये यह बिल्कुल भी पवित्र नहीं था, लेकिन श्रद्धावश हमने भी इसका आचमन किया।

   पहाडों पर कहां से पानी निकल आये, कुछ नहीं कहा जा सकता। वे पहाड चाहे हिमालय के हों, पश्चिमी घाट हों या ये जांस्कर के हों।

   मन्दिर के अन्दर घुसे। यहां फोटो लेने की मनाही थी। यह एक बडा सा कमरा ही था। कमरे के बीचोंबीच दलाई लामा की प्रतिमा थी। उसके पीछे दीवार पर बुद्ध प्रतिमा व अन्य प्रतिमाएं व चित्र थे। ताज्जुब भी हुआ कि दलाई लामा आगे हैं और बुद्ध पीछे हैं। कमरे में आसनों की कई पंक्तियां थीं जिनमें भिक्षु ध्यान व पूजा-पाठ करते थे। यहां मेरा जो सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित किया, वो था गोम्बोरंजन चोटी का चित्र। भिक्षु से पूछा कि यह स्थान कहां है तो बताया कि शिंगो-ला से पहले एक गांव मिलेगा- करग्याक। करग्याक के पास यह चोटी है। मैं रोमांचित हो उठा कि मुझे इसी के पास से होकर जाना है। वहां का दृश्य ही ऐसा था। बाद में पता चला कि प्रकाश जी भी इसके बारे में जानते थे।

   करीब डेढ-दो घण्टे यहां बिताकर अब बारी थी वापस चलने की। पूरने तक की दूरी पांच किलोमीटर है। प्रकाश जी को देखते हुए लग रहा था कि कम से कम चार-पांच घण्टे तो लगने ही हैं। साढे तीन बजे यहां से वापस चल पडे।

   अचानक विधान ने नीचे की तरफ इशारा करके बताया कि चौधरी, वो देख। मैंने देखा, कुछ खास नहीं दिखा। बोला कि ध्यान से देख। ध्यान से देखा। नीचे एक स्कूल था। दो तरफ कमरों की कतारें थीं, बीच में छोटा सा पक्का मैदान था। कुछ बाल-भिक्षु मैदान में टहल रहे थे। स्कूल के उस तरफ पास ही सारप नदी बह रही थी। मैंने कहा- कुछ खास तो नहीं है।

   बोला- वे बच्चे मैदान में क्या कर रहे हैं। मैंने कहा- टहल रहे हैं। बोला- नहीं, वे मैदान में भारत का नक्शा बना रहे हैं। वास्तव में वे छोटे-छोटे पत्थर इकट्ठे करके उन्हें भारत के नक्शे की शक्ल में रख रहे थे। गौरतलब है कि अगले दिन स्वतन्त्रता दिवस था। यहां इस दूर-दराज में देशप्रेम की भावना देखकर जी खुश हो गया। एक बार तो नीचे स्कूल में जाने का मन भी किया लेकिन नहीं गये।

   गेस्ट हाउस में आये। प्रकाश जी कुर्सी पर बैठे बैठे मेज पर सिर रखे सो रहे थे। बिस्कुट नमकीन और कोल्ड ड्रिंक खाये। प्रकाश जी अब काफी अच्छे हो गये थे। यह उनके चेहरे से भी पता चल रहा था। चलते चलते साढे चार बज गये। मैंने कहा कि दूरी पांच किलोमीटर है। रास्ता नदी के बहाव के साथ साथ है इसलिये ढलान है। हमें तीन घण्टे में पहुंच जाना है।

   इस बार प्रकाश जी ठीक चले। लगभग 4000 मीटर की ऊंचाई होती ही ऐसी है। फिर लद्दाख। आप थोडा चलोगे, बुरी तरह थक जाओगे। बैठ जाओगे तो आराम मिलेगा। यही प्रकाश जी के साथ हुआ। पुल पार किया और पुरने का रास्ता पकडा। कहीं कहीं चढाईयों और उतराईयों के बावजूद भी रास्ता समतल ही है।

   वो जो पदुम-दारचा सडक बन रही है, उसमें से पुरने से एक सडक निकालकर फुकताल गोम्पा को भी जोडा जायेगा। इसके भी बनाने का काम चल रहा है। जहां घाटी में चौडाई है, कठोर चट्टानें नहीं हैं वहां कुदाल से मिट्टी खोदकर सडक बनाई जा रही है। जहां कठोर चट्टानें हैं, उस हिस्से को छोड दिया है। जब कभी मुख्य सडक पुरने तक बन जायेगी, मशीने पुरने तक आ जायेंगीं तो इन चट्टानों को भी तोड दिया जायेगा।

