Monday, October 14, 2013

एक लाख किलोमीटर की रेल यात्रा

जब गोवा से लौट रहा था तो 15 अगस्त 2013 की सुबह ठीक साढे चार बजे पुणे से बीस किलोमीटर आगे निकलते ही मेरी रेल यात्राओं के एक लाख किलोमीटर पूरे हो गये। उस समय मैं गहरी नींद सो रहा था। अहमदनगर के पास जब आंख खुली तो इस बात की अनुभूति होना स्वाभाविक ही था क्योंकि इस बात की जानकारी मुझे थी जब रात सोया था। बधाई देने वालों में पहला व्यक्ति कमल था।
8 अप्रैल 2005 को पहली बार ट्रेन में बैठा था। एक लाख किलोमीटर यात्रा करने में 8 साल 4 महीने और 7 दिन लगे। वैसे अभी तक 604 बार 327 ट्रेनों में यात्रा की। 322 बार 29544 किलोमीटर पैसेंजर में, 208 बार 36596 किलोमीटर मेल एक्सप्रेस ट्रेनों में और 74 बार 35495 बार सुपरफास्ट ट्रेनों में सफर कर चुका हूं। जहां तक दर्जे की बात है तो 526 बार 50034 किलोमीटर साधारण दर्जे में, 72 बार 49218 किलोमीटर शयनयान में, 3 बार 1327 किलोमीटर सेकण्ड सीटिंग में, 2 बार 752 किलोमीटर थर्ड एसी में और 1 बार 303 किलोमीटर एसी चेयरकार में यात्रा की।
ये हुई आंकडों की बात। आंकडों को यहां क्लिक करके भी देखा जा सकता है।
नियमित रेलयात्री जानते हैं कि हमेशा नियम कायदों में रहकर रेलयात्रा नहीं की जा सकती। कभी टिकट न लेने की मजबूरी बन जाती है, कभी गलत टिकट पर यात्रा करने की मजबूरी तो कभी गलत ट्रेन में चढने की मजबूरी। मुझे भी कई बार बेटिकट यात्रा करनी पडी। कई बार जनरल का टिकट लेकर शयनयान में जाना पडा। लेकिन फिर भी पूरी कोशिश रहती है कि सही टिकट पर ही यात्रा करूं।
अगर कभी रात का सफर करना पडे तो मैं आरक्षण कराना पसन्द करता हूं। आरक्षण ऑनलाइन ही कर लेता हूं अपने एटीएम कार्ड का प्रयोग करके। लेकिन अगर कभी एक भी वेटिंग सूची होती है, तो आरक्षण से बचता हूं। मुझे कभी भी जरूरी काम से बाहर नहीं जाना पडा, हमेशा घुमक्कडी के सिलसिले में ही जाना होता है तो अगर इस रूट पर आरक्षण नहीं मिल रहा है तो किसी दूसरे रूट पर ही सही। कुछ मित्रों को आश्चर्य होता है कि मैं कैसे हमेशा कन्फर्म बर्थ हासिल कर लेता हूं। इसकी यही वजह है। मई जून और होली दीवाली का समय आरक्षण के लिहाज से सबसे मुश्किल समय होता है, उस दौरान मैं रेल यात्रा नहीं करता। मानसून रेलयात्रा करने के लिये सर्वोत्तम है। हमेशा भीड वाले बिहार रूट पर भी एक दिन पहले भी कन्फर्म बर्थ मिल जाती है।
कुछ मित्र सोचते हैं कि मुझे रेलवे की तरफ से कुछ छूट आदि मिलती है। ऐसा नहीं है। मैं दिल्ली मेट्रो में कार्यरत हूं। दिल्ली मेट्रो और भारतीय रेलवे का कोई मेलजोल नहीं है। मुझे भारतीय रेल में यात्रा करने के लिये हमेशा अपनी जेब से खर्च करना होता है, चाहे वो टिकट लेने का मामला हो, खाने पीने का मामला हो या स्टेशन के आरामघर में रुकने का मामला हो। यानी हमेशा आम यात्री की तरह।
तीन साल पहले जब पचास हजार किलोमीटर पूरे किये थे, तो कई मित्रों ने कहा था कि यह गिनीज बुक रिकार्ड हो गया आदि आदि। निश्चित तौर पर ऐसी टिप्पणियां आपके कम सामान्य ज्ञान को दर्शाती हैं। मुझे मालूम तो नहीं है लेकिन जो भी गिनीज रिकार्ड है, वो दस लाख किलोमीटर से ज्यादा ही है। एक लाख किलोमीटर को इसमें शामिल करने की बात बेतुकी है। एक लाख किलोमीटर गिनीज तो दूर, लिमका रिकार्ड लायक भी नहीं है।
