Monday, August 14, 2017

पंचचूली बेस कैंप यात्रा - धारचूला

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9 जून 2017
थल समुद्र तल से लगभग 900 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। अच्छा-खासा कस्बा है। कुमाऊँ के ऐसे कस्बों में भी ठीक-ठाक चहल-पहल देखने को मिलती है। गढ़वाल और कुमाऊँ में मुझे यही अंतर देखने को मिला। कुमाऊँ ज्यादा जीवंत है।
थल से निकलते ही एक तिराहा है। सीधी सड़क मुनस्यारी चली जाती है और दाहिने मुड़कर डीडीहाट। हम दाहिने मुड़ गये। हमें धारचूला जाना था। अगर सबकुछ ठीक रहा तो वापसी में मुनस्यारी से आयेंगे।
डीडीहाट लगभग 1700 मीटर की ऊँचाई पर है, तो 25 किलोमीटर के इस रास्ते में चढ़ाई ही रहती है। सारा रास्ता पहाड़ के उत्तरी ढलान पर है, इसलिये घने जंगलों वाला है। वर्षावन। यहाँ चीड़ नहीं है। अगर कहीं है भी तो दूसरे अनगिनत प्रजाति के पेड़-पौधों के बीच में दुबका-सिकुड़ा-सा। जून होने के बावजूद भी यहाँ बेहतरीन हरियाली थी। अन्यथा हिमालय में मानसून के दौरान ही हरियाली आनी शुरू होती है। बाइक की स्पीड़ और कम कर ली, ताकि इस हरियाली का भरपूर आनंद लेते रहें। दो-तीन स्थानों पर नाले भी मिले, जिनका पानी सड़क पर आ गया था। कीचड़ भी मिली। रात बारिश हुई थी, तो पहाड़ से छोटे-छोटे पत्थर पानी के साथ सड़क पर आ गये थे। ये पत्थर अभी भी ऐसे ही पड़े थे। बारिश में हिमालय में ऐसा होता है।
घंटे भर में डीडीहाट पहुँच गये। मुझे यह नाम बड़ा आकर्षित करता है। कई साल पहले, जब मैंने दुनिया देखनी शुरू ही की थी, हल्द्वानी बस अड्डे पर डीडीहाट डिपो की एक बस देखी थी। तभी यह नाम मन में बस गया। डीडीहाट - कहाँ होगा यह और कैसी होगी इसकी दुनिया! नक्शे में देखा। नहीं मिला। फिर बाद में और बड़े नक्शे में देखा। मिल गया। पिथौरागढ़ जिले में पिथौरागढ़ से भी बहुत आगे। सपने देखने में क्या जाता है? मैं सपने देखता कि कभी डीडीहाट भी जाऊँगा। आज वो सपना पूरा हुआ। अच्छा मौसम। और उससे भी अच्छी बाज़ार में चहल-पहल। पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा जाने को तैयार बसें। हल्द्वानी जाने को तैयार जीपें। दोपहर बारह बजे के आसपास का समय था।
कुछ खाने-पीने लगे तो ऐसे ही बातचीत भी शुरू हो गयी। हम धारचूला जा रहे हैं - यह जानकर हमें रास्ता बताने लगे - “भाई जी, आपको अस्कोट के रास्ते जाना पड़ेगा। यहाँ से मेन रोड़ से जाओगे तो अस्कोट दूर पड़ेगा। थोड़ा ही आगे से एक शॉर्ट-कट निकलता है। सीधे अस्कोट।”
हमने शॉर्ट-कट ही चुना। मेन रोड़ चौड़ी थी। यह बेहद संकरी। किसी का आना-जाना भी नहीं था। सड़क पर पड़े चीड़ के पत्ते कह रहे थे कि इधर से कोई नहीं जाता। जहाँ कोई नहीं जाता, वहाँ हमें बड़ा आनंद आता है। रास्ते में एक जगह पुलिस ट्रेनिंग स्कूल जैसा भी कुछ मिला। चीड़ के घने जंगलों में। यहाँ तो मज़ा आता होगा पुलिस वालों को लेफ़्ट-राइट करने में।
अस्कोट में फिर से मेन रोड़ मिल गयी। धारचूला रोड़। दो-लेन की। एकदम शानदार। सामने काली नदी दिख रही थी। उसके पार नेपाल।
अस्कोट से थोड़ा ही आगे जौलजीबी है। मिलम ग्लेशियर से आने वाली गोरीगंगा और कैलाश की तरफ़ से आने वाली काली नदी के संगम पर बसा छोटा-सा गाँव है। यहाँ से गोरीगंगा के साथ-साथ एक सड़क जाती है, जो आगे मुन्स्यारी भी पहुँचती है।
