Monday, December 20, 2010

मदमहेश्वर यात्रा

15 नवम्बर 2010, दिन सोमवार। सुबह छह बजे नाइट ड्यूटी से फारिग हुआ और छह बजकर तीन मिनट पर अहमदाबाद से हरिद्वार जाने वाली 9105 हरिद्वार मेल पकड ली। रात्रि जागरण के कारण नींद आ रही थी। जनरल डिब्बे में बैठने की ही जगह मिल जाये तो गनीमत है। इसलिये सीधे शयनयान में एक ऊपर वाली बर्थ कब्जाई, नौ बजे का अलार्म लगाया और सो गया। नौ बजे के लगभग यह गाडी मुजफ़्फ़रनगर पहुंचती है। हरिद्वार जाने के लिये मैं मुज़फ़्फ़रनगर तक ट्रेन का इस्तेमाल करता हूं और इससे आगे बस का।
परसों यानी 17 को बद्रीनाथ धाम के कपाट बन्द हो रहे हैं। कल शाम तक मैं वहां पहुंच जाऊंगा और उस उत्सव का हिस्सा बनूंगा; यही सोचकर मैं निकला था। उत्तराखण्ड में रात को बसें नहीं चलतीं। बद्रीनाथ जाने वाली बसें भी हरिद्वार और ऋषिकेश से सुबह-सुबह निकलती हैं और शाम तक वहां पहुंचती हैं। ग्यारह-साढे ग्यारह बजे हरिद्वार से बद्रीनाथ तो क्या जोशीमठ की बस भी मिलनी मुश्किल है। फिर भी देखते हैं कहां की बस मिलेगी और कहां तक पहुंच पाते हैं आज। श्रीनगर तक तो पहुंच ही सकता हूं, आगे रुद्रप्रयाग? देखा जायेगा।
साढे ग्यारह बजे हरिद्वार पहुंच गया। अगर ट्रेन से आता तो साढे बारह बजने तय थे। ऋषिकुल चौराहे पर उतरा और उतरते ही ऋषिकेश जाने वाली बस मिल गयी। घण्टे भर में ऋषिकेश। प्राइवेट बस अड्डे में घुसने भी ना पाये थे कि गोपेश्वर जाने वाली बस खडी दिख गयी। एक दो सीटें ही खाली थी, वो भी सबसे पीछे वाली। मेरे बैठते ही बस चल पडी। अब सोचना शुरू किया कि गोपेश्वर है कहां? हां, जायेगी तो श्रीनगर होकर ही। फिर आगे रुद्रप्रयाग है। गोपेश्वर कहां है? याद आया, चमोली के पास। अरे तेरे की- श्रीनगर तक ही छह बज जायेंगे यानी अंधेरा हो जायेगा। फिर एक घण्टे में सात बजे तक रुद्रप्रयाग, आठ साढे कर्णप्रयाग, साढे नौ दस बजे चमोली और साढे दस ग्यारह बजे गोपेश्वर। इतनी दूर की बस मिल जायेगी, यह उम्मीद नहीं थी।
समस्या आयी टिकट की। कहां तक की टिकट लूं। मान लो कि यह बस दस बजे चमोली पहुंचेगी। तब तक पूरा चमोली आधी नींद खींच चुका होगा। कहीं कोई कमरा मिलना भी मुश्किल हो जायेगा। फिर कल का पूरा दिन भी तो पडा है, रिस्क नहीं लेना है, अभी ऐसा करते हैं कि श्रीनगर तक की टिकट ले लेते हैं। बाकी वहां पहुंचकर देखा जायेगा।
मैंने कल रात ही भरपेट खाना खाया था। पूरी रात जगकर ड्यूटी की, फिर तुरन्त ही ट्रेन पकड ली। हां, शाहदरा स्टेशन पर दस रुपये की आठ पूरी और दो कटोरी आलू की सब्जी खायी थी। मुज़फ़्फ़रनगर में स्टेशन से बाहर निकलते ही बस मिल गयी, ऐसा ही हरिद्वार और ऋषिकेश में हुआ। कुल मिलाकर खाना नहीं खाया और इस समय मैं भूखा था। शाम छह बजे श्रीनगर पहुंचने का अन्दाजा था, इसलिये ये मानकर चल रहा था कि श्रीनगर में ही खाना मिलेगा। लेकिन भला हो देवप्रयाग का, आधे घण्टे के लिये गाडी रोक दी गयी कि नाश्ता कर लो, टट्टी-पेशाब कर लो।