पहले मेरे पास सभी यात्राओं के टिकट सुरक्षित थे लेकिन डेढ साल पहले कमरा बदलते समय वह संग्रह कहीं खो गया। इस वजह से टिकट संग्रह का उत्साह कम पड गया, फिर भी टिकट को संभाल कर रख ही लेता हूं।
अब तक की गई रेल यात्राओं का नक्शा देखने के लिये यहां क्लिक करें
अब याद करते हैं इस दौरान की गई कुछ यात्राओं को जिनका अभी तक कभी भी उल्लेख नहीं किया:
2 अक्टूबर 2007, मैं नोयडा में एक प्राइवेट कम्पनी में काम करता था। रविवार की छुट्टी रहती थी। पैसेंजर में नये नये रूटों पर घूमना तो अच्छा लगता ही था। तय किया कि शाहदरा शामली लाइन देखी जाये सहारनपुर तक। उस समय तक मेरा पाला इण्टरनेट जैसी चीजों से नहीं पडा था। मुझे पता भी नहीं था कि नेट पर पैसेंजर ट्रेनों की समय सारणी कैसे देखी जाये। तो एक महीने पहले शाहदरा गया था तो वहां की समय सारणी एक कागज पर नोट करके ले आया था। उसी से पता चला था कि शाहदरा से शामली वाली लाइन पर कितने कितने बजे गाडियां हैं।
शाहदरा से दोपहर बाद वाली पैसेंजर पकडी और निकल चला। भीड तो थी लेकिन बागपत रोड तक गाडी खाली हो गई। बडौत, कांधला, शामली के बाद रामपुर मनिहारन पार करते करते दिन भी छिप गया। ट्रेन टपरी पहुंची, उसके बाद सहारनपुर। सहारनपुर स्टेशन तब तक मेरा परिचित हो चुका था। कई बार हरिद्वार आना जाना हुआ था उससे पहले।
अगले दिन दोपहर दो बजे से ड्यूटी थी। पर्याप्त समय था हाथ में। सोचा कि अम्बाला चलता हूं, वहां से पानीपत वाली लाइन पर पैसेंजर से यात्रा करूंगा। बारह बजे तक भी दिल्ली पहुंच गया तो दो बजे तक आराम से नोएडा पहुंच जाऊंगा। जालंधर इंटरसिटी आई। बिल्कुल खाली। पहुंच गया अम्बाला छावनी। वहां समय सारणी देखी तो पानीपत रूट पर सुबह छह बजे ही एक पैसेंजर दिख गई। लेकिन इसके दिल्ली पहुंचने के समय की जानकारी नहीं थी। इतना तो पता था कि दूरी दो सौ किलोमीटर है। मेरठ से हरिद्वार भी रेल मार्ग से इतना ही है, वहां पैसेंजर आठ घण्टे लगा देती है। अर्थात यहां भी आठ घण्टे लगेंगे। दो बजे दिल्ली पहुंचूंगा, फिर ड्यूटी पहुंचने में लेट हो जाऊंगा।
छत्तीसगढ एक्सप्रेस आई। पकड ली और सुबह सुबह गाजियाबाद पहुंच गया। भीड इतनी थी कि बुरी हालत हो गई।
इसके बीस दिन बाद फिर मैं गाजियाबाद स्टेशन पर था। अबकी बार मुरादाबाद रूट देखना था। सुबह वाली पैसेंजर पकड ली। गढमुक्तेश्वर में गंगाजी को देखकर आश्चर्यचकित रह गया। मुरादाबाद पहुंचते ही सबसे पहले देखा कि अब कहां की पैसेंजर सबसे पहले जायेगी। रामनगर वाली तैयार खडी थी। रामनगर वाली पैसेंजर का प्लेटफार्म नम्बर अब तो मालूम नहीं है लेकिन यह मुख्य स्टेशन से कुछ हटकर है। पहले मीटर गेज रही होगी, तब अलग प्लेटफार्म बना दिया होगा।
अक्टूबर में मौसम सुहावना होता है। पहाड देखने की आस लगाता लगाता जब काशीपुर पहुंच गया तो निराशा हाथ लगी। काशीपुर से निकलकर पहाड दिखने लगे। रामनगर गया और इसी ट्रेन से मुरादाबाद लौट भी आया। अन्धेरा हो गया था। यहां से वापसी के लिये शाहजहांपुर पैसेंजर मिल गई। यह गाडी अब सीतापुर तक बढा दी गई है। इसमें शयनयान भी होता है, लेकिन साधारण डिब्बों में अत्यधिक भीड की वजह से शयनयान में आना पडा। यहां टीटीई ने बडा जलील किया लेकिन रात के सफर में यह सब झेलना तो पडता ही है।
