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नारायण स्वामी आश्रम

11 जून 2017
अभी ढाई ही बजे थे और हमें बताया गया कि दुकतू से जल्द से जल्द निकल जाओ, अन्यथा यह अनिश्चित समय तक सड़क मार्ग से कट जायेगा। सी.पी.डब्लू.डी. सड़क की खुदाई कर रहा था, इसलिये सड़क बंद होने वाली थी। हमें याद आया कि वहाँ सड़क थी ही नहीं, जीप वालों ने इधर-उधर से निकालकर आना-जाना शुरू कर दिया था। अब वे लोग जब पहाड़ खोदेंगे तो जीप वालों की वह लीक भी बंद हो जायेगी और कोई भी दुकतू न तो आ सकेगा और न ही जा सकेगा। हम दुकतू में एक दिन और रुकना चाहते थे, लेकिन अनिश्चित समय के लिये फँसना नहीं चाहते थे।
सामान बाँधा और निकल पड़े। लेकिन हम यह देखकर हैरान रह गये कि उन्होंने खुदाई शुरू कर दी थी। गुस्सा भी आया कि बताने के बावज़ूद भी दस मिनट हमारी प्रतीक्षा नहीं की इन्होंने। लीक बंद हो चुकी थी। लेकिन एक संभावना नज़र आ रही थी। यहाँ पहाड़ ज्यादा विकट नहीं था और सड़क के बराबर में खेत थे। हम खेतों-खेत जा सकते थे।
खेत में उतर गये और धीरे-धीरे चलने लगे। जे.सी.बी. मशीन पीछे छूट गयी और हम फिर से सड़क पर पहुँचने की संभावना ढूँढ़ने लगे। लेकिन सड़क अब तक काफी ऊपर चली गयी थी, सीधे चढ़ना नामुमकिन था। कुछ दूर सामने खेतों में ही एक गाड़ी खड़ी थी, दो-तीन घर भी थे। हम उनकी तरफ चल दिये। वहाँ से अवश्य ही ऊपर चढ़ने का रास्ता होगा।
लेकिन एक समस्या और सामने आ गयी। बीच में एक नाला था। और आप जानते ही होंगे कि पहाड़ों में जहाँ समतल खेतों के बीच से नाला बहता है, तो काफी गहराई में बहता है। बाइक को सीढ़ियों के रास्ते नीचे उतारने, लकड़ी के पुल से नाला पार करने और फिर से सीढ़ियाँ चढ़ाने में पसीने भी छूटे और नानी भी याद आयी।
ऊपर सड़क तक चढ़ने का रास्ता मिल गया और हम फिर से सड़क पर थे। वह गाड़ी सी.पी.डब्लू.डी. के एक अधिकारी की थी, जो अपने परिवार को भी साथ-साथ घुमा रहा था। उन्होंने ही बताया कि आज हमें नारायण आश्रम जाना चाहिये। वहाँ कमरे भी मिलते हैं और भोजन भी।
वे चार बड़े नाले अभी भी पार करने बाकी थे। इनमें से दो तो अपेक्षाकृत आसान थे और दो मुश्किल। दोनों मुश्किल नालों को पार करने से पहले मैंने दीप्ति को आगाह कर दिया कि उस पार पहुँचकर एक पत्थर पर कैमरा रिकार्डिंग के लिये रख देना और जूते उतारकर दौड़ पड़ने को तैयार रहना। अगर मैं बाइक समेत किसी नाले में गिर पड़ा तो दीप्ति की सहायता के बिना उठना नामुमकिन होता। किस जगह से नाला पार करना है, किस जगह गिरने की संभावना है, यह सब पहले ही ‘कैलकुलेट’ कर लिया था। और यह भी पक्का कर लिया था कि गिरने के बाद नाले में बहूँगा नहीं।




