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पदुम- दारचा ट्रेक- पुरने से तेंगजे

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
आज देश में स्वतन्त्रता दिवस मनाया जा रहा था और हम जांस्कर के दुर्गमतम स्थान पर छोटे से गांव के छोटे से खेत में तम्बू लगाये पडे सो रहे थे। हमें तिरंगा देखना था और दो घरों के गांव पुरने में इसकी कोई सम्भावना नहीं थी। उम्मीद थी कि आगे बढेंगे तो कहीं किसी बडे गांव में स्कूल मिलेगा और हम तिरंगा देख सकेंगे।
आगे बढने से पहले थोडा सा भूतकाल में लौटते हैं। कल की बात है। जब हम फुकताल से पुरने आये तो हमें घोडे वाला मिला। यह वही घोडे वाला था जो हमें परसों शाम अनमो से चा के रास्ते में मिला था और हमने उसे सुबह पुरने में मिलने को कहा था। जिस समय हमारी घोडे वाले से बात हुई थी, उस समय हमारा इरादा पुरने रुकने का ही था लेकिन बाद में अन्धेरा हो गया तो इरादा बदल गया और हम चा रुक गये। हालत हमारी तब ऐसी थी कि हम इस वाकये को भूल गये।
अब आगे क्या हुआ, यह भी जान लीजिये। वो घोडे वाला तेंगजे का था जो पुरने से भी करीब 15 किलोमीटर आगे है। वह पहले अपने घर गया। उसे पुरने तक पहुंचने में ही अन्धेरा हो गया होगा। अपने घर वह कम से कम दस ग्यारह बजे रात को पहुंचा होगा। फिर रात को ही वहां से पुरने लौट आया और सुबह हमें ढूंढने लगा। लेकिन हम वहां होते तो उसे मिलते भी। तब हम चा में थे और फुकताल जाने वाले थे। वह हमें ढूंढता रहा लेकिन हम नहीं मिले। फिर दोपहर को प्रकाश जी और विधान का सामान लेकर एक आदमी पुरने गया। आपको याद होगा कि हमने आठ सौ रुपये में सामान चा से पुरने पहुंचाने के लिये एक आदमी को कहा था और खाली हाथ फुकताल चले गये थे। उस आदमी ने वहां हमारे बारे में बताया। उससे हमने किसी घोडे वाले को तैयार करने को भी कहा था। उसने एक घोडे वाले को तैयार कर दिया। अब पुरने में दो घोडे वाले ऐसे हो गये जो हमारा इंतजार कर रहे थे।
छोटा सा गांव पुरने; हर किसी को हमारा सब मामला पता चल गया। तेंगजे के घोडे वाले को भी। तेंगजे वाले ने दूसरे घोडे वाले से बताया होगा कि हमारी बात उससे परसों ही हो गई थी इसलिये वह बडा दावेदार है। यह सुनकर दूसरा घोडे वाला चला गया। जब हम शाम को फुकताल गोम्पा देखकर पुरने आये तो तेंगजे वाला मिला। उसने शिकायत की कि हमने पुरने रुकने को कहा था और रुक गये चा गांव में। हमने अपनी मजबूरी बताई। उसने कहा कि वो आज पूरे दिन हमारा इन्तजार करता रहा और इस वजह से उसकी आज की दिहाडी का नुकसान हुआ है। अगर हमारा इन्तजार न करता तो वो अपने घोडे को कहीं और लगा देता। कमाई के लिहाज से आजकल पीक सीजन चल रहा है। उसने आज का भी किराया मांग लिया जो आठ सौ रुपये तय हुआ था।
यह सुनकर विधान फट पडा। बडी जोरदार बहस हुई। मारपीट नहीं हुई, बस इतनी कमी रह गई। घोडे वाला भी तैश में आ गया और आज की दिहाडी पर अड गया और कल से पन्द्रह सौ रुपये प्रतिदिन किराया निर्धारित कर दिया। 
...
इस यात्रा के अनुभवों पर आधारित मेरी एक किताब प्रकाशित हुई है - ‘सुनो लद्दाख !’ आपको इस यात्रा का संपूर्ण और रोचक वृत्तांत इस किताब में ही पढ़ने को मिलेगा।
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पुरने में अपना रात का ठिकाना


प्रकाश जी और विधान के साथ इस यात्रा का आखिरी भोजन

पुरने का पुल... इसे पार करके दाहिने रास्ता अनमो व पदुम जाता है जबकि सीधे शिंगो-ला। प्रकाश जी और विधान दाहिने मुड गये और मैं सीधे चला गया।

