Thursday, February 27, 2014

मिज़ोरम में प्रवेश

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दिनांक था 24 जनवरी 2014 और मैं था सिल्चर में।
सुबह साढे छह बजे ही आंख खुल गई हालांकि अलार्म सात बजे का लगाया था। मच्छरदानी की वजह से एक भी मच्छर ने नहीं काटा, अन्यथा रात जिस तरह का मौसम था और मच्छरों के दो-तीन सेनापति अन्धेरा होने की प्रतीक्षा कर रहे थे, उससे मेरी खैर नहीं थी। अपनी तरफ से काफी जल्दी की, फिर भी निकलते-निकलते पौने आठ बज गये। ट्रैवल एजेंसी के ऑफिस में घुसने ही वाला था, उनका फोन भी आ गया।
दो सौ रुपये में साइकिल की बात हुई। मैं राजी था। कल जगन्नाथ ट्रैवल्स ने तीन सौ रुपये मांगे थे। इस मामले में जितना मोलभाव हो जाये, उतना ही अपना फायदा है। साइकिल को सूमो की छत पर अन्य बैगों के साथ बांधने में काफी परेशानी हुई। साढे आठ बजे मिज़ोरम के लिये प्रस्थान कर गये। सूमो में मेरे अलावा तीन बिहारी, दो बंगाली व पांच मिज़ो थे। सभी मिज़ो हिन्दी भी जानते थे।
सिल्चर एक प्रमुख व्यापारिक नगर है। यह असोम में स्थित है और त्रिपुरा, मिज़ोरम व मणिपुर के लिये प्रवेश द्वार का काम करता है। अच्छा-खासा ट्रैफिक रहता है। इस ट्रैफिक से बचने के लिये ड्राइवर मुख्य राजमार्ग छोडकर शहर के अन्दर से ले गया। ड्राइवर भी मिज़ो था, पचास के लगभग उम्र रही होगी लेकिन गाडी अत्यधिक धीमे चला रहा था। दो बजे तक आइजॉल पहुंच जाने का अन्दाजा था लेकिन गाडी की गति को देखते हुए लगने लगा कि तीन बजे तक भी पहुंच जायें तो गनीमत है। जब तक असोम में हैं, तब तक मैदान है; मिज़ोरम में प्रवेश करने पर पहाडी मार्ग शुरू हो जायेगा, गति और कम हो जायेगी।
बाघा में कुछ देर रुकना पडा। गाडी के पिछले दरवाजे का लॉक ढीला था, इसकी वजह से यह काफी आवाज कर रहा था। यात्री यहां खाना खाने लगे, ड्राइवर ने तब तक लॉक ठीक करवा लिया। यहीं मैंने फ्रूटी की एक बोतल ली जिस पर लिखा था- प्रोडक्ट ऑफ बांग्लादेश। गौरतलब है कि यह इलाका भौगोलिक रूप से बांग्लादेश के ज्यादा नजदीक में है। कछार और मेघालय की पहाडियां इसे बाकी भारत से अलग-थलग कर देती हैं। रही-सही कसर इन पहाडियों में खराब सडक पूरी करती है। फिर बांग्लादेश सीमा पर तारबन्दी न होने के कारण कोई भी आसानी से इधर से उधर आ-जा सकता है। बांग्लादेश में तो बांग्ला भाषा बोली ही जाती है, यहां भी बांग्ला जमकर बोली जाती है। लोगों के रहन-सहन और पहनावे में भी कोई अन्तर नहीं है। कोई भी वस्तु गुवाहाटी से मंगाने की बजाय बांग्लादेश से मंगाने पर सस्ती पडती है।