लेकिन इसकी ज़रूरत नहीं पड़ी। आसानी से सभी नाले पार हो गये। ऐसे नालों में मौसम और समय के अनुसार पानी की मात्रा बदलती रहती है। नीचे पड़े पत्थरों की स्थिति भी बदलती रहती है और सड़क की चौड़ाई भी। पानी के बहाव से अंदाज़ा लगाना होता है कि कहाँ कैसा पत्थर पड़ा है। और बहाव से ही पानी में घुसे बिना गहराई का भी अंदाज़ा लग जाता है। बिना अनुभव के इसे नहीं सीखा जा सकता, इसलिये मैं इस बारे में और नहीं लिखूँगा। हाँ, अगर आप ढलान वाले किनारे से इसे पार करेंगे तो असंतुलित होने से बह जाने की ज्यादा संभावना होती है। पहाड़ की तरफ से पार करेंगे तो पानी की रफ़्तार ज्यादा ज़रूर मिलेगी, आप गिर भी सकते हैं, लेकिन बहने का उतना ख़तरा नहीं होगा। ध्यान रखिये, एक बार बहते पानी में गिरने के बाद आपके लिये बाइक उठाना लगभग नामुमकिन होगा, इसलिये अपने साथी को इस बारे में अवश्य सावधान रखिये।
मैं हमेशा जूते पहनकर ही नाले पार करता हूँ। जूतों में ठंड़ा पानी तो अवश्य भरता है, लेकिन पानी के अंदर चिकने पत्थरों पर नंगे पैरों के मुकाबले जूते पहनकर अच्छी पकड़ बनती है।
एक नाले के पास सड़क बनाने वाले मज़दूरों के तंबू थे। बच्चे खेल रहे थे। हमें देखते ही वे हमारे पीछे-पीछे हो लिये - “हम भी देखेंगे, आप कैसे इस नाले को पार करते हो।”
वाकई इनमें दो नाले बड़े मुश्किल हैं। लद्दाख और अन्य जगहों का अनुभव ही काम आया।
दुकतू से चलने के सवा दो घंटे बाद बीस किलोमीटर दूर वरतिंग पहुँचे। चाय पीकर बड़ा आराम मिला।
और सात बजे हम उस स्थान पर खड़े थे, जहाँ से नारायण आश्रम के लिये सड़क अलग होती है। यहाँ से नारायण आश्रम लगभग 26 किलोमीटर दूर है। यानी कम से कम डेढ़ घंटा लगेगा। साढ़े आठ बजे। यानी अंधेरे में पहुँचेंगे। यहीं कुछ ढाबे भी थे। सभी ने एक सुर में कहा कि बहुत अच्छी पक्की सड़क बनी है। हम ‘बहुत अच्छी’ सुनकर नारायण आश्रम की ओर चल दिये।
लेकिन यह पूरा रास्ता बहुत ख़राब है। अंधेरे में बाइक चलाने लायक तो कतई नहीं है। पूरा रास्ता एकदम सुनसान है। पांगू और हिमखोला जैसे गाँव भी हैं। पांगू ठीकठाक गाँव है, लेकिन हमें यहाँ कोई होटल नहीं दिखा। होटल होता तो हम यहीं रुक जाते।
रात साढ़े आठ बजे नारायण आश्रम पहुँचे। सड़क पार्किंग में जाकर समाप्त हो जाती है। आश्रम कुछ ऊपर है। आश्रम में रोशनी थी, लेकिन पार्किंग में एकदम घुप्प अंधेरा। गेट पर ताला नहीं लगा था। सामान उतारकर अंदर प्रवेश कर गये। आवाज़ें लगायीं, तब एक महिला बाहर निकली। चार सौ रुपये प्रति व्यक्ति अर्थात हमें आठ सौ रुपये में दो बिस्तर मिले। खाने का समय हो चुका था, खाना भी मिल गया।