   मेरा ध्यान लगातार प्रकाश जी पर था, हालांकि इस बार हम तीनों साथ ही थे। मैं उन्हें उकसाता रहता था कि रास्ता समतल है, थोडे तेज चलो। वे हर बार कहते- हां, भूल गया था। कई बार ऐसा ही हुआ। यहां हम सुस्ती के इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि आसान रास्ता होने के बावजूद भी तेज चलना भूल जाते हैं। याद आने पर तेज चल देते हैं, कोई परेशानी नहीं होती लेकिन कुछ ही देर में फिर से वही चाल।

   नतीजा यह हुआ कि हम ढाई घण्टे में ही पुरने पहुंच गये यानी सात बजे ही। पुरने में असल में दो ही घर हैं। दोनों भाई हैं। और ये पुरने ‘रियासत’ के राजा हैं। यहां इनकी कई दुकानें हैं जिन्हें इनका ही परिवार चलाता है। यह गांव एक बेहद महत्वपूर्ण मार्ग पर बसा है, इसलिये यहां से गुजरने वाले ज्यादातर लोग यहां रुकते ही हैं। कई टैंट लगे थे, हमने भी लगा लिया। पुरने वालों ने ही अपने खेतों में हल्की घास उगाकर शानदार कैम्पिंग ग्राउण्ड बना रखी है, इसलिये वे टैंट लगाने का किराया भी लेते हैं- प्रति टैंट सौ रुपये। होमस्टे भी है जिसका किराया प्रति बिस्तर साढे तीन सौ रुपये है। खाना अलग से। आपको जो खाना है, उसी के अनुसार पैसे।

   आज हमारे मेजबान ने वेज मोमो बनाये थे। उनके घर में ही चले गये। उस लडके का नाम तेनजिंग था। वह जम्मू से एमबीबीएस की तैयारी कर रहा था। आजकल गांव आया हुआ था। उसने बताया कि वे लोग जम्मू जाने के लिये मनाली वाले रास्ते से जाते हैं। कुछ पैदल चलकर शिंगो-ला पार करना है। वे पहले ही फोन करके मनाली से टैक्सी मंगा लेते हैं। फिर मनाली उतरकर चौबीस घण्टे जम्मू की बसें मिलती हैं। रास्ता अच्छा है। जबकि कारगिल व श्रीनगर की तरफ ऐसा नहीं है। एक तो पदुम पहुंचना, फिर कारगिल पहुंचना जहां ढंग की सडक ही नहीं है, फिर श्रीनगर पहुंचना जहां कोई बस नाम की चीज नहीं चलती, चलती भी होगी तो बेहद सीमित संख्या में और उसके बाद हमेशा जाम रहने वाली श्रीनगर-जम्मू सडक; इन सबसे लाख गुना बेहतर है मनाली के रास्ते।

   इनके घर में एक फ्रांसीसी परिवार भी बैठा था। उनकी एक लडकी यहीं पदुम में किसी एनजीओ के साथ कुछ सामाजिक काम करती है।

   मोमो मुझे बेहद पसन्द हैं। फिर चटनी व दही के साथ मन भरकर खाये। विधान से बच गये, वे भी खा लिये; प्रकाश जी से बच गये, वे भी और अपने तो खाये ही। बात करते रहे और मोमो खाते रहे। पता नहीं आगे क्या-क्या मिले, आज स्वादिष्ट भोजन मिल रहा है, उसे क्यों छोडें? विधान और प्रकाश जी ज्यादा इसलिये नहीं खा पाये कि अभी भी उसे हाई माउंटेन सिकनेस हो रही थी।