बाघा से चले तो शीघ्र ही घुमावदार मार्ग आरम्भ हो गया। एक सूचना-पट्ट भी नजर आया, बीआरओ ने लगा रखा था- मिज़ोरम में आपका स्वागत है। एक और बोर्ड दिखा- बीआरओ की सडक समाप्त, पीडब्ल्यूडी की सडक शुरू। मिज़ोरम में कुछ समय पहले तक बीआरओ सडक निर्माण करता था। अब कुछ सडकों की जिम्मेदारी मिज़ोरम पीडब्ल्यूडी को दे दी गई है।
वैरेंगते में चेकपोस्ट है। यहां सभी के परमिट चेक किये गये, उन पर ठप्पा भी लगाया गया। मिज़ोरम में प्रवेश करने के लिये सभी गैर-मिज़ो लोगों को परमिट लेना पडता है। मैंने अपना परमिट दिल्ली से ही बनवा लिया था- चाणक्यपुरी स्थित मिज़ोरम हाउस से। मिज़ोरम वालों के पहचान-पत्र चेक किये गये।
पैसे को लेकर आलोचना का एक लम्बा दौर चला। सिल्चर से आइजॉल का किराया 380 रुपये है। दूरी है 185 किलोमीटर। इनमें से 110 रुपये ट्रैवल एजेंसी अपने पास रखती है, 270 रुपये ड्राइवर को दिये जाते हैं। सारा खर्च ड्राइवर को ही करना होता है। यात्री इसलिये परेशान थे कि 185 किलोमीटर के लिये 380 रुपये बहुत ज्यादा हैं। ड्राइवर इसलिये परेशान था कि सारे खर्चे उसे करने पडते हैं।
मिज़ोरम पूरी तरह से पहाडी प्रदेश है। मिज़ो का अर्थ ही होता है पहाडी मनुष्य। मध्य हिमालय जैसे पहाड दिखते हैं। हालांकि हिमालय में केले व बांस के पेड अक्सर नहीं होते। यहां बांस इतना ज्यादा है कि दैनिक जीवन बिना बांस के सम्भव ही नहीं। घर तो बांस से बनते ही हैं, फर्नीचर भी बांस का ही होता है। सबसे मजेदार लगी मुझे बांस की हाथ-गाडी। चार पहियों की यह गाडी घर-घर में दिखी। बोझ ढोने में इसका इस्तेमाल होता है। और हां, इसमें स्टीयरिंग भी होता है।
बुआलपुई में गाडी फिर रोक दी खाना खाने के लिये। असल में खाने का ठिकाना तो यही है लेकिन दरवाजा खराब हो जाने के कारण कुछ देर बाघा में रुकना पडा था। यहां केवल ड्राइवर ने ही खाना खाया, बाकी यात्रियों ने चाय पी। होटल संचालन एक महिला कर रही थी, मिज़ो थी, अच्छी हिन्दी बोल रही थी।
मिज़ोरम में मिज़ो भाषा बोली जाती है। इसकी कोई लिपि नहीं थी तो ईसाई मिशनरियों ने रोमन लिपि की शुरुआत की। अब मिज़ो भाषा रोमन में लिखी जाती है। अंग्रेजी पढने वाला कोई भी इंसान मिज़ो भी पढ सकता है लेकिन अंग्रेजी से भिन्न होने के कारण समझ नहीं सकता। एक बात और, मिज़ो फोनेटिक भाषा है अर्थात जो लिखा है वही पढा जायेगा। अंग्रेजी की तरह पढने के ऊल-जलूल नियम नहीं हैं। जैसे कि मिज़ो भाषा में क्रिसमस को ‘Christmas’ नहीं लिखा जाता बल्कि Krismas लिखा जाता है। Christmas को मिज़ो में च्रिस्तमस पढा जायेगा। यहां अक्सर ‘ट’, ‘ठ’, ‘ड’, ‘ढ’ अक्षरों का प्रयोग नहीं होता। इनके स्थान पर ‘त’, ‘थ’, ‘द’, ‘ध’ बोले जाते हैं। यानी चाय को ‘टी’ नहीं बल्कि ‘ती’ कहा जायेगा। एक उदाहरण और, यहीं एक गांव है कॉनपुई। इसकी मिज़ो वर्तनी है- Kawnpui. अगर यह कॉनपुई न होकर कानपुई होता तो इसकी वर्तनी होती- Kanpui. यानी जो लिखा है, वही पढा जायेगा।
