Monday, December 22, 2014

खूबसूरत सूरू घाटी

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
कल ही पता चल गया था कि पदुम तक कोई बस नहीं जाती बल्कि सुबह सुबह सूमो चलती हैं। कारगिल से पदुम की दूरी लगभग ढाई सौ किलोमीटर है और शेयर्ड सूमो में प्रति यात्री डेढ हजार रुपये किराया लगता है। हमारे पास भी अब डेढ हजार देकर सूमो में जाने के अलावा कोई चारा नहीं था लेकिन सुबह सोते रह गये और जितनी गाडियां पदुम जानी थीं, सभी जा चुकी थीं।
विधान और प्रकाश जी सूमो स्टैण्ट की तरफ चले गये और मैं कमरे पर ही रुका रहा। इस दौरान मैं नहा भी लिया। कारगिल में बिल्कुल भी सर्दी नहीं थी, रात हम पंखा चलाकर सोये थे। जब दोनों आये तो बताया कि अब हमें टैक्सी ही करनी पडेगी जो नौ हजार की पडेगी। इसका अर्थ था तीन-तीन हजार प्रति व्यक्ति। विधान ने सबसे पहले विरोध किया। उसे अभी भी यकीन नहीं था कि अब कोई भी शेयर्ड गाडी नहीं मिलेगी। खैर, बाहर निकले। पता चला कि शाम चार बजे के आसपास एक बस परकाचिक तक जायेगी। मैंने तुरन्त नक्शा खोलकर देखा। परकाचिक तो आधी दूरी पर भी नहीं है। उसके बाद? परकाचिक तक पहुंचते पहुंचते रात हो जायेगी। बहुत ही छोटा सा गांव होगा दो-चार घरों का। पता नहीं कोई रुकने का ठिकाना मिलेगा या नहीं। हालांकि हमारे पास रुकने का पूरा इंतजाम था। खाना कारगिल से लेकर चलेंगे। लेकिन परकाचिक से आगे कैसे जायेंगे? कोई ट्रक मिल जायेगा। लेकिन रात को ट्रक का क्या काम? ट्रक अगर कोई जायेगा भी तो दिन में जायेगा। इस रास्ते पर राज्य परिवहन की बसें नहीं चलतीं। इसका अर्थ है कि रास्ता बडे वाहनों के लिये नहीं है। फिर ट्रक भी नहीं मिलेगा। कल सुबह वही सूमो मिलेंगी जो कारगिल से जायेंगी। तो फिर परकाचिक क्यों जायें? सुबह यहां कारगिल से ही उन्हीं सूमो को पकड लें। लेकिन ऐसा करने से हम फिर एक दिन लेट हो रहे थे।

