Monday, February 4, 2013

लद्दाख यात्रा- लेह आगमन

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राम-राम से जुले-जुले तक
लेह उतरने से कुछ मिनट पहले उदघोषणा हुई कि विमान लेह के कुशोक बकुला रिन्पोछे हवाई अड्डे पर उतरने वाला है। कुशोक बकुला रिन्पोछे नाम से ही पता चल रहा है कि हम लद्दाखी जमीन पर आ गये हैं। असल में कुशोक बकुला पिटुक गोनपा के प्रधान लामा थे। लेह के हवाई अड्डे के एक तरफ तो लेह शहर है जबकि दूसरी तरफ पिटुक गोनपा है। पिटुक को अंग्रेजी में स्पिटुक (Spituk) लिखा जाता है, जिससे कुछ लोग इसे स्पिटुक मोनेस्ट्री भी कहते हैं।
जब विमान पौने आठ बजे लेह के रनवे पर लैंड कर चुका और रुकने के लिये दौडता जा रहा था, तब पुनः उदघोषणा हुई कि हम अपने मोबाइल चालू कर सकते हैं। हालांकि मुझे कोई जल्दी नहीं थी, इसलिये चालू नहीं किया। सवा घण्टे पहले हम 200 मीटर की ऊंचाई पर थे, अब 3200 मीटर की महा-ऊंचाई पर, इसलिये शरीर पर कुछ असर तो होना ही था। असर होना तभी शुरू हो गया जब विमान का दरवाजा खोला गया। अभी तक हम दिल्ली वाले वायुदाब पर ही थे, क्योंकि वायुयान एयरटाइट था। अब जब अचानक दरवाजा खोला गया तो दिल्ली की भारी हवा निकल गई और लेह की हल्की हवा अन्दर भर गई। सीट से उठकर दरवाजे की ओर जाते समय यह अन्तर साफ महसूस हो रहा था।
घोषणा हुई कि बाहर तापमान माइनस दस डिग्री है। मैंने दिल्ली के हिसाब से कपडे पहन रखे थे लेकिन जब बाहर निकला तो अहसास हो गया कि यही कपडे लेह में भी पर्याप्त होंगे। अगले दिन चिलिंग पहुंचने तक मैंने यहीं कपडे पहने रखे.जबकि तापमान माइनस पन्द्रह से भी कम पहुंच गया था। लद्दाख की जमीन पर पैर रखने के आधे घण्टे के अन्दर मैंने जान लिया कि मेरे पास माइनस पच्चीस डिग्री तक के लिये पर्याप्त कपडे हैं। जितने कपडे मैंने पहन रखे हैं, बैग में उससे भी ज्यादा कपडे हैं।
बाहर निकलकर विकास को फोन किया। विकास सीआरपीएफ में है और इस समय ड्यूटी जेल में है, बुआ का लडका है, भाई है। लेह के मुख्य चौक से चार पांच किलोमीटर दूर श्रीनगर रोड पर हवाई अड्डा है, जबकि मनाली रोड पर सात किलोमीटर दूर जेल है। टैक्सी वाले ने डेढ सौ रुपये मांगे। मैंने विकास से कहा कि दस किलोमीटर के लिये मैं डेढ सौ रुपये नहीं दूंगा। उसने कहा कि एयरपोर्ट से बाहर निकलकर सडक पार कर ले, दस दस रुपये वाली टैक्सियां चलती हैं, वहां से मुख्य चौक पर दोबारा टैक्सी बदलकर फिर से दस रुपये वाली में बैठकर जेल पर आ जा।
सीआरपीएफ की एक टुकडी हवाई अड्डे पर भी है। बाद में विकास की सलाह के अनुसार खाना बांटने वाली सीआरपीएफ की गाडी से मैं जेल में पहुंच गया।
जिन्दगी में पहली बार लद्दाख आया और आते ही जेल में।
आप अगर वायुयान से दिल्ली से लेह पहुंचते हैं, तो यह शरीर के साथ भीषण अत्याचार है। मैं वैसे भी कमजोर शरीर वाला हूं, तो मेरे लिये यह अत्याचार और भी भीषण है। मस्तिष्क ने तापमान परिवर्तन तो स्वीकार कर लिया, लेकिन वायुदाव परिवर्तन स्वीकार करना बहुत बडी बात है।
