Thursday, November 29, 2018

टाइगर फाल और लाखामंडल की यात्रा


1 अक्टूबर 2018
आज मैं सुबह सवेरे ही उठ गया था। इसका कारण था कि आज नाश्ते में पकौड़ियाँ बनवानी थीं, क्योंकि होटल के मालिक रोहन राणा को आलू के पराँठे बनाने नहीं आते। लेकिन सुबह सवेरे आठ बजे जब तक मैं उठा, तब तक पता नहीं किसने गोभी के पराँठे बनाने को कह दिया था। आज एहसास हुआ कि मुझसे पहले उठने वाले लोग भी इस दुनिया में होते हैं। और जब गोभी के पराँठे सामने आए, तो उनमें न गोभी थी और न ही पराँठा था। कतई पापड़ थे, जिनका नाम गोभी-पराँठा पापड़ रख देना चाहिए।
यहाँ से चले तो सीधे पहुँचे चकराता बाजार में। असल में परसों झा साहब ने बताया था कि चकराता बाजार में फलां दुकान पर सबसे अच्छा पहाड़ी राजमा मिलता है, तो ग्रुप की महिलाओं ने खत्म हो जाने तक राजमा खरीद लिया। मुझे एक कोने में बिस्कुट का खुला पैकेट रखा मिल गया, सबको एक-एक बिस्कुट बाँटकर पुण्य कमा लिया।
लेकिन सबसे अच्छा लगा गोल्डन एप्पल। सुनहरा सेब। वाह! एकदम नरम और मीठा।

Monday, November 26, 2018

एक यात्रा लोखंडी और मोइला बुग्याल की

Chakrata Travel Guide
29 सितंबर 2018...
जब भी सिर मुंडाते ही ओले पड़ने लगें, तो समझना कि अपशकुन होगा। पता नहीं होगा या नहीं होगा, लेकिन हमें यह गाड़ी बिल्कुल भी पसंद नहीं आई। दिल्ली से ही राज कुमार सुनेजा जी, सिरसा से डॉ. स्वप्निल गर्ग सर, रोहिणी से डॉ. विवेक पाठक और उनके बच्चे, गुड़गाँव से निशांत खुराना, कानपुर से शिखा गुप्ता इतनी सुबह हमारे यहाँ आ चुके थे। जैसे ही इन्होंने बस में कदम रखा, सबसे पहले सामना टायर से हुआ। और आगे बढ़े तो सीट-कवर के चीथड़ों के बीच सीट ढूँढ़ना मुश्किल हो गया। सीटों पर पड़ी चूहों की गोल-गोल टट्टियों को कुछ फूँक से और कुछ हाथ से साफ करना पड़ा। ड्राइवर अभी-अभी उठकर आया था और तकिये में से सबसे ज्यादा मैली शर्ट निकालकर लाया था।
और कुछ ही देर में शालिनी जी भी आने वाली हैं...
हे भगवान! आज रक्षा करना। पहली बार टेम्पो ट्रैवलर में किसी ग्रुप को ले जा रहे हैं, और पहली ही बार यह दिन देखना पड़ रहा है।
साढ़े सात बजे बस चली तो मैं सबसे पीछे वाली सीट पर मुँह छुपाए बैठा था और बाकी सब चुप बैठे थे। शास्त्री पार्क मेट्रो स्टेशन से ठेके वाले तिराहे तक पहुँचते-पहुँचते मुझे थोड़ी अक्ल आई... जिसके माध्यम से यह बस बुक की थी, उसे फोन मिलाया और जान-बूझकर जोर-जोर से बोलने लगा, ताकि बस की सभी सवारियाँ समझ जाएँ कि हमारी आगे की यात्रा के लिए दूसरी बस आ रही है।