ठीक छह बजे श्रीनगर पहुंचे। मैंने टिकट यही तक का लिया था, उतर गया। अंधेरा हो ही गया था। ऋषिकेश से श्रीनगर तक के पांच घण्टे के सफर में मैंने सोच लिया था ज्यादा रिस्क ना लेते हुए रुद्रप्रयाग तक चला जाये। कल का पूरा दिन है ही, बद्रीनाथ बडे आराम से पहुंच जायेंगे। सो सात बजे तक रुद्रप्रयाग।
बस से उतरते ही एक होटल वाले ने पकड लिया कि आओ, कमरा दिखाता हूं। देखने में क्या हरज है? डबल बेड था, अटैच बाथरूम-लैट्रीन और कुल मिलाकर ठीक-ठाक था। बोला कि तीन सौ रुपये। मैंने मना कर दिया कि भाई, अब तो चार धामों में से तीन तो बन्द हो ही चुके हैं। परसों चौथा भी बन्द हो जायेगा। कुल मिलाकर यात्रा सीजन खत्म हो चुका है। फिर भी तुम सीजन वाला किराया ही ले रहे हो। मैंने डेढ सौ का प्रस्ताव रखा। साफ मना कर दिया गया। मैं वापस मुड गया कि इस खत्म हो चुके सीजन में मुझे बडे आराम से सौ रुपये तक का कमरा मिल जायेगा।
थोडी दूर ही गया था कि किसी ने पीछे से आवाज लगाई। पूछा कि कमरा चाहिये?
-हां, चाहिये।
-चलिये, मैं दिखाता हूं आपको।
-अरे, दिखाना क्या? पैसे बताओ।
-पैसे-वैसे तो होते रहेंगे। आप पहले कमरा देखिये।
वो मुझे उसी होटल में ले गया जहां से मैं मना करके आया था। मैंने गेट पर ही कह दिया कि मुझे यहां नहीं लेना है। मैं यहीं से वापस गया था।
-हां, मुझे पता है। आप डेढ सौ कह रहे थे। चलो, दो सौ दे दो।
-भाई, अगर आपको डेढ सौ में देना है तो बताओ, नहीं तो मुझसे मगजमारी करके कोई फायदा नहीं।
-ठीक है, मानोगे नहीं। डेढ सौ ही दे दो।
यह गढवाली लडका काफी कायदे से बात कर रहा था। फिर भी आधुनिकता ने असर तो किया ही है। बोला कि भाई साहब, आपके कमरे में एक डबल बेड पडा है, दो रजाई भी हैं। हमारे सब कमरे अगर भर गये तो किसी को हम आपके कमरे में ठहरा देंगे। आपके सामान की गारंटी हमारी है।
-नहीं। आप यहां से डबल बेड हटाकर सिंगल बेड लगा दो और एक रजाई उठाकर ले जाओ।
-नहीं, नहीं। वैसे तो यह नौबत आयेगी ही नहीं। फिर भी इमरजेंसी में। आप तीन सौ का कमरा आधे रेट में ले भी तो रहे हैं।
-भाई, बिल्कुल नहीं।
-असल में हमारे कई सारे रिश्तेदार आये हैं। यहां इलाज कराने आये हैं तो दिक्कत हो रही है।
-तो क्या यहां बीमार रिश्तेदारों को ठहराओगे?
-नहीं नहीं, हममें से कोई एक सोयेगा। मैं या पिताजी।
-और अगर मैंने तीन सौ रुपये दे दिये होते तो कैसे सोते?
-दिक्कत तो पडती। लेकिन कुछ ना कुछ तो कर ही लेते।
-ठीक है, अब भी कर लो। मैं इस कमरे में अकेला ही सोऊंगा।
-नहीं, अभी तो ठीक है। लेकिन अगर कुछ देर बाद कोई और ठहरने के लिये आ गया तो दिक्कत पडेगी।
-अगर आपके पास कमरे नहीं हैं तो आपने मुझे दिया क्यों? लाइये, डेढ सौ रुपये वापस दीजिये। अपने रिश्तेदारों और बाकियों को सुलाइये। मैंने आपसे जबरदस्ती तो की नहीं है। यहां रुद्रप्रयाग में मुझे बडे आराम से इतने ही रेट में इससे भी अच्छा कमरा मिल जायेगा। लाइये, पैसे वापस कीजिये। मैं जा रहा हूं।
-नहीं नहीं, आप तो बुरा मान गये। ठीक है आराम से सोइये। मैं एक रजाई ले जा रहा हूं। आपके लिये एक ही रजाई काफी होगी। कोई आपको डिस्टर्ब नहीं करेगा।
और वो एक रजाई लेकर चला गया। इधर मैं पूरी रात इत्मीनान से सोया। आखिर सुबह एक और लम्बा सफर करके बद्रीनाथ जाना था।