आज यहां प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी आने वाले थे। अभी वे लेह में थे, दोपहर तक यहां आयेंगे। उनका भाषण स्थल उसी जांस्कर रोड पर था जिससे हमें जाना था। इस वजह से वह सडक बिल्कुल बन्द थी। यानी हमें प्रधानमन्त्री के आने और उनके चले जाने तक प्रतीक्षा करनी पडेगी। सडकों पर बस कमल के फूल की झण्डियां लगी थीं।
विधान ने बताया कि हमने जिस टैक्सी वाले से बात की थी, वो जांस्कर का ही रहने वाला है। जाहिर है उसे वापस भी लौटना होगा, इसलिये वह हमें सस्ते में ले जायेगा। लेकिन जब उसके पास पहुंचे तो पता चल गया कि वह कारगिल का ही रहने वाला था। उसे जांस्कर नहीं जाना था। अगर हम उसकी गाडी को किराये पर लेंगे तो वह हमें ले जायेगा। लेकिन वह नौ हजार रुपये ही लेगा। एक भी कम नहीं। मैंने उससे कहा भी कि हम परकाचिक वाली बस में परकाचिक तक चले जायेंगे। वह तुरन्त बोला- उसके बाद? उसके बाद जो होगा देखा जायेगा। बोला कि कुछ भी नहीं होगा और कुछ भी नहीं देखा जायेगा। परकाचिक में किसी भी सूमो में जगह नहीं मिलेगी और आपको कल कारगिल लौटना लडेगा। उसका चेहरा देखकर लग रहा था कि वह सच बोल रहा है।
मैं और प्रकाश जी पैसे खर्च करने के पक्षधर थे जबकि विधान चाहता था कि थोडी बहुत भागदौड और कर लें। क्या पता कहीं सस्ते में बात बन जाये। फिर भी मैंने कह दिया कि मैं भागदौड नहीं करूंगा, यहीं बैठा हूं। आप घूम आओ। काम हो जाये तो फोन कर देना। और आप दोनों जो भी जैसा भी निर्णय लेंगे, मुझे मंजूर होगा। वास्तव में मैं पन्द्रह किलो का बैग उठाकर उस झुलसाने वाली धूप में बिल्कुल नहीं घूमना चाहता था।
दोनों ने कोशिशें कीं लेकिन बात नहीं बनी। दोपहर हो चुकी थी और हम कारगिल में ही थे। हमें कभी का यहां से निकल जाना चाहिये था। वैसे ही हमारे पास समय बहुत कम है। नतीजा- तीनों को झुंझलाहट होने लगी। तीनों समझदार थे, इसलिये झगडा नहीं हुआ। लेकिन विधान पूरा झुंझलाहट से भरा था और मैं उससे भी ज्यादा। उस समय मेरी झुंझलाहट चरम पर पहुंच गई जब विधान ने पूछा- अब क्या करें? मैंने फिर दोहरा दिया- दो घण्टे हो गये हमें होटल छोडे हुए और आप कुछ भी निर्णय नहीं ले रहे हैं। विधान भाई, निर्णय लो। अगर आप चाहते हो कि सुबह वाली गाडी से जायेंगे तो होटल चलो। मुझे यहां धूप और धूल में बैठना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा।
फिर पन्द्रह बीस मिनट तक एक मौन छा गया। चुप्पी प्रकाश जी ने तोडी- नीरज, तुम्हारा क्या फैसला है? मेरे मुंह से अचानक निकला- टैक्सी। और मानों दोनों इसी जवाब की प्रतीक्षा कर रहे हों। पांच मिनट के अन्दर हम टैक्सी में थे। सामान ऊपर छत पर बंध चुका था। सारी झुंझलाहट मिट चुकी थी।

