Monday, September 4, 2017

पंचचूली बेस कैंप ट्रैक

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11 जून 2017
आप कभी कुमाऊँ गये होंगे मतलब नैनीताल, रानीखेत, मुक्तेश्वर, कौसानी, चौकोड़ी, मुन्स्यारी... तो आपने हिमालय की बर्फीली चोटियों के भी दर्शन किये होंगे। आपको इन चोटियों के नाम तो नहीं पता होंगे, तो इनके नाम जानने की उत्सुकता भी ज़रूर रही होगी। आप किसी स्थानीय से इनके नाम पूछते होंगे तो मुझे यकीन है कि वो नंदादेवी से भी पहले आपको पंचचूली चोटियों के बारे में बताता होगा - “वे पाँच चोटियाँ, जो एकदम पास-पास हैं, पंचचूली हैं।” आप इनके फोटो खींचते होंगे और सोने से पहले भूल भी जाते होंगे।
लेकिन अब नहीं भूलेंगे। क्योंकि आप पढ़ रहे हैं इन्हीं पंचचूली के बेस कैंप जाने का यात्रा-वृत्तांत सचित्र। जहाँ से भी आपने पंचचूली देखी हैं, कल्पना कीजिये आप वहीं खड़े हैं और इन चोटियों को निहार रहे हैं। उधर त्रिशूल है, फिर नंदादेवी है और इनके दाहिने पंचचूली की पाँच चोटियाँ हैं। कर ली कल्पना? तो अब आपको बता दूँ कि हम पंचचूली के भी उस पार खड़े हैं। आपको बताया जाता होगा कि हिमालय के पार तिब्बत है, लेकिन ऐसा नहीं है। हिमालय के पार भी बड़ी दूर तक भारतीय इलाका है। हम भी उसी इलाके में खड़े हैं। आपके और हमारे बीच में पंचचूली की 6300 मीटर से 6800 मीटर ऊँची ये पाँच चोटियाँ हैं।
साढ़े आठ बजे हम 3200 मीटर की ऊँचाई पर बसे दुकतू गाँव से चल पड़े। आसमान साफ था, हालाँकि कहीं-कहीं सफेद बादल भी तैर रहे थे। बहुत अच्छी चौड़ी पगडंडी बनी है। रास्ता भटकने का कोई डर नहीं। पश्चिमी हिमालय में 3200 मीटर की ऊँचाई वह स्थान होता है, जहाँ वृक्ष-रेखा समाप्त हो जाती है और घास के मैदान आरंभ हो जाते हैं। यहाँ भी वृक्ष तो समाप्त हो गये थे, लेकिन छोटे पेड़ बाकी थे। मुझे वनस्पतियों की कोई पहचान नहीं है, लेकिन भोजपत्र को आसानी से पहचान लेता हूँ। और यहाँ तो पूरा जंगल ही भोजपत्र का है। हमारे ऋषि-मुनियों ने वेद-पुराण सब भोजपत्र की छाल पर ही लिखे हैं। आज भी ये अपने मूल रूप में विद्यमान हैं। अक्सर यात्री लोग भोजपत्र की छाल को उतारकर अपने साथ ले जाते हैं। लेकिन यहाँ ऐसा नहीं है। यह हिंदू धर्म का कोई तीर्थ नहीं है, तो भोजपत्र वाले यात्री यहाँ नहीं आते। छाल तनों पर और डालों पर ऐसे ही लटकी रहती है। जमीन पर भी गिरी रहती है।
दुकतू से पंचचूली नहीं दिखती, लेकिन जैसे जैसे आगे बढ़ते जाते हैं, चोटियाँ दिखने लगती हैं। दो घंटे बाद जब 3600 मीटर की ऊँचाई पर पहुँचे तो पंचचूली की पाँचों चोटियाँ अपने विराट रूप में हमसे हाथ भर की दूरी पर थीं। इनके बीच से उतरते ग्लेशियर तो रोंगटे खड़े कर देने के लिये काफी थे। यहाँ मन में आया कि इसे पंचचूली बेस कैंप ट्रैक न कहकर पंचचूली ग्लेशियर ट्रैक कहना चाहिये।
यहाँ 3600 मीटर की ऊँचाई पर एक छोटा-सा मैदान है। देवता-स्वरूप एक पत्थर गड़ा है। अगरबत्तियों के अवशेष भी हैं। हम भी अपने मेजबान के आग्रह पर अगरबत्ती और माचिस अपने साथ लाये थे। यहाँ इन्हें जला दिया। मैंने पहले कभी ट्रैक में अगरबत्ती नहीं जलायी थी। आज इसे जलाते समय मन में यही विचार आ रहे थे - “हे परमेश्वर! आपने हमारी प्रत्येक यात्राएँ हमेशा ही सफल की हैं। आगामी यात्राएँ भी इसी तरह सफल करते रहना।”
यहाँ से आगे तकरीबन 100 मीटर की उतराई थी। उसके बाद रास्ता ग्लेशियर के बगल से जाता हुआ दिख रहा था। ग्लेशियर जिस स्थान पर नदी में परिवर्तित होते हैं, वहाँ उनमें पत्थरों और मिट्टी की अधिकता होती है, इसलिये काले दिखते हैं। लेकिन ऊपर के हिस्सों में ये सफेद होते हैं और कभी-कभी नीले भी। मेरी इच्छा इसके आख़िर तक जाने की थी। मैं कल्पना कर सकता था कि वहाँ पहुँचकर मुझे सिर उठाकर ग्लेशियर देखना पड़ेगा। वहाँ अचानक रास्ता समाप्त हो जायेगा। लेकिन दो कारणों से मैं हिचक रहा था। एक तो मौसम ख़राब होने लगा था और दीप्ति थक चुकी थी। हालाँकि वह ट्रैकिंग में आसानी से थकती नहीं है, लेकिन आज थक गयी।
“मैं यहीं बैठी हूँ, तू वहाँ तक घूमकर आ” यह सुनकर मैं आगे चल दिया।
100 मीटर नीचे उतरकर भेड़-वालों की झौंपड़ी के बगल से होता हुआ आगे बढ़ गया। भेड़ें आसपास और दूर-दूर तक फैली हुई थीं। दो भूटिया कुत्ते भी थे। मेरी तरफ देखा भी, लेकिन भौंके नहीं। यहाँ बहुत सारी जलधाराएँ आती हैं। बुग्याल है और इन्हीं में फूल भी खिलने शुरू हो गये। कुछ खिल चुके, कुछ बाकी थे। पीछे मुड़कर देखा, दीप्ति ऊपर ‘स्काईलाइन’ पर अलग ही दिख रही थी। बादल और घने होने लगे थे। इस वजह से जल्दबाजी करनी पड़ी। अन्यथा यहाँ तो पूरा दिन भी बिताना कम होता।
आख़िरकार एक घंटा चलने के बाद 3660 मीटर की ऊँचाई पर ग्लेशियर के खड़े किनारे पर कदम रुके। इससे भी आगे किनारे-किनारे कुछ दूर जाया जा सकता था, लेकिन मैं नहीं गया। ग्लेशियर के किनारे एकदम खड़े, खतरनाक और टूटे-फूटे होते हैं। ऊपर बादलों ने चोटियों को ढक लिया था, लेकिन ग्लेशियर को अभी तक मेरे लिये बचाकर रखा था। दो झरने भी थे, जो ऊपर से गिरते हुए तो दिख रहे थे, लेकिन नीचे कहाँ गिर रहे हैं, इसका पता नहीं चल रहा था। बहुत ऊँचे थे।
मैं यहाँ घंटों बैठना चाहता था, लेकिन दस मिनट में ही लौटना पड़ा। बूंदे भी गिरने लगी थीं। मैं दीप्ति को हर हाल में वहीं बैठे रहने को कहकर आया था। अगर बारिश होने लगेगी, तो मुझे यकीन था कि वह वहाँ से हटेगी नहीं। भीगती रहेगी, लेकिन हटेगी नहीं। अच्छा होता कि वह कुछ दूर और चल लेती और गड़रियों की झौंपड़ियों में बैठ जाती। तब मैं निश्चिंत होता। इस वजह से तेज चलना पड़ा।
गनीमत रही कि बारिश और ज्यादा नहीं हुई। जैसे-जैसे दुकतू नज़दीक आता गया, मौसम भी साफ मिलता गया। खराब मौसम केवल ग्लेशियर के पास ही था।
सवा दो बजे जब दुकतू पहुँचे तो काफी थक चुके थे। योजना थी कि कुछ देर आराम करके दांतू जायेंगे। पैदल ही घूम आयेंगे। कीड़ा-जड़ी देखेंगे और इसके बारे में और ज्यादा जानकारी लेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हो सका।
हमारे पहुँचते ही सी.पी.डब्लू.डी. के एक आदमी ने बताया कि वे लोग दुकतू से नीचे सड़क की खुदाई करने वाले हैं, जिसके कारण अगले कुछ दिनों तक दुकतू सड़क मार्ग से कट जायेगा। न कोई गाड़ी यहाँ आ सकेगी और न ही जा सकेगी। ऐसी खबर सुनते ही भला हम कैसे यहाँ रुक सकते थे? पता नहीं कितने दिन लग जायेंगे। भूख लगी थी, फटाफट दाल-चावल निगले और सामान बांधकर वापस चल दिये।

