Skip to main content

अजन्ता गुफाएं

6 अगस्त 2013 दिन मंगलवार था जब मैं नई दिल्ली स्टेशन से झेलम एक्सप्रेस में बैठा। गाडी पौने दो घण्टे लेट थी। रास्ते में फरीदाबाद से कमल भी आने वाला था।
यह दस दिनों का कार्यक्रम असल में एक ट्रेन यात्रा ही था। इसमें मुख्य रूप से पश्चिमी घाट की पहाडियों के दोनों ओर फैली रेलवे लाइनों पर यात्रा करनी थी। आरम्भ में इस यात्रा में मैं और प्रशान्त ही थे। कमल बाद में आया। कमल और मेरी मुलाकात पहली बार जब हुई, तभी अन्दाजा हो गया कि कमल के लिये यह यात्रा अच्छी नहीं हो सकती। कमल ने बताया था कि वह ज्यादातर कम्पनी के काम से ही घूमा है और उसमें भी ज्यादातर राजधानी एक्सप्रेस से। ऐसे में कैसे वह कई कई दिनों तक पैसेंजर ट्रेनों में बैठा रह सकता था? इसलिये उसकी मुश्किलों को कुछ कम करते हुए अपनी यात्रा में से मिराज से बिरूर तक की पैसेंजर यात्रा रद्द कर दी। उसके स्थान पर एक दिन गोवा को दे देंगे या फिर मालवन जायेंगे।
इससे पहले मैंने अपना आरक्षण मंगला लक्षद्वीप एक्सप्रेस से करा रखा था दिल्ली से भुसावल तक। लेकिन बाद में कमल के आग्रह पर इसे रद्द कराकर झेलम को चुना। मंगला से जाने का एक फायदा था कि यह पर्याप्त समय पहले हमें भुसावल पहुंचा देती और हम आराम से पाचोरा चले जाते व आठ बजे चलने वाली जामनेर नैरो गेज पैसेंजर पकड लेते। झेलम से जाने का कुछ और फायदा था। वो यह कि झेलम सवा छह बजे पाचोरा पहुंचती है, जबकि मंगला रात दो बजे भुसावल। तो नींद में कोई खलल नहीं पडता। लेकिन झेलम एक तो जम्मू से आती है, फिर इसके ठहराव भी मंगला के मुकाबले बहुत ज्यादा हैं, इसके लेट होने की ज्यादा सम्भावना बनती है।
यात्रा शुरू करने से पहले ही यह सम्भावना सामने आ गई जब झेलम पौने दो घण्टे विलम्ब से नई दिल्ली आई। पाचोरा में भी हमें पौने दो घण्टे का मार्जिन मिलता, इसलिये आवश्यक है कि अब गाडी और ज्यादा लेट न हो, बल्कि टाइम कवर भी करे।
फरीदाबाद से कमल भी आ गया। उधर तीसरा साथी प्रशान्त हमें जलगांव मिलेगा। कमल को मालूम नहीं था कि मैं नाइट ड्यूटी करके आया हूं, इसलिये जब उसके आने पर मैं सोने चला गया तो उसके चेहरे पर नाखुशी झलक रही थी।
खैर, आगे बढते हैं। भुसावल पहुंचे तब भी गाडी पौने दो घण्टे ही लेट थी। ग्यारह सौ किलोमीटर की दूरी में दस मिनट भी कवर नहीं हुए, अब क्या कवर होंगे? इरादा बना लिया कि जलगांव उतरने में ही भलाई है। पाचोरा गये तो नैरो गेज की ट्रेन छूट सकती है।
महाराष्ट्र में एक मजा है। और वो है वडापाव। मुझे यह बडा स्वादिष्ट लगता है। बीस रुपये में तो पेट भर जाता है।
