Monday, October 2, 2017

जागेश्वर और वृद्ध जागेश्वर की यात्रा

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15 जून 2017
दन्या से जागेश्वर जाने में भला कितनी देर लगती है? आप ‘ट्यण-म्यण बाट, हिटो माठूँ-माठ’ पढ़ते-पढ़ते जागेश्वर पहुँच जाते हैं। कुमाऊँनी में लिखी इन बातों का अर्थ हमें नहीं पता। शायद ‘ट्यण-म्यण बाट’ का अर्थ होता होगा - टेढ़े-मेढ़े रास्ते। बाकी पता नहीं। सोच रहा हूँ कि अगर इसे मेरठी में लिखा जाये तो “ऐंड़े बेंड़े रस्ते” लिखा जायेगा। जिस दिन ‘हिटो माठूँ-माठ’ का अर्थ पता चल जायेगा, उस दिन उसे भी मेरठी में अनुवादित कर दूँगा।
मुख्य मार्ग से जब जागेश्वर के लिये मुड़े तो देवदार का जंगल आरंभ हो गया। एक होता है चीड़ का जंगल और दूसरा होता है देवदार का जंगल। चीड़ का जंगल भी निःसंदेह खूबसूरत होता है, लेकिन देवदार की बात ही कुछ और है।
डांडेश्वर मंदिर को हमने जागेश्वर समझ लिया। लेकिन यह जागेश्वर के रास्ते में उससे दो-तीन किलोमीटर पहले है। नीचे नदी किनारे किसी का अंतिम संस्कार हो रहा था। मंदिर शिव को समर्पित है। पुरातत्व विभाग का सूचना-पट्ट बताने लगा कि यह मंदिर-समूह नौवीं-दसवीं शताब्दी में बना था। इस मंदिर में रथों का प्रयोग नहीं किया गया है और यह पूर्वाभिमुख है और इस क्षेत्र के अन्य नागर शैली के मंदिरों से भिन्न है। यह तो मैंने पुरातत्व का सूचना-पट्ट पढ़कर बता दिया। अन्यथा पुरातत्व के मामले में मैं काला अक्षर भैंस बराबर हूँ। कुछ मूर्तियाँ हैं, बाह्य दीवारों पर भी कुछ है और छोटे-छोटे मंदिर भी हैं, लेकिन मुझे कुछ नहीं पता इनके बारे में। मेरी मित्र मंडली में कई मित्र पुरातत्व विशेषज्ञ भी हैं। मैं उनसे भी पूछ सकता हूँ, लेकिन फिर वही बात। काला अक्षर भैंस बराबर।
लेकिन एक घुमक्कड़ को पुरातत्व की बेसिक जानकारी तो होनी ही चाहिए। जानकारी हासिल करूँगा, लेकिन पहले जागेश्वर पहुँचते हैं।
जागेश्वर में बड़ी भीड़ थी जी। मैं मंदिर-समूह के बारे में कुछ भी नहीं बताऊँगा, क्योंकि हमने यहाँ कुछ भी नहीं देखा। घूमे तो सभी मंदिरों में, लेकिन पुरातत्व और वास्तु की कोई जानकारी न होने के कारण खाली ही रह गये। फोटो और सेल्फी लेते मनुष्य देखे, तो हम भी फोटो और सेल्फी लेने में लग गये। बहुत सारे लोग पूजा-पाठ भी कर और करा रहे थे, हम इनसे दूर ही रहे। मंदिर के शिखर के पास एक वृत्त में तीन चेहरे दिखे। इनके ऊपर एक छोटा-सा हाथी था। ये क्या थे, क्यों थे; कुछ नहीं पता। तो मैं अभी भी यही कहूँगा कि हमने जागेश्वर नहीं देखा। कुछ टेढ़ी-मेढ़ी - ट्यण-म्यण - मुद्राओं में फोटो खींचे और आधे घंटे में ही जागेश्वर ‘करके’ लौट चले।
और इस तरह हमारा जागेश्वर भी हो गया।
अगर हम बाइक से उतरकर एक भले मानुस से वृद्ध जागेश्वर के बारे में पूछते, तो वह हमें पैदल जाने का रास्ता बता देता। लेकिन चूँकि हम बाइक पर बैठे थे, इसलिये उसने हमें बाइक का ही रास्ता बताया। जागेश्वर से आप एक खास दिशा में ऊपर पहाड़ी की ओर देखोगे, तो आपको वृद्ध जागेश्वर का मंदिर दिख जायेगा। वो दिशा कौन-सी है, हमें नहीं पता। क्या कहा? गूगल मैप में देखकर बता दूँ? ही ही ही। अभी नहीं।