पिछले दिनों दिल्ली में तापमान एक डिग्री तक पहुंच गया था और आर्द्रता सौ प्रतिशत। सौ प्रतिशत आर्द्रता का अर्थ है कि वायु में और अधिक पानी नहीं समा सकता, गीले कपडे नहीं सूख सकते। सूखे कपडों को थोडी देर बाहर टांग दो, गीलापन आ जायेगा। रात में ओस इसी वजह से पडती है। दिल्ली की सर्दी की यही समस्या है कि कितने ही कपडे पहनकर चलो, कपडों में गीलापन आ ही जायेगा। इस प्रकार दिल्ली में तापमान जब एक डिग्री हुआ तो दो तरफा मार पडी- कम तापमान और उच्च आर्द्रता।
लद्दाख में ऐसा नहीं है। यह चूंकि मरुस्थल है, इसलिये आर्द्रता कम ही रहती है। इस दिनों यह पचास प्रतिशत थी। कपडों के गीले होने का सवाल ही नहीं। हालांकि ठण्ड जबरदस्त होती है लेकिन रात में ओस नहीं पडती, बरफ भी नहीं गिरती। इसी कारण दिल्ली की सर्दी और लेह की सर्दी मुझे समान मालूम हुई।
वायुदाब की कमी का अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब शाम को मैंने अपनी पानी की खाली बोतल भरने के लिये खोली तो ढक्कन को हल्का सा ढीला करते ही ढक्कन बडी तेजी से उड गया और काफी दूर जा गिरा। बोतल दिल्ली में ही खाली हो चुकी थी, उसमें पानी नहीं था, मात्र हवा भरी थी। जब मैं लेह आ गया तो बोतल में दिल्ली के प्रेशर वाली हवा ही भरी रही जबकि यहां हवा का प्रेशर करीब चालीस प्रतिशत कम है। ढक्कन के ढीला करते ही उसमें उच्च दाब वाली हवा के कारण ढक्कन का दूर जा गिरना पक्का था। इसी कारण मैंने सोच रखा था कि दो दिनों तक लेह में खाली पडा रहूंगा। इस कम वायुदाब के अनुसार शरीर अपने आप सन्तुलित हो जायेगा।
रात सोते समय पैर का पंजा सो गया। पंजे व दो-तीन उंगलियों में चींटी सी चलने लगी, बेचैनी हो गई। किसी तरह पैर हिला-हिलाकर पंजा जगाया गया। नींद आई तो कुछ देर बाद एडी सो गई। बडी समस्या है- अजीब अजीब बीमारियां। कहीं यह वायुदाब के कारण ही तो नहीं है। हृदय ने पैर के सुदूर सीमावर्ती इलाकों में खून की सप्लाई कम कर दी। इसका मतलब निम्न रक्तदाब? क्या वायुदाब कम होने से रक्तदाब भी कम हो जाता है?
लेह में ज्यादातर दुकानें बन्द हैं, कुछ खुली हैं। विकास के मित्र राजेन्द्र के साथ एक ट्रेकिंग वाली दुकान पर गया। चादर ट्रेक के लिये पूछताछ की। खर्चा बताया एक आदमी का चौबीस हजार रुपये। इससे पहले कि आंखों के सामने अन्धेरा छाता, हम वहां से खिसक लिये।
सभी टूर ऑपरेटरों का अपना बंधा-बंधाया रूटीन है। मेरी जरुरत किसी ने नहीं सुनी। मैं कहता कि मुझे मात्र स्लीपिंग बैग और एक पोर्टर चाहिये, जो चार दिनों का राशन ले जा सके। ज्यादा सामान हो तो दो का खर्चा भी उठा लूंगा। वे कहते कि एक गाइड, दो पोर्टर व एक हेल्पर के बिना काम नहीं चलेगा। चार की बजाय छह दिन लगेंगे। स्लीपिंग बैग के अलावा टैंट भी चाहिये।
मैं अपने जी पर पत्थर रखकर दस हजार तक खर्च करने को तैयार था। आखिर सर्दियों में लद्दाख बार-बार नहीं आया जाता। लेकिन मेरी किसी ने नहीं सुनी।
एक टैक्सी वाले से बात की, वो कल मुझे चिलिंग ले जायेगा। लेह से करीब 70 किलोमीटर दूर है चिलिंग। जांस्कर नदी के किनारे बसा हुआ।