जब हम दिल्ली से चले थे, तभी पता चल गया था कि प्रशान्त हमें भुसावल में नहीं मिलेगा बल्कि जलगांव मिलेगा। उसका इरादा था झेलम एक्सप्रेस से हमारे ही साथ पाचोरा जाने का। अब जब हम भी जलगांव उतरने की तैयारी करने लगे, तो उसे सूचित करना था कि वह इस ट्रेन में न चढे। फोन मिलाया लेकिन नहीं मिला। मेरे फोन में कुछ गडबड थी। ट्रेन रुकते ही हम उतर गये लेकिन प्रशान्त नहीं मिला। अगर उसे हमारे यहां उतरने की जानकारी नहीं होगी तो वो इसी ट्रेन में चढ जायेगा। हमने भी सोच लिया कि अगर हम उससे सम्पर्क न कर सकें तो इसी से पाचोरा जाना पडेगा।
आखिरकार सम्पर्क हुआ और वो ट्रेन चलने से क्षण भर पहले उतर गया। वो कल से यहीं था, इसलिये नहा-धो चुका था। कमल भी झेलम एक्सप्रेस के शौचालय में नहा आया था। मुझे जलगांव स्टेशन पर नहाना पडा।
तीस रुपये लगे ऑटो में हम तीनों के बस अड्डे तक पहुंचने के। हम गैर-हिन्दी इलाके में थे, इसलिये ऑटो वाला शीघ्र जान गया कि हम अजन्ता जायेंगे। उसने हमें ऑटो से ही ले चलने का सुझाव दिया जिसे हमने किराया सुनते ही नकार दिया। बारह सौ बताया उसने तीनों का किराया। साथ ही यह झूठ भी जोडा कि अजन्ता यहां से डेढ सौ किलोमीटर दूर है, पहाडी रास्ता है, बस तीन घण्टे में पहुंचायेगी और उसका किराया होगा साढे तीन सौ रुपये प्रति व्यक्ति। यह सुनते ही कमल विचलित हो गया और ऑटो वाले से मोलभाव करने को कहने लगा। कमल आठ सौ पर था जबकि ऑटो वाला हजार से नीचे नहीं आया।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होना चाहिये कि मुझे पूरे रास्ते की जानकारी थी कि कितना दूर है और कैसा रास्ता है। साठ किलोमीटर के आसपास है अजन्ता गुफाएं जलगांव से। पूरा रास्ता मैदानी है। राज्य सरकार की बस अगर मिल जाये तो पचास रुपये प्रति व्यक्ति से ज्यादा किराया भी नहीं लगेगा। प्राइवेट में दस रुपये महंगा होगा, इससे ज्यादा कतई नहीं।
औरंगाबाद वाली बस मिल गई। साठ साठ रुपये लगे और डेढ घण्टे के अन्दर हम अजन्ता गुफाओं को जाने वाले तिराहे पर थे।
चिल्लर यानी छुट्टे पैसों की हर जगह समस्या पडी। कमल ने पहले ही बता दिया था कि महाराष्ट्र में चिल्लर की समस्या आने वाली है। जब तक हम इस राज्य में रहे, हर जगह यह समस्या आई। पता नहीं छुट्टे पैसे कहां खप जाते हैं?
बस पहुर से होकर निकली थी। पहुर में पाचोरा- जामनेर नैरो गेज लाइन का स्टेशन भी है। बस ने फाटक भी पार किया। अगर झेलम एक्सप्रेस समय पर चलती तो हम भी आज ही इसी लाइन पर यात्रा करते। खैर, कोई बात नहीं। तब कार्यक्रम था पहले नैरो गेज और बाद में अजन्ता का जबकि अब कार्यक्रम होगा पहले अजन्ता और बाद में नैरो गेज का। दो साल से मेरा इन दोनों को एक साथ एक ही दिन में करने का कार्यक्रम बनता-बिगडता आ रहा है। आज नहीं बिगडने दूंगा।
इस तिराहे से मुख्य सडक सीधे औरंगाबाद चली जाती है और तीसरी सडक अजन्ता गुफाओं को जाती है, जो यहां से चार किलोमीटर दूर है। प्रवेश द्वार पर शुल्क देना पडा। साथ ही पता भी चला कि यहां से गुफाओं तक जाने के लिये बसें भी चलती हैं। मेरा अन्दाजा था कि इस घोर पर्यटन स्थान पर वह बस चार किलोमीटर के भी पचास साठ रुपये ले लेती होगी लेकिन यह अन्दाजा गलत निकला। इसका किराया दस रुपये था। इसमें भी शर्त थी कि अगर छुटे पैसे नहीं होंगे तो बीस रुपये किराया होगा। हमारे पास संयोग से छुट्टे थे।