19 जनवरी 2008, उस दौरान मैं बेरोजगार था लेकिन गुडगांव में रहता था। पुरानी दिल्ली की समय सारणी नोट कर रखी थी। रोहतक रूट पर जाने का फैसला किया। उन दिनों मेरा इरादा अपने ठिकाने से सुबह सवेरे निकलर दिनभर पैसेंजर में घूमकर रात तक या फिर अगली सुबह तक वापस लौटने का होता था। सुबह दिल्ली से जींद वाली पैसेंजर पकड ली। रोहतक उतर गया। जींद तक जाने की इसलिये हिम्मत नहीं हुई कि पता नहीं वापसी के लिये आज ही कोई गाडी मिले या न मिले। लेकिन जब देखा कि भिवानी पैसेंजर भी तैयार खडी है और अभी दोपहर है तो आगे जाने का लोभ हो गया। भिवानी पहुंच गया। भिवानी से रेवाडी पहुंचा हिसार-जयपुर पैसेंजर से। रेवाडी से गुडगांव पहुंचना थोडा मुश्किल था। रात इतनी हो गई थी कि आखिरी गाडी निकल चुकी थी। बस से जाना पडा।
19 मई 2008, एक इंटरव्यू के चक्कर में चण्डीगढ जाना था। रात को पुरानी दिल्ली से जम्मू स्पेशल पकड ली। आधी रात तक अम्बाला। वहां से सुबह सुबह कालका पैसेंजर से चण्डीगढ पहुंच गया। इंटरव्यू तो हुआ जैसा हुआ, मैं बस से कालका पहुंच गया। पहली बार नैरो गेज की लाइन देखी थी। दोपहर बाद का समय था, शिमला के लिये कोई ट्रेन नहीं थी। लेकिन वापसी के लिये थी- हिमालयन क्वीन। अम्बाला उतर गया। रात को वहीं सोया।
अगले दिन कुरुक्षेत्र वाली ईएमयू पकडी। कुरुक्षेत्र उतरा तो आगे दिल्ली की पैसेंजर देखने चला गया। कुरुक्षेत्र से एक लाइन नरवाना भी जाती है। दिल्ली और जींद दोनो रूटों की गाडियां तैयार खडी थीं। मैंने जींद जाने का फैसला किया। गाडी जींद तक खाली ही गई। जींद भी एक जंक्शन है जहां से एक लाइन रोहतक और एक पानीपत जाती है। दोनों रूटों की गाडियां खडी थीं। मैं टिकट लेने लगा तो रोहतक वाली गाडी चली गई, इसलिये पानीपत का टिकट ले लिया। हालांकि यह गाडी भी रोहतक जाती है, लेकिन पानीपत का चक्कर लगाकर। आज एक ही दिन में दो रूट निपटा दिये- कुरुक्षेत्र-जींद और जींद-पानीपत।
1 सितम्बर 2008 को मैं बरेली में था। पहली बार मीटर गेज की ट्रेन में यात्रा करने वाला था। तब मैं हरिद्वार में नौकरी करता था। एक दिन की छुट्टी लेकर आया था। बरेली से लालकुआ जाना था। चला भी गया। गाडी में ज्यादा भीड नहीं थी। लेकिन गाडी हिलती बहुत थी। स्पीड उम्मीद से ज्यादा थी, फिर भी बडी लाइन की गाडी से कम ही थी। लालकुआ से काशीपुर, मुरादाबाद होते हुए रुडकी पहुंच गया, वहां से बस से हरिद्वार। अब यह बरेली-लालकुआ लाइन ब्रॉड गेज हो चुकी है।
बहुत हो गया... आज के लिये इतना काफी...!
नहीं, नहीं। एक किस्सा और। जरूरी है। मजेदार भी।
अभी जब गोवा से लौट रहा था तो मेरी और कमल की बर्थ अलग अलग डिब्बों में थी। कमल अपने डिब्बे में था और मैं अपने में। पूरा कूपा खाली पडा था, आगे से चढेगा कोई। तभी बराबर वाले कूपे से मेरी ही उम्र का एक लडका आया- भाईसाहब, आपको चेस खेलना आता है? मैंने हां कह दिया। बोला कि बोर हो रहा हूं, चलो चेस खेलते हैं। बोरियत भी खत्म हो जायेगी। मेरा मन शतरंज खेलने का नहीं था, इसलिये मैंने आधे घण्टे बाद खेलने को कह दिया। तब तक ट्रेन दूधसागर के जंगलों में घुस जायेगी, मुझे मना करने का बहाना मिल जायेगा।
