Monday, August 7, 2017

पंचचूली बेस कैंप यात्रा: दिल्ली से थल

7 जून, 2017
ज़िंदगी एक बार फ़िर मेहरबान हो गयी और हमें मौका दे दिया हिमालय की ऊँचाईयों पर जाने का। कुमाऊँ हिमालय की ऊँचाईयों पर मैं कभी नहीं गया था, सिवाय कई साल पहले पिंड़ारी और कफ़नी ग्लेशियर की यात्राओं के। इस बार मिलम ग्लेशियर का इरादा बना तो दो सप्ताह की छुट्टियाँ मंज़ूर नहीं हुईं। मंज़ूरी मिली एक सप्ताह की और इतने में मिलम का भ्रमण नहीं हो सकता था। तो इस तरह पंचचूली बेस कैंप जाने पर मोहर लगी।
चार जून को बिलासपुर, छत्तीसगढ़ से सुनील पांडेय जी बाइक पर लद्दाख के लिये निकले। उस दिन वे जबलपुर रुके। पाँच को मध्य प्रदेश की गर्मी ने उनकी हालत ख़राब कर दी और वे वापस लौटते-लौटते बचे। ओरछा रुके। छह तारीख़ की आधी रात को वे दिल्ली आये। उधर हमारी योजना रात के दो-तीन बजे निकल जाने की थी, ताकि हम भी दिन की गर्मी से निज़ात पा सकें। लेकिन सुनील जी के मद्देनज़र हम भी रुक गये। ऊपर से इंद्रदेव मेहरबान हो गये और अगले दिन भीषण गर्मी की संभावना समाप्त हो गयी।
बड़ा अच्छा लगता है जब दूर-दराज़ से मित्र लोग सीधे शास्त्री पार्क आकर दम लेते हैं। अभी कुछ ही दिन पहले वे अपने परिवार के पाँच अन्य सदस्यों के साथ दिल्ली आये थे। मैं उस समय झारखंड़ गया हुआ था। मुझे उम्मीद नहीं थी कि वे हमारे यहाँ रुकेंगे। उन्होंने एक बार मना भी कर दिया था। मैं उनसे सहमत भी हो गया था। आख़िर इतने बड़े दल के साथ किसी के घर में डेरा जमाना अच्छा नहीं माना जाता। लेकिन शीघ्र ही उन्होंने ऐलान कर दिया कि वे जितने दिन भी दिल्ली में रहेंगे, हमारे यहाँ ही रहेंगे। यह सुनते ही जो खुशी मिली, बस यही लग रहा था कि मेरी ट्रेन उड़कर झारखंड़ से दिल्ली पहुँच जाये।
और उससे ज्यादा खुशी इस बार थी। मोटरसाइकिल पर सामानों के बीच में छोटे-से पांडेय जी बमुश्किल ही दिख रहे थे। और अब भी कह रहे थे कि कुछ सामान मनाली से भी खरीदना है। हालाँकि वापस लौटे तो बताया कि चौथाई सामान की भी आवश्यकता नहीं पड़ी। टैंट कहीं नहीं लगाया, स्लीपिंग बैग, मैट्रेस की कहीं ज़रूरत नहीं पड़ी। मैंने मना किया था इनके लिये। हर जगह सुविधा हैं। जेब में पैसे और टंकी में तेल होना चाहिये, बस। और तो और, ऑक्सीजन सिलेंडर भी था साहब के पास।
तो पांडेय जी शास्त्री पार्क आ गये। मैंने पूछा - “सर, हम तो सुबह निकल जायेंगे छह सात बजे। आप कितने बजे तक निकलोगे?”
बोले - “भाई, मारोगे क्या? लद्दाख तो दिमाग से निकल गया है। एम.पी. की गर्मी और तीन दिन में तेरह सौ किलोमीटर की यात्रा ने लद्दाख भुला दिया है। मैं तो दिल्ली घूमने के इरादे से आया हूँ। तीन-चार दिन रुकूँगा। हिम्मत बनेगी तो लद्दाख जाऊँगा।”
