Saturday, September 10, 2011

चकराता में टाइगर फाल

अपनी श्रीखण्ड यात्रा पूरी करने के बाद हमारी योजना रामपुर से रोहडू, आराकोट, त्यूनी और चकराता होते हुए वापस आने की थी। आराकोट में हम हिमाचल छोडकर उत्तराखण्ड में घुस गये। और उस दिन त्यूनी के बाद हमारे साथ जो घटना घटी, उसे मैं पहले ही बता चुका हूं। खैर किसी तरह रास्ता ढूंढते ढूंढते सहिया पहुंचे। यह कस्बा चकराता और विकासनगर के बीच में है।
अगले दिन सुबह ही सहिया से चल पडे। करीब बीस किलोमीटर के बाद चकराता है। वैसे तो हमें कल शाम को ही यहां आ जाना था, लेकिन रास्ता भटक जाने की वजह से यहां नहीं आ सके। चकराता में घुसते ही एक चौक है। यहां से तीन दिशाओं में सडकें निकलती हैं- एक तो वही जिससे हम आये थे विकासनगर वाली, दूसरी सीधे त्यूनी और तीसरी दाहिने मुडकर चकराता के बाजार से होती हुई मसूरी।
हमने चकराता का नाम तो बहुत सुना था लेकिन ले देकर सिर्फ एक ही नाम याद था- टाइगर फाल। बाइक थी ही साथ में और टंकी भी फुल ही थी, तो पूछ ताछकर टाइगर फाल की तरफ चल दिये। कल पूरे दिन बाइक पर बैठे रहने के कारण मेरा मन था कि यहां से पैदल ही निकला जाये लेकिन बाकी सभी बाइक के मोहपाश में जबरदस्त रूप से बंधे बैठे थे। वैसे बारिश भी हो रही थी और जोंकों का भी डर था। बस, एक जोंक ही है जिसकी वजह से मेरा पैदल जाने का उत्साह खत्म हो गया। चलो भाई बाइक से ही चलते हैं। त्यूनी रोड पर करीब दो किलोमीटर आगे जाने पर एक सडक दाहिने की तरफ नीचे उतरती है- यही टाइगर फाल जाती है। दूरी थी करीब 25 किलोमीटर।
जैसी उम्मीद थी हमें बिल्कुल वैसी ही सडक मिली। ठीक ठाक लगभग टूटी फूटी। करीब बीस किलोमीटर के बाद एक और सडक दाहिने से ही नीचे उतरती है। उस नीचे वाली के पास ही है फाल। चकराता का सबसे बडा आकर्षण यही टाइगर फाल है। इसकी ऊंचाई 300 फीट से भी ज्यादा बताई जाती है। यह ऊंचाई इसे हिमालय में सर्वोच्च झरनों में लाने के लिये काफी है।
हम जब बाइकों पर भागे चले जा रहे थे तो हमें यकीन तो था ही कि झरना कहीं पास ही है इसलिये एक से पूछ लिया। उसने बताया कि भाई, आप झरने का रास्ता पीछे छोड आये हो। वैसे तो यह सडक भी झरने के काफी पास तक जाती है लेकिन आगे जबरदस्त भू-स्खलन था इसलिये सडक बन्द थी। लोगबाग सडक से मिट्टी हटाकर बस पैदल चलने लायक रास्ता बना रहे थे। खैर, हम उसके कहे अनुसार कुछ पीछे गये। यहां एक गेट है जहां से एक पक्की पगडण्डी जाती है। हमें बताया गया कि इस पगडण्डी पर आंख मीचकर चलते जाओ, यह सीधे झरने पर ही पहुंचती है। मैंने कहा कि भाई, अगर आंख मीचकर चलेंगे तो गिरना तय है, हां इतनी आंख खोलना कि रास्ता दिखता रहे।
बाइक वही सडक किनारे खडी की और पक्की पगडण्डी पर चल पडे। यह पगडण्डी कुछ आगे जाकर नीचे उतरने लगती है। बारिश और ऊपर खेतों से बहकर पानी भी इस पर ही बह रहा था इसलिये सडक पर काई जम गई थी और फिसलन पैदा हो गई थी। सभी लोग एकाध जगह फिसले भी लेकिन गम्भीर रूप से कोई नहीं गिरा। आमतौर पर हमने आजतक जितने भी झरने देखें हैं सभी पहाड पर ऊपर से खुले में गिरते देखे हैं और उनकी आवाज और दूर से दिखाई पडने के कारण काफी पहले ही पता चल जाता है कि वो रहा झरना लेकिन जब हमें चलते चलते काफी टाइम बीत गया, हम अपने रास्ते के निम्नतम बिन्दु पर पहुंच गये, और झरने का कहीं नामोंनिशान तक नहीं, तो शक होने लगा कि कहीं ऊपर बैठे हमें इधर भेजने वाले ने गलत तो नहीं भेज दिया। मैं और सन्दीप काफी आगे निकल आये, पीछे मुड-मुडकर देखने पर नितिन और विपिन दिखने बन्द हो गये तो समझ लिया गया कि वे वापस चले गये हैं।