सांवर्डे स्टेशन से दो लडके और चढे। उनकी बर्थ मेरे वाले कूपे में ही थी। उन्हें शिरडी जाना था। हालचाल पूछा तो उन्होंने बताया- हम ड्रामेबाज हैं। हमारी एक नाटक मण्डली है जो कोंकणी में नाटक खेलती है। हमारी कमाई का साधन भी यही है।
आधे घण्टे बाद वो शतरंज वाला लडका आ गया। मैंने मना कर दिया, उसने एक ‘ड्रामेबाज’ को पकड लिया। कौन जीता, कौन हारा, मुझे नहीं मालूम।
एक गेम खेलने के बाद ड्रामेबाज ने भी मना कर दिया। हां, वो लडका बैंगलौर में डेंटिस्ट है जो किसी सेमीनार में भाग लेने गोवा आया था, अब दिल्ली जा रहा था फिर किसी सेमीनार में भाग लेने। नहीं नहीं... डेंटिस्ट नहीं, बल्कि हड्डीस्ट था। हड्डियों का डाक्टर।
हड्डीस्ट ने सुझाव दिया कि अन्त्याक्षरी खेलते हैं। ड्रामेबाजों ने इसके लिये भी मना कर दिया। फिर उसने बताया कि अन्त्याक्षरी काफी मजेदार होगी। इसमें कोई गाना नहीं गाया जायेगा बल्कि स्थानों के नाम बताये जायेंगे और उस स्थान के बारे में दो तथ्य भी बताने होंगे। यह सुनते ही मेरे कान खडे हो गये। तभी उसने एक बात और कही- मैं अकेला रहूंगा और आप तीनों एक तरफ। अगर आप जीत गये तो मैं तीनों को डिनर कराऊंगा, मैं जीत गया तो बस एक कप चाय पिला देना।
खेल शुरू हुआ। उसने अहमदाबाद से शुरूआत की। फर्राटेदार अंग्रेजी में अहमदाबाद का पूरा इतिहास भूगोल बता डाला, साथ ही अक्षांश देशान्तर भी। अब हमें ‘डी’ से कोई स्थान बताना था, तुरन्त दिल्ली बता दिया। उस पर ‘आई’ आया। उसने इटारसी बताया। चूंकि हर स्थान के बारे में दो दो तथ्य बताने भी आवश्यक थे। उसने पहला तथ्य बताया कि यह मध्य प्रदेश में है। दूसरा तथ्य बताया कि यह भारत का एकमात्र रेलवे स्टेशन है जहां पर तीनों गेज की लाइनें स्थित हैं। मैंने विरोध किया- नहीं, इटारसी जंक्शन अवश्य है लेकिन चारों दिशाओं में ब्रॉड गेज ही जाती है। इटारसी ने अपने पूरे इतिहास में ब्रॉड गेज के अलावा कोई दूसरी गेज देखी तक नहीं है। जिस तरह मैंने उसका विरोध किया, उसने मेरा किया। मैंने पूछा कि बताओ जरा कि इटारसी से नैरो गेज जाती कहां है? तुरन्त जवाब मिला- सोनीपत। मैं समझ गया कि मेरे सामने मूर्ख बैठा है। उसे गलत सिद्ध करने के लिये मेरे पास कोई सबूत नहीं था, इसलिये मैंने कहा- कल जब हम इटारसी पहुंचेंगे तो स्वयं देखना कि इटारसी में नैरो गेज और मीटर गेज की लाइनें हैं या नहीं। यहीं बात उसने मुझसे कह दी कि तुम भी देखना।
अन्त्याक्षरी आगे बढी। उसके पास जब ‘आर’ से कोई स्थान बताने का नम्बर आया तो उसने बताया- राप्तीसागर। तथ्य बताये- यह बिहार में है और यहां से राप्तीसागर एक्सप्रेस के नाम से एक ट्रेन भी चलती है। मेरी नजर में उसका सामान्य ज्ञान खत्म हो ही चुका था, इसलिये मैंने कोई विरोध नहीं किया। अब हम पर भी ‘आर’ आ गया। मैंने फटाक से कहा- राप्तीसागर। यह केरल में है और यहां से गोरखपुर के लिये राप्तीसागर एक्सप्रेस के नाम से एक ट्रेन चलती है। उसने विरोध किया। मैंने भी उसके उत्तर का विरोध किया कि राप्तीसागर नाम की कोई जगह है ही नहीं। जिस तरह हिमसागर एक्सप्रेस चलती है हिमालय से समुद्र तक तो उसका नाम हिमसागर हो गया। उसी तरह राप्तीसागर भी है। उसने मेरे दावे को खारिज कर दिया। मैंने उसके दावे को। उसे फिर से ‘आर’ से बताना पडा।
