Friday, January 9, 2015

पदुम- दारचा ट्रेक- पुरने से तेंगजे

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आज देश में स्वतन्त्रता दिवस मनाया जा रहा था और हम जांस्कर के दुर्गमतम स्थान पर छोटे से गांव के छोटे से खेत में तम्बू लगाये पडे सो रहे थे। हमें तिरंगा देखना था और दो घरों के गांव पुरने में इसकी कोई सम्भावना नहीं थी। उम्मीद थी कि आगे बढेंगे तो कहीं किसी बडे गांव में स्कूल मिलेगा और हम तिरंगा देख सकेंगे।
आगे बढने से पहले थोडा सा भूतकाल में लौटते हैं। कल की बात है। जब हम फुकताल से पुरने आये तो हमें घोडे वाला मिला। यह वही घोडे वाला था जो हमें परसों शाम अनमो से चा के रास्ते में मिला था और हमने उसे सुबह पुरने में मिलने को कहा था। जिस समय हमारी घोडे वाले से बात हुई थी, उस समय हमारा इरादा पुरने रुकने का ही था लेकिन बाद में अन्धेरा हो गया तो इरादा बदल गया और हम चा रुक गये। हालत हमारी तब ऐसी थी कि हम इस वाकये को भूल गये।
अब आगे क्या हुआ, यह भी जान लीजिये। वो घोडे वाला तेंगजे का था जो पुरने से भी करीब 15 किलोमीटर आगे है। वह पहले अपने घर गया। उसे पुरने तक पहुंचने में ही अन्धेरा हो गया होगा। अपने घर वह कम से कम दस ग्यारह बजे रात को पहुंचा होगा। फिर रात को ही वहां से पुरने लौट आया और सुबह हमें ढूंढने लगा। लेकिन हम वहां होते तो उसे मिलते भी। तब हम चा में थे और फुकताल जाने वाले थे। वह हमें ढूंढता रहा लेकिन हम नहीं मिले। फिर दोपहर को प्रकाश जी और विधान का सामान लेकर एक आदमी पुरने गया। आपको याद होगा कि हमने आठ सौ रुपये में सामान चा से पुरने पहुंचाने के लिये एक आदमी को कहा था और खाली हाथ फुकताल चले गये थे। उस आदमी ने वहां हमारे बारे में बताया। उससे हमने किसी घोडे वाले को तैयार करने को भी कहा था। उसने एक घोडे वाले को तैयार कर दिया। अब पुरने में दो घोडे वाले ऐसे हो गये जो हमारा इंतजार कर रहे थे।
छोटा सा गांव पुरने; हर किसी को हमारा सब मामला पता चल गया। तेंगजे के घोडे वाले को भी। तेंगजे वाले ने दूसरे घोडे वाले से बताया होगा कि हमारी बात उससे परसों ही हो गई थी इसलिये वह बडा दावेदार है। यह सुनकर दूसरा घोडे वाला चला गया। जब हम शाम को फुकताल गोम्पा देखकर पुरने आये तो तेंगजे वाला मिला। उसने शिकायत की कि हमने पुरने रुकने को कहा था और रुक गये चा गांव में। हमने अपनी मजबूरी बताई। उसने कहा कि वो आज पूरे दिन हमारा इन्तजार करता रहा और इस वजह से उसकी आज की दिहाडी का नुकसान हुआ है। अगर हमारा इन्तजार न करता तो वो अपने घोडे को कहीं और लगा देता। कमाई के लिहाज से आजकल पीक सीजन चल रहा है। उसने आज का भी किराया मांग लिया जो आठ सौ रुपये तय हुआ था।
यह सुनकर विधान फट पडा। बडी जोरदार बहस हुई। मारपीट नहीं हुई, बस इतनी कमी रह गई। घोडे वाला भी तैश में आ गया और आज की दिहाडी पर अड गया और कल से पन्द्रह सौ रुपये प्रतिदिन किराया निर्धारित कर दिया। प्रकाश जी शान्ति से मामला सुलझाने की कोशिश में लगे रहे। मैं विधान को पकडकर दूर ले गया और कहा कि तू चुप रह। जो तुझे देना हो, दे देना; नहीं तो मैं और प्रकाश जी वहन कर लेंगे। उधर प्रकाश जी ने घोडे वाले को समझाया कि भईया, आज का किराया तो माफ कर। कल से तू बारह सौ रुपये प्रतिदिन के हिसाब से ले लेना। अपने घोडे ले आ। लेकिन वो पट्ठा भी जालिम निकला। उसने विधान के साथ बहस को अपनी इज्जत का सवाल मान लिया और जिद पर अड गया कि पहले आज के आठ सौ दो, उसके बाद कल की बात करना। मैं और विधान प्रकाश जी से यह कहकर दूर चले गये कि आप बात कर लो। जो भी फैसला होगा, हमें मान्य होगा।