हम तो सात तारीख़ की सुबह दस बजे निकल गये। पांडेय जी तीन दिनों तक शास्त्री पार्क ही रहे। और चौथे दिन ऐसी हिम्मत बनी कि सीधे हिमाचल में सतलुज किनारे नैना देवी ही जाकर रुके।
...
रात बारिश हुई थी, तो मौसम में अच्छाई थी। ढाई घंटे लगे सौ किलोमीटर दूर गढ़ पहुँचने में। गंगा जी के पुल पर खड़े हुए तो पुल हिलता था। बड़े पुल भारी वाहनों के आने-जाने से हिलते ही हैं। बगल में रेलवे लाइन। एक ट्रेन मुरादाबाद की ओर जाती मिली। यह दीप्ति की दोस्त थी, लेकिन वह इसे पहचान नहीं पायी। मैंने याद दिलाया - “यह पुश-पुल है।” दिल्ली-मुरादाबाद पैसेंजर। दीप्ति इधर की ही रहने वाली है। तो ये लोग जब भी दिल्ली से अपने गाँव जाते हैं तो इसी ट्रेन से जाते हैं। बताते हैं कि घर के सामने स्टेशन है - चक्कालीलेट हाल्ट। बड़े किस्से सुनाती है उधर के। घर के बगल से गंगन नदी गुजरती है। या फिर कोई और नदी है। नजीबाबाद के ऊपर से निकलती है। क्या खाक पानी होता होगा इसमें! बारिश में ही आता होगा। बताती है बारिश में हम सिर पर बस्ते रखकर गले तक पानी में उतरकर इसे पार करते थे। और इसका यह नाम गंगा से प्रभावित है। गंगन। एक तरफ़ गंगा, दूसरी तरफ़ रामगंगा। बीच में गंगन। जैसे दो जाटों के साथ एक नाई चल रहा हो। गंगन नाई। सेवा-टहल करता हुआ। मुरादाबाद में यह रामगंगा में मिल जाती है। इसके उद्गम का पता लगाने जायेंगे तो कभी पता नहीं चलेगा। या चलेगा?
मैं कभी बाइक पर जोया से आगे नहीं गया था। सड़क कैसी है, नहीं पता। दीप्ति ने बताया - “यह सड़क बरेली तक बहुत अच्छी है। फोर-लेन।” लेकिन हमें बरेली थोड़े ही जाना था? हल्द्वानी जाना था। परंपरागत रास्ता रामपुर से होकर है। तीन साल पहले मैंने देखा था उसे। इतना ख़राब कि स्वाद अभी तक याद था। यार लोग भी कहते थे कि रामपुर से यू.पी. और उत्तराखंड़ के बॉर्डर तक बहुत ख़राब है, उसके बाद बहुत अच्छा है। रामपुर से बॉर्डर पचास किलोमीटर से ऊपर है। तो क्या पचास किलोमीटर सहन कर लें?
नहीं। जब इस रास्ते की ‘खासियत’ की पक्की जानकारी है, तो दूसरे रास्ते से जायेंगे। वो भी ख़राब मिलेगा तो पछतावा नहीं होगा। अच्छा मिल गया तो बल्ले-बल्ले।
मुरादाबाद से टांडा की सड़क पकड़ ली। दो लेन की है। जब तक काशीपुर रोड़ पर रहते हैं, तब तक बहुत ट्रैफिक मिलता है। और जब टांडा की सड़क अलग होती है, ट्रैफिक में भारी कमी आ जाती है। सड़क दो लेन की ही रहती है। और बहुत अच्छी बनी है। इसी सड़क पर कुछ सरदार शर्बत पिला रहे थे। हम ऐसी चीजें कभी नहीं छोड़ते। सरदार खुश हुए, जब हमने उनके फोटो लिये। दीप्ति ने कहा यहाँ गुरुद्वारा है। मैंने कहा फैक्ट्री है। वैसे दीप्ति की नज़रें तेज हैं। तो गुरुद्वारा ही होगा।
