Monday, September 25, 2017

पाताल भुवनेश्वर की यात्रा

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13 जून 2017
हम मुन्स्यारी में थे और सोते ही रहे, सोते ही रहे। बारह बजे उठे। आधी रात के समय यहाँ बड़ी चहल-पहल मची थी। गाड़ी भरकर पर्यटक आये थे। उनकी गाड़ी कहीं ख़राब हो गयी थी तो लेट हो गये। और उन्होंने जो ऊधम मचाया, उसका नतीज़ा यह हुआ कि हम दोपहर बारह बजे तक सोते रहे। उठे तो आसमान में बादल थे और बर्फ़ीली चोटियों का ‘ब’ भी नहीं दिख रहा था। आज हमें मुन्स्यारी के आसपास ही घूम-घामकर वापसी के लिये चल देना था और थल के आसपास कहीं रुकना था। अब साफ़ मौसम नहीं था तो मुन्स्यारी घूमने का इरादा त्याग दिया और वापस चल दिये।
बड़े दिनों से इच्छा थी मुन्स्यारी देखने की। वो इच्छा तो पूरी हो गयी, लेकिन घूम नहीं पाये। इच्छा कहीं न कहीं अधूरी भी रह गयी। इसे पूरा करने फिर कभी आयेंगे।
फिर रुके हम सीधे क्वीटी जाकर। रास्ते में आने वाली हर जगह को पीछे छोड़ते हुए और उस प्रसिद्ध झरने को भी - बिरथी फाल को। सबको पीछे छोड़ते हुए। रास्ते का आनंद लेते हुए। रास्ता कुल मिलाकर ठीक ही है, लेकिन बिरथी और मुन्स्यारी के बीच में कई स्थानों पर ख़राब भी है। ऐसे ही एक ख़राब रास्ते में एक कार फँसी खड़ी थी। अकेला आदमी उसे निकालने की कोशिश कर रहा था, पत्थर हटा भी रहा था व डाल भी रहा था और पत्नी व बच्चे अपने टूर को ‘एंजोय’ कर रहे थे - सेल्फी और चिप्स।
तो हम सीधे क्वीटी रुके। भूख लगने लगी थी। चाय और समोसे। यह परचून की एक काफी बड़ी दुकान थी। शायद छोटे-से क्वीटी की सबसे बड़ी दुकान हो, लेकिन यहाँ समोसे ही सबसे ज्यादा बिकते थे। एक ग्राहक एक सौ अस्सी रुपये का सौदा ले गया। हमारे रहते यही उसकी सबसे बड़ी बिक्री थी, अन्यथा दस रुपये, बीस रुपये के समोसे ही बिके जा रहे थे।
हमें पता नहीं चला और तेजम के पास कहीं से अल्मोड़ा की सड़क अलग हो गयी। हमें पाताल भुवनेश्वर जाना था, तो सीधे ही चलते रहे। नामिक ग्लेशियर से आने वाली रामगंगा के साथ-साथ।
थल पहुँच गये। अभी चार ही बजे थे, तो थल में नहीं रुके। रामगंगा पार करके चढ़ाई शुरू हो गयी। चीड़ का शानदार जंगल। यहाँ मुझे संस्कृत सूझी। संस्कृत में एक फेसबुक स्टेटस भी डाल दिया। यार लोग मेरी सदाबहार संस्कृत पर वाहवाही करने लगे, लेकिन एक मित्र ने फटकारा - “हे अंडाहारी मनुष्य! तुम्हें देवभाषा संस्कृत न लिखनी चाहिये और न पढ़नी चाहिये। यह परम सात्विक प्राणियों के लिये है।” अब मैं भी कहाँ पीछे हटने वाला था - “हे सात्विक मनुष्य! एक वाक्य संस्कृत में लिखकर दिखा दो।” और मज़ा तब आया, जब उन्होंने कहा - “मैं भी सात्विक ना हूँ जी। जब सात्विक हो जाऊँगा, तभी संस्कृत सीखूँगा।”
लेकिन सीखने की कोई उम्र नहीं होती, कोई सत्व-तमस का चक्कर नहीं होता। ‘सुगंधिम-पुष्टिवर्धनं’ सीखो या ‘लाहौल-विला-कुव्वत’ सीखो या चेंगलपट्टू में बोली जाने वाली भाषा सीखो या कोझिकोड़ की भाषा सीखो। जितना सीखो, उतना थोड़ा।
तो हम बेरीनाग जाकर रुक गये। एक होटल था - पंचचूली व्यू करके। सबसे ऊपर वाला कमरा मिला। कमरे के सामने इससे नीचे के कमरों की छत थी। दरवाजा उत्तर में खुलता था और सामने दिखती थीं - पंचचूली की पाँचों चोटियाँ। मज़ा आ गया।
क्या कहा? पैसे? 500 रुपये।
...