   अपने टैंट में आ गये। हवा नहीं चल रही थी इसलिये उतनी ठण्ड भी नहीं थी, फिर भी काफी ठण्ड थी। हम कांप भी रहे थे। आसमान बिल्कुल साफ था। इतना साफ कि आकाशगंगा दिख रही थी। यह मैंने दो दिन पहले रांगडुम में भी देखी थी। तब सोचा कि बादल है। आज फिर सोचा कि बादल हैं। मैंने प्रकाश जी से कहा- देखो सर, बादल भी बिल्कुल ऐसे लग रहे हैं जैसे आकाशगंगा हों। वे बोले कि यह आकाशगंगा ही तो है। मेरा मुंह खुला रह गया। पूरी धरती पर कुछ गिनी-चुनी जगहें ही हैं जहां से नंगी आंखों से आकाशगंगा दिखाई देती है। नहीं तो बडी बडी दूरबीनें लगाई जाती हैं, मौसम साफ होने का इंतजार किया जाता है, तब कहीं जाकर दिखाई देती है यह। और मैं इस ‘कीमती’ चीज को बादल समझे बैठा था। बस फिर क्या था! तुरन्त ट्राइपॉड लगाया और फोटो ले लिये।

   विधान ने प्रकाश जी का ट्राइपॉड लिया, अपना कैमरा उस पर सैट किया और फोटो लेने की कोशिश करने लगा। फोटो लेने से पहले स्क्रीन पर कुछ भी नहीं दिख रहा था इसलिये अन्दाजे से ही लेंस इच्छित दिशा में करना पडता था। फोटो आ जाता तो बाद में समायोजित करते। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। यही विधान के साथ भी हुआ लेकिन जब उसने शटर दबाया तो स्क्रीन बडी देर तक काली ही रही। अन्धेरी रात में मैन्यूअल मोड में ऐसा होना कोई अनोखा नहीं है। हमने शटर स्पीड, अपर्चर, ये, वो बदले लेकिन फिर से काला फोटो। बडा दिमाग लगाया लेकिन कुछ नहीं हुआ। जिस सेटिंग पर मेरे कैमरे में अच्छे फोटो आ रहे थे, वो सेटिंग विधान ने भी लगाईं लेकिन फिर से वही बात। हम दोनों माथा पकडकर बैठ गये कि बात क्या है। आखिरकार दोष निकाला प्रकाश जी के ट्राइपॉड का- जो चीज अपनी नहीं है, उसी में कमी है। हमारी चीज में तो कोई कमी हो ही नहीं सकती।। ट्राइपॉड बदला। अब मेरे ट्राइपॉड पर विधान ने कैमरा लगाया। लेकिन वही काला फोटो। कम से कम आधे पौने घण्टे तक लगे रहे। आखिरकार विधान ने यह सब बन्द करने का निर्णय लिया। कब तक ठण्ड में मरें!
जब विधान कैमरा ट्राइपॉड से हटा रहा था तो वो चीखा- ओये चौधरी, साला हमने लेंस कैप तो हटाई ही नहीं थी।

फुकताल गोम्पा



सारप नदी




फोटो के केन्द्र में गेस्ट हाउस दिख रहा है जहां प्रकाश जी बैठे हैं।

गोम्पा के अन्दर

गोम्पा के अनोखे रास्ते




मुख्य मन्दिर गुफा में बना है।



नीचे स्कूल-मैदान में बच्चों द्वारा बनाया गया भारत का नक्शा




‘आंख’ वाले




पुल पार करना है और पुरने की तरफ बढना है।


निर्माणाधीन सडक






याक



पुरने गांव



आकाशगंगा नंगी आंखों से दिख रही थी।


रात के अन्धेरे में लिया गया एक और फोटो


फुकताल गोम्पा की स्थिति। नक्शे को छोटा व बडा करके भी देखा जा सकता है।


अगले भाग में जारी...





पदुम दारचा ट्रेक
1. जांस्कर यात्रा- दिल्ली से कारगिल
2. खूबसूरत सूरू घाटी
3. जांस्कर यात्रा- रांगडुम से अनमो
4. पदुम दारचा ट्रेक- अनमो से चा
5. फुकताल गोम्पा की ओर
6. अदभुत फुकताल गोम्पा
7. पदुम दारचा ट्रेक- पुरने से तेंगजे
8. पदुम दारचा ट्रेक- तेंगजे से करग्याक और गोम्बोरंजन
9. गोम्बोरंजन से शिंगो-ला पार
10. शिंगो-ला से दिल्ली वापस
11. जांस्कर यात्रा का कुल खर्च

32 comments:

  1. भाई नीरज जी फुकताल गोम्पा की सैर करा ही दी आपने,बढिया है...
    पहाडो पर रात को इतने तारे व आकाशगंगा देखकर किसी ओर दुनियां मे होने का आभास सा होता होगा...