असल में हमें घोडों की सख्त आवश्यकता थी। प्रकाश जी की आज की चाल को देखकर लग रहा था कि ये खाली हाथ भी नहीं चल पायेंगे, एक घोडा तो अकेले इनके लिये ही चाहिये और एक घोडा सामान के लिये। मैं भी अपना सामान घोडे पर लादने को राजी हो गया। इससे विधान पर खर्च कम पडेगा। पहले ही उसका बजट से बाहर खर्च हो गया है।
प्रकाश जी बिल्कुल शान्त प्रकृति के इंसान हैं। उन्होंने अपनी प्रकृति के अनुसार ही घोडे वाले से बात की, घोडे वाला भी शान्त बात करता रहा। लेकिन जब वे हमारे पास आये तो नकारात्मक उत्तर लेकर आये। घोडे वाले का हम पर बिल्कुल विश्वास नहीं था। वो सोच रहा था जिस तरह हमने आज किया, आगे भी वैसा ही करेंगे। उसने कल साथ चलने से बिल्कुल मना कर दिया। इसके बाद तलाश शुरू हुई किसी दूसरे घोडे वाले की। लेकिन अब शाम के समय कौन मिलता? मेजबान तेनजिंग से बात की तो उसने भी मना कर दिया। आखिर सबको हर मामला पता था। हर स्थानीय यही समझता था कि हम धोखेबाज हैं। इसलिये अगर उनके घोडे खाली भी खडे हों, तब भी वे कल साथ नहीं चलने वाले।
अब वही फैसला लिया गया जो ऐसे में लिया जाता। प्रकाश जी बिल्कुल भी नहीं चल सकेंगे। हालांकि फुकताल से पुरने तक वे ठीक चले लेकिन आगे और भी ज्यादा ऊंचाई है और रास्ता भी खराब मिलेगा, इसलिये कोई रिस्क नहीं लिया जा सकता था। विधान पन्द्रह किलो सामान के साथ नहीं चल सकता था। तय यही हुआ कि वे दोनों वापस लौट जायें और मैं यात्रा पूरी करूं। आज मैं तेंगजे पहुंच जाऊंगा, कल शिंगो-ला के आधार तक, परसों शिंगो-ला पार और चौथे दिन दारचा। उधर वे दोनों आज पदुम पहुंच जायेंगे, कल कारगिल, परसों लेह और चौथे दिन शाम तक दारचा। अब हम चौथे दिन दारचा में मिलेंगे।
सबने साथ बैठकर आखिरी बार दावत उडाई। लद्दाख की वो सूखी मोटी रोटी चाय व जैम के साथ। अनमो जाने वाले एक विदेशी दल के घोडे पर दोनों का सामान बंध गया। साढे नौ बजे पुल पार किया और अलविदा कह दिया।
यह वास्तव में बडा ही भावुक कर देने वाला क्षण था। कितना खुश था विधान! मैंने केवल उसी से इस यात्रा पर आने को कहा था। मुझे भरोसा था कि वह इसे पूरा कर लेगा। लेकिन भारी सामान ने मुसीबत कर दी। वास्तव में इस यात्रा पर न स्लीपिंग बैग लाने की जरुरत है और न ही टैंट। सबकुछ पांच-पांच दस-दस किलोमीटर पर मिलता रहता है। हालांकि विधान के पास टैंट नहीं था, फिर भी उसके पास काफी वजन हो गया। उधर प्रकाश जी कई महीनों से जबरदस्त तैयारी कर रहे थे। उन्होंने तो फेसबुक पर ग्रुप चैट भी आरम्भ कर दी थी जिसमें हम तीनों के अलावा तरुण गोयल भी थे। पता नहीं तरुण भाई ने विधान व प्रकाश जी से कब कह दिया कि वे भी चलेंगे लेकिन मुझे एक बार भी यकीन नहीं हुआ कि वे ऐसा करेंगे। मेरा यकीन सच निकला। फिर भी प्रकाश जी रोज सबसे कई कई बातें पूछते थे। मैं हैरान हूं कि दो महीनों तक रोज नई नई बातें उनके दिमाग में कैसे आती थी? उन्होंने हर तरह की तैयारी की लेकिन सबसे ज्यादा समस्या उन्हें ही हुई। मैंने कहा भी था उन्हें कि आप मत चलो। कुछ नहीं धरा जांस्कर में। लेकिन ना, ट्रेकिंग करूंगा। पहली ट्रेकिंग थी उनकी और चलने से पहले मैं उन्हें जितना हतोत्साहित कर सकता था, किया लेकिन वे टस से मस नहीं हुए, उल्टे और ज्यादा मजबूती से डटे रहे। ऐसे में इन्हें वापस जाते देखना दुखदायी था। फिर हमारा प्रत्येक का खर्च भी बहुत ज्यादा हो गया था- बीस-बीस हजार से भी ज्यादा। इतना खर्च करने के बाद भी वापस लौटना पडा। यह और भी दुख की बात थी। लेकिन कुदरत की यही मर्जी थी। वास्तव में कुदरत भी पक्षपात करती है।
