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पचमढ़ी से पातालकोट

23 अगस्त 2015
बहुत दिनों से सोच रखा था कि जब भी पचमढी जाऊंगा, तब पातालकोट भी जाना है। मेरे लिये पचमढी से ज्यादा आकर्षक पातालकोट था। अब जब हम पचमढी में थे और हमारे पास बाइक भी थी, तो इतना तो निश्चित था कि हम पातालकोट भी अवश्य जायेंगे। पातालकोट का रास्ता तामिया से जाता है, तामिया का रास्ता मटकुली से जाता है और मटकुली पचमढी जाते समय रास्ते में आता है। मटकुली में एक तिराहा है जहां से एक सडक पिपरिया जाती है, एक जाती है पचमढी और तीसरी सडक जाती है तामिया होते हुए छिन्दवाडा और आगे नागपुर।
डेढ बजे पचमढी से चल दिये और एक घण्टे में ही मटकुली पहुंच गये। रास्ता पहाडी है और ढलान भरा है। हम रात के अन्धेरे में पचमढी आये थे। तब यह रास्ता बहुत मुश्किल लग रहा था, अब उतना मुश्किल नहीं लगा। पचमढी में मौसम अच्छा था, लेकिन जितना नीचे आते गये, उतनी ही गर्मी बढती गई।
भूख लगी थी, मटकुली में भरपेट खाना खाया। मैं इस छिन्दवाडा वाले रास्ते को लेकर शंकित था कि पता नहीं कैसा रास्ता है। लेकिन जब इस पर चलना शुरू किया तो सारी शंकाएं निर्मूल हो गईं। यह बेहद शानदार सडक है। है तो टू-लेन ही लेकिन तीन-लेन जितनी चौडी है। कहीं कोई गड्ढा नहीं और ट्रैफिक भी नहीं।
शुरू-शुरू में दो-चार गांव हैं, फिर सडक जंगल में घुस जाती है। कुछ पहाडी मार्ग भी मिलता है लेकिन सडक की गुणवत्ता में कोई कमी नहीं आती। रास्ते में कई जगह कुछ लोग थाली में या परात में लड्डू जैसा कुछ बेचते मिले। हमारी जिज्ञासा तो थी कि यह क्या है लेकिन हम रुके नहीं। हालांकि जंगल और आदिवासी इलाका जरूर था लेकिन खतरे वाली कोई बात नहीं थी।
पौने पांच बजे तामिया पहुंचे। मटकुली से तामिया लगभग 50 किलोमीटर है। यहां से पातालकोट व्यू पॉइण्ट करीब 20 किलोमीटर है। वैसे तामिया भी एक अच्छी लोकेशन पर बसा है। इसके आसपास भी काफी कुछ देखने लायक है। आसपास के शहरों से यहां लोग आते होंगे घूमने। रुकने ठहरने का और खाने-पीने का भी इंतजाम है यहां। यहां आकर जंगल भी समाप्त हो जाता है और पहाडी मार्ग भी। या यूं कहें कि यहां से जंगल और पहाड शुरू होते हैं, तो ज्यादा ठीक लगेगा।
तामिया से पांच किलोमीटर छिन्दवाडा की तरफ और चलना होता है, एक गांव है। यहीं से पातालकोट का रास्ता अलग होता है। यहां से पातालकोट का 17 किलोमीटर का रास्ता अच्छा तो बना है लेकिन पतली सी सडक है और ऊंची-नीची यानी ‘बम्पी’ है। रास्ता शानदार नजारों से भरा है। ऊंची-नीची जमीन है और मानसून में चारों ओर हरियाली हो जाने के कारण घास की कालीन बिछी लगती है। इनके बीच बाइक चलाना शानदार अनुभव होता है। किलोमीटर के पत्थर बार-बार बता रहे थे कि छिन्दी इतना दूर है। हर पांच किलोमीटर पर हर्रई और नरसिंहपुर की दूरियां भी लिखी आतीं। यह सब देखते हुए अन्दाजा हो गया था कि पातालकोट छिन्दी के पास है।
एक जगह एक तिराहा मिला, यहां बोर्ड लगा था कि पातालकोट (रातेड) व्यू पॉइण्ट के लिये बायें जायें और चिमटीपुर व्यू पॉइण्ट के लिये सीधे जायें। हमने रुककर विमर्श किया कि पहले कहां जायें- रातेड या चिमटीपुर। तय हुआ कि रातेड पास में ही है, वहीं चलते हैं पहले। बाइक बायें मोड लीं।