अगले दिन बेरीनाग से कितने बजे चले, यह मायने नहीं रखता। लेकिन साढ़े ग्यारह बजे पाताल भुवनेश्वर पहुँच गये। जून का महीना हिमालय में ट्रैवलिंग का सबसे पीक महीना होता है। आप कहीं भी निकल जाओ, टूरिस्ट लोग मिलेंगे। यहाँ भी पतली-सी सड़क पर दे-दनादन गाड़ियाँ आती-जाती मिलीं। और जो हमें देखकर आगे निकलने को होरन बजाना शुरू कर देता था, उसे हम साइड़ नहीं देते थे। पतली सड़क है, चुपचाप पीछे-पीछे चलो। जहाँ जगह होगी, अपने आप साइड़ दे देंगे। बाइक वालों की पहाड़ में चलती है, कार वाले इस बात को कभी नहीं समझ सकते। वे सोचते हैं, जैसे मैदान में बाइक एक तिनके से ज्यादा नहीं होती, वैसा भी पहाड़ में भी होता होगा। लेकिन बिना बाइक वाले की मर्जी के आगे निकलकर दिखाओ।
तो हम पाताल भुवनेश्वर पहुँच गये। सड़क का जहाँ ‘दी एंड़’ हो जाता है, वहाँ एक आदमी कुर्सी डाले बैठा था। वो कौन था, यह तो पता नहीं, लेकिन उसका एक ही काम था - सबसे यह कहते रहना कि ओये, डी.एम. साहब आने वाले हैं। अपनी गाड़ी यहाँ खड़ी मत करो।
कुछ कारें एक लाइन में खड़ी थीं। अगल-बगल। पार्किंग की तरह। उनमें से एक कार चली गयी तो उस खाली स्थान पर हमने अपनी बाइक खड़ी कर दी। हम हटे भी नहीं थे कि एक कार वाला आ गया - “ओये, बाइक किसकी है? हटाओ यहाँ से। हमें अपनी कार लगानी है यहाँ।” मैंने भी कह दिया - “म्हारी है। ना हटाते।” एक तो मेरा पेट निकला ही हुआ है, ऐसे मौकों पर थोड़ी छाती भी चौड़ी कर लेता हूँ। तो शायद मैं चौड़-धौड़ दबंग टाइप का लगता होऊँगा। मुझे नहीं पता। सामने वाला ही जानता होगा।
कुछ नीचे उतरकर गुफा के द्वार पर पहुँचे तो वहाँ अलग ही नज़ारा था। लाइन लगी थी और भीड़ बेशुमार। द्वारपाल दरवाजा बंद करके चिल्ला रहा था - पचपन नंबर वाले आ जाओ। ये नंबर कहाँ से मिलते हैं? आ जाओ जी, यहाँ से मिलते हैं - एक काउंटर के अंदर से आवाज आयी। लाओ तो, हम दो मनुष्य हैं। उसने बिजली की गति से हाथ चलाये, एक पर्ची बनायी और “लाओ जी एक सौ दस रुपये। कैमरा-मोबाइल इधर जमा कर दो। अंदर इन्हें ले जाना एलाऊ नहीं है।” मैंने बड़ी विनती की - “भाई मेरे, बड़ी दूर से आया हूँ। कैमरे की भी पर्ची काट दे। पर यार, मना मत कर।”
“ये सभी लोग बड़ी दूर से ही आये हैं जी। और हमारे हाथ में कुछ ना है। आपको अगर फोटो खींचने हैं तो देहरादून से परमिशन लानी पड़ेगी।”
“गुफा तो पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है। और पुरातत्व विभाग अमूमन एक तय राशि लेकर कैमरा ले जाने देता है।”
“हमें कुछ नहीं पता जी। आप कैमरा-मोबाइल अंदर नहीं ले जा सकते।”
पर्ची पर देखा। मंदिर समिति जैसा कुछ लिखा था। “लेकिन पर्ची तो मंदिर समिति दे रही है। तो क्या पाताल भुवनेश्वर मंदिर समिति का हेडक्वार्टर देहरादून में है?”
“नहीं जी, मंदिर समिति तो कभी भी एलाऊ नहीं करेगी यहाँ फोटोग्राफी। लेकिन यदि आपको फोटो लेने ही हैं, तो देहरादून स्थित पुरातत्व ऑफिस से परमिशन लानी पड़ेगी।”
मामला मैं समझ गया। पुरातत्व ने अपने बोर्ड लगा दिये - “अटेंशन... यह पुरातत्व विभाग की संपत्ति है... अगर कोई भी व्यक्ति इसे नुकसान पहुँचाता पाया गया तो अलाने नियम की फलानी धारा के अनुसार इतने रुपये का जुर्माना और इतने साल की जेल होगी।”
बावले कहीं के... अटेंसन वाला बोर्ड लगाकर खुद देहरादून जाकर बैठ गये और इस धरोहर को मंदिर समिति को देकर चले गये।