इस प्रवेश द्वार से आगे बढते हैं तो एक छोटा सा बाजार है जहां खाने-पीने और खरीदने की कई दुकानें हैं। हमारे काम की केवल खाने की दुकानें ही थीं। आलू के परांठे खाये। थे तो महंगे लेकिन स्वादिष्ट भी थे।
छोटी मिनी बसें तैयार खडी रहती हैं। मानसून का समय ऑफ सीजन माना जाता है लेकिन शीघ्र ही बस भर गई और भरते ही चल पडी। दस मिनट में हम चार किलोमीटर की दूरी तय कर चुके थे और स्वयं को चारों तरफ से पहाडों से घिरा हुआ देख रहे थे।
यहां भी प्रवेश शुल्क लगा। झुंझलाहट हुई कि चार किलोमीटर पहले भी शुल्क लिया था, अब क्यों? जवाब मिला वो शुल्क खत्म। अब गुफाओं का शुल्क देना पडेगा। साथ ही पांच रुपये बिजली का शुल्क भी था। पहले तो पता नहीं चला, बाद में मालूम पडा कि अन्धेरी गुफाओं को प्रकाशित करने के लिये बिजली की खपत होती है।
असन्तोष इस बात का नहीं है कि 45 रुपये लग गये बल्कि इस बात का है कि तीन बार टिकट लेना पडा। इसी को भले ही पचास रुपये कर दिया जाये लेकिन केवल एक ही बार होना चाहिये तो असन्तोष नहीं होगा। वन विभाग अलग ले रहा है, पर्यटन विभाग अलग ले रहा है और विद्युत विभाग अलग। तीनों मामले राज्य सरकार के हैं, इसलिये तीनों को इकट्ठा ही ले लेना चाहिये। बाद में आपस में बांट लें।
गुफाओं तक पहुंचने के लिये कुछ सीढियां चढनी पडीं। प्रशान्त की हालत खराब हो गई। मोटा होने का खामियाजा।
गुफाएं एक घुमावदार पहाडी पर बनी हैं। वैसे तो ये गुफाएं किसी समय बौद्ध शिक्षा और ध्यान साधना का केन्द्र रही होंगी लेकिन समय के साथ सब ‘विलुप्त’ हो गईं। बाद में एक अंग्रेज ने इन्हें खोजा। वो बेचारा अंग्रेज यहां शिकार खेलने आया था और खुद खो गया। भटकते भटकते उसे संयोग से ये गुफाएं दिख गईं। बस, फिर क्या था? यथाशीघ्र यह स्थान दुनिया के नक्शे में तेजी से उभर गया। शोध पर शोध हुए और फलस्वरूप इसका सारा इतिहास-भूगोल ढूंढ लिया गया। गुफाओं में जो चित्र थे, लेख थे सब पढ लिये गये और अब इसके बारे में कुछ भी अज्ञात नहीं है।
अंग्रेजों की मैं सिर्फ इसीलिये इज्जत करता हूं कि उन्होंने ‘विधर्मियों’ की संस्कृति और उनके इतिहास को केवल ढूंढा ही नहीं, बल्कि उसे संरक्षित भी किया। मुझे यह कहने में जरा भी संकोच नहीं है कि अगर उनसे पहले इस्लामी शासनकाल में इन गुफाओं का पता चलता, तो तुरन्त इनका मटियामेट कर दिया जाता। यह मटियामेट कर देने की प्रवृत्ति इस्लाम पर एक कलंक है। हर मुसलमान को अपने पूर्वजों के इस कृत्य पर शर्मिन्दा होना चाहिये।