इसके बाद सडक अत्यधिक खराब आने लगी। ड्राइवर को पता था इसलिये उसने गाडी को दूसरी सडक पर मोड दिया। यह ठीक थी व इस पर ट्रैफिक भी नहीं था। तभी सचिन का फोन आया कि वो बांगकॉन में है। एयरटेल का नेटवर्क अच्छा काम कर रहा था। तुरन्त गूगल मैप में देख लिया और पता चल गया कि आइजॉल में प्रवेश करते ही हम बांगकॉन से गुजरेंगे। ड्राइवर को बता भी दिया कि मुझे बांगकॉन उतरना है।
दर्तलांग (Durtlang) में पहली बार आइजॉल के दर्शन हुए। आइजॉल एक पहाडी रीढ पर बसा हुआ है। समुद्र तल से ऊंचाई लगभग 1100 मीटर है। पहाडी का चप्पा-चप्पा कंक्रीट से ढका हुआ था, फिर भी अच्छा लग रहा था।
साढे चार बजे मैं सूमो से उतरा। अन्दाजा छह घण्टे में आइजॉल पहुंच जाने का था, लेकिन आठ घण्टे लग गये। सचिन मिला। वह कल से मेरी प्रतीक्षा कर रहा है। एक दिन विलम्ब से आने के लिये माफी मांगनी पडी। सचिन ने अपने स्वभाव के मुताबिक तुरन्त माफ कर दिया। उसने यहीं एयरपोर्ट रोड पर एक कमरा ले रखा था। कल भी इसी में रुका था। कल किराया दो सौ था, आज जब होटल मालिक को पता चला कि सचिन का एक और साथी भी आने वाला है, तो आज किराया तीन सौ कर दिया। हालांकि तीन सौ के हिसाब से कमरा उतना अच्छा नहीं था। एक बडे से हॉल में प्लाईबॉर्ड खडे करके छोटे छोटे कमरे बना दिये। दरवाजा भी प्लाई का ही था। एक एक बल्ब टांग दिए। इसी हॉल के एक कोने में बाथरूम व शौचालय था। दो कमरों के बीच में मात्र पतली सी प्लाई होने के कारण आवाजें बडी आसानी से सुनी जा सकती थीं। हालांकि मिज़ो आवाज हमारे किसी काम की नहीं थी लेकिन जब बराबर वाले कमरे में एक पति-पत्नी ठहरे तो देर रात तक उनकी ‘आवाज’ ने हमें विचलित किये रखा।
शाकाहारियों के लिये यहां भोजन के ज्यादा विकल्प नहीं हैं। जहां हम ठहरे थे, उसके नीचे भी एक रेस्टॉरेंट था और सामने भी। सचिन यहां कल से है तो उसे सब पता था कि किस रेस्टॉरेंट की क्या खासियत है। उसने बताया कि नीचे वाले में मात्र चावल मिलते हैं जबकि सामने वाले में खाने की ज्यादा वस्तुएं हैं। हम सामने वाले में ही गये। वहां मेरे लिये भी ज्यादा विकल्प थे। मेन्यू कार्ड देखकर ‘चाऊ’ मंगाये गये। उनके पास चाऊमीन भी थी लेकिन सचिन के कहने पर चाऊ मंगाया गया। चाऊ भी चाऊमीन की ही तरह होता है, पता नहीं दोनों को अलग अलग श्रेणियों में क्यों रखा गया। यहां हर जगह मांसाहारी भोजन की भरमार है- सूअर, बकरे, मुर्गे से लेकर गाय के मांस तक की। इसलिये शाकाहारी दिखने वाले हर भोजन पर मांस भी रखा जाना आम है। होटल संचालिका हिन्दी तो कम समझती थी लेकिन भावनाएं ज्यादा समझती थी, इसलिये इशारे से बताने पर उसने मेरे चाऊ पर मांस नहीं रखा। इसके ऐवज में मैंने आमलेट बनवा लिया।