टांडा में भीड़ थी। बड़ा कस्बा है। रामपुर जिले में है। बड़ा बदनाम है रामपुर। इतना बदनाम कि दीप्ति ने पहले ही कह दिया था कि रामपुर से होकर नहीं जाना। अन्यथा एक विकल्प रामपुर से सुआर होकर भी था। बड़ा अज़ीब नाम है सुआर। अंग्रेजी में पढ़ें तो सूअर पढ़ा जाता है। रामपुर में है तो मुस्लिम प्रधान ही होगा। तो इसका नाम सूअर या सूआर कैसे पड़ गया? क्या मुसलमानों ने कभी इसका नाम बदलवाने की चेष्टा नहीं की?
जो भी हो, हम सूआर नहीं जा रहे थे। पाँच किलोमीटर दूर से निकल गये।
उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड़ में आ गये। बाजपुर। इसके बाद जंगल शुरू। अच्छी सड़क बरकरार रहती है। हम कालाढूंगी की ओर बढ़ रहे थे। मानसून होता तो हरियाली होती। अब भी हरियाली कम नहीं थी, लेकिन जून का महीना भी था।
जंगल में अलग ही आनंद होता है बाइक चलाने का। कुछ ही देर में हम उस तिराहे पर थे, जहाँ से बायें सड़क रामनगर जाती है। जंगल के बीच में केवल एक तिराहा। और बहुत सारे सूचना-पट्ट - राधा स्वामी सत्संग ब्यास, विजयपुर धमोला 7 किमी; पेट्रोल पंप, पेट्रोल एवं डीजल उपलब्ध है; सीमा समाप्त, बरहैनी राजि, तराई केंद्रीय वन प्रभाग, हल्द्वानी; यूनियन बैंक ऑफ इंडिया; श्याम बोरिंग कंपनी। और जंगल विभाग के हरे रंग के बैरियर पर हरे रंग में लिखा था - STOP. एक स्पीड़ ब्रेकर इधर और एक उधर।
कुछ साल पहले मैं इधर आया था। कार्बेट फाल बगल में ही है। दीप्ति ने देखने से मना कर दिया। भीड़ होगी और ज्यादा पानी भी नहीं होगा। आगे कालाढूँगी के पास जिम कार्बेट का घर भी देखा। लेकिन दूर से ही। मैं तो कई साल पहले देख ही चुका था। मेरे लिये उतना आकर्षण नहीं था। और दीप्ति ने भी मना कर दिया। कुछ खाने की इच्छा थी, लेकिन हल्द्वानी के लिये इस इच्छा का परित्याग कर दिया।
हमें पिथौरागढ़ जाना था। लोहाघाट के रास्ते जायेंगे। तो हल्द्वानी होकर जाना ठीक रहेगा। अल्मोड़ा के रास्ते जाते तो कालाढूँगी से ही नैनीताल चढ़ जाते। कालाढूँगी से हल्द्वानी का रास्ता बहुत अच्छा है और जंगली है। दीप्ति दोनों हाथों को फैला लेती और हवा में उड़ने की कल्पना करती। मुझे बैक-व्यू मिरर में सब दीखता, लेकिन पीछे का ट्रैफिक नहीं दीखता। चेतावनी देनी पड़ती।
भूख लगी ही थी। दिल्ली से चलने के बाद कुछ नहीं खाया था। फटाफट मोमो-समोसे खाये और आगे चल दिये। जून अर्थात यात्रा का सीजन। और नैनीताल-भीमताल दोनों मिलकर उत्तर भारत की भारी भीड़ को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। हम इस भीड़ से आगे निकल जाना चाहते थे आज।