तो बड़ी देर बाद हमारा नंबर आया। एक पतले रास्ते से आड़े-तिरछे होकर, बैठकर, सरककर, रस्सी-जंजीर पकड़कर नीचे उतरना होता है। फिर पहुँचते हैं हम असली गुफा में। गाइड़ लोग, जो कि मंदिर समिति के कर्मचारी ही होते हैं, हर चट्टान की, टपकते पानी की, चूने के ढेर की व्याख्या करने लगते हैं - “ये देखो जी, यह शेषनाग का फन है। यह शिवजी का त्रिशूल है। ये पार्वती की गोद में गणेश जी हैं और यहाँ गणेश जी की सूँड़ के नीचे इतने करोड़ देवता हैं। जब भगवान कृष्णजी ने उसके साथ ऐसा किया था, तो ऐसा हुआ था। अमृत की जलधारा फूट पड़ी थी। ये वो ही जलधारा है। जब ऊपर से लटकता यह खंबा नीचे वाले खंबे से मिल जायेगा, तो सृष्टि का नाश हो जायेगा। और वे दो खंबे पहले अलग-अलग थे, अब मिल चुके हैं। उस समय सृष्टि का नाश इसलिये नहीं हुआ क्योंकि इधर फलाने देवता फलानी मुद्रा में बैठे हैं।”
और हमने इन्हें सुनना बंद कर दिया। चूने की चट्टानों में जब पानी प्रवेश करेगा तो वह अपने साथ चूने को घोलकर ले जायेगा। शेष बचेंगी अनोखी-अनोखी आकृतियाँ, जिन्हें लोग देवताओं की उपाधियाँ दे देते हैं। यह प्रक्रिया करोड़ों वर्षों से चल रही है और अभी भी अनवरत जारी है। रिस-रिस कर पानी आता है, उसमें चूने के अवशेष होते हैं। ऊपर छत पर जहाँ से पानी टपकता है, ये अवशेष वहाँ भी एकत्र होने लगते हैं और नीचे भी एकत्र होते रहते हैं। कालांतर में ऊपर से एक खंबेनुमा संरचना नीचे की ओर बनना शुरू होती है और उसके ठीक नीचे भी एक खंबा ऊपर उठना शुरू होता है। इसे आप शिवलिंग कहिये या कुछ भी कहिये। यह होता रहेगा और एक समय ऐसा आयेगा, जब ये दोनों खंबे मिल जायेंगे। तब चूने का पानी बिना टपके ही खंबे के माध्यम से ऊपर से नीचे आ जाया करेगा।
लेकिन यह जानकारी मंदिर समिति कभी नहीं देगी। इसे देने की जिम्मेदारी पुरातत्व की है और पाताल भुवनेश्वर में पुरातत्व विभाग है ही नहीं, केवल लाल-नीली ‘अटेंसन’ ही है।
कुछ लड़के गाइड़ से चमगादड़ों वाली गुफा तक भी ले जाने को कहने लगे। गाइड़ ने मना कर दिया - “नहीं, वहाँ ऑक्सीजन नहीं है।”
इसका क्या मतलब हुआ? चमगादड़? वे आते-जाते कहाँ से हैं? गुफाओं में चमगादड़ होते ही हैं। उन्हें आने-जाने का रास्ता भी चाहिये। लेकिन जिस तंग रास्ते से हम आये हैं, उस रास्ते चमगादड़ों के आने-जाने की संभावना नहीं है। तो क्या बाहर जंगल में कहीं दूसरा रास्ता भी है गुफा में आने के लिये?
ये प्रश्न अनुत्तरित रह गये।
और हाँ, आपको अगर ऐसी ही गुफा में बे-रोकटोक फोटोग्राफी करनी है, तो सीधे पहुँचिये आंध्र प्रदेश स्थित बोर्रा गुफाओं में। गुफा के भीतर रंग-बिरंगी रोशनियाँ आपके फोटो को बिना मेहनत के ही उत्कृष्ट बना देंगी...
...
गंगोलीहाट में देवी का एक मंदिर है। देवदार के पेड़ों के बीच। बहुत अच्छा लगा।
और अब चल पड़े दिल्ली की ओर। पनार में पिथौरागढ़-अल्मोड़ा मार्ग मिल गया। बेहद शानदार मार्ग है। चलते रहे, चलते रहे। बशोली में दम लेने रुके। और जब दन्या से होकर गुजर रहे थे तो बारिश होने लगी। दन्या में ही रुक गये। अच्छा खासा कस्बा है। मैंने पहले कभी इसका नाम भी नहीं सुना था। आसपास और दूर-दूर तक चीड़ का जंगल। चार सौ रुपये का कमरा बिना मोलभाव के। शानदार डिनर। उससे भी शानदार बाल मिठाई और सिंगोड़ी।
आप अल्मोड़ा के आसपास होते हैं तो बिना बाल मिठाई के कैसे रह सकते हैं?