तो फिर से मुख्य मार्ग पर आ गये और अल्मोड़ा की तरफ चलने लगे। बहुत अच्छी सड़क है। मैं खामखा ही उत्तराखंड़ की सड़कों की तारीफ़ नहीं करता। अगर तारीफ़ की है, तो अवश्य कुछ बात है।
कुछ ही किलोमीटर चले कि वृद्ध जागेश्वर का मोड़ दिख गया। दूरी आठ किलोमीटर है। सड़क है तो ठीक ही, लेकिन बाबा आदम के जमाने की बनी हुई है। सड़क मंदिर पर जाकर समाप्त हो जाती है। दाहिने नीचे कुछ दूर जागेश्वर दिख रहा था। जागेश्वर देवदार के जंगल में है, वृद्ध जागेश्वर चीड़ के जंगल में।
इसका क्या महात्म्य है, क्या कहानी है, हमें नहीं पता। और पता करने की इच्छा भी नहीं। भीड़ बिल्कुल भी नहीं थी। बाहर दो पुजारी बैठे थे। जब तक पुजारीजी उठते, हम दर्शन-दुर्शन करके लौट आये। वृद्ध जागेश्वर भी ‘हो’ गया।
कल मुझे ऑफिस जाना था, तो आज ही दिल्ली पहुँच जाना चाहिये था। अगर दिल्ली न भी पहुँचेंगे, तो कम से कम मुरादाबाद तक तो पहुँच ही जाना है। अब कुछ और देखने की इच्छा त्याग दी और दिल्ली की ओर चल पड़े। रास्ते में सबसे पहले मिला अल्मोड़ा। नहीं, गोलू देवता का मंदिर भी मिला था। बड़ी चहल-पहल थी। गोलू जी को दूर से ही प्रणाम करके चलते रहे। दूर-दूर तक चीड़ का ही जंगल। यह जंगल समाप्त हुआ तो अल्मोड़ा दिख गया। यहाँ से बाहर निकले तो बाल मिठाई की दुकानें मिल गयीं। एक दुकान के सामने बाइक खड़ी करके उससे दो दुकान आगे जाकर बैठ गये। भूख लगी थी। कुछ चटपटा खाने लगे। इतने में एक लड़का आया - “भाई जी, वो बाइक हटा लो जी।”
“हाँ, हाँ। मुझे पता है कि तुम्हारी दुकान के सामने बाइक खड़ी है। लेकिन याद रखो, हम पाँच किलो बाल मिठाई तुम्हारे यहाँ से ही लेंगे।”
पाँच किलो सुनते ही उसके सुर बदल गये - “कोई नहीं, कोई नहीं जी। आराम से खाओ और आराम से आओ।”
उसके जाते ही मैं दीप्ति से बोला - “बड़ा आया बाइक हटवाने। अब शाम तक भी बाइक वहाँ खड़ी रहेगी, कोई परेशानी नहीं।”
तो हमने बहुत सारी बाल मिठाई ली - बाल वाली भी और बिना बाल वाली भी। गोल-गोल सफेद दानों को बाल कहते हैं।
ढाई बजे खैरना पहुँचे। हल्द्वानी से रानीखेत का रास्ता भी यहीं से अलग होता है। अब चूँकि हम हल्द्वानी की ओर ही जा रहे थे, तो कह सकते हैं कि अब रानीखेत से आने वाला रास्ता भी मिल गया। ट्रैफिक और बढ़ गया।
टंकी फुल करा ली। पिछली बार जब जौलजीबी में फुल करायी थी, तब से अब तक 400 किलोमीटर आ चुके हैं। कुल 9.6 लीटर तेल आया। औसत आया 40 से ऊपर।
खैरना में ठंड़ा शर्बत पिला रहे थे। चार-चार गिलास खींच मारा दोनों ने। जून में 2000 मीटर से नीचे के स्थानों में बहुत गर्मी लगती है। और खैरना तो 1000 मीटर के आसपास ही है। फिर भरी दोपहरी का समय। पेट घड़े जैसा हो गया, लेकिन मन कह रहा था कि और पी ले। बुराँश का शर्बत था।