कारगिल से प्रस्थान
कारगिल से पदुम ढाई सौ किलोमीटर दूर है और सडक बेहद खराब। ड्राइवर ने बताया कि बारह घण्टे लगेंगे। यानी इसका अर्थ है कि हम रात दो तीन बजे पहुंचेंगे। आगे समुद्र तल से ऊंचाई भी ज्यादा है, इसलिये सर्दी लगेगी। सामान ऊपर बांध दिया था। हमने नीचे ही रखने को कहा ताकि दिन ढलने पर गर्म कपडे पहन सकें। लेकिन ड्राइवर ने सांकू तक के लिये दो व आगे परकाचिक की एक सवारी और बैठा ली। कह दिया कि सांकू में सामान नीचे उतार दूंगा। नौ हजार देने पर अगर स्थानीय सवारियां और आ बैठें तो जलन होनी स्वाभाविक ही थी लेकिन हमारे मना कर देने पर उन बेचारों को अपने गांव जाने के लिये किसी गाडी की प्रतीक्षा में कारगिल में रात भर के लिये रुकना पडता।
प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी अभी भी कारगिल नहीं आये थे। मैंने दिल्ली मनदीप को फोन करके पूछा ताकि वो टीवी में देखकर बता सके कि मोदी अभी लेह में भाषण दे रहे हैं या कारगिल के लिये प्रस्थान कर चुके हैं। इस तरह हम लगातार मोदी की एक-एक गतिविधि पर निगाह रखे हुए थे। जब मोदी यहां से चले जायेंगे, तभी जांस्कर वाली सडक खुलेगी।
खैर, प्रधानमन्त्री आये। भाषण दिया और चले गये। उसके बाद जो सडकों पर भीड उमडी, वो आधे घण्टे तक अनवरत चलती ही रही, लेकिन उसमें कोई कमी नहीं आई। दो बजे मौका देखकर ड्राइवर ने गाडी आगे बढा दी। जरा ही देर में हमें भाषण स्थल दिखाई दिया जहां अब कोई आदमजात नहीं दिख रही थी। खाली कुर्सियां ही रखी हुई थीं। आगे बढे तो एक पुलिसवाला गाडी में आ बैठा। उसे पांच किलोमीटर आगे अपने गांव जाना था। वह अपनी दुर्दशा सुनाये जा रहा था कि सुबह से भूखे प्यासे यहां बैठे हैं, अब जाकर सुकून मिला।
तीन बजे चालीस किलोमीटर दूर सांकू गांव पहुंच गये। सांकू तक अच्छी सडक बनी है। यहां कुछ ढाबे हैं, जहां खाना मिल जाता है। विधान शुद्ध शाकाहारी है जबकि मैं और प्रकाश जी अण्डाहारी। तीनों ने अपनी अपनी पसन्द का खाना खाया। रोटी तो लद्दाख में ऐसी मिलती है कि एक बार बनने के बाद आप उसे दस दिनों बाद भी खा सकते हो। इसी तरह की मोटी और कडी रोटी आमलेट-चाय के साथ खानी पडी।
सूरू घाटी एक बेहद खूबसूरत घाटी है। दूर दिखते बर्फीले पहाड और बीच में बहती सूरू नदी। नदी के ही किनारे किनारे सडक है। रास्ते में थोडी थोडी दूरी पर गांव मिलते रहते हैं। नदी का पाट यहां काफी चौडा है। हम रास्ते में बार बार गाडी रुकवा देते थे। यहां तक कि विधान भी बार-बार कह उठता था- पैसे वसूल हो गये।
सांकू से करीब 35 किलोमीटर दूर पनिखार गांव है। यह गांव नदी के उस तरफ बसा हुआ था। समय कम था, नहीं तो गाडी रुकवाकर आधे पौने घण्टे यहीं सडक पर बैठे बैठे फोटो खींचते तो वे हमारी जिन्दगी के बेहद बेहतरीन फोटो होते। सांकू में भी ठहरने का इंतजाम है और पनिखार में भी व आगे के गांवों में भी। पनिखार से कई ट्रैकिंग रूट जाते हैं। इनमें सबसे प्रसिद्ध किश्तवाड ट्रैक है। यहां से बस एक दर्रा पार करना होता है और आप किश्तवाड पहुंच सकते हो। एक दर्रा पार करना होता है और आप द्रास पहुंच सकते हो और दो दर्रे पार करके पहलगाम पहुंच सकते हो।
साढे पांच बजे परकाचिक पहुंचे। यहां भी एक चाय की दुकान पर गाडी रोक दी। ड्राइवर कुछ दूर नमाज पढने चला गया और हम चाय पीने लगे। नदी के उस तरफ एक बडा ग्लेशियर भी है जिसे परकाचिक ग्लेशियर कहते हैं। अब तक सूरज जी महाराज पश्चिम में स्थापित हो चुके थे और ऊंचे नंगे वीरान पहाडों के पार जाकर डूबने का उपक्रम करने लगे थे। परकाचिक को सूरू घाटी का आखिरी इस्लामी गांव भी कह सकते हैं। अब बौद्ध गांव मिलेंगे।
सडक तो सांकू के बाद ही खराब होने लगी थी। पनिखार के बाद तो जैसे गायब ही हो गई। लग रहा था कि गाडी वालों ने चार पैसे कमाने के लिये जबरदस्ती पत्थरों में गाडी चलानी शुरू कर दी है। गाडियां चलने लगीं तो पगडण्डी... मतलब पहियाडण्डी बन गई और उसी लीक पर सभी गाडियां चलती हैं। ऐसे में गाडी के एक-एक बोल्ट व वेल्डिंग की परीक्षा तो होती ही है, साथ ही आपके शरीर के जोडों, हड्डियों व मांसपेशियों की भी परीक्षा हो जाती है।