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    1. बिल्कुल सचिन भाई...

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  2. Vah neeraj bhai photography Bahut aachchi he . ghumte raho .
    Umesh joshi . D.

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  3. जब विधान कैमरा ट्राइपॉड से हटा रहा था तो वो चीखा- ओये चौधरी, साला हमने लेंस कैप तो हटाई ही नहीं थी

    JAI HO......................

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  4. अच्छी पोस्ट +अच्छे फोटो जो कि पोस्ट करना नीरज का जन्मदिन अधिकार है।

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    1. धन्यवाद सचिन भाई...

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  5. Photo achchi aai hai..colors bahut khul ke aaye hai..ekdum natural jaan parte hai..isme camera ka kammal to hota hi hai mager half credit to photo kichne wale ko bh jata hai..kisis kisi photo mai aisa lagta hai jaise kouch editing bhi ki gai hai..jaise wo yak wali pic..mager overall pic achchi aai hai..words ka bhi achcha prayog kiya..verall 7.5 out of 10..

    Aashish Gutgutia

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    1. आशीष जी, आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि उस याक वाली को छोडकर सभी में एडिटिंग की गई है। याक वाली में कोई एडिटिंग नहीं हुई है। फिर भी धूप के कारण ऐसा ही लग रहा है कि जबरदस्त एडिटिंग हुई है।
      धन्यवाद आपका।

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  6. एक बेहतरीन यात्रा पोस्ट ,

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    1. धन्यवाद रस्तोगी साहब...

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  7. नीरज भाई मे विधान भाई के ब्लॉग पर इस पोस्ट को पढ़ चुका हु। फोटो विधान भाई के भी बहुत अच्छे है लेकिन पता नही क्यों वो यात्रा विवरण लिखने मे कंजूसी करते है ,आपकी पोस्ट का इसी कंजूसी की वजह से इंतजार था। अदभुद फुकताल गोम्पा की ग़ज़ब यात्रा और बेहतरीन फोटो।
    लगता है आपने अमेजन का एफिलिएशन ज्वाइन कर लिया है। अच्छा है। लगे रहो ..................................

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    1. हां जी, अमेजन के साथ साथ फ्लिपकार्ट का भी एफिलियेशन ज्वाइन कर लिया है। अब मैं आपको अमेजन और फ्लिपकार्ट के सामान बेचता भी नजर आया करूंगा। धन्यवाद आपका...

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  8. DALAI LAMA ki photo hamesha aage hi lagi hoti hai kynki bo sadhak hai aur sadhak hamesha aage rhta hai

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    1. आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

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  9. Replies
    1. bhoot???? ये भूत क्या होता है???

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  10. Neeraj Bhai, Which font do you use to write in Hindi alphabate............ kindly write it. Thank you.

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    1. मैं यूनीकोड में लिखता हूं। कभी फॉंण्ट पर ध्यान नहीं दिया लेकिन चलिये, देखता हूं। अभी बताता हूं।

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    2. फॉण्ट का पता नहीं चल रहा। By default लिखा आ रहा है।

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  11. खतरनाक यात्रा का जानदार फोटो ।

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  12. Neeraj bhai, hamesa ki tarah Saandar post, lazbab photo.

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    1. धन्यवाद गुप्ता जी...

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  14. Zanskar mai aapne white water rafting kyo nahi ki..suna hai bahut thrilling hai 12000 feet pe rafting karna...himalaya ke bich mai..

    Ashish gutgutia

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    1. सर जी, राफ्टिंग तो मैंने ऋषिकेश में नहीं की, मनाली में नहीं की, फिर जांस्कर में क्यों करेंगे? दूसरी बात कि जांस्कर में जहां राफ्टिंग होती है, हम वहां से सैंकडों किलोमीटर दूर थे। राफ्टिंग निम्मू के पास होती है जहां जांस्कर नदी समाप्त हो जाती है जबकि हमारी यात्रा शुरू हुई थी उस स्थान से जहां से यह नदी ग्लेशियर से निकलकर शुरू होती है।

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    2. यह ठीक वही बात हुई कि मैं दिल्ली से गाजियाबाद जाऊं और आप कहें कि यूपी गये और बनारस नहीं गये?

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  15. Aapke sath yatra me bhut aanand aa rha h. Dhanyavad :-)

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  16. बहुत खूबसूरत तस्वीरें ---ये लाल रंग का फल कौन सा है

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