आगे एक-दो स्थानों पर और शर्बत वाले स्टाल मिले। लेकिन समझ नहीं आया कि किस उपलक्ष्य में ऐसा हो रहा है। समझ आया कैंची धाम से तीन किलोमीटर पहले। जाम लगा था। सड़क की बायीं लेन में हल्द्वानी जाने वाली गाड़ियाँ कतार में खड़ी थीं। हम आगे निकलते चले गये और आख़िरकार जाम में फँस गये। जू-तू करके आगे बढ़े तो पता लगने लगा कि पीछे शर्बत की कृपा क्यों बरस रही थी। 15 जून को मेला लगता है कैंची धाम पर। और मेला कोई छोटा-मोटा नहीं, भारी मेला। कंधों पर स्टार पर स्टार लगाये बड़े-बड़े पुलिस अफसर भी ट्रैफिक देख रहे थे। इसी से पता चला कि हाँ, वाकई भारी मेला है।
अब हमने मेला ‘एंजोय’ करना शुरू कर दिया। दीप्ति को मोबाइल और कैमरे में कितनी भी लंबी वीडियो बनाने की छूट दे दी। मैं अक्सर तीस सेकंड़ से ज्यादा की वीडियो नहीं बनाने देता, लेकिन अब बोल दिया कि इस मेले को एंजोय करना है, तो अपने-अपने तरीके से करो। मैं बाइक के कान ऐंठने लगा और वह कैमरे के।
बड़ी गाड़ियों का यहाँ आना प्रतिबंधित था। छोटी गाड़ियाँ भी पुलिस वालों की मर्जी पर आ रही थीं। और बाइकों पर कोई प्रतिबंध नहीं। कई किलोमीटर लंबी तो पैदल यात्रियों की ही लाइन थी। सब कतार बनाये खड़े थे। हम चलते रहे, चलते रहे, चलते ही रहे; लेकिन यह कतार बड़ी दूर जाकर समाप्त हुई। रास्ते में और भी कई स्थानों पर ठंड़ा शर्बत पिला रहे थे। हर स्टाल का स्वाद चखा हमने। एक स्टाल में तो कुछ ही देर पहले हलवे-पूरियों का भंड़ारा समाप्त हुआ था। बड़ा जोर पड़ा कि हम कुछ देर पहले यहाँ क्यों नहीं आये।
कैंची धाम के बाद पहली ही बसावट भवाली है। और भवाली के तो और भी बुरे हाल थे। यहाँ मेला तो नहीं था, लेकिन मेले से भी बुरे हाल थे। यहाँ से एक सड़क नैनीताल जाती है और एक हल्द्वानी। मैं ‘कैलकुलेट’ करने में लग गया कि किस रास्ते ज्यादा ट्रैफिक मिलेगा। हमें नैनीताल बिल्कुल भी नहीं जाना था, लेकिन कैलकुलेशन से यह पता चला कि फिलहाल नैनीताल जाने में ही फायदा है। हल्द्वानी रोड़ पर ट्रैफिक और जाम से राहत मिलने वाली नहीं, नैनीताल रोड़ पर राहत मिल जायेगी।
और हमारी ‘कैलकुलेशन’ सही निकली। खाली पड़ी सड़क और कुछ ही देर में नैनीताल। अब यहाँ से कालाढूंगी जायेंगे और वहाँ से बाजपुर होते हुए सीधे मुरादाबाद।
नैनीताल की झील सूखने लगी है। देखकर दुख भी हुआ। पर्यावरणविद और अन्य जानकार कहते हैं कि अत्यधिक दोहन से यह झील सूख रही है। पानी के सोते सूख रहे हैं, दोहन चल ही रहा है। जून में वैसे भी झीलें सूख जाती हैं। शायद मानसून में यह लबालब भर जाये।
अच्छा हाँ। कुछ सालों बाद जब यह झील बहुत ज्यादा सूख जायेगी तो नैनीताल नगर निगम इसमें प्लॉट काट देगा। नगर निगम नहीं काटेगा तो कोई प्रभावशाली लालची नेता ही काट लेगा। एक बार जमीन के टुकड़े हो गये; तो कोई इसके नाम होगा, कोई उसके नाम। तो फिर इसे मान्यता दे दी जायेगी। फिर बहुमंजिले होटल बनेंगे। मकान बनेंगे। और खरीदने वाले और कोई नहीं होंगे, हम ही लोग होंगे, जो आज नारे लगा रहे हैं - “हाय-हाय, झील सूख रही है; हाय-हाय, पर्यावरण प्रदूषण; हाय-हाय, दोहन।”