दो किलोमीटर चलकर सडक घास के एक मैदान में समाप्त हो गई। यहां एक वाच टावर बना था ताकि लोगबाग पातालकोट को निहार सकें। यहां से आगे बिल्कुल पाताल लोक ही था। सीधी खडी गहराई। इसका पातालकोट नाम इसी गहराई की वजह से पडा है- बिल्कुल पाताल। लेकिन नीचे पाताल में भी लोग रहते हैं और गांव भी हैं। रातेड भी इनमें से एक गांव हैं। खूब घना जंगल है और आना-जाना पैदल ही होता है।
स्थानीय आदिवासी यहां जडी-बूटियां और स्थानीय पैदावार बेच रहे थे। एक तो यह इलाका ही बेहद दुर्गम है, फिर पातालकोट- यहां कोई स्वास्थ्य सुविधा नहीं है। आदिवासी स्वयं ही अपना उपचार करते हैं और कुदरत ने इनके जंगल में खूब जडी-बूटियां उगा रखी हैं। ये लोग इनका प्रयोग करना जानते हैं। लेकिन हम थोडे ही जानते हैं? कोई बूटी ले भी लेते तो वो हमारे किसी काम की नहीं थी।
पीछे सडक पर राजाखोह के बारे में भी लिखा था। वो यहां से तीन किलोमीटर दूर है। हमने उसके बारे में पूछा तो पता चला कि वहां बाहर का कोई आदमी आसानी से नहीं जा सकता। यह सामने पाताल लोक दिख रहा है, जब आप इसमें नीचे उतर जाओगे तो फिर ऐसा ही एक पाताललोक और दिखेगा जो यहां से नहीं दिख रहा। उस पाताल में भी नीचे उतरकर कहीं राजाखोह है।
नीचे एक सडक दिखाई दी। पता चला कि सडक बन रही है। हमारी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। सडक बन रही है तो बाइक जा सकती है। लेकिन ऊपर सूरज महाराज कह रहे थे कि अब यहां ज्यादा देर मत रुको। सुमित को कल हर हाल में इन्दौर पहुंचना था। अन्यथा हम आज तामिया रुक जाते और कल फिर पातालकोट आते। कल का दिन हमें और मिल जाये तो हम कैसे भी करके राजाखोह तक अवश्य जायेंगे। जहां तक बाइक जायेगी, बाइक से जायेंगे; उसके बाद पैदल जायेंगे।
यही सुमित भी सोच रहा था। उसके मन में भी यही चल रहा था कि कल का दिन और मिलना चाहिये। मैं सोच रहा था कि तामिया पहुंचने में हमें अन्धेरा हो जायेगा। सुमित वापस इन्दौर जाने के लिये मटकुली, पिपरिया होते हुए जाना चाहेगा और मैं बैतूल होते हुए। तामिया में मैं सुमित को समझा दूंगा और बैतूल के रास्ते चलने को राजी कर लूंगा। तामिया से चलकर जुन्नारदेव तक काफी रात हो जायेगी। अगर हिम्मत रही तो बैतूल रुकेंगे अन्यथा जुन्नारदेव ही रुक जायेंगे। यह मैं सोच रहा था। अचानक सुमित ने कहा- नीरज, अगर हम आज यहीं रुकते हैं तो तुझे कोई परेशानी तो नहीं?
भला मुझे क्यों परेशानी होती? मैं भी तो यही चाहता था। स्थानीय लोगों से बात की तो पता चला कि यहां रुकने का एकमात्र स्थान जंगल वालों का रेस्ट हाउस है और वो वहां सामने दिख रहा है। रेस्ट हाउस की लोकेशन रोमांचित करने वाली थी। हमारे और रेस्ट हाउस के बीच में ‘पाताल’ का एक हिस्सा था और रेस्ट हाउस उस तरफ बिल्कुल खडे किनारे पर बना था। वही असल में चिमटीपुर व्यू पॉइण्ट है जिसके बारे में पीछे बोर्ड पर लिखा था।
जल्दी ही हम रेस्ट हाउस में पहुंचे। चौकीदार ने बताया कि तीन किलोमीटर पीछे छिन्दी के पास फॉरेस्ट रेंज ऑफिस है। इसकी बुकिंग केवल वहीं से होगी। दोनों महिलाओं और एक बाइक को वहीं छोडकर मैं और सुमित वापस छिन्दी आये और रेंज ऑफिस में गए। वहां एक आदमी मिला। उसने बताया कि साहब अभी विजिट पर गये हैं। पता नहीं कब आयें। हमने कुछ देर प्रतीक्षा की लेकिन साहब नहीं आये तो हम फिर रेस्ट हाउस पर पहुंचे। साहब का मोबाइल नम्बर नहीं मिल सका।