लेकिन इन सबके बावजूद प्राकृतिक सुन्दरता में कोई कमी नहीं आती। ऊपर घूमते बादल और उनसे आती धूप-छांव सूरू घाटी की हरी कालीन पर सम्मोहक दृश्य उत्पन्न करती है। बार बार गाडी रुकवानी पडती थी। किसी को न अपने चेहरे के फोटो लेने की सुध थी, न दूसरे के चेहरे के। बस सभी चाहते थे कि इस सम्मोहक सुन्दरता को अपने अपने कैमरे में दूसरे से ज्यादा भर लें। और सभी सफल भी रहे।
वास्तव में नौ हजार रुपये वसूल हो गये।
तभी अचानक बडी सी खुली जगह पर बीचोंबीच एक माने दिखाई पडा जिसने ऐलान कर दिया कि अब बौद्ध धरती शुरू हो गई है। गौरतलब है कि कारगिल जिला भी लद्दाख में आता है। लेकिन कारगिल जिले में ज्यादातर मुस्लिम हैं। केवल जांस्कर घाटी व थोडे बहुत उधर मुलबेक की तरफ ही बौद्ध हैं। अभी हमने जांस्कर घाटी में प्रवेश नहीं किया था। मुझे लग रहा था कि पूरी सूरू घाटी मुस्लिम है लेकिन ऐसा नहीं है। ऊपरी सूरू घाटी के सभी गांव बौद्ध हैं।
नून कून के बिना सूरू का वर्णन अधूरा है। असल में ये दो चोटियां हैं जो सात हजार मीटर से भी ज्यादा ऊंची हैं। सांकू के बाद ये दिखनी शुरू हो जाती हैं और फिर दिखती ही रहती हैं।
आठ बजे रांगडुम पहुंचे। यहां एक रेस्ट हाउस है जहां गाडी रोक दी। ड्राइवर ने बताया कि आज यहीं रुकेंगे और सुबह सवेरे चार बजे यहां से प्रस्थान कर जायेंगे। हमारी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा क्योंकि अभी तक हम मानकर चल रहे थे कि रात दो तीन बजे पदुम पहुंचेंगे और पूरी रात हमें इसी गाडी में बितानी पडेगी। सारा सामान गाडी से निकालकर कमरे में रख दिया और यहीं कैण्टीन में खाने को बोल दिया। ड्राइवर कैण्टीन में ही सो जायेगा जहां उसका कोई पैसा नहीं लगेगा। असल में हमें ड्राइवर पर एक भी पैसा खर्च नहीं करना था। यहां तक कि रास्ते भर चाय और खाने पर भी नहीं। वो कारगिल का है तो जाहिर है कि मीट के बिना नहीं रह सकता। हमारे साथ खाता तो बेचारे को ‘घास’ ही खानी पडती।
रांगडुम में हमारे अलावा कुछ विदेशी भी थे। यह समुद्र तल से 4000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इस ऊंचाई पर अच्छी खासी सर्दी होती है। लेकिन अभी साढे आठ बजे उतनी सर्दी महसूस नहीं हो रही थी। दिन में तेज धूप पडने के कारण काफी गर्मी होती है। शाम को जब दिन ढल जाता है तो चट्टानों से विकिरण निकलता है जिससे काफी देर तक वातावरण में गर्मी बनी रहती है। बाद में तापमान कम होता चला जाता है। फिर भी हमने गर्म कपडे पहन रखे थे और मंकी कैप भी लगा रखी थी।
ऊपर पूरा चांद निकला था। लग रहा था कि आज पूर्णिमा है। आज नहीं है तो आजकल में होगी। मेरे व प्रकाश जी के पास ट्राइपॉड था। मैं तो निकाल लाया लेकिन प्रकाश जी नहीं लाये। विधान ने मुझसे मांगा तो मैंने मना कर दिया। मैं स्वयं लम्बे एक्सपोजर के फोटो खींचने में लगा था। ऐसे फोटो के लिये ट्राइपॉड जरूरी होता है। फिर इन फोटो में कैमरे की बैटरी भी जल्दी खत्म हो जाती है लेकिन हमें उसकी कोई चिन्ता नहीं थी। रांगडम में बिजली की सुविधा है।
विधान ने एक कार की छत पर कैमरा रखकर काम चला लिया। कुछ देर बाद मैं रेस्ट हाउस की चहारदीवारी से बाहर निकला और सडक किनारे आ गया। दूर तक फैली ऊपरी सूरू घाटी बडी मनमोहक दिख रही थी। ट्राइपॉड पर कैमरा लगाया और लम्बे एक्सपोजर में घाटी के फोटो लेने शुरू कर दिये। जब देखा कि चांद के फोटो से कई गुना बेहतर ये फोटो हैं तो विधान को आवाज लगाई। अब तक सर्दी काफी बढ चुकी थी। जोर देने पर विधान कम्बल ओढे कांपता हुआ बाहर आया। मैंने उसे कुछ फोटो दिखाये तो वह उत्साहित हो गया और फिर उसने भी ट्राइपॉड से कुछ ऐसे ही फोटो खींचे। जी कर रहा था कि पूरी रात बाहर सडक पर व और आगे जाकर फोटो खींचने में ही निकाल दूं। लेकिन लौटना तो था ही।