पुरने का पुल पार करते ही एक रास्ता दाहिये अनमो व पदुम की तरफ चला जाता है और बायें वाला रास्ता शिंगो-ला की तरफ। वे दोनों दाहिने मुड गये और मैं बायें। दो किलोमीटर तक बडी जोरदार चढाई है। फिर रारू से आने वाला रास्ता इसमें मिल जाता है। मैंने पहले भी बताया था- आपको शायद याद होगा- कि जब पदुम से रारू तक ही सडक बनी थी तो पैदल यात्रा रारू से शुरू होती थी। और वो पैदल मार्ग नदी के बायें किनारे पर था। अब दाहिने किनारे पर अनमो तक सडक बन गई है लेकिन फिर भी रारू से पैदल यात्री अभी भी पुराने पैदल पथ का प्रयोग करते हैं। यह वही पुराना पथ है। जिसे पुरने नहीं जाना होता, वो ऊपर ही ऊपर निकल जाता है। जिसे पुरने जाना होता है, उसे नीचे नदी पार करने के लिये पुल तक उतरना पडता है।
दो किलोमीटर की बडी तेज चढाई थी। अभी पुरने से जो भी कुछ खाकर चला था, सब हजम हो गया। फिर भूख लगने लगी। गनीमत थी कि अब रास्ता समतल ही था। डेढ घण्टे चलने के बाद नदी पर एक पुल मिला। इसे पार करके मार्लिंग गांव जाया जाता है। लेकिन मेरा रास्ता सीधा ही था। और आधे घण्टे चलने पर तेस्ता गांव आया। यह एक बडा गांव था। उम्मीद थी कि यहां कुछ खाने को मिल जायेगा। बडी जोर की भूख लग रही थी।
उधर मौसम खराब होने लगा। घने काले बादल घिरने लगे और तेज हवाएं चलने लगीं। ऐसे मौसम में अगर मैं अकेला होता हूं तो मुझे डर लगने लगता है। हालांकि जानता भी था कि यहां बारिश नहीं पडेगी, लेकिन डरावना मौसम था तो डर भी लग रहा था।
तेस्ता के रहनुमा पता नहीं कहां घुस गये कि कोई भी नहीं दिखा। किसी घर का दरवाजा खुला भी नहीं था। अन्यथा मैं किसी भी घर में घुसकर बिना चाय पीये बाहर निकलने वाला नहीं था। यह एक बहुत जबरदस्त ट्रेकिंग पथ है। सालों से यहां ट्रेकिंग होती रही है। सभी स्थानीय हम जैसे ट्रेकर की आवश्यकता समझते हैं।
कोई नहीं दिखा तो मैं आगे बढ गया। कुछ दूर चलने पर एक घोडे वाला उधर से आता दिखा तो उसने बताया कि कुछ ही आगे कूरू गांव है, वहां कुछ मिल जायेगा। फिर कूरू पहुंचने में भी एक घण्टा लग गया। यह छोटा सा गांव है। गांव में प्रवेश किया और पता चला कि बाहर भी निकल गया। पीछे मुडकर देखा तो कूरू भी पीछे छूट गया। एक खेत में एक महिला काम करती दिखी। उसने बताया कि कूरू में कोई खाने-पीने का इंतजाम नहीं है। साथ ही यह भी कहा कि थोडी देर रुक जाओ। वह खेत का काम निपटाकर मुझे अपने घर ले जाती और चाय पिलाती। मैंने शालीनतावश मना कर दिया और आगे बढ चला।
रास्ता बिल्कुल समतल ही था। चढाई होगी भी तो इतनी मामूली होगी कि कुछ भी पता नहीं चल रहा था। साढे नौ बजे पुरने छोड दिया था, अब दो बज रहे थे। भूख तो लग ही रही थी, थकान भी हो रही थी। मन कर रहा था कि कहीं आधे-एक घण्टे के लिये बैठ जाऊं और बैग में रखे बिस्कुट खाऊं। लेकिन खराब होते मौसम को देखते हुए ज्यादा देर तक बैठने लायक जगह भी नहीं मिली।
आखिरकार कूरू पार करके जगह मिली। यह एक नया बना घर था जिसमें कोई नहीं था। इसके बरामदे में शरण ली। जैसे ही मैं बैठा, बूंदाबांदी शुरू हो गई। तेज हवाएं पहले ही चल रही थीं। इनकी वजह से ठण्ड बहुत ज्यादा बढ गई। हाथों में दस्तानें पहनने पड गये। थकान इतनी हो रही थी कि बैग दीवार के सहारे टिकाकर मैं लेट गया और तुरन्त आंख लग गई। बीस मिनट बाद आंख खुली। बडी गहरी नींद आई। जगने के बाद लगा कि अभी तक जो हुआ, वो सब बीते जमाने की बात है। मौसम अभी भी खराब था, बूंदाबांदी अभी भी हो रही थी। हालांकि मेरे पास रेनकोट था, लेकिन मैंने बूंदाबांदी रुकने का निश्चय किया। इस दौरान कुछ बिस्कुट खा लिये।