लेकिन भीमताल रोड़ पर इतना ट्रैफिक कि चाहकर भी हम तेज नहीं चल सके। भीमताल ही रुकने का इरादा कर लिया। एक पेट्रोल पंप के सामने बने ‘होमस्टे’ में 1600 रुपये का साधारण कमरा गिरते-गिरते 1200 तक आ गया। महीनेभर बाद ही यह 200 रुपये का मिलने लगेगा। आगे बढ़ो।
खुटानी में 1000 रुपये का कमरा मिला। एक भी रुपया कम करने को तैयार नहीं। छह बज चुके थे। सस्ता ठिकाना पचास किलोमीटर आगे शहरफाटक में ही मिलेगा। धानाचूली बैंड़ तक तो सस्ता मिलने वाला है नहीं। मुक्तेश्वर का सारा ट्रैफिक धानाचूली बैंड़ से ही होकर गुज़रता है। और पचास किलोमीटर के लगेंगे कम से कम दो घंटे। इसका अर्थ है कि अंधेरा हो जायेगा। अंधेरे में नहीं चलना।
अब एक कोशिश भवाली में भी कर लेते हैं। छह किलोमीटर अल्मोड़ा की तरफ़। यानी हमारे चलने की दिशा से विपरीत। अगर हज़ार का ही कमरा लेना है तो भवाली में इनसे अच्छा मिल जायेगा। बड़ा बाज़ार है और ज्यादातर पर्यटक वहाँ रुकते भी नहीं।
रास्ते में एक होमस्टे और दिखा। कोई भीड़ नहीं, कोई भाड़ नहीं। बारह सौ भी होगा, तब भी रुक लेंगे। नीचे परचून की दुकान थी। मूँछों वाले मालिक। जितनी बड़ी मूँछें, उतना ही मृदु कंठ। खेद जताते हुए बोले कि सभी कमरे भरे हुए हैं। कहने लगे - “भीमताल में हमारे एक जानकार हैं। उनसे पूछ लेता हूँ।”
“रहने दो भाई जी। हम भीमताल से ही आये हैं। उधर तो बड़ी महंगाई है जी।”
“ऐसा है भाई जी, कि जून का महीना है और...”
“...और सीजन चल रहा है।”
“बस, यही बात है।”
एक आदमी स्कूटर पर भवाली की ओर जा रहा था - “ओये, ओये, सुन, सुन। कमरे खाली हैं क्या तुम्हारे यहाँ?”
“अभी फोन करके पूछता हूँ।”
“हेलो, हेलो... हाँ, हाँ... ठीक है...”
“हाँ जी, हैं कमरे खाली।”
मैंने लगे हाथों पूछ लेना उचित समझा - “किराया कितना है भाई जी?”
“सीजन चल रहा है। 2000 तक के रेट हैं, लेकिन आप 1000 दे देना।”
अब तक हम हज़ार-हज़ार सुन-सुनकर इतने पैसे खर्च करने को तैयार हो चुके थे। भवाली से अल्मोड़ा की तरफ़ चलते ही आँचल डेरी के सामने ही यह ‘दिनेश होमस्टे’ है। नीचे मिस्त्री की दुकान है, ऊपर कमरे बने हैं। कमरों के आगे बड़ी खुली छत है। बड़ा आनंद आता है इस पर टहलने में। और कमरे भी बड़े-बड़े। साथ में अटैच बाथरूम-टॉयलेट तो है ही, रसोई भी है। सब सामान। बनाओ और खाओ। बाहर छत पर भी एक रसोई है। उसमें भी सब सामान। कोई ताला नहीं। वहाँ भी बनाओ और खाओ। हमारी फ्री चाय वहीं से बनकर आयी। मुझे यह स्थान इतना पसंद आया कि कभी इधर रुकने के योग बनेंगे तो यहीं रुकेंगे। और मई-जून को छोड़कर बाकी पूरे साल यह सस्ता ही होगा। 400-500 रुपये का आसानी से मिल जाया करेगा।