सांकू में







खूबसूरत सूरू घाटी




अगस्त का महीना और यहां गेहूं अभी तक पका भी नहीं।

पनिखार गांव

पनिखार गांव


परकाचिक में मस्जिद


परकाचिक ग्लेशियर

परकाचिक में चाय (फोटो क्रेडिट: प्रकाश जी)

(फोटो क्रेडिट: प्रकाश जी)

परकाचिक में चाय की दुकान

इस मार्ग पर ग्लेशियरों की भरमार है।








माने अर्थात बौद्ध धरती आरम्भ





आगे के सभी फोटो 30 सेकण्ड की शटर स्पीड पर लिये गये हैं। सभी फोटो रात के हैं।







इस नक्शे को जूम-इन व जूम-आउट भी किया जा सकता है।


अगले भाग में जारी...




पदुम दारचा ट्रेक
1. जांस्कर यात्रा- दिल्ली से कारगिल
2. खूबसूरत सूरू घाटी
3. जांस्कर यात्रा- रांगडुम से अनमो
4. पदुम दारचा ट्रेक- अनमो से चा
5. फुकताल गोम्पा की ओर
6. अदभुत फुकताल गोम्पा
7. पदुम दारचा ट्रेक- पुरने से तेंगजे
8. पदुम दारचा ट्रेक- तेंगजे से करग्याक और गोम्बोरंजन
9. गोम्बोरंजन से शिंगो-ला पार
10. शिंगो-ला से दिल्ली वापस
11. जांस्कर यात्रा का कुल खर्च

29 comments:

  1. लाज़वाब फोटो...!
    लगता है यात्रा ख़त्म होते होते विधान का बज़ट पूरी तरह गड़बड़ा जायेगा..!

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    1. हां, गडबडा तो जायेगा लेकिन उतना नहीं।

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  2. खुबसूरत फोटो, यात्रा का ट्रेलर शानदार है पूरी यात्रा जानदार होगी. अगले पोस्ट का बेसब्री से इंतजार रहेगा.

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    1. धन्यवाद चन्द्रेश भाई...

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  3. are neerajji hame to ghar baithe swarg ke darhan kara rahe ho..din ke khinche photo to varanan se pare hai .aur raat ke photo
    to kisi pari katha ke drishya lag rahe hai..... ek shabad me kahe to laajawaab.

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  4. भाई मानना पड़ेगा तूने सारे पैसे वसूल कर लिए ..........लेकिन एक बात मेरी समझ में नहीं आई और सब फोटो तो तेरी अच्छी होती हैं , लेकिन जब मेरी फोटो खींचता है तो वो गड़बड़ क्यों ?