इसके बाद हम भी बेइमानी पर आ गये। ‘आई’ अक्षर से बहुत से स्थान समाप्त होते हैं लेकिन इससे शुरू बहुत कम होते हैं। हमारे पास सारे विकल्प समाप्त हो चुके थे, इलाहाबाद को भी जबरदस्ती ‘आई’ से शुरू करना चाहते थे। किसी तरह इस बार ड्रामेबाजों ने गोवा के किसी गांव का नाम बताकर लाज बचाई। अब हम उन स्थानों को ढूंढते जो ‘आई’ पर समाप्त होते हों। हमें इस अक्षर की तंगी हो रही है तो सामने वाला भी तंगी में ही होगा। लेकिन हड्डीस्ट ने यह कहकर हमारी चिन्ता बढा दी कि इसकी झोली में अभी बहुत सारे ‘आई’ पडे हैं। हमने भी कह दिया कि बेटा, हमारे पास भी बहुत ‘आई’ हैं।
अगर हमारे पास कोई ‘आई’ आता तो इस्लाम और इस्माइल बडे काम आये। इस्लामपुर, इस्लामपुरी, इस्लामगंज, इस्लामजंग, ... यह बिहार में है, यह पंजाब में है, यह पाकिस्तान में, यह अफगानिस्तान में... यहां की साडी प्रसिद्ध है, यहां का बुर्का प्रसिद्ध है... चाहो तो नेट पर देख लो। ‘आई’ से बचाव तो हो गया, अब हमला भी करना था। हमारे पास कोई भी अक्षर आता, तीनों इसी जुगत में लग जाते कि हमारे द्वारा पूछा गया स्थान ‘आई’ पर समाप्त होता हो ताकि उसका संग्रह भी खत्म हो जाये। इसी तरह हमारे पास एक बार ‘ए’ आया। एक ड्रामेबाज ने तुरन्त कहा- अजमेर। दूसरे ने कहा- नहीं, इसे फिर कभी बतायेंगे, अभी ऐसी जगह ढूंढो जो ‘आई’ पर समाप्त होती हो। सोच-विचार होता रहा। तभी मैंने कहा- अजमेरी। हड्डीस्ट ने मानने से इंकार कर दिया। मैंने कहा- यह दिल्ली में है। यहां एक बहुत बडा गेट भी है जिसे अजमेरी गेट कहते हैं। इसी तरह बाद में हमने कश्मीरी भी बता दिया।
ट्रेन लोंडा पहुंची। अभी तक अन्त्याक्षरी का कोई फैसला नहीं हुआ था। वो ‘आई’ को ढूंढता ढूंढता अफ्रीका पहुंच गया था। कुछ भी बताता, हमें मानना पडता। हड्डीस्ट ने कहा कि गाडी यहां एक घण्टा रुकेगी। चलो, डिनर कर लेते हैं। गोवा एक्सप्रेस में यहां कुछ परिवर्तन होते हैं। इसके कुछ डिब्बे बैंगलौर जाते हैं, उन्हें काट दिया गया। वे घण्टे भर बाद आने वाली रानी चेन्नम्मा एक्सप्रेस से जुडकर आगे जायेंगे। एक ट्रेन हुबली से आती है। उसमें से दो साधारण डिब्बों को काटकर यहीं छोड दिया जाता है, बाकी डिब्बों को गोवा एक्सप्रेस में जोड दिया जाता है जो दिल्ली चले जाते हैं। इसके अलावा ट्रेन की दिशा भी बदलती है, इंजन इधर से उधर लगाया जाता है। इस काम को स्टेशन के कर्मचारी बेहद फुर्ती से करते हैं। मात्र बीस मिनट में सारा काम हो जाता है।
हड्डीस्ट का तो पता नहीं लेकिन हमने वडापाव और इडली से पेट भर लिया। गाडी दूसरी दिशा में सरकने लगी तो उसमें चढ लिये। अब हड्डीस्ट नहीं आया। उसकी बर्थ देखी, खाली थी। उसके पास मात्र एक बैग ही था, जिसे शायद वो लेकर ही उतर गया हो। साफ तौर पर उसकी गाडी छूट चुकी थी। इसकी दो वजहें हो सकती हैं। प्रमुख वजह है कि उसके अनुसार गाडी यहां एक घण्टे रुकेगी, वो खाना खाने बाहर चला गया हो। दूसरी वजह हो सकती है कि उसे मालूम न हो कि गाडी अब विपरीत दिशा में जायेगी। इतना तो उसे पता था कि यहां कुछ डिब्बों की अदला-बदली भी होती है। गाडी जब चलने लगी तो वह डिब्बों की अदला-बदली ही समझ रहा होगा।
उसकी गाडी छूट जाने का हमें कोई दुख नहीं हुआ। ड्रामेबाजों के साथ मैं भी खुश था। खूब चटकारे ले लेकर इस घटना का आनन्द लिया गया।

