Monday, September 18, 2017

बाइक यात्रा: नारायण आश्रम से मुन्स्यारी

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12 जून 2017
ग्यारह बजे नारायण आश्रम से चल दिये। आज मुन्स्यारी पहुँचना था, जो यहाँ से करीब 150 किलोमीटर दूर है। कल रात के समय हम यहाँ आये थे। अब दिन के उजाले में पता चल रहा था कि यह रास्ता कितना खूबसूरत है। ख़राब तो है, लेकिन खूबसूरत भी उतना ही है। शुरू में जंगल है, फिर थानीधार के बाद विकट खड़े पहाड़ हैं। थानीधार पांगु के पास है। धारचूला से पांगू तक नियमित जीपें चलती हैं। थानीधार से पूरब में थोड़ा ऊपर नारायण आश्रम का बड़ा ही शानदार दृश्य दिखता है।
यहाँ एक सूचना-पट्ट लगा था - तवाघाट से थानीधार मोटर-मार्ग का निर्माण। और यह मार्ग 14 किलोमीटर लंबा होने वाला था। हमें नहीं पता था कि यह पूरा बन गया या नहीं। तो हम इसी पर चल दिये। अगर पूरा बन गया होगा, तो 10-12 किलोमीटर कम चलना पड़ेगा और अगर पूरा नहीं बना होगा तो वापस यहीं लौट आयेंगे। जरा ही आगे एक गाँव में पता चल गया कि यह मार्ग अभी पूरा नहीं बना है, तो वापस उसी रास्ते लौट आये।
अब मैं एक बात और बताना चाहूँगा। थानीधार और तवाघाट के बीच में कोई भी गाँव नहीं है। इस 14 किलोमीटर की दूरी में 800 मीटर नीचे उतर जायेंगे। ज़ाहिर है कि सड़क का ढाल अच्छा-खासा होगा। इसी से पहाड़ की विकटता का भी अंदाज़ा लगाया जा सकता है। वर्तमान में जो सड़क है, वह 20 किलोमीटर लंबी है। यह नयी सड़क इस दूरी को 6 किलोमीटर कम करेगी। लेकिन नयी सड़क बनने से पहाड़ का सत्यनाश हो रहा है। नीचे फोटो हैं, आप देखना। चूँकि सड़क का सारा मलबा नीचे ही गिराया जाता है, तो इससे पूरे पहाड़ से वनस्पतियों का सफाया हो चुका है। धूल उड़ती है और अब यह एक भू-स्खलन क्षेत्र बन चुका है। आगामी समय में यहाँ हमेशा भू-स्खलन होता रहेगा। पुरानी सड़क चट्टानी पहाड़ों से होकर गुजरती है, इसलिये वहाँ भू-स्खलन का उतना ख़तरा नहीं है। बेहतर होता कि टूटी हुई पुरानी सड़क को ही अच्छा बना देते। केवल 6 किलोमीटर बचाने को इतना बड़ा नुकसान!
मैं पहाड़ों में सड़क बनाने का समर्थक हूँ। हर गाँव तक अच्छी सड़क बननी चाहिये। लेकिन इस तरह नहीं।
आगे बढ़ते हैं। एक बजे कंचौती पहुँचे। कल हम यहीं से नारायण आश्रम के लिये मुड़े थे। उन लोगों को लताड़ लगायी, जिन्होंने बताया था कि नारायण आश्रम की सड़क अच्छी बनी है। चावल नहीं थे, इसलिये कुछ चाय पी, कुछ बिस्कुट खाये और कुछ अंड़े भी।
ढाई बजे धारचूला पहुँचे। धूप निकली थी और 900 मीटर की ऊँचाई पर बसे इस शहर में गर्मी चरम पर थी। यहाँ भरपेट भोजन मिला - रोटी-सब्जी और राजमा-चावल।
अभी भी हमें काफी दूरी तय करनी थी, इसलिये शीघ्र ही धारचूला से निकल पड़े। बाइक में पेट्रोल समाप्ति की ओर था, भरवाना ज़रूरी था। लेकिन जब पेट्रोल पंप पर पहुँचे तो बमुश्किल डेढ़ लीटर ही पेट्रोल मिला। यहाँ भी पेट्रोल समाप्त हो गया था। अगला पेट्रोल पंप कहाँ है? जौलजीबी। यानी तीस किलोमीटर आगे। अब हमारे पास इतना पेट्रोल तो था कि जौलजीबी पहुँच सकें। इन तीस किलोमीटर में 21 किलोमीटर तक तो बहुत अच्छी सड़क बनी है, बाकी 9 किलोमीटर भी एक-दो साल में अच्छी बन जायेगी। बी.आर.ओ. जिंदाबाद।