17 जनवरी 2013
सुबह उठा तो सीआरपीएफ वाले साथी नहाने को कहने लगे। बोले कि गर्म पानी है, नहा ले। भला उनके यहां बिजली व मिट्टी के तेल की क्या कमी- पानी गर्म करने के लिये। मैंने मना कर दिया कि लद्दाख की इस दस दिन की यात्रा में एक बूंद भी पानी सिर पर नहीं डालना है। फिर कहने लगे कि फ्रेश तो हो ले। मैंने उसके लिये भी मना कर दिया कि जब शरीर को जरुरत होगी, अपने आप संकेत मिल जायेंगे। बे-वजह इतनी ठण्ड में मैं नंगा होने वाला नहीं हूं। आखिरकार उनकी घेराबंदी व जिद के आगे गर्म पानी से मुंह धोना पड गया।

(पिछली पोस्ट की तरह यह पोस्ट भी बिना फोटू की है और मैटीरियल भी काफी कम है। इसका कुछ और कारण है। पिछली पोस्ट मेरी पहली हवाई यात्रा पर केन्द्रित थी, आज की पोस्ट उससे मेल नहीं खाती। अगली पोस्ट सिन्धु घाट की रहेगी, वो भी आज की पोस्ट से बे-मेल है।)


अगला भाग: लद्दाख यात्रा- सिन्धु दर्शन व चिलिंग को प्रस्थान


लद्दाख यात्रा श्रंखला
1. पहली हवाई यात्रा- दिल्ली से लेह
2. लद्दाख यात्रा- लेह आगमन
3. लद्दाख यात्रा- सिन्धु दर्शन व चिलिंग को प्रस्थान
4. जांस्कर घाटी में बर्फबारी
5. चादर ट्रेक- गुफा में एक रात
6. चिलिंग से वापसी और लेह भ्रमण
7. लेह पैलेस और शान्ति स्तूप
8. खारदुंगला का परमिट और शे गोनपा
9. लेह में परेड और युद्ध संग्रहालय
10. पिटुक गोनपा (स्पिटुक गोनपा)
11. लेह से दिल्ली हवाई यात्रा

19 comments:

  1. नीरज भाई, आशा है की आप अपने वादे पे कायम रहेंगे ! नहीं नहाने के वादे पे ! देखते है आगे क्या होता है!

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  2. हवा के दबाब के अंतर वाली बात अच्छे से समझाई! आगे की पोस्ट का इंतजार है अब!

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  3. अरे यू कै, दवाब में आके मुँह धो लिया, हम तो यही जानते थे कि नीरज मानसिक रुप से (पहाड़ों पर शारीरिक कमजोरी, ऊँचाई के कारण दिखायी देती है।) बहुत मजबूत है, अपनी बात मनवाता है यू यहाँ मुँह धो लिया, धत्त तेरी की,

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  4. नीरज जी! कुछ लद्दाख के फोटो में दर्शन करवा दो, बड़ी महान कृपा होगी।

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  5. तन्नै पहले ही कह दिया था के वायु दाब संभाल के रखियो……… आखिर ढक्कन उड़ा ही दिया न। :)

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  6. थोडा और पढने को मिलता तो और ज्यादा मज़ा आता ,खैर काफी मज़ा चखने को मिल गया अब आगे का इंतजार है ....

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  7. थोडा और पढने को मिलता तो और ज्यादा मज़ा आता ,खैर काफी मज़ा चखने को मिल गया अब आगे का इंतजार है ....