ओशो का एक कथन याद आ रहा है कि जिन लोगों को मूर्तियों से लगाव होता है, वे दो तरह के लोग होते हैं। एक मूर्तिपूजक और दूसरे मूर्तिभंजक। दोनों मूर्तियों के घनघोर प्रेमी हैं। मूर्ति में है कुछ नहीं लेकिन एक प्रेमी उसे पूजना शुरू कर देता है, दूसरा प्रेमी उसे तोडना शुरू कर देता है। बुनियादी रूप से दोनों में कोई फरक नहीं है।
मुझे पुरातत्व की ज्यादा समझ नहीं है। फिर भी सभी गुफाओं में एक साम्य देखने को मिला। वो यह कि हर गुफा में भिक्षुओं के लिये कमरे हैं और एक नियत स्थान पर बुद्ध म्रतिमा भी। कमरे छोटे छोटे हैं। कमरों के सामने बडा सा हॉल है जिसकी दीवारों, खम्भों और छतों पर चित्रकारी की गई है। यह स्थान इसी मामले में विलक्षण है कि जहां मूर्तिकला उत्कृष्ट है, वहीं चित्रकला भी उत्कृष्ट है। ऐसे स्थान अक्सर देखने में नहीं आते।
कुल 28 गुफाएं हैं। पहली गुफा में घुसते ही एक सबक सीखने को मिला। मूवी कैमरे का चार्ज अलग से लगता है। मेरा कैमरा मूवी कैमरा नहीं है। गुफा के प्रवेश द्वार पर ही रक्षक ने कैमरे को ऐसे जांचा जैसे वह कैमरों का विशेषज्ञ हो। फिर कहने लगा कि यह मूवी कैमरा है, इसे लेकर आप अन्दर नहीं जा सकते। मैंने मना किया तो वह तेवर में आ गया। मैंने पूछा कि आपको कैसे पता कि यह मूवी कैमरा है? क्या आपने कैमरों का कोई कोर्स कर रखा है? बोला कि हमारा रोज का यही काम है। हम देखते ही बता देते हैं कि कैसा कैमरा है।
मैंने कहा कि फिर तो ठीक है। ये लो, आप इससे एक मूवी बनाकर दिखाईये। ... छोडो, इसे चालू करके ही दिखा दीजिये ताकि बटन दबाते ही मूवी बननी शुरू हो जाये।...छोडो, इसमें पहले से जो मूवी पडी हुई हैं, वे प्ले करके दिखा दीजिये।... छोडो, इसे पकडकर ही दिखा दीजिये कि इसे पकडा कैसे जाता है।
मूक।
ठीक है। जाओ, लेकिन इससे मूवी मत बनाना। और फ्लैश भी मत मारना। मूवी बनाने और फ्लैश मारने पर प्रतिबन्ध है। मैंने कहा मंजूर।
और उस अल्प प्रकाश में कैमरे ने जो फोटो खींचे, मैं खुद भी हैरान हूं। ज्यादातर फोटो मैन्यूअल मोड में खींचे और कुछ तो वास्तव में जादुई हैं।
इसी तरह का एक मामला और हुआ। एक गुफा में मैं पैनोरमा ले रहा था। इसमें बटन दबाकर चारों ओर घूमना होता है। सामने वाले को लगता है कि शूटिंग कर रहा है। देखते ही रक्षक पास आया और बोला कि शूटिंग करना एलाउ नहीं है। मैंने कहा कि मैंने तो शूटिंग की ही नहीं। बोला कि अभी कर रहे थे, पैनल्टी लगेगी। स्वाभिमान को ठेस पहुंची। कैमरा उसके हाथ में पकडा दिया- ये ले, दिखा क्या शूट किया है? भला वो कैसे दिखाए?
यहां अगर फोटोग्राफरों को मूवी बनाने से रोकना है, तो कैमरा विशेषज्ञ रक्षक व गाइड होने चाहिये। भला ये दसवीं फेल गधे फोटोग्राफरों को फोटो खींचना सिखायेंगे? क्रोध भी आता है और हैरानी भी होती है।
