Skip to main content

गोकर्ण, कर्नाटक

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें
मंगलौर से मडगांव पैसेंजर पकडी तो रास्ते में गोकर्ण रोड स्टेशन पर उतर गये। पहले योजना थी कि गोवा जायेंगे और चौबीस घण्टे तक वहीं रहेंगे। लेकिन मुझे गोवा रास नहीं आया, तो गोकर्ण उतर गया। वैसे एक दूसरा विकल्प मुरुडेश्वर भी था, लेकिन गोकर्ण के ओम बीच के बारे में बहुत सुना था, उसे देखने की इच्छा बलवती हो गई।
गूगल मैप ने कभी भी हमारा साथ नहीं छोडा, इसलिये बिना किसी से पूछे ही पता चल गया कि स्टेशन से गोकर्ण की दूरी ग्यारह किलोमीटर है। स्टेशन से करीब एक किलोमीटर दूर मुख्य सडक है, जहां से गोकर्ण की बस भी मिल सकती है। स्टेशन के बाहर सिर्फ ऑटो खडे थे। एक से किराया पूछा तो उसने डेढ सौ रुपये बताया। कमल ने तुरन्त कहा कि हम सौ देंगे। मैंने मना कर दिया कि ग्यारह किलोमीटर के हम सौ भी नहीं देंगे, पचास देंगे। सभी ऑटो वालों ने मना कर दिया। हम मुख्य सडक की ओर बढ चले।
तभी पीछे से एक ऑटो वाला आया और अस्सी मांगने लगा। पता नहीं क्या मन में आया, हम सहमत हो गये। उसने हमें सीधे मन्दिर की बगल में उतारा और एक होटल में कमरे के लिये कन्नड में बात भी की। होटल वाले को हिन्दी बहुत कम आती थी। एक बहुत बडा कमरा दिखाया। किराया था पांच सौ रुपये। मुझे कमरा पसन्द आया, पर्याप्त हवादार और रोशनीयुक्त था। बिना मोलभाव के ले लिया। कमल ने कहा भी कि मोलभाव तो कर लेते। मैंने मना कर दिया कि यह इतना बडा, हवादार और रोशनीयुक्त कमरा पांच सौ में भी सस्ता है, इसलिये मोलभाव की आवश्यकता नहीं। जो चीज मुझे पसन्द आ जाती है, मैं उसके लिये अक्सर मोलभाव नहीं किया करता।
गोकर्ण का अर्थ गाय का कान होता है। इसके बारे में कई कथाएं हैं जिनका उल्लेख मैं यहां नहीं करूंगा। यह वैसे तो एक धार्मिक स्थान है लेकिन समुद्र किनारे होने के कारण पर्यटक भी काफी आते हैं। कई बीच भी यहां हैं। मेरा उद्देश्य उन बीच को देखना था।
धार्मिक रूप से मुख्य आकर्षण महाबलेश्वर मन्दिर है जहां शिव की पूजा होती है। हमारे कमरे की खिडकी से मन्दिर बहुत अच्छी तरह दिखता था। मन्दिर के जो भी फोटो खींचे, सभी खिडकी से ही खींचे।
मन्दिर का एक चक्कर लगाकर हम सामने एक गली में चल पडे जहां से समुद्र कुछ ही दूर रह जाता है। आसमान में बादल छाये थे, भीड बिल्कुल नहीं थी और बीच पर गन्दगी का साम्राज्य था। साथ ही कौवों और कुत्तों का भी।
गोकर्ण में पांच बीच हैं- क्रमशः मुख्य बीच, कुडले बीच, ओम बीच, हाफ मून बीच और पैराडाइज बीच। पैराडाइज बीच को फुल मून बीच भी कहते हैं। मुख्य बीच तो मन्दिर के सामने ही है जहां गन्दगी का साम्राज्य था। यहां मुख्यतः धार्मिक लोग होते हैं जो मन्दिर देखने आते हैं और लगे हाथों समुद्र भी देख लेते हैं। इसके दक्षिण में बाकी बीच हैं। कुडले बीच सडक मार्ग से नहीं जुडा है, ओम बीच तक सडक है, बाकी दोनों बीच तक भी शायद सडक है या फिर शायद नहीं है। ओम बीच गोकर्ण से सडक मार्ग से सात-आठ किलोमीटर है। मेरी इच्छा पैदल ही छोटे पहाडी रास्ते से ओम बीच तक जाने की थी जिससे रास्ते में पडने वाले कुडले बीच को भी देख सकें। कमल को अपनी इच्छा बताई और उसकी भी सहमति मिलते ही कुडले का रास्ता पूछा और चल दिये।