अन्धेरा हो चुका था और अब एक ही चारा था कि वापस तामिया चलो। वैसे यहां से भी पातालकोट का शानदार नजारा दिखता है। यदि आप कभी पातालकोट जाओ तो यहां खडे होकर सूर्यास्त देखना।
वापस चल दिये। फिर से रेंज ऑफिस के सामने से होकर ही जाना था तो सोचा कि एक बार फिर देख लेते हैं कि साहब आये या नहीं। गेट के सामने बाइक खडी कीं तो पाया कि ताला लगा है। बाइक वापस मोड ली और स्टार्ट करके गियर में डालते हुए धीरे धीरे क्लच छोडते हुए चलने ही लगे तो पीछे एक गाडी आती दिखाई दी जिस पर लाल बत्ती जल रही थी। लालबत्ती न होती तो हम चल ही पडे थे। बत्ती देखकर रुक गये।
साहब ने बताया कि खाने-पीने के लिये कच्चा सामान यहीं छिन्दी से खरीदकर ले जाओ, वहां चौकीदार पका देगा। हमारे साथ अपना एक कर्मचारी भी कर दिया। हम फिर से रेस्ट हाउस में पहुंचे। सुमित ने खिचडी बनाने के लिये कुछ चावल, आलू, प्याज-टमाटर आदि ले लिये थे। थोडा दूध ले लिया।
बाहर ही रेट लिस्ट लगी थी कि एक कमरा 500 रुपये का है। हमें दो कमरे लेने थे। लेकिन वो कर्मचारी महाभ्रष्ट निकला। उसने बताया कि एक बिस्तर का किराया ही 600 रुपये है। तुम चार बिस्तर लोगे तो 2400 रुपये देने होंगे। वो बाहर पुराना रेट लिखा है। मैंने और सुमित ने एक-दूसरे को देखा। आंखों ही आंखों में तय हो गया कि एक ही कमरा लेंगे और चारों उसी में सो जायेंगे। हमने उससे भी कह दिया कि हम एक ही कमरा लेंगे, तुम एक कमरे का बिल बनाओ। बोला कि आपको साहब के सामने ही बताना चाहिये था कि आप एक कमरा लोगे। वहां दो कमरों की बात हुई, अब जब मैं साहब को बताऊंगा कि आपने एक ही कमरा लिया तो वे मुझ पर शक करेंगे कि मैंने दो कमरे देकर एक कमरे का बिल बनाया। बडी देर तक बहस हुई। आखिरकार उसे एक कमरे का बिल बनाना पडा।
वो भी सरकारी कर्मचारी था और उसे बिल भी सरकारी ही भरना था। इसमें वो हेराफेरी नहीं कर सकता था। उसने एक कमरे का 500 रुपये का बिल बनाया। पैसे 2400 ही मांगे। इधर हम भी पढे लिखे थे, ऊपर से दोनों कंजूस। दोबारा नये सिरे से बहस हुई। उसे दो बिल बनाने पडे, हमने 1000 रुपये दिये। रुकने का कोई और विकल्प होता तो हम यहाँ कतई नहीं रुकते। 
चौकीदार ने बताया कि यहां जो भी लोग आते हैं, वे पातालकोट देखने कम और बीयर-मुर्गे की दावत उडाने ज्यादा आते हैं। इस तरह उसे भी फ्री में बीयर-मुर्गा मिलता रहता है। उस दावत में से कुछ हिस्सा उस भ्रष्ट कर्मचारी को भी मिल जाता है। हमारे शाकाहारी होने की वजह से वो कर्मचारी बहुत निराश था। आज हमने केवल चाय बनाई, थोडी उसी चौकीदार को भी दे दी। हालांकि खाना चौकीदार ही बनाता है लेकिन इधर सभी खाली थे, मोर्चा महिलाओं से संभाला। फिर अगले दिन जो खिचडी बनी, उसके तो कहने ही क्या! इतनी स्वादिष्ट कि एक बडा कुकर भरकर बनाई और सारी की सारी हम चारों ही खा गये। चौकीदार को जरा सी भी नहीं मिली। सुबह फिर वो कर्मचारी आया था कि कहीं आज हम मुर्गा तो नहीं बना रहे। लेकिन फ्री में बीयर-मुर्गे उडाने वाले को आज भी निराशा ही हाथ लगी। याद रखेगा हमें वो।
बिल्कुल खुले में और पातालकोट के एकदम ऊपर एक कोने में बना होने के कारण यहां हवा बडी तेज लग रही थी और रेस्ट हाउस की खिडकियों, दरवाजों, रेलिंग और इधर-उधर टकराकर इतनी तरह की आवाजें पैदा कर रही थी कि बहुत से लोग तो डर जाते होंगे। भूत-चुडैल की हंसी-ठिठोली से लेकर चीखने-चिल्लाने तक की आवाजें यहां पैदा हो रही थीं।