एक मित्र हैं कुकरेती साहब। सीमा सड़क संगठन में अच्छे पद पर हैं। उन्हें जब हमारी इस यात्रा का पता चला तो धारचूला में हमारे ठहरने का इंतज़ाम कर दिया। वो तो अच्छा हुआ कि जौलजीबी में एयरटेल का नेटवर्क था, हमारी धारचूला बात हो गयी, अन्यथा बड़ा भटकना पड़ता। बी.आर.ओ. के यहाँ ही हम ठहरे थे। और जैसा कि हर सरकारी विश्राम गृह होता है, यह भी बेहद शानदार था। पचास रुपये किराया और कुछ खाने के पैसे।
हमें आज धारचूला में दो काम करने थे। एक तो ट्रैक के लिये परमिट लेना था और काली पार करके नेपाल घूमना था। लेकिन पहला काम पहले। विश्रामगृह की जिम्मेदारी एक बंगाली दादा संभाल रहे थे। नाम याद नहीं। उन्होंने पिछले दो-तीन दिनों में हमारे लिये एस.डी.एम. कार्यालय में बड़ी भागदौड़ की थी। तो वे व्हाट्सएप पर हमें आवश्यक निर्देश दे देते थे और पहचान-पत्र आदि भी मंगा लेते थे। लेकिन कल उन्होंने बताया कि हमारा मेडिकल होगा, तभी आगे का परमिट मिलेगा। अगर इस बात का पहले ही पता चल जाता तो हम दिल्ली से ही अपना मेडिकल सर्टिफिकेट लेकर चलते।
तो आज हम एस.डी.एम. कार्यालय पहुँचे। उधर मुझे एक उड़ती-उड़ती ख़बर मिली थी कि पंचचूली बेस कैंप जाने के लिये परमिट नहीं लगता। तो सबसे पहले मुझे यही पता करना था कि क्या वास्तव में परमिट लगता है या नहीं। एक ऑफिस में पहुँचे। साहब तो नहीं थे, उनका चपरासी था। साहब का चपरासी है तो समझिये कि साहब का बॉस है। कुर्सी पर एक लड़का और बैठा था। ऐसे कार्यालयों में चपरासी चाहे मैदान के हों, या पहाड़ के; व्यवहार एक-सा ही होता है। शायद कहीं ट्रेनिंग मिलती होगी।
देखते ही बोला - “हाँ, क्या चाहिये? किससे मिलना है? क्या काम है?”
दादा - “साहब नहीं हैं क्या?”
चपरासी - “नहीं, मुझे बताओ क्या काम है।”
दादा - “पंचचूली बेस कैंप का परमिट बनवाना था।”
चपरासी - “कहाँ से आये हो?”
दादा - “दिल्ली से।”
चपरासी - “चरित्र प्रमाण-पत्र लाये हो?”
मैं - “चरित्र प्रमाण-पत्र की ज़रूरत नहीं होती।”
चपरासी - “होती है। किसने कहा नहीं होती? उसके बिना कुछ नहीं बनेगा।”
मुझे बड़ी हँसी आयी। चपरासी तो चपरासी है। उससे किसी भी तरह की समझदारी की उम्मीद नहीं करनी चाहिये। मैं कभी भी ऐसे कार्यालयों में जाना पसंद नहीं करता। यह देखकर मन और भी ख़राब हो गया। हमारी तो अलग बात है। परमिट नहीं भी मिलेगा, तब भी कोई बात नहीं। कहीं और घूम लेंगे। लेकिन जो वास्तव में ज़रूरतमंद होते हैं, उन्हें ये लोग कितने चक्कर लगवाते हैं, यह किसी से छुपा नहीं है।
वहाँ जो एक लड़का कुर्सी पर बैठा था, अब वो चपरासी से बोल पड़ा - “अबे, कौन-सा परमिट लगता है? मैं दुकतू का रहने वाला हूँ और वहाँ का क्षेत्र पंचायत सदस्य हूँ। कोई परमिट नहीं लगता उधर।”
फिर वो हमसे बात करने लगा - “देखिये सर, मैं दुकतू का क्षेत्र पंचायत सदस्य हूँ। यहाँ से जीपें चलती हैं। आप अभी बुकिंग कर लेना और सुबह चले जाना। उधर खाने को भी मिल जायेगा और ठहरने को भी। कोई परमिट नहीं लगता। चेकपोस्ट में केवल अपना नाम-पता लिखना होता है।”
बस, हमारा काम हो गया था। और मैं अभी भी हँस रहा हूँ - चरित्र प्रमाण-पत्र। दिल्ली जाकर अपना चरित्र प्रमाण-पत्र बनवाकर लाते, फिर ये लोग कोई ऐसी चीज मांगते, जो केवल आपके निवास-स्थान पर ही बन सकती है।