दूसरा दिन
अब हमारा मन बदल गया। लोहाघाट के रास्ते नहीं जायेंगे, बल्कि अल्मोड़ा के रास्ते जायेंगे। आपको रास्तों की जानकारी हो तो आपके पास कई विकल्प होते हैं और उनमें से सर्वश्रेष्ठ चुनने के लिये आप स्वतंत्र होते हैं। मन कब बदल जाये, कुछ नहीं कहा जा सकता। अपना भी बदल गया। मोबाइल में कुछ देर अंगूठा मारा और पता चल गया कि दोनों ही रास्तों से यहाँ से धारचूला लगभग समान दूरी पर है - ढाई सौ किलोमीटर। और पहाड़ों में एक दिन में इतनी दूरी बाइक पर तय करना आसान नहीं होता। हमें अंदाज़ा होने लगा कि आज हम धारचूला नहीं पहुँचने वाले।
थोड़ा ही आगे एक आश्रम है - नीम करौरी बाबा का। कोई इसे करौली कहता है, कोई करौरी। नीम सभी कहते हैं। दर्शन तो नहीं करने थे, लेकिन खाना-पीना आवश्यक था। जीम लिये। यह बताना आवश्यक नहीं कि क्या-क्या खाया और कितना खाया। चलिये, बता देता हूँ। या रहने दूँ?
खैरना से आगे छह-सात किलोमीटर तक बड़ी ख़राब सड़क है। चौड़ी करने का काम चल रहा है। लेकिन उसके बाद बहुत अच्छी है। दो-लेन की। उत्तराखंड़ में वैसे भी अच्छी सड़कें ही हैं।
मैं वैसे तो बाइक चलाते समय इधर-उधर नहीं देखता हूँ, लेकिन बाल मिठाईयों की दुकानों ने मेरा यह व्रत तोड़ दिया। बहुत सारी दुकानें थीं। हम ‘आगे लेंगे’, ‘अगली दुकान से लेंगे’ कहते-कहते सबको पार करते चले गये और सारी की सारी दुकानें पीछे छूट गयीं। लेकिन चिंता की कोई बात नहीं। अभी अल्मोड़ा आना बाकी है। बाल मिठाई अल्मोड़ा की ही देन है। हम अल्मोड़ा में ख़ूब सारी मिठाईयाँ खरीदेंगे।
एक तिराहे पर आगे जाने वाली दोनों सड़कों पर लिखा था - बागेश्वर इधर। दोनों ही सड़कें मानों झगड़ रही हों। एक कहती बागेश्वर इधर, दूसरी चिल्ला उठती - नहीं, बागेश्वर इधर। फ़िर दोनों हमसे कहतीं - इधर, इधर... इधर, इधर। हमने वहीं खड़े एक पुलिस वाले की शरण ली - इन दोनों में से अच्छी कौन-सी है? बोला, वो दाहिने वाली कसार देवी वाली है और बायें वाली छोटी है। हम छोटी पर चल दिये। कसार देवी छोड़ दिया। लक्ष्य पंचचूली और धारचूला है, तो रास्ते में आने वाली प्रत्येक जगहें नहीं देखनी चाहिये। कभी बाद में जब हमें धारचूला नहीं जाना होगा, तब कसार देवी, गोलू देवता आदि के दर्शन करेंगे।
अल्मोड़ा में भारी ट्रैफिक और हम धीरे-धीरे निकलते-निकलते पूरा शहर पार कर गये। बाल मिठाई की सभी दुकानें पीछे छूट गयीं। और आगे जाकर जहाँ रुके, वहाँ कोई दुकान नहीं थी।