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  8. रक्तदाब बाहर के वायुदाब के कारण परिवर्तित नहीं होता।
    आप की यह पोस्ट नए लोगों को साधारण वैज्ञानिक जानकारी प्रदान करने के लिए भी उपयोगी है।

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  9. आप ने तो साक्षात् दर्शन करा दिये लेह के । जाना कब होगा पता नहीं, पर इतना पता चल गया कि ये आसां न होगा । साधुवाद !

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  10. आप ने तो साक्षात् दर्शन करा दिये लेह के । जाना कब होगा पता नहीं, पर इतना पता चल गया कि ये आसां न होगा । साधुवाद !

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  11. वहाँ के कम दबाव में अन्दर से हल्का लग रहा होगा...प्रकृति के साथ..

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  12. पहली बार लद्दाख आये और आते ही जेल में :-)

    पानी सिर पर नहीं डालना है ना डालो बाक़ी शरीर पर तो डाला जा सकता है!

    बढ़िया वृतांत

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  13. बहुत बढिया. . . . वाकई. . . . बडा मजा आ रहा है। ठण्ड की बात आपने चौकांनेवाली कही। लेकिन बढिया। और वायुदाब के बारे में आप बिलकुल सही कह रहे है। लेह में 3505 मीटर ऊँचाई पर वायूदाब सामान्य दबाव की तुलना में मात्र 62% रह जाता है। मुझे आपसे बडी, बहुत बडी जलन हो रही है . . . .

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  14. बहुत बढ़िया जा रहे हो ..इस बार भी फोटू न लगाने से मजा आधा हो गया नीरज .....

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  15. भाई जेल का नाम सुन के ही डर गये थे पर पूरी पोस्ट पढके आनंद आगया, डटा रह मजबूती से.

    रामराम.

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  16. नीरज जी....
    बढ़िया रही यात्रा....एक बात तो वायू दाव और तापमान का काफी प्रभाव पड़ता हैं...और हमारे जवान इसी तापमान में मुस्तैदी से तैनात रहते हैं....|आपके भाई में बड़ा हि गलत काम किया आपके साथ...जबरदस्ती मुँह धुलवा ही दिया....

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  17. नीरज भाई, ऊंचाई पर वायु दाब घटने से शरीर का रक्त दाब बढ़ जाता है, वैसे द्विवेदी जी भी सही कह रहे हैं कि शरीर पर फर्क नहीं पड़ता, लेकिन जब आप धीरे धीरे ऊंचाई की ओर बढ़ते हैं, तभी शरीर खुद को अनुकूलित कर पाता है, हवाई जहाज से जाने पर तो दिक्कत होती ही है। ब्लड प्रेशर बढ्ने के कारण ही कुछ लोगों को नाक से नकसीर आने लगती है, क्योंकि नाक के अंदर की नसें बहुत पतली और नाजुक होने के कारण अधिक रक्त दाब में फट जाती हैं। वैसे ये ड्राइनेस्स के कारण भी होता है, आर्द्रता कम होने से भी। माउंटेन सिकनेस और हाई आल्टीट्यूड प्रॉबलम भी इसी वजह से होती है। जब हम अमरनाथ गए थे तो वहाँ पहुँचते ही हमारे सामने एक आदमी एक डैम से मर गया ! गुफा तक जाते जाते मेरी भी हालत खराब हो गयी थी, मैंने तो सब साथियों को बता दिया था। लद्दाख यात्रा मे भी कुछ साथियों कि तबीयत खराब हो गयी थी। अभी लेटेस्ट खतलिंग यात्रा मे भी मासर ताल से कुछ नीचे हम 3 मे से 2 बोल गए थे !!
    इस स्वप्निल यात्रा के लिए बधाई ! मेरा भी ख्वाब है सर्दी मे लद्दाख जाने का !! ख्वाब तो कई हैं ! देखने मे क्या जाता है !! कालिंदी ट्रेक भी एक ख्वाब है !! कभी साथ तो ले चलो नीरज भाई कहीं !!!

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