विकीपीडिया के अनुसार, इस आश्रम की स्थापना श्री नारायण स्वामी जी ने 1936 में की थी। इसकी समुद्र तल से ऊँचाई लगभग 2550 मीटर है। सामने नीचे काली नदी बहती है और उधर नेपाल दिखता है। आश्रम अच्छा बना है। बगीचे में अपने गुज़ारे लायक सब्जियाँ उगा लेते हैं और जड़ी-बूटियाँ व मसाले भी। एक पुस्तकालय और एक संग्रहालय भी है। स्वामी जी से संबंधित वस्तुएँ रखी हैं।
सर्दियों में आश्रम में ठहरने की मनाही है, लेकिन यदि भूल-चूक से कोई पहुँच भी जाये तो दो-चार रजाई-गद्दे चौकीदार के पास उपलब्ध रहते हैं।
और मुझे आश्रमों का रत्ती भर भी अनुभव नहीं, इसलिये इससे ज्यादा नहीं लिख सकता। महंगी फीस देखकर अनुभव लेने का मन भी नहीं करता। अन्यथा चीड़ के जंगलों से घिरा यह आश्रम ध्यान व मानसिक शांति के लिये सर्वथा उपयुक्त है।
कैलाश मानसरोवर यात्रा भी यहीं से होकर गुजरती है। हालाँकि बी.आर.ओ. ने नीचे ही नीचे काली नदी के किनारे-किनारे काफ़ी दूर तक रास्ता तैयार कर दिया है, लेकिन कुमाऊँ मंडल विकास निगम अभी भी यात्रियों को यहीं से लेकर जाता है। बस से यात्री यहाँ तक आते हैं। दर्शनोपरांत और भोजनोपरांत पैदल यात्रा आरंभ हो जाती है। आगे कहीं सिरखा है। सिरखा में यात्री रुकते हैं। अगर वर्तमान मोटरमार्ग का भरपूर प्रयोग किया जाये तो एक महीने तक चलने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा को दस दिन तक छोटा किया जा सकता है। यात्रियों का समय भी बचेगा और धन भी। पता नहीं क्यों कुमाऊँ मंडल विकास निगम ऐसा नहीं करता।
खाना खा रहे थे तो रसोई की मालकिन ने कहा - “हम तो जी इतने लोगों को अच्छा खाना खिलाते हैं, ठहरने का बंदोबस्त भी करते हैं, लेकिन आश्रमों की कोई भी प्रशंसा नहीं करता। जबकि यही काम करने वाले गुरुद्वारों की सब प्रशंसा करते हैं। आश्रमों में कोई जूठे बर्तन भी नहीं धोता, जबकि गुरूद्वारों में होड़ लगी रहती है।” यह सुनते ही मुझे और दीप्ति को इतनी जोर से हँसी आयी कि भोजन फेफड़ों में जाने से बाल-बाल बचा। अरे भाई, एक यात्री से एक दिन के चार सौ रुपये भी लोगे और फ्री में सेवा करते गुरूद्वारों से तुलना भी करोगे? हम बर्तन धो देंगे, झाडू भी लगा देंगे, लेकिन चार सौ रुपये लेने के बाद आप गुरूद्वारों से तुलना करने के अधिकारी नहीं रहे।

ऊपर जे.सी.बी. सड़क की खुदाई कर रही है, तो खेतों से होकर जाने के अलावा कोई चारा नहीं रहा...






हम भी देखेंगे, आप कैसे नाला पार करते हो...











नारायण आश्रम



आश्रम से दिखता नेपाल हिमालय



अगला भाग: बाइक यात्रा: नारायण आश्रम से मुन्स्यारी


1. पंचचूली बेस कैंप यात्रा: दिल्ली से थल
2. पंचचूली बेस कैंप यात्रा - धारचूला
3. पंचचूली बेस कैंप यात्रा - धारचूला से दुकतू
4. पंचचूली बेस कैंप यात्रा - दुकतू
5. पंचचूली बेस कैंप ट्रैक
6. नारायण स्वामी आश्रम
7. बाइक यात्रा: नारायण आश्रम से मुन्स्यारी
8. पाताल भुवनेश्वर की यात्रा
9. जागेश्वर और वृद्ध जागेश्वर की यात्रा
10. पंचचूली बेसकैंप यात्रा की वीडियो






Comments

  1. Badiya lekh, shandar photograph,
    narayan ashram ke bare me kelash mansarowar ke ek yatra blog me bhi pada hai

    ReplyDelete
  2. शानदार लेख। अगली कड़ी का इतंजार।

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  3. ऐसे लगता है जैसे मैं ही घूम आया हु धन्यवाद नीरज भाई

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