अच्छा हाँ, यह तो बताना भूल ही गया कि हम पुनः अपना रास्ता बदलकर बागेश्वर क्यों जाने लगे? अल्मोड़ा से धारचूला के रास्ते में तो बागेश्वर आता ही नहीं है। असल में मैं जब कई साल पहले पिंड़ारी ग्लेशियर गया था, तो अल्मोड़ा से बागेश्वर की दूरी अंधेरे में तय की थी, एक तेंदुआ भी दिखा था। वापसी में दिन में इस दूरी को तय किया तो रास्ते की खूबसूरती को देखकर मैं मोहित हो गया था। रास्ते इतने भी खूबसूरत हो सकते हैं, तब पहली बार जाना। तब से अब तक गंगाजी में बहुत पानी बह चुका, लेकिन वो खूबसूरती अभी भी ज़ेहन में थी। हम आज तो धारचूला पहुँच नहीं सकते, तो क्यों न इस सड़क की उसी खूबसूरती का आनंद लिया जाये।
अल्मोड़ा शहर पीछे छूट गया तो चीड़ का जंगल आरंभ हो गया। जून का महीना था, लेकिन चीड़ का जंगल हमेशा ही ख़ूबसूरत होता है। इसके बीच में अगर अच्छी सड़क हो, तो क्या कहने! मैं ऐसे जंगलों की पहले भी बड़ी तारीफ़ कर चुका हूँ, ज्यादा तारीफ़ मुझसे नहीं होती। फिर भी निराला ही आनंद था। रास्ते में बिनसर सेंचुरी जाने का मार्ग भी दिखा, भीड़ भी दिखी, लेकिन हम धीरे-धीरे बागेश्वर की तरफ़ बढ़ते गये।
और बाल मिठाई खरीदी बागेश्वर में। पैक करा ली और सोच लिया कि आगे जंगल में बैठकर खायेंगे।
बागेश्वर से चौकोड़ी लगभग पचास किलोमीटर है। और वही चीड़ का जंगल। चलते ही चढ़ाई है, फिर रास्ता रिज के साथ-साथ चलता है। ठंड़ी हवा। अच्छी सड़क। और तीस की स्पीड़ से चलती बाइक। पीछे दीप्ति हाथ फ़ैलाकर गाना गा रही थी - “पंछी बनूँ उड़ती फ़िरूँ मस्त गगन में...”
चलिये, बहुत श्रंगार रस हो गया। ज्यादा लिखेंगे तो छलक जायेगा। आज चौकोड़ी रुकेंगे और हिमालय दर्शन करेंगे। चौकोड़ी हिमालय के बहुत फोटो देखे हैं। आज खुद जाकर देखेंगे। आसमान साफ़ है। सूर्यास्त देखेंगे। हिमालय में सूर्यास्त की लालिमा देखेंगे। जंगल के सन्नाटे में सड़क किनारे बैठकर बाल मिठाई खाते हुए हम यही बातें कर रहे थे।
चौकोड़ी से तीन किलोमीटर पहले उत्तराखंड़ पर्यटन ने दूरियाँ लिखी थीं - पाताल भुवनेश्वर 46 किलोमीटर, मुनस्यारी 92 किलोमीटर, कैलाश मानसरोवर 201 किलोमीटर। हम कैलाश भले ही न जा रहे हों, लेकिन कैलाश-पथ पर तो जा ही रहे थे। यह सोचकर मैं भावुक हो गया।