चूंकि पहाडी रास्ता है, इसलिये उतार चढाव रहते ही हैं। यहां से पहले कुछ चढाई है, फिर उतराई। एक व्यक्ति से पूछा तो मेरे समझने में गलती हो गई और गलत सीढियों पर चढने लगे। खैरियत थी कि ज्यादा नहीं चढना पडा। लेकिन मानसून के कारण सीढियों पर काई जमी थी, जहां फिसलने का डर था। शुक्र रहा कि नहीं फिसले।
एक मन्दिर के अहाते में पहुंचे। यह शायद राम मन्दिर है, समुद्र से कुछ ऊपर है लेकिन इसकी दीवारों को पानी स्पर्श करता है। यहां बैठकर समुद्र को देखना अच्छा लगता है। साथ ही सामने फैला गन्दा गोकर्ण बीच भी दिखता है।
मन्दिर से फिर सीढियां शुरू होती हैं। सौ के करीब रही होंगी, फिर एक मैदान के दर्शन होते हैं। यहीं एक छोटा सा कुछ है जो खण्डहर हो गया है। समुद्र की पृष्ठभूमि में हरी काई से युक्त यह बडा आकर्षक लगता है। इसके प्रत्येक फोटो शानदार आये।
आगे बढे तो मैदान जारी रहता है। इसमें गायें चर रही थीं। अगर उमस न होती और पीछे विशाल पर्वत होते तो यह गढवाल के तीन हजार मीटर ऊंचे बुग्यालों जैसा नजारा होता। कमल को यह जगह बहुत पसन्द आई, तभी तो मैं धीरे धीरे चलते हुए भी बहुत आगे निकल गया और वह मन्द मन्द चाल से प्रत्येक क्षण का आनन्द लेता चल रहा था।
हम छोटे रास्ते से आये थे, एक लम्बे रास्ते से गोकर्ण से आई सडक भी मिल गई। सडक क्या है, बस गाडियों के चलने लायक रास्ता है। आखिरकार वह भी समाप्त हो जाता है। यहां कुछ ऑटो खडे थे जो मछुआरों के थे। यहां से एक खडी ढलान पर नीचे समुद्र की लहरें थपेडें मारती हैं। कटा फटा तट है, यह बिना नाव वाले मछुआरों के लिये आदर्श है। कुछ ही देर में झोला भर कर मछलियां पकड लेते हैं जिनकी गोकर्ण में पर्याप्त खपत है।
अब कुडले बीच के लिये पगडण्डी शुरू होती है। उतराई है। बडा तेज ढलान है। मैं नीचे उतर ही रहा था कि बारिश शुरू हो गई। कमल पीछे रहकर फायदे में रहा। वह एक ऑटो में जा घुसा। मेरे छिपने को कुछ नहीं था। वापस भागता तो एक तो ऊपर चढना पडता और भीग भी जाता। इससे तो अच्छा है कि नीचे ही उतरे चलो। सामने कुडले बीच दिख रहा था।
इस ढलान पर नीचे उतरने में हिमालय का अनुभव काम आया। पतली सी पगडण्डी और भयंकर ढलान, फिर बारिश की वजह से फिसलन भी हो गई। हवा इतनी तेज कि गिरा देने को तैयार। हवा की दिशा के हिसाब से कैमरे को छुपाना पडा। फिर भी खोल भीग गया, कैमरा बचा रहा। एक बरसाती नाला पार करना पडा, हालांकि बरसात होने के बावजूद भी उसमें पानी नहीं था। इसकी गहराई छह फीट के आसपास रही होगी, दीवारें बिल्कुल खडी। पहले तो इसमें उतरना मुश्किल पडा, फिर बाहर निकलना भी मुश्किल।