पचमढ़ी और मटकुली के बीच में 


मटकुली से एक रास्ता छिन्दवाडा होते हुए नागपुर जाता है। हमें इसी पर जाना है।


छिन्दवाडा रोड 






तामिया के पास 

तामिया 


यहाँ से पातालकोट का रास्ता अलग होता है।

पातालकोट की और 


पातालकोट का प्रथम दृश्य 


ऐसे बहुत झरने हैं



वो सामने ऊपर रेस्ट हाउस दिख रहा है जहाँ हम आज रुकेंगे



पातालकोट 

जड़ी बूटियां बेचते स्थानीय लोग 

रातेड से चिमटीपुर की सड़क 





चिमटीपुर रेस्ट हाउस से दिखता पातालकोट 



यही रेस्ट हाउस है








अगला भाग: पातालकोट भ्रमण और राजाखोह की खोज


1. भिण्ड-ग्वालियर-गुना पैसेंजर ट्रेन यात्रा
2. महेश्वर यात्रा
3. शीतला माता जलप्रपात, जानापाव पहाडी और पातालपानी
4. इन्दौर से पचमढी बाइक यात्रा और रोड स्टेटस
5. भोजपुर, मध्य प्रदेश
6. पचमढी: पाण्डव गुफा, रजत प्रपात और अप्सरा विहार
7. पचमढी: राजेन्द्रगिरी, धूपगढ और महादेव
8. पचमढी: चौरागढ यात्रा
9. पचमढ़ी से पातालकोट
10. पातालकोट भ्रमण और राजाखोह की खोज
11. पातालकोट से इंदौर वाया बैतूल

28 comments:

  1. वाह! और एक बेहतरीन दुनिया की सैर कराई! कितने अन्दर तक आप घूमते हैं!