लेकिन बात घूम-फिरकर जाट खोपडी पर आ जाती है। हम पर कोई आफत तो आ नहीं रही थी कि हम भी जरा सी बात पर निराश होकर वापस भाग जाते। आगे चलते रहे। एक छोटा सा पुल आया। पुल के उस तरफ एक झोपडी दिख रही थी। सन्दीप भाई ने मुझसे कहा कि यार, काफी देर हो गई है, झरने का कहीं नामोंनिशान तक नहीं। तू झोपडी तक जा, कोई ना कोई जरूर मिलेगा, उससे पूछ। मैं गया तो देखा कि पगडण्डी खत्म हो गई है। झोपडी क्या मात्र छप्पर है और कोई नहीं है। तभी बायीं तरफ धुआं सा उठता दिखा, मैं समझ गया कि वो झरना ही है। नदी के शोर में झरने की आवाज दब गई थी। सन्दीप को बुला लिया। खैर, थोडी देर बाद बाकी दोनों भी गये। वे झरना ना मिलने के कारण बेहद निराश थे। मैंने पहले भी बताया था कि यात्रा की सारी प्लानिंग मेरे और सन्दीप के ही सिर पर थी, बाकी दोनों जरा भी दिक्कत होते ही टांग खींचने का काम करने लगते।
उन्होंने अब भी वैसा ही किया। बोले कि ले ली धार? उल्टे चलो, अब वापसी में वैसे भी चढाई है। उस पहाडी ने हमें चूतिया बना दिया है और तुम बेवकूफ़ इतने समझदार बने फिरते हो, उसकी बातों में झट से आ गये। मैंने थोडी दूर उठते ‘धुएं’ की तरफ इशारा किया। उन्होंने पूछा कि वो क्या है। टाइगर फाल। हालांकि यहां से झरना पूरा नहीं दिख रहा था लेकिन उसके नीचे गिरने से जो धुंध बन रही थी, वो यहां से रोंगटे खडे कर देने के लिये काफी थी। दोनों के दोनों सन्न होकर खडे देखते रहे।
झरने तक पहुंचने के लिये एक छोटी सी नदी पार करनी थी। इसमें पानी ज्यादा तो नहीं था, बीच में काफी पत्थर भी दिख रहे थे लेकिन बहाव भी बहुत तेज था। सन्दीप पहले तो पत्थरों पर पैर रख-रखकर चले, तभी बीच में छपाक से पानी में गिर पडे। पत्थरों पर जबरदस्त काई जमी हुई थी। उनके बाद तो सभी ने बिना पत्थरों का लालच किये सीधे नदी में घुसकर पार की। यह भी गनीमत थी कि यहां नदी काफी दूर तक लगभग समतल में बहती है। अगर आम हिमालयी नदियों की तरह होती तो पानी में घुसते ही काम तमाम हो जाना तय था।
क्या विराट झरना और उससे भी ज्यादा विराट जलराशि! हम इसमें नहाने की योजना बनाकर आये थे लेकिन जब ऊपर से गिरता पानी देखा तो इसके पास भी नहीं गये। डरा रहा था यह झरना। और हम डर गये। दूर दूर से ही फोटो खींचे, जी भरकर निहारा और वापस चल पडे। जाते जाते एक काम और कर दिया कि हमने यह देख लिया कि ऊपर सडक से यह झरना कहां से दिखेगा। जाते समय उसी जगह मोटरसाइकिलें रोककर देखा गया। झरना ऊपर एक समतल घाटी में बहता है, गांव के घरों और खेतों को सींचता हुआ आगे बढता है, और अचानक धडाम से 300 फीट नीचे जा पडता है। ठीक उसी इन्दौर में पातालपानी वाले झरने की तरह जहां पिछले दिनों अचानक पानी आ जाने के कारण पांच लोग ऊपर से कई सौ फीट नीचे गिर पडे और मर गये। यहां भी झरने के बिल्कुल मुहाने पर ऊपर एक झोपडी सी दिख रही थी। हम वहां नहीं गये थे। और हां, यहां हमें कई लोमडियां भी दिखीं। सडक पर चहलकदमी करती हुई भी लेकिन जब फोटो के लिये नीचे उतरे तो भाग गईं।
इसके बाद हम चकराता बाजार में नहीं गये और वापस सहिया होते हुए कालसी पहुंचे।