हर गुफा में गाइड पीछे पडे कि साहब मैं इस गुफा के बारे में सबकुछ बताऊंगा। कैसे बनी, किसने बनवाई, कब बनी, इसमें क्या क्या है, इनके क्या अर्थ हैं, सब बताऊंगा। पैसे? केवल सात सौ रुपये। एक गुफा के सात सौ रुपये। भाई देख, हमारी भी इच्छा है कि हम यहां से कुछ सीखकर जायें लेकिन गुफा से बाहर निकलते ही सबकुछ भूल जायेंगे। हमें पता है कि हम भूल जायेंगे। हम केवल मौजमस्ती और कुछ फोटो खीचने आये हैं ना कि पुरातत्व विशेषज्ञ बनने। फिर भी, हमारे स्तर के इंसान को यहां के बारे में जितना पता होना चाहिये, उससे ज्यादा हमें पता है।
फिर भी गाइड पीछा नहीं छोडते। पीछे लग जाते। हर गुफा में यही हुआ। गाइड सोचता कि ये लोग फ्लैश मारेंगे तो जुर्माना लूंगा। एक ने कहा कि यहां दो खम्बे ऐसे हैं जिन पर अगर हाथ से थपकी लगायें तो आवाज निकलती है। हमने पूछा कौन से खम्भे हैं। बोला कि यह नहीं बता सकता। आपको पैसे देने होंगे। बेटा, पैसे तो हम देंगे नहीं। प्रशान्त, हो जा शुरू। सारे खम्भे बजाकर देखने शुरू कर दिये। आखिरकार दो खम्भे मिल गये जो अन्दर से खोखले रहे होंगे। उनसे प्रतिध्वनि आ रही थी। निकलते समय प्रशान्त ने उस गाइड से कहा- अगर तू बता देता तो हमारे हाथ ना दुखते पत्थर पीटते पीटते।
मेरा मानसिक स्तर इतना अच्छा नहीं है कि अजन्ता के इतिहास को याद रख सकूं। पहली बात कि इसे पढने में भयंकर बोरियत होती है। हीनयान, महायान, इतना ईसा पूर्व, इतना ईस्वी सन, ये संकेत, भित्तिचित्र; कुछ भी समझ नहीं आता। किसी तरह उबाई ले लेकर इसे पढा भी है लेकिन अब लिखने के समय सब भूल गया हूं। भगवान, ऐसी बुद्धि किसी को न दे।
हमारे लिये ये गुफाएं फोटो खींचने से ज्यादा कुछ नहीं थी। साथ ही एक जादुई दुनिया भी। इन अन्धेरी गुफाओं में कैसे छैनी हथौडा चलाये होंगे, कैसे कूची चलाई होगी? एक गाइड ने हमसे यह बात पूछी भी थी। हमने कहा कि दीया जलाया होगा। बोला कि एक दिन का काम नहीं था यह। दीये से ये काली हो जातीं। कम से कम कहीं न कहीं कालिख तो मिलती। कहीं भी कालिख का निशान नहीं है। हमने उसी से पूछ लिया कि हां, यार, बात में तेरी दम तो है। तू ही बता दे। बोला कि ऐसे नहीं बताया करते हैं। पैसे लगेंगे।... फिर तो रहने दे। हम अज्ञानी ही सही।
26वीं गुफा बडी जबरदस्त है। इसमें लेटे हुए बुद्ध की प्रतिमा है। साथ ही एक प्रदक्षिणा गलियारा भी जिसके दोनों तरफ एक से बढकर एक मूर्तियां। यहां भी गाइड पीछे पडा। हर मूर्ति का रहस्य, हर मूर्ति की कहानी बताऊंगा। हमने मना कर दिया। खफा होकर उसने बत्तियां बन्द कर दीं। यहां बत्तियां स्ट्रीट लाइटों की तरह नहीं है कि बुझते ही अन्धेरा छा जायेगा। हर बल्ब से जो प्रकाश निकलता है, वह किसी मूर्ति के विशेष भाग पर या किसी विशेष मूर्ति पर ही पडता है, नहीं तो पूरा उजाला रहता है। बत्ती बुझने का हमें जब पता चला, तभी कहा- ओये, बत्तियां जला दे, हम पांच रुपये देकर आये हैं।
नीचे वाघोडा नदी बहती है। जो पास में ही बडा शानदार झरना बनाती है। मानसून में यह अपने सर्वोत्तम रूप में था।
दो बजे यहां से वापस चल दिये। हमें अब शीघ्र पहुर पहुंचना है ताकि नैरो गेज की गाडी का आनन्द ले सकें।