चौकोड़ी पहुँचे तो शाम के छह बजे थे। अभी धूप भी थी। यहाँ गाँव और बाज़ार जैसा कुछ नहीं दिखा। दिखे तो केवल बड़े-बड़े आलीशान होटल। ऐसे आलीशान कि दीप्ति भी पीछे बैठी कह देती - ना, यहाँ नहीं रुकना। हमारी पहुँच से बाहर है।
एक ‘पहुँच’ वाले होटल में गये तो किराया सुनते ही वापस दौड़ लिये - दो हज़ार रुपये। अगले में गये - डेढ़ हज़ार रुपये। समुद्र तल से 2000 मीटर ऊपर स्थित चौकोड़ी लगातार प्रसिद्ध होता जा रहा है। आलीशान होटल बनते जा रहे हैं और यात्री भी नियमित आते जा रहे हैं। जून में तो आयेंगे ही। तो इतना किराया होगा ही। इसका अर्थ है कि चौकोड़ी हमारे लिये नहीं है। फिर हमारे लिये क्या है?
हमारे लिये थल है- चौकोड़ी से पच्चीस किलोमीटर आगे। समुद्र तल से 900 मीटर ऊपर। गर्म जगह। तो थल ही चलो।
रास्ते के बारे में बार-बार कहने की ज़रूरत नहीं। उतराई थी।
थल नामिक ग्लेशियर से निकलने वाली रामगंगा नदी के किनारे बसा है। अच्छा बाज़ार है। गर्मियों में गर्म, मानसून में सुहावना और सर्दियों में ठंड़ा। चार सौ रुपये का कमरा मिला, बिना मोलभाव के ले लिया। बाइक एक शटर के भीतर खड़ी हो गयी। ठंड़े पानी में नहाये। आनंद आ गया। चौकोड़ी में रज़ाई में सोते, यहाँ पंखे के नीचे थे। लेकिन सुकून था। हज़ार से ज्यादा रुपये बच गये।
और यार-दोस्त पूछते हैं कि सस्ती घुमक्कड़ी कैसे की जाये। ऐसे की जाये।
घूमो-घुमाओ, पैसे बचाओ।
जब बागेश्वर में बैठे दाल-चावल खा रहे थे तो आज के अख़बार पर निगाह चली गयी थी। एक फोटो था, सड़क पर एक चौड़ा-सा गड्ढा और उसमें भरा पानी। लिखा था - बेरीनाग-मुनस्यारी सड़क। साथ ही बेरीनाग से लेकर दिल्ली तक की सभी सरकारों की आलोचना की गयी थी। पत्रकारिता का यही उसूल है। नकारात्मकता ढूँढ़-ढूँढ़कर लाओ और सरकारों को गाली लिखो। आते समय थल के पास वो गड्ढ़ा हमें देखने को मिला। और पूरे रास्ते केवल वही एक गड्ढ़ा था। हमें तो पता भी नहीं चला कि हम गड्ढ़े के बगल से निकले हैं। वो तो थल में लेटे-लेटे आज की यात्रा की बातें सोच रहे थे, तो अचानक ध्यान आ गया। उत्तराखंड़ में सड़कें अच्छी हैं। इस गड्ढे को जल्द ही भर दिया जायेगा। कुछ दिन बाद जब हम लौट रहे थे तो यह गड्ढ़ा भरा जा चुका था। तब उसी अख़बार में वही पत्रकार साहब लिखेंगे - हमारे अख़बार में छपी ख़बर का असर। और एक बार फिर से अपनी प्रशंसा करते हुए बेरीनाग से दिल्ली तक की आलोचना कर देंगे।