लेकिन जौलजीबी के पेट्रोल पंप पर सूखा नहीं पड़ा था। टंकी फुल हो गयी। मुन्स्यारी में जहाँ यह 74.16 रुपये प्रति लीटर था, वहीं जौलजीबी में 74.02 रुपये प्रति लीटर। दिल्ली में 67.25 रुपये था और बागेश्वर में 70.82। और हाँ, एक बात और बता दूँ। बाइक जैसे-जैसे पुरानी होती जा रही है, बेहतर औसत भी देती जा रही है। दिल्ली से बागेश्वर तक 52 किलोमीटर प्रति लीटर का औसत आया और बागेश्वर से धारचूला, दुकतू, नारायण आश्रम, धारचूला, जौलजीबी जिसमें ज्यादातर ख़राब सड़क पर चले, 44 का औसत आया। यह अच्छा औसत शायद इसलिये आया होगा कि पहाड़ों पर ढलान वाले रास्ते पर मैं बाइक को किसी भी गियर में डालकर क्लच लीवर दबाकर चलाता हूँ। बाइक स्टार्ट रहती है, लेकिन न्यूट्रल में चलती है। कोई लोड़ नहीं पड़ता, तो औसत अच्छा आ ही जाता है।
तो जौलजीबी से हमने पिथौरागढ़ रोड़ छोड़ दी और मुन्स्यारी की ओर चल पड़े। रास्ता गौरी नदी के साथ-साथ रहता है। यह नदी मिलम ग्लेशियर से निकलती है। इसके उदगम तो पता नहीं कब जाना हो, लेकिन आज संगम देख लिया। जौलजीबी में ही गौरी और काली का मिलन होता है। संगम देख लिया, उदगम भी देख लेंगे।
सड़क बहुत अच्छी बनी है। कुछ स्थानों पर बी.आर.ओ. पुल निर्माण कर रहा है, तो डायवर्जन का भी सामना करना पड़ा, अन्यथा कुल मिलाकर सड़क बहुत अच्छी है।
गौरी नदी यहाँ तंग घाटी बनाकर नहीं बहती है। कई स्थानों पर तो घाटी दो किलोमीटर तक चौड़ी है। ऐसे स्थानों पर खेत भी हैं और गाँव भी। पूरा रास्ता खेतों और गाँवों से होकर ही गुजरता है। तहसील धारचूला है, तो धारचूला से बरम, बुंगापानी तक खूब जीपें चलती हैं।
लेकिन पहाड़ी नदियाँ हमेशा ही चौड़ी घाटी में बहती रहें, नामुमकिन। मदकोट के पास भी गौरी को विकट पहाड़ों का सामना करना पड़ा। एकदम सीधे खड़े पहाड़ और आबादी का नामोनिशान नहीं। चट्टानें आपके ऊपर ऐसे लटकी रहती हैं कि ऊपर से गिरती पानी की बूँदें या कोई पत्थर आप पर नहीं पड़ेगा। इस मार्ग पर एक झरना भी है। झरना बड़ी ऊँचाई से गिरता है और आप झरने व पहाड़ के बीच से बिना भीगे निकल जाते हैं। मुझे झरने बड़े पसंद हैं और ऐसे झरने तो हिमालय में विरले ही मिलते हैं।
मदकोट काफी बड़ा कस्बा है। मुझे अंदाज़ा नहीं था कि यह इतना बड़ा होगा। उत्तराखंड़ परिवहन की एक बस खड़ी दिखी - देहरादून से मदकोट। यह शाम को देहरादून से चलती होगी, सुबह हल्द्वानी और अगली शाम को मदकोट। सुबह यहाँ से देहरादून के लिये चलेगी। मदकोट से ही पंचचूली के दक्षिणी बेसकैंप जाया जा सकता है। हम उत्तरी बेसकैंप से आये हैं।
यहाँ गौरी नदी पार की और मुन्स्यारी की ओर चल दिये। नदी के उस तरफ एक जे.सी.बी. पहाड़ की खुदाई कर रही थी। सारा मलबा नीचे नदी में डाला जा रहा था। और यह मलबा अपने साथ सभी पेड़-पौधों व वनस्पतियों को भी उखाड़कर ले जा रहा था। जैसे-जैसे सड़क आगे बनती जा रही थी, पहाड़ की खाल खींचती जा रही थी। बड़ा दुख हुआ। सड़क तो बननी चाहिये। मदकोट से ऊपर उस घाटी में कई गाँव हैं, जहाँ सड़क नहीं है। लेकिन इस तरह नहीं। पता नहीं इस सड़क को कौन बना रहा है, बी.आर.ओ. या सी.पी.डब्लू.डी.। अगर ये लोग प्रतिज्ञा कर लें कि सड़क बनाते समय धूल का एक कण तक भी नीचे नहीं जाने देना है, तो हिमालय के लिये अच्छा रहेगा। हालाँकि अभी सोचा जा सकता है कि ऐसा कैसे होगा, लेकिन जब प्रतिज्ञा कर ही लेंगे तो ऐसा होने लगेगा। कुछ खर्च बढ़ जायेगा, कुछ समय बढ़ जायेगा - लेकिन ऐसा हो सकता है।
रात आठ बजे मुन्स्यारी पहुँचे। जून होने के बावजूद भी 500 रुपये का एक कमरा मिल गया। बस अड्डे के पास ही। बस अड्डे पर दिल्ली-मुन्स्यारी बस खड़ी थी। सुबह यह बस दिल्ली के लिये प्रस्थान कर जायेगी।