शिंगो-ला से आती नदी जो पुरने में बारालाचा-ला से आती सारप नदी में मिल जाती है।


सामान ढोने का एकमात्र साधन


रास्ते में मिला एक छोटा सा गांव- नाम ध्यान नहीं।


मार्लिंग जाने के लिये पुल


तेस्ता गांव में प्रवेश



खराब मौसम और धूल भरा ठण्डा तूफान पास आता हुआ।


तेस्ता गांव

कूरू गांव में प्रवेश


इसमें कोई नहीं था। यहीं मैंने आधे-पौने घण्टे तक आराम किया।


तीर की नोक पगडण्डी पर है, नदी से बिल्कुल सटकर।

तेंगजे के पास


तेंगजे गांव

इसी पुल से तेंगजे में प्रवेश करना है।


आज का ठिकाना


तेंगजे की स्थिति। नक्शे में इसे दांग्जे लिखा है। नक्शे को छोटा व बडा करके भी देखा जा सकता है।



अगला भाग: पदुम दारचा ट्रेक- तेंगजे से करग्याक और गोम्बोरंजन

पदुम दारचा ट्रेक
1. जांस्कर यात्रा- दिल्ली से कारगिल
2. खूबसूरत सूरू घाटी
3. जांस्कर यात्रा- रांगडुम से अनमो
4. पदुम दारचा ट्रेक- अनमो से चा
5. फुकताल गोम्पा की ओर
6. अदभुत फुकताल गोम्पा
7. पदुम दारचा ट्रेक- पुरने से तेंगजे
8. पदुम दारचा ट्रेक- तेंगजे से करग्याक और गोम्बोरंजन
9. गोम्बोरंजन से शिंगो-ला पार
10. शिंगो-ला से दिल्ली वापस
11. जांस्कर यात्रा का कुल खर्च




Comments

  1. बहुत सुन्दर वर्तान्त। और फोटो का तो क्या कहना.

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  2. अदभुत जगह, अदभुत नज़ारे और अदभुत नीरज ! चल अकेला चल अकेला.................
    दानो साथियों से अलग होते ही पोस्ट में भी रफ़्तार आ गयी है।

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  3. नीरज भाई वास्तव मे विधान भाई और प्रकाश जी का यात्रा छोड़ना दुखद था। लेकिन रास्ता भी कुछ नही था। खैर अगर आपके स्थान पर मै होता तो उनके साथ ही वापस लोट जाता लेकिन आपने ऐसा न करके अदभुद साहस का परिचय दिया है। दुर्गुम यात्रा के शानदार दुर्लभ फोटो। आगे की यात्रा का इंतजार रहेगा।

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    1. वापस तो मैं भी लौट आता लेकिन यह सर्वसम्मति से लिया गया फैसला था जिसमें विधान और प्रकाश जी को भी कोई आपति नहीं थी।

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  4. घर के कमरे में बैठे बैठे ही आप के साथ ट्रेकिंग का आनन्द ले लिया, अद्भुत और अद्वितीय। शुक्रिया,नीरज जी। दोनों साथियों का बिछुङना दुखद रहा।

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  5. सुन्दर यात्रा वृतांत ,फोटोग्राफी तो लाजवाब रहता है आपका ,फोटो सेन्स गजब का है

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  6. यात्रा मे कुछ रुकावट के बावजूद सफल यात्रा और जानदार पहाड़ो के शानदार फोटो ।

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  7. ऐसे ही एक गुजरती डिश बनती है जिसे दाल ढोकला कहते है इसमें भी तुअर की दाल में कच्चा आटे की रोटिया बनाकर शक़्क़र पारे की तरह काट कर उबलते है पर वो बहुत स्वादिष्ट लगती है

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    1. गुजरती डिश या गुजराती डिश???

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    2. तू भी ना .... हा हा हा हा हा गुजराती डिश सही कहा

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  8. भाई जब हम ग्रुप मे यात्रा कर रहे होते है,तब हमारी मानसीकता अलग होती पर जब ग्रुप टूट जाता है ओर यात्रा अकेले करनी होती तब मन मे क्या विचार आते रहते है,बताईयेगा जरूर? ओर आपने कैसे यह समय कैसे बिताया

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    1. यह सब बताया है त्यागी जी...

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  9. रोमांचकारी लेख....

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