यही वो तिराहा है। इस स्थान को लेणी मोड कहते हैं। लेणी माने गुफा।

गुफाएं

गुफाओं के अन्दर



एक गुफा के अन्दर का जादुई नजारा







एक गुफा का प्रवेश द्वार







एक गुफा का प्रवेश द्वार





प्रशान्त


एक अधूरी गुफा

यह है गुफा नम्बर 26






जाटराम और कमल- बिल्कुल विपरीत।... स्वभाव भी।

वाघोडा नदी



यह है कमल कान्त। इस महाराज के चेहरे पर मुस्कान आना एक दुर्लभ घटना थी।





यह रहा अजन्ता गुफा क्षेत्र का मानचित्र।
अगला भाग: जामनेर-पाचोरा नैरो गेज ट्रेन यात्रा

पश्चिमी घाट यात्रा
1. अजन्ता गुफाएं
2. जामनेर-पाचोरा नैरो गेज ट्रेन यात्रा
3. कोंकण रेलवे
4. दूधसागर जलप्रपात
5. लोण्डा से तालगुप्पा रेल यात्रा और जोग प्रपात
6. शिमोगा से मंगलुरू रेल यात्रा
7. गोकर्ण, कर्नाटक
8. एक लाख किलोमीटर की रेल यात्रा




Comments

  1. प्रकृति के मध्य में इतनी सुन्दर संरचना, सुन्दर चित्र

    ReplyDelete
  2. बहुत ही सुन्दर तरह से लिए गए फोटो है
    भगवान से कामना है की आपकी यात्रा ऐसे ही चलती रहे...

    ReplyDelete
  3. आप अपनी यात्रा की MAN VS WILD की तरह छोटी सी विडियो
    भी बनाया करे तो सोने पे सुहागा है...

    ReplyDelete
  4. मैंने कहा कि फिर तो ठीक है। ये लो, आप इससे एक मूवी बनाकर दिखाईये। ... छोडो, इसे चालू करके ही दिखा दीजिये ताकि बटन दबाते ही मूवी बननी शुरू हो जाये।...छोडो, इसमें पहले से जो मूवी पडी हुई हैं, वे प्ले करके दिखा दीजिये।... छोडो, इसे पकडकर ही दिखा दीजिये कि इसे पकडा कैसे जाता है।
    मूक।

    ReplyDelete
  5. kahin bhi jaaiye... sub jagah aisa hota hai ... aachaa hua jo aap un ki baaton me ni aaye... :)
    bahut achaa likha likha hai

    ReplyDelete
  6. kahin bhi jaaiye... sub jagah aisa hota hai ... aachaa hua jo aap un ki baaton me ni aaye... :)
    bahut achaa likha likha hai

    ReplyDelete
  7. सुरक्षा कर्मी की कोई ग़लती नहीं है आज के दौर में तकनीक इतनी तेज़ी से बदल रही है कि गजेट्स के फंक्शंस पहचानने चलाने का तरीका प्रॉडक्ट के हिसाब से बदलता है. शायद आपको उनका टोका जाना पसंद न आया हो लेकिन यकीन मानिए कई पर्यटक बिना शुल्क चुकाए वीडियोग्राफी फोटोग्राफी करते हैं और बाद में पकड़े जाने पर इन सुरक्षाकर्मियों को अधिकारियों स्वरा तलब किया जाता है.

    ReplyDelete
  8. barsat ka mausam hone ke karan prakarti bhi purre nikhar per thiii.......