अगला भाग: मदमहेश्वर यात्रा - रुद्रप्रयाग से ऊखीमठ तक


मदमहेश्वर यात्रा
1. मदमहेश्वर यात्रा
2. मदमहेश्वर यात्रा- रुद्रप्रयाग से ऊखीमठ तक
3. ऊखीमठ के पास है देवरिया ताल
4. बद्रीनाथ नहीं, मदमहेश्वर चलो
5. मदमहेश्वर यात्रा- उनियाना से गौंडार
6. मदमहेश्वर यात्रा- गौंडार से मदमहेश्वर
7. मदमहेश्वर में एक अलौकिक अनुभव
8. मदमहेश्वर और बूढा मदमहेश्वर
9. और मदमहेश्वर से वापसी
10. मेरी मदमहेश्वर यात्रा का कुल खर्च

11 comments:

  1. बद्री नाथ मे ब्लागजगत की शाँति के लिये भी दुआ कर देना। यात्रा शुभ हो। आशीर्वाद।

    ReplyDelete
  2. यात्रा की भड़भड़ाहट की सलीके से व्यक्त किया है, पर यात्रा का आनन्द भी इसी में है।

    ReplyDelete
  3. इसे कहते है जाट की चतुराई |

    ReplyDelete
  4. अरे नीरज भाई बडा सस्ता कमरा मिला, हमे भी पता भेजना, हमारे सडे से शहर मे ही १२०० रु मे एक कमरा मिलता हे, वेसे यात्रा का विवरण बहुत सुंदर रहा, ओर जाट को चतुराई से बात करते भी पहली बार देखा, वेसे तो जाट ३०० की जगह ६०० ही दे देता हे

    ReplyDelete
  5. नीरज भाई, आपकी घुमक्‍कडी का फायदा हम लोगों को भी मिल रहा है। पर इस बार चित्र नहीं हैं, क्‍या बात है।
    ---------
    आपका सुनहरा भविष्‍यफल, सिर्फ आपके लिए।
    खूबसूरत क्लियोपेट्रा के बारे में आप क्‍या जानते हैं?

    ReplyDelete
  6. ये बिन फोटू वाली पोस्ट और किसी की भले ही हो अपने नीरज जाट की नहीं हो सकती...भाई ये कुनकी पोस्ट है...थारी ही है के? कमरा तो ना गुमा दिया...तमने?

    कमरे में सोने के लिए इतनी मगजमारी...बहुत ना इंसाफी है भाई...

    नीरज

    ReplyDelete
  7. अब आपके यात्रा वृतांत पढने में मज़ा आने लगा है /
    होतालोम के नाम भी बता दे ।
    शायद कभी ज़रूरत पड़े

    ReplyDelete
  8. बहुत खूब, नीरज भाई इसी श्रीनगर का हुआ करता था मैं कभी !

    ReplyDelete
  9. namaskar Bhai ,Aap abhi tak badrinath ji ki yatra per nahi gaye ............waha kab jaoge ...........jab badrinath ji jana to waha se age bhi jana satopanth lake tak .bot adventurour route hai ......

    ReplyDelete