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12 comments:

  1. ek mukkam pura karne ke leya badhiye ho neeraj bhai.

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  2. आरक्षित यात्राओं की संख्या भले ही कम हो पर किलोमीटर अधिक है। मेेरे अनुमान के आधार पर आपकी तीन चौथाई से भी अधिक यात्रायें साधारण श्रेणी में हुयी हैं, कितना ख़र्चा हुआ, यह नहीं लिखा।

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  3. बहुत बढ़िया नीरज बाबू, अब आपका नया नाम घुमक्कड़ रेल यात्री......लगे रहो, लगे रहो....वन्देमातरम...

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  4. नीरज जी एक लाख किलोमीटर की यात्रा पूरी करने पर आपको बधाई। उम्मीद है आप दस लाख से भी कई ज्यादा किलोमीटर की यात्रा कर रिकॉर्ड जरूर बनायेंगे। शुभकामनाएं!

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  5. mujhe raipur jate huye Bilaspur ka ek aadmi mila wo NTPC k liye 2 saal se kaam kar raha hai.... is kaam me usko week me 2 baar train se Bilaspur se Delhi aana hota hai... Agar dekha jaaye to usne itne time me usne 4,50,000 km se b zyada train yatra ki hai...

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  6. mubharak ho neeraj ji. keep travailing and keep writing .

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  7. शानदार उपलब्धि

    बधाई शुभकामनाएं नीरज जी
    (आखिरी शब्द 'आई' से ख़तम होता है जी) :-)

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  8. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज मंगलवार (15-10-2013) "रावण जिंदा रह गया..!" (मंगलवासरीय चर्चाःअंक1399) में "मयंक का कोना" पर भी है!
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का उपयोग किसी पत्रिका में किया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  9. Really relished the blog. Train traveling always fascinates me and such blogs are like treats

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  10. congratulations on your journey of 1 lac kms. you are very inspiring :)

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