बूंदाबांदी बन्द हुई तो यहां से आगे बढा। डेढ घण्टे चलते रहने पर खुली जगह आई और नदी पर एक पुल भी दिखा। अब मुझे नदी पार करके उस तरफ जाना था। यह तेंगजे गांव था। चौडी घाटी होने के कारण यह एक बडा गांव है। पुल पार करके आगे कुछ टैंट लगे दिखे। मैं उधर ही चल दिया। यकीन था कि वहां कुछ खाने को मिलेगा।
यहां मैं निराश नहीं हुआ। एक दुकान थी। सबसे पहले चाय पी। अभी साढे चार ही बजे थे लेकिन आगे न बढने का फैसला किया। आगे पता नहीं अगला गांव कितना आगे हो, खाने को आराम से मिलेगा भी या नहीं; यही सोचकर यहीं घुटने गाड दिये। टैंट लगा लिया। अच्छा हां, वे जो टैंट थे, वे कुछ विदेशी ट्रैकर्स के टैंट थे। ये ट्रैकर हमें फुकताल गोम्पा में भी मिले थे। इनका ग्रुप लीडर एक नेपाली था। उसकी मुस्कान बडी शानदार थी और वह बेहद शालीनता से बात भी करता था। इन्हें कल तेंगजे से ही रास्ता बदलकर सरचू की तरफ जाना है। सरचू भी मनाली-लेह हाईवे पर स्थित है।
प्राकृतिक नजारे का तो कुछ कहना ही नहीं। अब वो धूल भरे नजारे गये जिनसे विधान विचलित हो गया था। अब घाटी बहुत चौडी हो गई थी और प्रकृति ने जी खोलकर यहां कलाकारी की है। तेंगजे गांव लगभग 4000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। मैंने नदी की तरफ टैंट का मुंह किया और अन्दर लेटकर जो नजारा दिखता था, उसके लिये मेरे पास कोई शब्द नहीं है।
शाम को दुकान की मालकिन ने थुपका बनाया। एक तो इसका अजीब सा नाम- थुपका- ‘थूक’ से मिलता-जुलता; फिर इसमें जो कच्चे आटे की छोटी छोटी रोटियां बनाकर डाली जाती हैं, उन्हें खाना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था। यह बिल्कुल आलू की पतली सब्जी की तरह बनाया जाता है। थोडे से आलू, थोडी सी मटर, बन्दगोभी और आखिर में गुंथे आटे की छोटी छोटी रोटियां बनाकर डाल दीं। हम उत्तर भारतीयों को भुना आटा खाने की आदत है, उबला आटा नहीं। ऐसा करके यह पक तो जाता है लेकिन लगता ऐसा ही है जैसे कच्चा आटा ही खा रहे हों। पहले तो मुझे लगा कि आलू की सब्जी बन रही है, बाद में रोटी बनेगी। जब उसने कटोरे में थुपका मेरे सामने रख दिया तो लगा कि इसने सब्जी का जायका लेने के लिये ऐसा किया कि लो, नमक-मिर्च चेक कर लो जैसा कि अक्सर हम अपने यहां करते हैं। अच्छा छौंक लगा था इसलिये तरी स्वादिष्ट थी। मैंने तुरन्त कहा- वाह, अच्छी बनाई है। यह सुनते ही उसने मेरे कटोरे में और थुपका डाल दिया और स्वयं भी अपना कटोरा लेकर वही बैठ गई। मैं देखता रहा कि यह रोटी तो बना ही नहीं रही। मुझे नहीं पता था कि थुपका ऐसा होता है। मैं संकोचवश कह भी नहीं सका कि रोटी कब बनाओगी? लेकिन बातों बातों में जब पता चला कि यह थुपका है तो कसम से जी खराब हो गया। नाम ही ऐसा है; फिर जब सब्जी में पडा वो उबला आटा खाना शुरू किया तो और भी जायका खराब हो गया। यह काफी उबल चुका था लेकिन फिर भी दांतों में चिपक रहा था। लेकिन खाना तो था ही। जबरदस्ती करके सारा खा गया।
उधर वो सरचू वाला ग्रुप जिनका लीडर नेपाली था, वे अपना सारा राशन-पानी साथ लेकर चल रहे थे। उनके यहां मिक्स वेज के लिये सब्जी कटती मैंने देखी थी। अब जब मैं ‘थूक-पा’ खा रहा था तो उनके यहां से छौंक लगने की जोरदार आवाज आई और बाद में सुगन्ध भी। मन तो बहुत किया कि एक कटोरी सब्जी उनसे ही मांग लाऊं लेकिन नहीं गया।