बेरीनाग कस्बा और दूर दिखतीं पंचचूली की चोटियाँ...

पंचचूली पर सूर्यास्त...

शायद यह त्रिशूल है... सूर्योदय...




गुफा के अंदर जाने को प्रतीक्षारत यात्री... 


बीस-बीस रुपये हम दोनों के और पचास रुपये में कंपलसरी गाइड़...

यह देखिये... इधर देखिये... पाताल भुवनेश्वर में पुरातत्व विभाग के कर्मठ अधिकारी पूरी तल्लीनता से अपना काम करते हुए... अबे देश की धरोहर है पाताल भुवनेश्वर और आपने इन्हें ठगों के हाथ में सौंप रखा है लोगों को गुमराह करने के लिये...



हाट कालिका मंदिर गंगोलीहाट में जाटराम

एक फोटू और...

वन मोर...





पनार में पिथौरागढ़-अल्मोड़ा सड़क... बायें पिथौरागढ़, ऊपर अल्मोड़ा, दाहिने पाताल भुवनेश्वर





11 comments:

  1. सदा स्वस्थ, प्रसन्न रहो

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 101वीं जयंती : पंडित दीनदयाल उपाध्याय और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  3. Aap berinaag me om dhanu hotel me rukte

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  4. बहुत अच्छी जगह है

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  5. आखिर से दूसरी फोटो गजब आयी है। हमेशा की तरह रोचक विवरण।

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  6. सुंदर चित्रों से सजा रोचक यात्रा विवरण !

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  7. रोचक यात्रा वृतांत ..... चित्र तो बोनस की अनुभूति दे गये .....

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  8. वहाँ के भंडारियों ने लूट का अड्डा बना रखा है गुफा के नाम पर।

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