मुरादाबाद-बाज़पुर मार्ग पर सरदार शर्बत पिलाते हुए




हल्द्वानी में




बागेश्वर से दूरियाँ

बागेश्वर चौकोड़ी मार्ग





23 comments:

  1. Savere savere aap ka naya post pad ke majaa aa gaya. Thanx neeraj bhai

    ReplyDelete
  2. लेख पढ़कर मन आनंद से भर गया नीरज जी,बाइक चलाने का आनंद चीड़ के जंगलों में क्या होता है ये तो उस जगह चलाने वाला ही जान सकता है ,अभी हाल ही मैंने अपनी खटारा बाइक से इलाहाबाद से नैनीताल, रानीखेत की यात्रा की थी जुलाई महीने में,रानीखेत में केवल 100 रुपये मे शिव जी मंदिर के धर्मशाला में रुका था,इतना आनंद की शब्दो मे बयाँ करना आसान नही, इस यात्रा का विवरण आपके ब्लॉग में लिखना चाहता हुँ क्या ये संभव है ?धन्यवाद, आपके अगले लेख के
    इंतजार में.

    ReplyDelete
    Replies
    1. आपका बहुत बहुत धन्यवाद राकेश जी... आप अपना लेख रोचक शब्दों में लिखकर और कुछ फोटो के साथ मुझे भेज सकते हैं... ब्लॉग पर प्रकाशित हो जायेगा...
      ईमेल: neerajjaatji@gmail.com

      Delete
    2. बाल मिठाई 🍩 ये मेरी फेवरोट है। पत्रिका के नकारात्मक रवैये से सहमत।

      Delete
  3. बहुत दिन इंतजार करा दिया नीरज भाई खैर अब इंतज़ार खत्म। बहुत ही बढ़िया लेख लगा! आपकी अगली पोस्ट का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा।

    ReplyDelete
  4. शानदार पोस्ट सरजी

    ReplyDelete
  5. बहुत ही शानदार संस्मरण

    ReplyDelete
  6. शानदार पोस्ट। पहाड़ों की बाल मिठाई और एक चॉकलेट ये मुझे काफी पसंद आती है। आपके साथ हम भी घूम लिए। पत्रकार का तो काम ही आलोचना करना होता। अगर आलोचना नहीं करेंगे तो पता कैसे चलेगा कि काम हो रहा है। :-p :-p अगले भाग का इतंजार है।

    ReplyDelete
  7. नीरज भाई निकले गजरौला से ही होंगे, पता होता तो हमे भी दर्शन हो जाते, खैर फिर कभी सही, .......बहुत बढिया यात्रा विवरण, जहां तक पत्रकारिता की बात है तो सब तो नहीं लेकिन अधिकतर पत्रकार नकारात्मक खबर देकर किसी व्यक्ति विशेष से अपनी व्यक्तिगत दुश्मनी निकालते हैं

    ReplyDelete
    Replies
    1. हाँ जी, गजरौला से ही निकले थे... हमें भी नहीं पता था कि आप भी यहीं रहते हैं...

      Delete
  8. Har baar ki tarah. behtareen.

    ReplyDelete
  9. Achha lekh. Ek bar Aadi Kailash ki yatra bhi Kara dijiye.

    ReplyDelete
  10. Neeraj,...what is that small pearls like squares in one photo? are they sweets?

    ReplyDelete
    Replies
    1. हाँ जी, यह बाल मिठाई है। जो छोटे-छोटे मोती जैसे दिख रहे हैं, इन्हें ‘बाल’ कहते हैं। ये ही बाल मिठाई को विशिष्ट बनाते हैं।

      Delete
  11. शानदार यात्रा वर्डन यदि घुम्मकड़ी रात्रि विश्राम के लिए सारे ऐशो आराम चाहेगा तो घुम्मकड़ी का आनंद ही नहीं आएगा

    ReplyDelete
  12. बाल मिठाई तो बहुत प्रसिध है कुमाऊं में भाई जी। और इसे खाने का मजा भी अलग ही है। वैसे कुमाऊँ हिमालय की ऊँचाई पर आप रुपकुंड यात्रा में भी जा चुके हैं।

    ReplyDelete
    Replies
    1. नहीं मोहित जी, रूपकुंड़ गढ़वाल में आता है... चमोली जिले में...

      Delete
  13. नीरज दा, वो स्वार रामपुर है सुआर कहीं गलत पढ़ लिये होंगे

    ReplyDelete
    Replies
    1. ओहो.. मुझे नहीं पता था... अंग्रेजी में नाम देखकर हिंदी में लिखा तो सुआर ही समझ आया... आपका बहुत धन्यवाद...

      Delete
  14. डर लगना स्वाभाविक है रामपुर में !! चलो खैर , अब आगे पढ़ते हैं !!

    ReplyDelete