पुरने में अपना रात का ठिकाना


प्रकाश जी और विधान के साथ इस यात्रा का आखिरी भोजन

पुरने का पुल... इसे पार करके दाहिने रास्ता अनमो व पदुम जाता है जबकि सीधे शिंगो-ला। प्रकाश जी और विधान दाहिने मुड गये और मैं सीधे चला गया।

शिंगो-ला से आती नदी जो पुरने में बारालाचा-ला से आती सारप नदी में मिल जाती है।


सामान ढोने का एकमात्र साधन


रास्ते में मिला एक छोटा सा गांव- नाम ध्यान नहीं।


मार्लिंग जाने के लिये पुल


तेस्ता गांव में प्रवेश



खराब मौसम और धूल भरा ठण्डा तूफान पास आता हुआ।


तेस्ता गांव

कूरू गांव में प्रवेश


इसमें कोई नहीं था। यहीं मैंने आधे-पौने घण्टे तक आराम किया।


तीर की नोक पगडण्डी पर है, नदी से बिल्कुल सटकर।

तेंगजे के पास


तेंगजे गांव

इसी पुल से तेंगजे में प्रवेश करना है।


आज का ठिकाना


तेंगजे की स्थिति। नक्शे में इसे दांग्जे लिखा है। नक्शे को छोटा व बडा करके भी देखा जा सकता है।