चकराता रोड


चकराता-टाइगर फाल रोड


टाइगर फाल जाने का पैदल मार्ग


वो छोटा सा पुल जिसका जिक्र ऊपर किया गया है।


सन्दीप भाई नदी पार कर रहे हैं।


और अचानक से छपाक। पीछे झरने की धुंध भी दिख रही है।


टाइगर फाल








मैं खुद तो कभी नहाया नहीं, बल्कि कुदरत ही खुद नहला देती थी।



झरना देख लिया है, अब वापस चलते हैं।





बिल्कुल बीच में एक लोमडी दिख रही है।



ऊपर सडक से झरना ऐसा दिखता है। पहले खेतों से होकर आता है और एकदम धडाम हो जाता है।


टाइगर फाल भी दिख रहा है, वो पुल भी दिख रहा है और वो नया बन रहा मकान भी दिख रहा है।



और अब कालसी के लिये प्रस्थान।

अगला भाग: कालसी में अशोक का शिलालेख


श्रीखण्ड महादेव यात्रा
1. श्रीखण्ड महादेव यात्रा
2. श्रीखण्ड यात्रा- नारकण्डा से जांव तक
3. श्रीखण्ड महादेव यात्रा- जांव से थाचडू
4. श्रीखण्ड महादेव यात्रा- थाचडू से भीमद्वार
5. श्रीखण्ड महादेव यात्रा- भीमद्वार से पार्वती बाग
6. श्रीखण्ड महादेव के दर्शन
7. श्रीखण्ड यात्रा- भीमद्वारी से रामपुर
8. श्रीखण्ड से वापसी एक अनोखे स्टाइल में
9. पिंजौर गार्डन
10. सेरोलसर झील और जलोडी जोत
11. जलोडी जोत के पास है रघुपुर किला
12. चकराता में टाइगर फाल
13. कालसी में अशोक का शिलालेख
14. गुरुद्वारा श्री पांवटा साहिब
15. श्रीखण्ड यात्रा- तैयारी और सावधानी

14 comments:

  1. Bahot baDhiya, chalo isi bahane nahana ho gaya.......:)

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  2. ये खुली वादियाँ, ये हसीं रास्ते।

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  3. भटक-भटक कर मिलती राह.

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  4. मैं खुद तो कभी नहाया नहीं, बल्कि कुदरत ही खुद नहला देती थी।.......... और पोटी(लेट्रिन) का क्या ........??? कुछ भी कहो जाटों ने फोटो मस्त खेंची !! सुन्दर यात्रा वृतांत !!

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  5. जिन इलाकों में घूम रहे हैं वहां का नैसर्गिक सौन्दर्य तो मन मोह रहा है. टाइगर फाल भी कमाल की है. आभार.

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  6. क्या बात है...बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  7. क्या बात है...बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  8. मन को लुभाने वाली तस्वीरें ,हरा -भरा सुहावना मौसम ,
    मन न हो नहाने का फिर भी नहला रही है कुदरत ,
    रास्ते हैं फिसलन भरे ,तभी तो गिरा रही है कुदरत ||
    ...बहुत ही अच्छी यात्रा चल रही है नीरज भाई .....

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  9. वो तो हम पहले ही नहा लिये बारिश में नहीं तो नहाने का पक्का बंदोबस्त कर के गये थे, रही सही कसर नदी पार करने में हो गयी थी।

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  10. हे भ्ग्वन१ कमेन्ट बॉक्स को भी जेब मे दाल कर चकराता ले गए थे.मिल ही नही रहा था. तो घुमक्कड नीरज ! खुद तो घुमते हो हमको फ्री मे घुमा लाते हो.पूरा यात्रा वृत्तांत पढा और.........'उस पहाडी ने हमें ....बना दिया है' पर हम तो अटक गए .भैये !तुम तो हमारी तरह बात करते हो.तुम्हारे चरण कहाँ है? हा हा हा संदीप की भीगी पेंट उनके धडाम से गिरने की गवाह है .तनिक धडाम से गिरे हुए का ही फोटो खींच लेते मजा आ जाता.
    फोटो एक से बढ़ कर एक.यकीन नही होता इतना खूबसूरत स्थान हमारे इतना करीब है.
    पर्यटक स्थल के साइन बोर्ड पर लिखे 'उचांई' जैसे शब्द पर हमारी जनर जल्दी जाती है और लिखवाने वाले को दो झापट र्सिदने की इच्छा होती है मास्टरनी जो ठहरे हा हा हा.जियो.और खूब घूमो फिरो जिव्निसंगिनी भी ऐसीही मिलेकी.....चलो दिलदार चलो चाँद के पार चलो' तुम बोलो और वो झट तैयार हो जाए.तुम्हारा भरोसा नही भाई.धरती के खूबसूरत नजारे देखने के बाद.......हा हा हा

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  11. मन को लुभाने वाली सुन्दर तस्वीरें

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  12. Wo makan kiska hai jo photo me bataya gaya hai, kya waha koi rehta hai

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