जब कुडले बीच के पास पहुंचा, तब तक अच्छी तरह भीग चुका था। बीच देखने और आगे ओम बीच जाने का सारा उत्साह हवा हो गया था। एक धूलयुक्त बरामदे में शरण ली। कपडे उतारे और निचोडकर कुछ देर सूखने को टांग दिये। तभी नीचे एक दुकान वाले की निगाह पडी। वह ऊपर आया। भाषा-भेद के कारण वह ज्यादा कुछ नहीं कह सका लेकिन उसका इरादा मुझे वहां से चलता कर देने का था। बरामदे से लगते कुछ कमरे थे, सभी में ताला लगा था। बरामदा स्वयं उजाड सा था। महीनों से उसमें झाडू तक नहीं लगी थी। फिर वह क्यों मुझे वहां से खदेडना चाहता था, समझ नहीं आया। यह बात मैंने उससे नहीं पूछी, गीले कपडे ही पहने और वापस चल दिया।
जिस रास्ते आया था, उसी रास्ते अब जाना था। बारिश थम चुकी थी। फोन नेटवर्क काम कर रहा था। पता चला कि कमल ऊपर ऑटो के पास ही है। मैंने पन्द्रह मिनट में आने को कह दिया। अब रास्ता चढाई भरा था। कोई मुश्किल नहीं हुई। गीले रास्ते पर उतरने में मुश्किल होती है, चढने में नहीं।
ऊपर गया तो कमल नहीं मिला। फिर फोन काम आया। पता चला वो उस नये बने रास्ते से वापस गोकर्ण की ओर जा रहा है। हम छोटे रास्ते से आये थे, इस बार सडक से जायेंगे। जल्दी ही फिर दोनों साथ थे। मैं जूते पहनने के बावजूद भी फिसलने से भयभीत था। नम मौसम होने के कारण फिसलन बहुत ज्यादा थी।
रात पता चला कि प्रशान्त अब मैसूर में है। उसने स्टेशन पर डोरमेटरी में एक बिस्तर ले लिया। वहां खटलमों की बहुतायत थी। हम चूंकि फेसबुक पर चैटियाने में लगे थे, इसलिये थोडी थोडी देर बाद वो सारा अपडेट बता देता था कि इस दौरान कितने खटमलों ने उसे काटा और कहां कहां काटा। अपने साथी की इस तरह की दुर्गति से आनन्द आता है। पूरी रात वो सो नहीं पाया। मैंने उसे कहा भी कि खटमलों का शीघ्रता से कोई इलाज नहीं किया जा सकता। इन्हें खदेडना एक लम्बा काम होता है, इसलिये तू कहीं बाहर जाकर कोई कमरा ले ले। लेकिन उसने मना कर दिया। अगले दिन पता चला कि उसने इसकी शिकायत कर दी। शिकायत पर अविलम्ब अमल किया गया और डोरमेटरी को चार दिनों के लिये बन्द कर दिया गया और खटमल मारने की दवा छिडक दी गई।
मेरा भी इस भयानक रक्त शोषक जीव से कई बार सामना हो चुका है। अच्छी तरह जानता हूं इसका स्वभाव और इसे नष्ट करने के तरीके। यह अन्धेरी और नम जगह पर पनपता है। दरारों और कपडों की तहों में छुपा रहता है। किसी सोते हुए आदमी के ऊपर अक्सर नहीं चढता। सशंक जीव है। बिस्तर पर चढकर शरीर के उन अंगों को निशाना बनाता है जो सीधे बिस्तर के सम्पर्क में रहते हैं ताकि इसे शरीर पर न चढना पडे।
इसे मारने का तरीका है साफ सफाई और शुष्क वातावरण। कीटनाशकों को भी इसे मारने में समय लग जाता है इसीलिये स्टेशन पर डोरमेटरी को चार दिनों के लिये बन्द कर दिया गया।
अगले दिन। आज ग्यारह बजे वहीं ट्रेन है जिससे कल हम आये थे। आज कोंकण रेलवे की बाकी बची यात्रा पूरी कर लेंगे- गोकर्ण रोड से मडगांव तक। इस बार ऑटो नहीं लिया बल्कि बस से गये। बस कुमटा जा रही थी। उसने रेलवे पुल के नीचे उतार दिया जहां से स्टेशन करीब एक किलोमीटर दूर है। कमल ने एक स्कूटर वाले को रुकवा लिया। हालांकि मैं पैदल ही गया। इस दौरान कमल ने टिकट भी ले लिये।