अगला भाग: पदुम दारचा ट्रेक- तेंगजे से करग्याक और गोम्बोरंजन

पदुम दारचा ट्रेक
1. जांस्कर यात्रा- दिल्ली से कारगिल
2. खूबसूरत सूरू घाटी
3. जांस्कर यात्रा- रांगडुम से अनमो
4. पदुम दारचा ट्रेक- अनमो से चा
5. फुकताल गोम्पा की ओर
6. अदभुत फुकताल गोम्पा
7. पदुम दारचा ट्रेक- पुरने से तेंगजे
8. पदुम दारचा ट्रेक- तेंगजे से करग्याक और गोम्बोरंजन
9. गोम्बोरंजन से शिंगो-ला पार
10. शिंगो-ला से दिल्ली वापस
11. जांस्कर यात्रा का कुल खर्च

21 comments:

  1. बहुत सुन्दर वर्तान्त। और फोटो का तो क्या कहना.

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    1. धन्यवाद पंवार साहब...

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    1. धन्यवाद गुप्ता जी...

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  3. अदभुत जगह, अदभुत नज़ारे और अदभुत नीरज ! चल अकेला चल अकेला.................
    दानो साथियों से अलग होते ही पोस्ट में भी रफ़्तार आ गयी है।

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    1. धन्यवाद अहमद साहब...

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  4. नीरज भाई वास्तव मे विधान भाई और प्रकाश जी का यात्रा छोड़ना दुखद था। लेकिन रास्ता भी कुछ नही था। खैर अगर आपके स्थान पर मै होता तो उनके साथ ही वापस लोट जाता लेकिन आपने ऐसा न करके अदभुद साहस का परिचय दिया है। दुर्गुम यात्रा के शानदार दुर्लभ फोटो। आगे की यात्रा का इंतजार रहेगा।

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    1. वापस तो मैं भी लौट आता लेकिन यह सर्वसम्मति से लिया गया फैसला था जिसमें विधान और प्रकाश जी को भी कोई आपति नहीं थी।

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  5. घर के कमरे में बैठे बैठे ही आप के साथ ट्रेकिंग का आनन्द ले लिया, अद्भुत और अद्वितीय। शुक्रिया,नीरज जी। दोनों साथियों का बिछुङना दुखद रहा।

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    1. धन्यवाद ज्ञानी जी...

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  6. सुन्दर यात्रा वृतांत ,फोटोग्राफी तो लाजवाब रहता है आपका ,फोटो सेन्स गजब का है

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    1. धन्यवाद पाण्डेय जी...

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  7. यात्रा मे कुछ रुकावट के बावजूद सफल यात्रा और जानदार पहाड़ो के शानदार फोटो ।

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  8. ऐसे ही एक गुजरती डिश बनती है जिसे दाल ढोकला कहते है इसमें भी तुअर की दाल में कच्चा आटे की रोटिया बनाकर शक़्क़र पारे की तरह काट कर उबलते है पर वो बहुत स्वादिष्ट लगती है

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    1. गुजरती डिश या गुजराती डिश???

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    2. तू भी ना .... हा हा हा हा हा गुजराती डिश सही कहा

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  9. भाई जब हम ग्रुप मे यात्रा कर रहे होते है,तब हमारी मानसीकता अलग होती पर जब ग्रुप टूट जाता है ओर यात्रा अकेले करनी होती तब मन मे क्या विचार आते रहते है,बताईयेगा जरूर? ओर आपने कैसे यह समय कैसे बिताया

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    1. यह सब बताया है त्यागी जी...

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  10. रोमांचकारी लेख....

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    1. धन्यवाद गुप्ता जी...

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