बाहर बाजार में कुछ फल आदि लेने गये। एक वृद्धा फल बेचती मिली। उससे केले का भाव पूछा। वह हिन्दी तो समझती ही नहीं थी, अंग्रेजी में भी लगभग शून्य ही थी। हम हिन्दी या अंग्रेजी में कुछ पूछते, वह मिज़ो में बोलती। केले का एक गुच्छा उठाया, इशारे से उसके पैसे पूछे, उसने केवल ‘हण्ड्रेड’ बोला। करीब पन्द्रह केले थे। हावभाव से लग रहा था कि वह हमारी पूरी बात अभी भी नहीं समझी। मैंने सचिन से कहा कि भाई, इसके सौ रुपये तो बहुत ज्यादा हैं लेकिन चलो फिर भी ले लेते हैं। हमने सौ रुपये में इन्हें ही लेना चाहा, तो उसने उस गुच्छे को दो हिस्सों में करके एक हमें पकडा दिया और एक अपने पास रख लिया, फिर कहा ‘हण्ड्रेड’। सचिन से पूछा कि यह क्या हुआ? उसने भी कहा कि पता नहीं। जाहिर था कि न हम उसकी बात समझ रहे थे और न ही वह। उसका जो एक शब्द हमें समझ आ रहा था, वो था ‘हण्ड्रेड’। पता नहीं यह ‘हण्ड्रेड’ क्या था? शायद केलों की एक निश्चित संख्या का दाम सौ रुपये रहा होगा। आखिरकार हमने केले नहीं लिये।
जब राजधानी में ही ऐसा है तो मिज़ोरम के दूर-दराज के इलाकों में भाषा सम्बन्धी और भी समस्याएं आने वाली हैं। देखते हैं क्या होगा!
कमरे पर लौटकर हमने आगे की योजनाएं बनानी शुरू की। मेरे एक दिन लेट हो जाने के कारण कार्यक्रम भी एक दिन लेट हो गया था। इसलिये हमने आइजॉल शहर घूमना छोडकर सुबह ही साइकिल यात्रा आरम्भ कर देने का विचार किया। मुझे लग रहा था कि सचिन शहर देखना पसन्द करेगा और मैं उसके कहने पर तुरन्त हां कर देता। लेकिन जब उसी ने कहा कि सुबह चम्फाई की तरफ चल देना है तो मैंने तुरन्त इसी पर अपनी मोहर लगा दी। मुझे भी शहर अच्छे लहीं लगते।
पिछली पोस्ट ‘बराक घाटी एक्सप्रेस’ पर दर्शन कौर धनोए जी ने टिप्पणी की:
“अगरतला से हमारे एक पडोसी भागकर आये है -- पिछले २ साल से यही है, वर्माजी बेचारे जिंदगी भर कि कमाई वहाँ लुटा आये --उनकी पत्नी वहाँ के स्कुल में टीचर थी --- वहाँ के लोगो ने उनको चेतावनी भी दी कि भाग जाओ पर बेचारे बगैर बीबी के रिटायर्ड हुए कैसे आते? उनके बच्चे उनकी बहन के पास मुम्बई में पड़ते थे २ साल पहले जब वो छुटियो में मुम्बई आये तो पीछे से उनका सारा घर ही लूट लिया गया -- अब लोग भी उनके और पुलिस भी उनकी --बेचारे चुप होकर रह गए --उनके घर का सारा सामान पडोसी यूज़ करते रहे पर वो किस्से बोले --अपने ही देश में लुटे हुए वो २ साल बाद वापस मुम्बई लौट आये ---जिंदगी भर कि कमाई लुटा कर --- मिजोरम यानि कि जंगल –”
गौरतलब है कि दर्शन जी मुम्बई में ही रहती हैं। मुझे इस टिप्पणी के बारे में कुछ नहीं कहना, बस दो बातें कहनी हैं:
एक, अगरतला मिज़ोरम में नहीं है। और दो, मुझे यूपी-निवासी व हिन्दी-भाषी होने के कारण आज भी मुम्बई जाते हुए डर लगता है।