गोकर्ण की एक गली


हमने सोचा यहां भण्डारा मिलेगा लेकिन गये तो कोई भण्डारा नहीं दिखा। बल्कि अन्नदान के नाम पर पैसों का दान लिया जाता है। धनदान कब से अन्नदान के बराबर हो गया?

गोकर्ण बीच




राम मन्दिर से दिखता गोकर्ण बीच


राम मन्दिर से आगे कुडले बीच की तरफ सीढियां

एक खण्डहर







यहां मछुआरे मछलियां पकडते हैं जिनकी गोकर्ण में बहुत खपत है।



कुडले बीच


महाबलेश्वर मन्दिर



अगला भाग:  एक लाख किलोमीटर की रेल यात्रा

पश्चिमी घाट यात्रा
1. अजन्ता गुफाएं
2. जामनेर-पाचोरा नैरो गेज ट्रेन यात्रा
3. कोंकण रेलवे
4. दूधसागर जलप्रपात
5. लोण्डा से तालगुप्पा रेल यात्रा और जोग प्रपात
6. शिमोगा से मंगलुरू रेल यात्रा
7. गोकर्ण, कर्नाटक
8. एक लाख किलोमीटर की रेल यात्रा




Comments

  1. मन्दिर में गये थे पर सीढ़ियाँ नहीं चढ़ीं। बड़ा आनन्द आया था।

    ReplyDelete
  2. Samudra ke sath chalna bahut achcha lagta he . Kamal sir photo me kuch soch rahe aesa lagta he .

    ReplyDelete
  3. अरे गोकर्ण बीच तो बड़ा ही गन्दा निकला। कुत्ते वाला चित्र तो एकदम ही वाहियात लग रहा है :(

    ReplyDelete
  4. yatra sahi chal rahi h chalte raho neeraj bhai.

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

ट्रेन में बाइक कैसे बुक करें?

अक्सर हमें ट्रेनों में बाइक की बुकिंग करने की आवश्यकता पड़ती है। इस बार मुझे भी पड़ी तो कुछ जानकारियाँ इंटरनेट के माध्यम से जुटायीं। पता चला कि टंकी एकदम खाली होनी चाहिये और बाइक पैक होनी चाहिये - अंग्रेजी में ‘गनी बैग’ कहते हैं और हिंदी में टाट। तो तमाम तरह की परेशानियों के बाद आज आख़िरकार मैं भी अपनी बाइक ट्रेन में बुक करने में सफल रहा। अपना अनुभव और जानकारी आपको भी शेयर कर रहा हूँ। हमारे सामने मुख्य परेशानी यही होती है कि हमें चीजों की जानकारी नहीं होती। ट्रेनों में दो तरह से बाइक बुक की जा सकती है: लगेज के तौर पर और पार्सल के तौर पर। पहले बात करते हैं लगेज के तौर पर बाइक बुक करने का क्या प्रोसीजर है। इसमें आपके पास ट्रेन का आरक्षित टिकट होना चाहिये। यदि आपने रेलवे काउंटर से टिकट लिया है, तब तो वेटिंग टिकट भी चल जायेगा। और अगर आपके पास ऑनलाइन टिकट है, तब या तो कन्फर्म टिकट होना चाहिये या आर.ए.सी.। यानी जब आप स्वयं यात्रा कर रहे हों, और बाइक भी उसी ट्रेन में ले जाना चाहते हों, तो आरक्षित टिकट तो होना ही चाहिये। इसके अलावा बाइक की आर.सी. व आपका कोई पहचान-पत्र भी ज़रूरी है। मतलब