ट्रैकिंग पथ से दिखता दांतू गाँव


पंचचूली ग्लेशियर का ऊपरी भाग

भोजपत्र का जंगल





दाहिने पंचचूली-3 और बायें पंचचूली-4


पंचचूली की सभी चोटियाँ

पंचचूली-5









ग्लेशियर के किनारे


जमीन के अंदर से निकलता पानी... एक नदी का उद्गम





भोजपत्र

भोजपत्र पर ब्लॉगिंग


7 comments:

  1. शानदार नज़ारे, हिमालय की खूबसूरती को बहुत सुंदर ढंग से आपने कैमरे में कैद किया है,भोजपत्रों की अधिकता और उनका उपलब्ध होना इस बात को साबित करता है कि अभी भी यह जगह पर्यटकों से दूर है,वरना इतने भोजपत्र के छाल ना दिखते, हिमालय की इन सुदूर वादियो का दर्शन कराने के लिए आपका धन्यवाद.

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  2. वाह, मैं भी घूम लिया ब्लॉग पढ़ते पढ़ते, फ़िर भी जाने का मन हो रहा है, उम्दा तस्वीरें।

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  3. लाजवाब वर्णन अगले भाग का इंतज़ार रहेगा नीरज भाई

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  4. Acha lekh. Agar apni purani yatraon ki tarah is lekh me yatra kharch bhi bata dete to mujh jaiso ko jyada help milti.

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  5. भोजपत्रों पर क्या लिखा , शास्त्र अनुसार भोजपत्र पर लिखा सिद्ध हो जाता है। एक प्रतिक चिन्ह मफलर बांधा है पर स्वेटर नहीं पहना।

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  6. bhojpatra par blogging :) ha ha..bhai last wala photo ekdum mast tha....Bahut hi badiya photos...Dhanyawad apka...

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