जब हमारे पास बाइक थी, तो जीप से क्यों जाने लगें? इसका उत्तर क्षेत्र पंचायत सदस्य ने ही दिया - “भाई जी, आप नहीं जानते। रास्ते में बहुत बड़े-बड़े नाले हैं। इतना पानी होता है कि जीप का बोनट भी डूब जाता है। बाइक नहीं जा पायेगी।”
और जितना वो ‘बाइक नहीं जायेगी’ कहता, उतना ही मेरे मन में आता जाता - बाइक चली जायेगी। जीप के बोनट तक पानी आता है और जीप बहती नहीं, इसका अर्थ है कि पानी में तेज बहाव नहीं है। और दुकतू का रास्ता जिन स्थानों से होकर गुज़रता है, वहाँ पानी का बहाव काफ़ी तेज होना चाहिये। इसका अर्थ है - अतिशयोक्ति।
जीप चली जायेगी, तो बाइक भी चली जायेगी।
एक जीप वाले से भी बात की। उसने बताया कि यहाँ से दुकतू 75 किलोमीटर है और कई ख़तरनाक नाले पार करने पड़ते हैं। शेयर्ड जीपें भी चलती हैं, लेकिन वे तभी चलती हैं जब पूरी भर जाती हैं। एक यात्री का किराया 400 रुपये है। और अगर पूरी गाड़ी बुक करोगे तो 5000 रुपये लगेंगे।
इतनी जानकारी काफ़ी थी। वापस लौटकर मुझे ब्लॉग और फेसबुक इत्यादि पर भी लिखना है, तो यह जानकारी काम आयेगी। और जाना तो हमें बाइक से ही है।
...
अब दूसरा काम। नेपाल भ्रमण।
धारचूला काली नदी से एकदम सटकर बसा हुआ है। नदी के उस तरफ़ नेपाल है। नेपाल वाले शहर को दार्चुला कहते हैं। एक झूला पुल दोनों को जोड़ता है। इधर सशस्त्र सीमा बल के जवान रहते हैं। पुल पर फोटो लेना मना है। भारत में एक जगह लिखा है - काठमांडू 965 किलोमीटर। रजिस्टर में एंट्री की और पुल पार करने लगे। पुल पर एक द्वार है, जिसे रात में बंद कर देते हैं। अभी यह खुला था। पहुँच गये नेपाल। उन्होंने कोई पूछताछ नहीं की। ऐसी ही होनी चाहिये दुनिया के सभी देशों की सीमाएँ। भारत-नेपाल के बीच भी तमाम तरह के झगड़े हैं, लेकिन सीमा-द्वारों पर उनका कोई असर नहीं होता।
एक मजदूर महिला भारत से नदी किनारे से रेत उठाकर ला रही थी। नेपाल में एक निर्माण-कार्य चल रहा था। भारतीय नागरिक दालें और चावल ला रहे थे। एक-एक किलो की पन्नियों में। दीप्ति ने पूछा कि अगर हम भी यहाँ से कुछ ले जायें, तो कस्टम वाले रोकेंगे तो नहीं। मैंने कहा - निजी प्रयोग के लिये कोई रोक नहीं है। हालाँकि हमने कुछ नहीं लिया।
नेपाल में चुनावों के कारण बड़ी गहमा-गहमी थी। पोस्टर और झंड़े लगे थे। प्रत्याशी भी वोट मांगते घूम रहे थे। और हर जगह दो शब्द ज़रूर लिखे थे - जय नेपाल।
और घंटेभर तक विदेश में घूमते-घूमते वापस स्वदेश लौट आये।
आपको यह जानकर बड़ी हैरानी होगी - और मुझे भी बहुत हैरानी हुई - कि धारचूला समुद्र तल से केवल 900 मीटर ही ऊपर है। पहले मैं सोचता था कि 2000 मीटर से भी ज्यादा होगा। इतनी कम ऊँचाई के कारण यहाँ बड़ी गर्मी थी। और सीधे खड़े ऊँचे पहाड़ हैं। तो ऐसा लगता है जैसे धारचूला कुएँ में बसा है। घना बसा है और गलियाँ व सड़कें भीड़-भाड़ वाली हैं। 250-300 किलोमीटर हिमालय के अंदर आप ऐसे स्थान के बारे में नहीं सोच सकते। मैं भविष्य में कभी भी धारचूला नहीं रुकना चाहूँगा।
...
आज की सीख: 1. नौकरशाही भारत की उन्नति में बाधक है। जिस स्थान पर जाने का परमिट भी नहीं लगता, वहाँ का परमिट बनाने के लिये ये लोग आपको चौदह चक्कर कटवायेंगे।
2. सभी सीमाएँ ऐसी ही होनी चाहिये, जैसी भारत-नेपाल की।