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  2. नीरज भाई उस रेस्ट हाउस के चौकीदार के व्यवहार की लिखित शिकायत ज़रूर कीजिये. इससे दूसरों का भला होगा.

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    1. संजय जी, मैंने अपना अनुभव बता दिया है। बाकी शिकायत करना मुझे पसंद नही।

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  3. पातालकोट की छुपी हुई दुनिया से परिचय कराने के लिए धन्यवाद् ।

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  4. में उन लोगो में से हु जो बहुत ज्यादा ख़ुशी प्रकट नहीं कर पाते है...
    लेकिन जब काफी देर के ड्रामे के बाद उन डिप्टी साहब की गाड़ी वहाँ रुकी और पातालकोट में ही रुकने की अनुमति मिल गई तो मेरी ख़ुशी सातवे आसमान पर थी..श्रीमती जी को तो इतनी ख़ुशी हुई की उन्होंने साइलेंट डांस ही शुरू कर दिया..
    पातालकोट रेस्ट हॉउस की लोकेशन थी ही इतनी शानदार...


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    1. बिलकुल ठीक कहा सुमित भाई।

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  5. खुद ही खाने की तैयारी करना..पकवाने तक मदद करना...बहुत ही मज़ा आ रहा था..ऐसी प्राकृतिक जगह पर खुद के द्वारा बनाया गया साधारण खाना भी स्वादिष्ट लगता है...लेकिन वह खिचड़ी तो दोनों दीप्तियो ने बनाई थी...वाकई मज़ेदार थी...सभी तृप्त हो गए थे...
    चाय,खिचड़ी के वक़्त के ग्रुप फोटो को शायद अगली पोस्ट में जगह मिले...???

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    1. हाँ भाई, वे फोटो अगली पोस्ट में मिलेंगे।

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  6. और ये जो तुम ऐसे ही बिना बताये यहाँ वहाँ कही भी कैसे भी फोटो ले लेते हो...













    बहुत ही अच्छे लगते है।

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    1. कौन सा फोटो है ऐसा? जरा बताना मुझे भी।

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    2. नीचे से 13 न. का फोटो....
      अच्छे लगते है ऐसे फोटो....

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  7. रोमांचक यात्रा के नज़ारे ..... हमारे देश में काफी कुछ छुपा हुआ देखने के लिए ... जो अनछुआ है

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  8. नीरज लद्दाख वाली पोस्ट पर जो बात पूछी थी वोही फिर से पूछना चाहूंगा कि बिना बाइक या बिना अपने वाहन के संभव है उतना दूर तक जाना , एकांत में इंटीरियर में पहुँच पाना ?

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    1. हाँ, योगी जी, संभव है। जैसे पातालकोट को ही ले लो। छिंदवाड़ा से यहां बगल में छिंदी और आगे हर्रई तक खूब बसें चलती हैं। हाँ, ये हो सकता है कि आपको बस से उतरकर दो-तीन किलोमीटर पैदल चलना पड़े।

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  9. अरे वाह्ह छिन्दवाडा परासिया मेरे ननिहाल पहुंच गए बेहद रोमांचक यात्रा के नज़ारे ....इन आलेखों से ही पता चलता है भारत देश के हर राज्य में देखने के लिए काफी कुछ है नीरज भाई

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  10. अच्छा हुआ तुम्हे रेस्ट हाऊस मिल गया। वरना हमारे (पुराना मध्यप्रदेश) के रेस्ट हाऊस मिल पाना कठिन ही हैं। एक रुम तो हमेशा मंत्रियों के लिए बुक रहता है। बाकी दूसरा दारु मुर्गा पार्टी के लिए होता है।

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    1. बिल्कुल ललित जी, आपने ठीक कहा.

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  11. पचमढ़ी कई बार गया हूँ इस रास्ते से भी गुजर चूका हूँ पर कभी पातालकोट नहीं गया ,पर अबकी जरुर जाऊंगा | फोटो देखकर रोमांचित कर दिया आपने ,वहाँ जाने का लालच भी जगा दिया ,जो खर्च आएगा उसका बिल भेज दूंगा ,आपको ,ऐसे फोटो और यात्रा वृतांत लिखोगे तो ,भुगतना तो पड़ेगा ही |हम भी वहीँ थे उन दिनों .......