    ReplyDelete
  9. "ओशो का एक कथन याद आ रहा है कि जिन लोगों को मूर्तियों से लगाव होता है, वे दो तरह के लोग होते हैं। एक मूर्तिपूजक और दूसरे मूर्तिभंजक। दोनों मूर्तियों के घनघोर प्रेमी हैं। मूर्ति में है कुछ नहीं लेकिन एक प्रेमी उसे पूजना शुरू कर देता है, दूसरा प्रेमी उसे तोडना शुरू कर देता है। बुनियादी रूप से दोनों में कोई फरक नहीं है।"

    मैंने दिलवाडा टेम्पल (आबू ) और मांडव में काफी पुराणी मूर्तियाँ देखि है पर सब मुस्लिम शासको ने महिलाओं की नाक और अग्र भाग काट कर उन्हें खंडित किया .अफ़सोस ! ये जरुर खंडित होने से बच गई होगी ....ये 'कमलकान्त ' वो ही है न जो संदीप के साथ गोवा गए थे और वापसी में मुझसे मिले थे ...

    ReplyDelete
  10. राम राम जी, बहुत ही सुंदर चित्रकारी ........ग़ज़ब ....

    ReplyDelete
  11. बहुत खूबसूरत अंदाज़ मे लिखा हे पूरा विवरण, पिछले साल गया था मैं भी और ऐसा ही अनुभव मिला था |
    पुणे से अजंता तक जाने के लिए रोड से 5-6 जगह पे टोल टैक्स भरना पड़ता है और अजंता के अंदर 3 बार |

    नीरज भाई कभी फिर से इस क्षेत्र मे आने का कार्यक्रम हो तो पूर्वसूचित करने की कोशिश करना, मै पुणे महाराष्ट्र मे कार्यरत हु|
    इस बहाने तुमसे मिलने और तुम्हारे साथ घूमने का शुभ अवसर भी मिल जाएगा |

    एक और बात पे हैरत हुआ की तुम इतनी सब यात्राओ के लिए टिकट कैसे निकाल लेते हो रेल्वे से |

    धन्यवाद |


    ReplyDelete
    Replies
    1. महीने भर पहले सूचित कर दिया था ब्लॉग पर।
      रही बात टिकट की, तो यह साधारण सा काम है। यह केवल हमारा वहम ही होता है कि ट्रेनों में सीट कभी नहीं मिलती। असल में ऐसा नहीं है।

      Delete
  12. jab ji chaha, jaha ji chaha, man me aaya, or ja aaye .ye jindgi na milegi dubara. ham apne hi bandhan m bandhe rah gaye.

    ReplyDelete
  13. Gufa ke bhitar prakash sheese ke dwara hota tha. jyada jankari ke liye hollywood movie mummy ka ek sin yaad karein

    ReplyDelete
  14. aapki yatra mangalmai ho neeraj bhai.

    ReplyDelete
  15. अजंता गुफा के इन मनोरम्य द्रश्य दीखाने के लिए और अंदरूनी जानकारी देने की लिए धन्यवाद

    ReplyDelete
  16. फोटोग्राफी में काफी निखार आया हैं। सभी फोटोज अतिसुंदर हैं। …

    ReplyDelete
  17. अजन्ता की गुफाओं के विषय में या तो पढा था या सुना था लेकिन आज देख लिया इतने सुन्दर चित्रों व सजीव लेखन द्वारा ।

    ReplyDelete
  18. DMRC के लिये विज्ञापन भी अच्छा लगा :-)

    प्रणाम

    ReplyDelete
  19. जानकारी से परिपूर्ण

    ReplyDelete
  20. मैं अपने परिवार के साथ नवंबर में अजन्ता जाने वाला हूं। आपसे मिली जानकारी के लिए धन्यवाद

    ReplyDelete
  21. पढ़कर बहुत अच्छा लगा।

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

ट्रेन में बाइक कैसे बुक करें?