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    1. आपकी फोटो?? कौन सी?? अच्छा वो... हा हा हा

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  5. रोमांचक यात्रा विवरण....और शानदार फोटोओ का संगम ......

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    1. धन्यवाद गुप्ता जी...

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  6. बेहतरीन फोटो रात के फोटोज लाजवाब हैं , आज ये फोटोज देख कर लगा कि क्यों कश्मीर को पृथ्वी का स्वर्ग कहा जाता है | आपके साथ साथ हम भी घूम लिए वो भी इस ठण्ड में घर बैठे, राजाइ ओढ़ कर | धन्यवाद नीरज जी इतने अच्छी यात्रा करने के लिये |

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    1. धन्यवाद मनीष जी। वैसे ये फोटो कश्मीर के नहीं हैं। यह इलाका लद्दाख में आता है।

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  7. नीरज भाई , मनमोहक यात्रा ,और मदहोश कर देने वाले फोटो। आपके फोटो ने प्रकृति की सुंदरता मे चारचाँद लगा दिए है। आखिर आप ने भी विज्ञापन अपने ब्लॉग पर लगा ही दिए -अच्छा है इससे आपकी घुमक्कडी का कुछ खर्च तो निकलेगा ही।

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    1. धन्यवाद विनय जी। अब जब गूगल हिन्दी ब्लॉग के लिये विज्ञापन सुविधा देने ही लगा है तो क्यों न प्रयोग करें?

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  8. रात के खिचें गए फोटो बहुत ही जींवत व शानदार आए है,लगता है जैसे काली रात में कोई स्त्री लाल परीधान पहने घुम रही हो,बहुत ही शानदार चित्र आपने लिए है,आपने कहां की रात की यह सुन्दरता को देखकर आपका मन वापिस कमरे में जाने को नही कर रहा था,वाकई कौन होगा जो ऐसे जगह को छोडकर जाना चाऐगा.
    नीरज जी बढिया लगे रहो भाई...

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    1. से काली रात में कोई स्त्री लाल परीधान पहने घुम रही हो... वाह वाह भाई, गजब अलंकार मारा है।

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  9. नीरज जी राम राम, बहुत सुन्दर फोटो, आपका कैमरा तो कमाल कर रहा हैं, वन्देमातरम

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    1. धन्यवाद गुप्ता जी...

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  10. Sundar varnan karke game bhi ghati me ghumane ka sukriya neeraji

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  11. Sundar varnan karke game bhi ghati me ghumane ka sukriya neeraji

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  12. बहुत सुन्दर चित्र ---रात भी इतनी नशीली हो सकती है पता नहीं था

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  13. रोमांचक यात्रा और खुबसूरत छायांकन खासकर रात के समय लिए चित्र चकित करते हैं . और हाँ .. उधर गेहूं अगस्त में पकते हैं यह जानकर भी विस्मय हुआ .

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  14. बहुत सुन्दर यात्रा जिस तरह आप घटनाओ का वरणन करते चलते हो लगता है जैसे हम ही इन पहाड़ो की खूबसूरत vadiyon में घूम रहे हो और उपरोक्त घटना हमारे साथ ही घट रही हो। अलंकृत भाषा शैली में कहूँ तो यात्रा का जीवंत चित्रण कर देते हो। सभी फ़ोटो बेमिसाल है रात में लिए गए फ़ोटो तो अद्भुत है

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  15. बहुत sundar... शब्द नहीं है.......

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  16. एक कहावत है की भगवान ने ज्ञान बाटना भारत के नीचे से अर्थात साउथ से शुरू किया था और उत्तर मे जाते जाते यह ज्ञान खत्म हो गया जब की सुंदरता बाटने की शुरुआत उत्तर भारत से किए और साउथ मे आते आते यह सुंदरता खत्म हो गया । यह कहावत आप की यात्रा और फोटो से पता चलता है।

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  17. इस मार्ग पर ग्लेशियरों की भरमार है।
    कितने ग्लेशियरों है यहाँ ????

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