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    1. सर जी, इस बार अवश्य जाना पातालकोट. अच्छा लगेगा.

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  12. आनंद आया पढ़ कर और चित्र भी अच्छे हैं। शिकायत तो अवश्य करनी चाहिए ताकि उसे सबक मिले और अन्य टूरिस्ट न लूटे जाएँ।

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    1. आपने ठीक कहा अनुराग जी..

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  13. पाताल कोट ( Patalkot ) मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में स्थित इस गहरी घाटी के भीतर बसे गावो को देखने का सौभाग्य वर्ष १९९९ में मुझे भी मिला था। सही मायने में इसे पाताल लोक कहना अतिश्योक्ति नही है। एक घाटी ख़त्म होते ही उतनी गहरी और फिर अंदर और अंदर ,और अंदर गहरी घाटी प्रारम्भ हो जाती है। कुछ गावो में तो सिर्फ कुछ घंटे ही सूर्य का प्रकाश पहुंच पाता है। इस घोड़े की नाल के आकार में विशाल पहाड़ियों से घिरा पूरी तरह से छिपा हुआ घाटी है। यदि जहा से खड़े होकर हम इस गहरी घाटी की और देखते है ,सामने की दूर खड़ी पहाड़ियों पर कभी शायद वहा समुद्र लहराता रहा होगा ,के लहरो के निशान भी दिखलाई पड़ते है। सतपुड़ा पर्वत श्रेणियों की गोद में बसा यह क्षेत्र भूमि से एक हज़ार से 1700 फुट तक की गहराई में बसा हुआ है। इस क्षेत्र में 40 से ज़्यादा मार्ग लोगों की पहुँच से दुर्लभ हैं और वर्षा के मौसम में यह क्षेत्र दुनिया से कट जाता है। ऊपर से चरती भैंसों को देखने पर ऐसा प्रतीत होता है, मनो कोई काला सा धब्बा चलता-फिरता दिखाई देता हो, सच मानिए ऐसी जगह पर मानव-बस्ती का होना एक गहरा आश्चर्य पैदा करता है। रामायण में वर्णित 'भगवान शिव' की पूजा के बाद, रावण के राजकुमार Meghnath बेटा ही इस जगह के माध्यम से पाताल लोक में गया था कि वहाँ की एक धारणा है। ऐसी जगह को आपने विकास के नाम पर केवल कोट में उतरने के लिए कुछ गहराइयो तक सीढ़ियों बना दी गयी है, लेकिन आज भी ये इसका उपयोग न करते हुए अपने बने–बनाए रास्ते-पगडंडियों पर चलते नजर आते हैं। सीढ़ियों पर चलते हुए आप थोडी दूर ही जा पाएँगे, लेकिन ये अपने तरीके से चलते हुए सैकड़ों फुट नीचे उतर जाते हैं।एक खोज के अनुसार पातालकोट की तलहटी में करीब 20 गाँव बसे हुए है। एक गाँव में 4-5 अथवा सात-आठ से ज्यादा घर नहीं होते। वे भी प्राकृतिक आपदाओ से प्रभावित हो रहे है। ऐसी जगह को आपने घूमने के बाद सचित्र वर्णन कर हम लोगो की भी वहा के परिवार सहित विजिट की याद ताज़ा करा दी। आपकी यात्रा का सचित्र वर्णन हमे भी आपके साथ ही घूम रहे है ,ऐसा महसूस होता है। शत शत नमन आपकी टीम के सभी को।

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    1. जी देवेन्द्र जी, अगली पोस्ट में इसका और विस्तार से वर्णन करूंगा.

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  14. 1981 में मेरे पापा इस स्थान पर बिजली पहुंच गए थे वह बिजली विभाग सब-इंजीनियर थे

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