थल से एक रास्ता मुन्स्यारी जाता है और एक डीडीहाट

थल-डीडीहाट मार्ग

ऐसा नहीं है कि थल-डीडीहाट मार्ग ख़राब ही है... सड़क संकरी ज़रूर है, लेकिन कुल मिलाकर अच्छी बनी है।


डीडीहाट-अस्कोट लघु-पथ

अस्कोट


जौलजीबी के पास काली नदी... और नदी के पार नेपाल

धारचूला

धारचूला में झूला पुल और दार्चुला की बहुमंजिला इमारतें

धारचूला बाज़ार

मैं वैसे तो बी.आर.ओ. की आलोचना करता हूँ, लेकिन ऐसे मौकों पर नहीं।



9 comments:

  1. एक शानदार यात्रा की एक अगली रोचक कड़ी पढ़कर आंनद आ गया, आपकी बातों से पुर्ण सहमत हूँ कि कुमाऊं ज्यादा जीवंत लगता है,घनी बसावट,अच्छी सड़के, पर गढ़वाल का तो एक अपना अलग ही आकर्षण है.लिखते रहिये आपके लेखों के जरिये हम भी आपके साथ साथ यात्रा करते है.

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  2. आपके ही माध्यम से नई नई जगहों के बारे में जानने को मिलता है नहीं तो ऐसी ऐसी छुपी जगहों का पता भी चलता।

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  3. घूमते आप हो
    पैसे आप खर्च करते हो
    छुट्टी आप लेते हो
    मुफ्त मे मजे हम लेते हैं

    (मुफ्त का चंदन घिस मेरे नंदन)


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  4. शानदार विवरण। परमिट वाला किस्सा सही था।आप लोगों को तो पता चल गया वरन वो कुछ न कुछ पैसे झटक ही लेता। हाँ, बॉर्डर के विषय में आपने सही कहा। पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में ऐसे ही सीमा रेखाएं होती तो कितना सही रहता।अगली कड़ी का इतंजार है।

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  5. bhai aapne meri kailash yatra ki yaad dilwa di.

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  6. Chalo agli bar Panchachulli base camp hi jayenge.Photo achhe h.

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  7. धारचूला समुद्र तल से केवल 900 मीटर ही ऊपर है। पहले मैं सोचता था कि 2000 मीटर से भी ज्यादा होगा। इतनी कम ऊँचाई के कारण यहाँ बड़ी गर्मी थी। और सीधे खड़े ऊँचे पहाड़ हैं। तो ऐसा लगता है जैसे धारचूला कुएँ में बसा है। घना बसा है और गलियाँ व सड़कें भीड़-भाड़ वाली हैं। 250-300 किलोमीटर हिमालय के अंदर आप ऐसे स्थान के बारे में नहीं सोच सकते। धन्यवाद शर्मा जी !! मैं भी यही सोचता था इस पोस्ट से पहले , लेकिन ये जानकारी अचंभित करती है !! खैर , भला किया चपरासी ने सिर्फ चरित्र प्रमाण पात्र माँगा , क्या पता फिर बर्थ सर्टिफिकेट भी मांग लेता :) ! काठमांडू 965 किलोमीटर , कितना अच्छा लगता है ऐसे बोर्ड देखना !! एक अमृतसर -वाघा बॉर्डर जाते हुए देखा था - लाहौर 23 किलोमीटर !! मजेदार यात्रा रही

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  8. विवरण सारगर्भित एवं जानकारीपूर्ण। मैप सुधार लें, आप गए डीडीहाट के रास्ते किंतु मैप में मुनस्यारी का मार्ग दर्शाया है।

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    1. गूगल मैप में कोई समस्या है... डीडीहाट से धारचूला का रास्ता दिखा तो रहा है, लेकिन रूट नहीं बना रहा...

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