कालाढूंगी रोड़ बहुत अच्छी बनी है। चूँकि नैनीताल जाने वाले ज्यादातर यात्री हल्द्वानी से जाते हैं, तो यह मार्ग खाली पड़ा था। एक अच्छी दिखने वाली जगह पर हम रुक गये, फोटो खींचने को। कुछ यात्री भी रुके थे। भुट्टे वाले भी थे। सड़क की रेलिंग के पार एक मैदान का टुकड़ा था। एक आदमी उस मैदान में जाने को रेलिंग के पार हो गया तो महिलाएँ चिल्ला उठीं - “हाय, रेलिंग मत कूदो, मर जाओगे, गिर जाओगे, ढै पड़ोगे।” आदमी हँसता रहा, बच्चे फोटो लेते रहे, महिलाएँ उसके ढै पड़ने को रोती रहीं, दीप्ति इन्हें देखकर हँसती रही।
खुरपाताल दूर से तो दिखा, लेकिन जब पास पहुँचे तो दिखा ही नहीं। पेड़ों और झाड़ियों में इस तरह गुम हुआ जैसे हो ही न। हमने भी ढूँढ़ने की कोशिश न की और अपने रास्ते चलते रहे।
आगे सन्नाटे में एक भुट्टे वाला बैठा था। हट्टा-कट्टा शरीर और गहरा साँवला रंग। काली पैंट और बनियान पहने हुए। दो कारें रुकी हुई थीं। हम भी रुक गये। बीस रुपये का एक भुट्टा। बगल में ही नीचे उसका गाँव था। सुबह ही यहाँ आ जाता है, शाम को अपने घर में। सुबह बोरी भरकर कूकड़ियाँ - भुट्टे - लाता है, शाम को जेब भरकर ले जाता है। कहने लगा - “भाई जी, बहुत अच्छा काम चल रहा है।”
मैंने पूछ लिया - “आज उधर कैंचीधाम के मेले में क्यों नहीं गये?”
“क्यों जाता? आप तो इधर आ गये, मैं कैसे चला जाता उधर?”
“अरे नहीं भाई जी, हम सुबह से ही आपको वहीं ढूँढ़ रहे थे। उधर नहीं मिले तो हमें यहाँ इतनी दूर आना पड़ा। पर हमने भी कसम खा रखी थी कि भुट्टे तो ताऊ के ही खाने हैं।”
दोनों कारें चली गयीं। हम बैठे रहे। भुट्टे में नींबू भी तेज था और मसाला भी तेज। दीप्ति की बात का कहना माना उसने। मुझसे खाते नहीं बना, दीप्ति दो भुट्टे खा गयी।
एक कार और आकर रुकी। हम तीनों देखने लगे; कितने यात्री हैं; कितने भुट्टे लेंगे। उन्होंने भुट्टे तो नहीं लिये, लेकिन दिमाग ख़राब करके चले गये। कार का शीशा नीचे हुआ, उसमें से एक ‘लेडी सिर’ बाहर निकला और पूरा पेट खाली करके शीशा चढ़ाकर तेजी से नैनीताल की ओर बढ़ गये। एकदम हमारी आँखों के सामने ही। दस मीटर भी दूर नहीं। मतलब, मैं भुट्टे में दाँत गड़ाये बैठा हूँ, दीप्ति अपना भुट्टा चबाकर निगलने वाली है... और सामने ही, एकदम सामने ही ऐसा वीभत्स नज़ारा।
“ये लो भाई जी, ऐसे भी लोग होते हैं दुनिया में।” भुट्टे वाले की आवाज़ आयी - “दूर-दूर तक जंगल है। लेकिन उन्हें यहीं आकर गड़बड़ करनी थी, जहाँ चार लोग बैठकर खा-पी रहे हों।”
और कमाल की बात यह है कि ये पैसे वाले लोग होते हैं। प्रभावशाली लोग होते हैं। देश चलाते हैं। नैनीताल जाकर दारू पीकर बोतलें फोड़कर-छोड़कर कह देंगे कि अब नैनीताल में वो बात नहीं रही।
हम तो भईया, सीधे मुरादाबाद जाकर रुके योगेश शर्मा जी के यहाँ। आलू सोयाबीन की सब्जी, दाल-चावल, रोटी, सलाद, रायता और दशहरी। नहाये-धोये, खाये-पीये और सो गये। सुबह ट्रैफिक बढ़ने से पहले-पहले दिल्ली आ गये।