सिल्चर में सूमो पर साइकिल

आइजॉल में तीन सौ रुपये में यह कमरा मिला था। हालांकि यह सस्ते में मिल सकता था, लेकिन हम ‘परदेशियों’ को देखकर इसके दाम बढा दिये।

आइजॉल शहर

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अगले भाग में जारी...

मिज़ोरम साइकिल यात्रा
1. मिज़ोरम की ओर
2. दिल्ली से लामडिंग- राजधानी एक्सप्रेस से
3. बराक घाटी एक्सप्रेस
4. मिज़ोरम में प्रवेश
5. मिज़ोरम साइकिल यात्रा- आइजॉल से कीफांग
6. मिज़ोरम साइकिल यात्रा- तमदिल झील
7. मिज़ोरम साइकिल यात्रा- तुईवॉल से खावजॉल
8. मिज़ोरम साइकिल यात्रा- खावजॉल से चम्फाई
9. मिज़ोरम से वापसी- चम्फाई से गुवाहाटी
10. गुवाहाटी से दिल्ली- एक भयंकर यात्रा

12 comments:

  1. प्रणाम नीरज जी!!

    वाकई‌ बेहतरीन कथन आ रहा है|

    यह सब करने और हम तक पहुँचाने केलि ए आपका बहुत धन्यवाद! अगले विवरण के लिए प्रतीक्षारत्|

    -आपका चहेता|

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  2. प्रणाम नीरज जी!!

    वाकई‌ बेहतरीन कथन आ रहा है|

    यह सब करने और हम तक पहुँचाने केलि ए आपका बहुत धन्यवाद! अगले विवरण के लिए प्रतीक्षारत्|

    -आपका चहेता|

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  3. महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं,
    सफर जारी हे आपके साथ..............

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  4. साइकिल यात्रा की प्रतीक्षा है।

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  5. हंड्रेड के केलों का किस्सा मजेदार लगा. सुन्दर। आपके और अनुभवों से परिचित होना है.

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  6. यही है हमारा इंडिया..अपने घर में सब शेर और बाहर जा के ये दुसरो को लूटने वाले भी खुद लुटते ही होंगे..परंपरा चली आ रही है

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  7. नीरज भाई मे आपकी घुमक्कड़ी का तो फैन हुँ ही लेकिन आपके किसी स्थान के बारे मे पूरी जानकारी एवं वहाँ की भाषा और संस्कृति के विस्तार पूर्वक विवरण का भी कायल हुँ। आपकी यात्रा निसन्देह सुखद होगी।

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  8. महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं, yatra magal may ho..............Yogendra Solanki

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  9. वाकई समझ पाने वाली भाषा की अनुपस्थिती में बहुत मुश्किल पेश होती है, साईकिल यात्रा के विवरण का इंतजार कर रहे हैं

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  10. नीरज भाई..... आपका लेख अच्छा लगा.... सुदूर उत्तरपूर्वी क्षेत्र के बारे में अभी तक किसी ब्लॉग में नहीं पढ़ा था.....

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  11. नीरज , मुम्बई और मिजोरम का क्या मेल ---कुछ समझ नहीं आया ---तुम्हारा यह कथन पढ़ कर मुझे अगरतला के किस्से कि याद आई--->

    "यह भारत की कुछ बेहद खूबसूरत रेलवे लाइनों में से एक है। आज के समय में यह लाइन असोम के लामडिंग से शुरू होकर बदरपुर जंक्शन तक जाती है। बदरपुर से आगे यह त्रिपुरा की राजधानी अगरतला चली जाती है और एक लाइन सिल्चर जाती है। अगरतला तक यह पिछले दो-तीन सालों से ही है, लेकिन सिल्चर तक काफी पहले से है। इसलिये इसे लामडिंग-सिल्चर रेलवे लाइन भी कहते हैं। यह लाइन मीटर गेज है। मुझे आज लामडिंग से शुरू करके सिल्चर पहुंचना है।"

    क्योकि मिजोरम के अजीबो -गरीब नामो में मुझे अगरतला नाम hi jana pahchana laga ---- :)

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  12. BHAI AAGE BHI BADDDDEGA

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