अक्सर हमें ट्रेनों में बाइक की बुकिंग करने की आवश्यकता पड़ती है। इस बार मुझे भी पड़ी तो कुछ जानकारियाँ इंटरनेट के माध्यम से जुटायीं। पता चला कि टंकी एकदम खाली होनी चाहिये और बाइक पैक होनी चाहिये - अंग्रेजी में ‘गनी बैग’ कहते हैं और हिंदी में टाट। तो तमाम तरह की परेशानियों के बाद आज आख़िरकार मैं भी अपनी बाइक ट्रेन में बुक करने में सफल रहा। अपना अनुभव और जानकारी आपको भी शेयर कर रहा हूँ। हमारे सामने मुख्य परेशानी यही होती है कि हमें चीजों की जानकारी नहीं होती। ट्रेनों में दो तरह से बाइक बुक की जा सकती है: लगेज के तौर पर और पार्सल के तौर पर। पहले बात करते हैं लगेज के तौर पर बाइक बुक करने का क्या प्रोसीजर है। इसमें आपके पास ट्रेन का आरक्षित टिकट होना चाहिये। यदि आपने रेलवे काउंटर से टिकट लिया है, तब तो वेटिंग टिकट भी चल जायेगा। और अगर आपके पास ऑनलाइन टिकट है, तब या तो कन्फर्म टिकट होना चाहिये या आर.ए.सी.। यानी जब आप स्वयं यात्रा कर रहे हों, और बाइक भी उसी ट्रेन में ले जाना चाहते हों, तो आरक्षित टिकट तो होना ही चाहिये। इसके अलावा बाइक की आर.सी. व आपका कोई पहचान-पत्र भी ज़रूरी है। मतलब

46 रेलवे स्टेशन हैं दिल्ली में

एक बार मैं गोरखपुर से लखनऊ जा रहा था। ट्रेन थी वैशाली एक्सप्रेस, जनरल डिब्बा। जाहिर है कि ज्यादातर यात्री बिहारी ही थे। उतनी भीड नहीं थी, जितनी अक्सर होती है। मैं ऊपर वाली बर्थ पर बैठ गया। नीचे कुछ यात्री बैठे थे जो दिल्ली जा रहे थे। ये लोग मजदूर थे और दिल्ली एयरपोर्ट के आसपास काम करते थे। इनके साथ कुछ ऐसे भी थे, जो दिल्ली जाकर मजदूर कम्पनी में नये नये भर्ती होने वाले थे। तभी एक ने पूछा कि दिल्ली में कितने रेलवे स्टेशन हैं। दूसरे ने कहा कि एक। तीसरा बोला कि नहीं, तीन हैं, नई दिल्ली, पुरानी दिल्ली और निजामुद्दीन। तभी चौथे की आवाज आई कि सराय रोहिल्ला भी तो है। यह बात करीब चार साढे चार साल पुरानी है, उस समय आनन्द विहार की पहचान नहीं थी। आनन्द विहार टर्मिनल तो बाद में बना। उनकी गिनती किसी तरह पांच तक पहुंच गई। इस गिनती को मैं आगे बढा सकता था लेकिन आदतन चुप रहा।

जाटराम की पहली पुस्तक: लद्दाख में पैदल यात्राएं

पुस्तक प्रकाशन की योजना तो काफी पहले से बनती आ रही थी लेकिन कुछ न कुछ समस्या आ ही जाती थी। सबसे बडी समस्या आती थी पैसों की। मैंने कई लेखकों से सुना था कि पुस्तक प्रकाशन में लगभग 25000 रुपये तक खर्च हो जाते हैं और अगर कोई नया-नवेला है यानी पहली पुस्तक प्रकाशित करा रहा है तो प्रकाशक उसे कुछ भी रॉयल्टी नहीं देते। मैंने कईयों से पूछा कि अगर ऐसा है तो आपने क्यों छपवाई? तो उत्तर मिलता कि केवल इस तसल्ली के लिये कि हमारी भी एक पुस्तक है। फिर दिसम्बर 2015 में इस बारे में नई चीज पता चली- सेल्फ पब्लिकेशन। इसके बारे में और खोजबीन की तो पता चला कि यहां पुस्तक प्रकाशित हो सकती है। इसमें पुस्तक प्रकाशन का सारा नियन्त्रण लेखक का होता है। कई कम्पनियों के बारे में पता चला। सभी के अलग-अलग रेट थे। सबसे सस्ते रेट थे एजूक्रियेशन के- 10000 रुपये। दो चैप्टर सैम्पल भेज दिये और अगले ही दिन उन्होंने एप्रूव कर दिया कि आप अच्छा लिखते हो, अब पूरी पुस्तक भेजो। मैंने इनका सबसे सस्ता प्लान लिया था। इसमें एडिटिंग शामिल नहीं थी।