डांडेश्वर मंदिर



जय श्री जागेश्वर







वृद्ध जागेश्वर


वृद्ध जागेश्वर से दिखायी देता जागेश्वर

अल्मोडा


कैंची धाम मेले का जाम


नैनीताल झील




खुरपाताल


इत्तू सा रेस्टोरेंट

समाप्त।

8 comments:

  1. ‘ट्यण-म्यण बाट, हिटो माठूँ-माठ’ पहली लाइन का मतलब तो आप समझ ही गए अब हिटो का मतलब चलो और माठूँ-माठ मतलब धीरे धीरे

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  2. Bhai Almora se phele k raste k bare mein to bata diya... Ranikhet bridge tak ab 4 lane kar rahe hain or rasta itna bekar ho rakha hai 5 10 ki speed se bhi bike nahi chal sakti..


    1 jaankari or chaiye देवदार or चीड़ mein kya antar hota hai

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    1. देवदार और चीड़ अलग-अलग पेड़ होते हैं... ठीक वैसे ही जैसे मैदानों में आम और नीम के पेड़ होते हैं... अंतर तो इन्हें देखने से ही पता चलेगा, लेकिन चीड़ के जंगल में कोई और पौधा या घास-पतवार नहीं उगते... चीड़ जमीन की सारी नमी सोख लेता है, पानी की कमी से कोई और वनस्पति इसके नीचे नहीं उगती... गर्मियों में पहाड़ों में जो आग लगती है, वो चीड़ के जंगल में ही लगती है... जबकि देवदार के जंगल में और भी बहुत सारी वनस्पतियाँ उगती हैं...

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    2. धन्यवाद भाई

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  3. Ye Extra widget bahut pahle hi lga dena tha. :)

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  4. बस ये लास्ट वाला एपिसोड छूट गया था पर आज सिर्फ इसे ना पढ़कर पहले वाले से शुरू किया
    मजा आ गया
    घंटो बीत गए
    आदी कैलाश ओर ओम परबत की यात्रा कभी करो तो मजा आ जायेगा पढ़ने का
    इनर लाइन पास से मन नही भरा
    आप लिखो तो मजा अलग
    शुभकामनये

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  5. हिटो माठूँ-माठ.. matlab dheere dheere chalo !

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