46 रेलवे स्टेशन हैं दिल्ली में

एक बार मैं गोरखपुर से लखनऊ जा रहा था। ट्रेन थी वैशाली एक्सप्रेस, जनरल डिब्बा। जाहिर है कि ज्यादातर यात्री बिहारी ही थे। उतनी भीड नहीं थी, जितनी अक्सर होती है। मैं ऊपर वाली बर्थ पर बैठ गया। नीचे कुछ यात्री बैठे थे जो दिल्ली जा रहे थे। ये लोग मजदूर थे और दिल्ली एयरपोर्ट के आसपास काम करते थे। इनके साथ कुछ ऐसे भी थे, जो दिल्ली जाकर मजदूर कम्पनी में नये नये भर्ती होने वाले थे। तभी एक ने पूछा कि दिल्ली में कितने रेलवे स्टेशन हैं। दूसरे ने कहा कि एक। तीसरा बोला कि नहीं, तीन हैं, नई दिल्ली, पुरानी दिल्ली और निजामुद्दीन। तभी चौथे की आवाज आई कि सराय रोहिल्ला भी तो है। यह बात करीब चार साढे चार साल पुरानी है, उस समय आनन्द विहार की पहचान नहीं थी। आनन्द विहार टर्मिनल तो बाद में बना। उनकी गिनती किसी तरह पांच तक पहुंच गई। इस गिनती को मैं आगे बढा सकता था लेकिन आदतन चुप रहा।

जिम कार्बेट की हिंदी किताबें

इन पुस्तकों का परिचय यह है कि इन्हें जिम कार्बेट ने लिखा है। और जिम कार्बेट का परिचय देने की अक्ल मुझमें नहीं। उनकी तारीफ करने में मैं असमर्थ हूँ क्योंकि मुझे लगता है कि उनकी तारीफ करने में कहीं कोई भूल-चूक न हो जाए। जो भी शब्द उनके लिये प्रयुक्त करूंगा, वे अपर्याप्त होंगे। बस, यह समझ लीजिए कि लिखते समय वे आपके सामने अपना कलेजा निकालकर रख देते हैं। आप उनका लेखन नहीं, सीधे हृदय पढ़ते हैं। लेखन में तो भूल-चूक हो जाती है, हृदय में कोई भूल-चूक नहीं हो सकती। आप उनकी किताबें पढ़िए। कोई भी किताब। वे बचपन से ही जंगलों में रहे हैं। आदमी से ज्यादा जानवरों को जानते थे। उनकी भाषा-बोली समझते थे। कोई जानवर या पक्षी बोल रहा है तो क्या कह रहा है, चल रहा है तो क्या कह रहा है; वे सब समझते थे। वे नरभक्षी तेंदुए से आतंकित जंगल में खुले में एक पेड़ के नीचे सो जाते थे, क्योंकि उन्हें पता था कि इस पेड़ पर लंगूर हैं और जब तक लंगूर चुप रहेंगे, इसका अर्थ होगा कि तेंदुआ आसपास कहीं नहीं है। कभी वे जंगल में भैंसों के एक खुले बाड़े में भैंसों के बीच में ही सो जाते, कि अगर नरभक्षी आएगा तो भैंसे अपने-आप जगा देंगी।