नारायण आश्रम रोड़

नारायण आश्रम रोड़


थानीधार से तवाघाट की निर्माणाधीन सड़क

दुकतू की तरफ से आती नदी पर बना एक बांध



नेपाल का एक दृश्य




बरम के पास गौरी नदी


मदकोट के पास



मदकोट के पास सड़क निर्माण और मलबा सीधा नीचे..

हरियाली और पहाड़ को ज्यादा नुकसान पहुँचाये बिना भी सड़क बनायी जा सकती थी... लेकिन पहाड़ की खाल खींच लेना कहाँ तक उचित है?


मुन्स्यारी बस अड्डा


7 comments:

  1. Jo bus munsharyi. M khadi h vo delhi phuchne m kitna smay leti hai

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  2. प्रणाम नीरजजी! बड़ी रोचक जानकारी मिली. सड़क निर्माण पर आपका दृष्टिकोण बहुत अच्छा लगा. गम्भीर विषय है.

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  3. आपने लिखा है "मैं बाइक को किसी भी गियर में डालकर क्लच लीवर दबाकर चलाता हूँ। बाइक स्टार्ट रहती है, लेकिन न्यूट्रल में चलती है। कोई लोड़ नहीं पड़ता, तो औसत अच्छा आ ही जाता है।"
    ढलानों पर औसत की परवाह ना करें
    गाड़ी गियर में डालकर बिना क्लच लीवर दबाकर चलायें क्योंकि ये गाड़ी को ढलान में कण्ट्रोल करता है विशेष तौर से वहां जहां मोड़ विद ढलान हो
    दूसरा यदि ढलान बहुत ज्यादा है गाड़ी तेज रफ़्तार में nutral में है और अचानक गियर में डाली जाये तो ये गियर बॉक्स को डैमेज कर सकता है

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    1. आपने सही कहा... लेकिन मैं ब्रेक से बाइक की स्पीड़ कंट्रोल करता हूँ... कभी भी ज्यादा तेज नहीं चलाता... और तेज रफ़्तार पर कभी भी गियर में नहीं डालता... प्रत्येक बाइकर को मालूम होता है कि कितनी स्पीड़ पर कौन-सा गीयर लगेगा... और अगर नहीं मालूम तो वह बाइकर अनाड़ी है...

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    2. बिलकुल सही कहा आपने
      प्रत्येक बाइकर को मालूम होता है कि कितनी स्पीड़ पर कौन-सा गीयर लगेगा... और अगर नहीं मालूम तो वह बाइकर अनाड़ी है...
      हा हा हा ......
      ओवरआल वैरी नाईस यात्रा वृतांत
      इस बार दिल्ली आऊंगा तो आपसे जरुर मिलूँगा

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