Saturday, November 24, 2018

तिगरी गंगा मेले में दो दिन

Garhmukteshwar Tigri Kartik Poornima Melaकार्तिक पूर्णिमा पर उत्तर प्रदेश में गढ़मुक्तेश्वर क्षेत्र में गंगा के दोनों ओर बड़ा भारी मेला लगता है। गंगा के पश्चिम में यानी हापुड़ जिले में पड़ने वाले मेले को गढ़ गंगा मेला कहा जाता है और पूर्व में यानी अमरोहा जिले में पड़ने वाले मेले को तिगरी गंगा मेला कहते हैं। गढ़ गंगा मेले में गंगा के पश्चिम में रहने वाले लोग भाग लेते हैं यानी हापुड़, मेरठ आदि जिलों के लोग; जबकि अमरोहा, मुरादाबाद आदि जिलों के लोग गंगा के पूर्वी भाग में इकट्ठे होते हैं।
सभी के लिए यह मेला बहुत महत्व रखता है। लोग कार्तिक पूर्णिमा से 5-7 दिन पहले ही यहाँ आकर तंबू लगा लेते हैं और यहीं रहते हैं। गंगा के दोनों ओर 10-10 किलोमीटर तक तंबुओं का विशाल महानगर बन जाता है। जिस स्थान पर मेला लगता है, वहाँ साल के बाकी दिनों में कोई भी नहीं रहता, कोई रास्ता भी नहीं है। वहाँ मानसून में बाढ़ आती है। पानी उतरने के बाद प्रशासन मेले के लिए रास्ते बनाता है और पूरे खाली क्षेत्र को सेक्टरों में बाँटा जाता है।
यह मुख्यतः किसानों का मेला है। गन्ना कट रहा होता है, गेहूँ लगभग बोया जा चुका होता है; तो किसानों को इस मेले की बहुत प्रतीक्षा रहती है। ज्यादातर लोग सपरिवार आते हैं। बच्चों का मुंडन होता है और मृतकों की याद में दीए प्रवाहित किए जाते हैं। इसी वजह से मुझे केवल दो बार ही इस मेले में जाने का मौका मिला है - पाँच साल की उम्र में, जब मुंडन हुआ था और पच्चीस साल की उम्र में, जब माताजी की याद में दीए प्रवाहित करने थे। इन दो मौकों के अलावा मुझे कभी भी यहाँ जाने का मौका नहीं मिला। हमारे पड़ोसी महीनों पहले से उत्साहित हो जाते थे। भैंसों की खास खातिरदारी की जाती थी, उन्हें कई-कई किलोमीटर तक टहलाया और दौड़ाया जाता था, ताकि मेले में जाते समय लंबी दूरी तय करने के कारण उनके पैर अकड़ न जाएँ। ज्यादातर लोग भैंसा-बुग्गियों पर ही जाते थे। जिनके पास ट्रैक्टर थे, वे ट्रैक्टर-ट्रोलियों से जाते थे। आज भी ऐसा ही होता है।

Monday, November 19, 2018

अमृतसर वाघा बॉर्डर यात्रा (विमल बंसल)

मूलरूप से समालखा हरियाणा के रहने वाले और वर्तमान में चंडीगढ़ में रह रहे विमल बंसल जी ने अपना एक यात्रा वृत्तांत भेजा है... इसका पहला भाग (डलहौजी-खजियार यात्रा) उनकी फेसबुक वाल पर प्रकाशित हो चुका है, इसलिए हम उसे अपने ब्लॉग पर प्रकाशित नहीं कर सकते... तो आप आनंद लीजिए इस भाग का...

तो दोस्तों, अमृतसर यात्रा शुरू करने से पहले इस शहर के पुराने नाम, इतिहास और देखने योग्य स्थानों के बारे में बता दूं।
अमृतसर का पुराना नाम रामदास नगर था जो कि सिखों के गुरु रामदास के नाम पर था, जिन्होंने सबसे पहले 1577 में 500 बीघा जमीन में गुरुद्वारे की नीव रखी थी। बाद में गुरु रामदास ने ही इसका नाम बदलकर अमृतसर रखा। यह नाम किसलिए बदला, इसके बारे में भी एक कथा प्रचलित है कि यही वो धरती है, जहां पर ऋषि वाल्मीकि जी ने रामायण की रचना की थी और यहीं पर माता सीता ने लव को जन्म दिया था। एक दिन माता सीता जब नहाने के लिये गईं तो लव को ऋषि वाल्मिकी जी के पास छोड़ गईं। बालक लव खेलता-खेलता ना जाने कहां चला गया। जब ऋषि वाल्मीकि को काफी देर तक खोजने पर भी लव नही मिला तो उन्होंने सोचा कि अब सीता को क्या जवाब दूंगा। तब उन्होंने कुशा नामक घास के तिनको में प्राण डालकर कुश को प्रगट किया था। तो दोस्तों, कुश का जन्म माता सीता की कोख से नही बल्कि ऋषि वाल्मीकि के वरदान से हुआ था। घास को कुशा भी कहा जाता है इसीलिए माता सीता के दूसरे पुत्र का नाम कुश रखा। कहते हैं कि अमृतसर की स्थापना भगवान वाल्मीकि के अमृत से हुई है। जब पुरुषोत्तम श्री राम जी ने अश्वमेध यज्ञ के लिये घोड़ा छोड़ा था तो उसको लव कुश ने पकड़ लिया था। उसके बाद राजा राम की सेना और लव कुश के मध्य युद्ध हुआ जिसमें लव कुश ने राम की सेना को मौत के घाट उतार दिया। बाद में जब खुद श्रीराम युद्ध करने आये तो खुद महाकवि वाल्मीकि जी ने आकर भगवान राम और लव कुश के मध्य युद्ध होने से रोका। तब श्री राम की याचना पर मरे हुये सैनिकों को जीवित करने के लिये वाल्मीकि जी ने वहां पर अमृत की वर्षा की और प्रभु श्री राम की समस्त सेना को जीवित कर दिया। बाद में श्री राम की सेना के जीवित होने के बाद महर्षि वाल्मीकि ने उस अमृत को वहीं पर दबा दिया। जब सिखों के गुरु रामदास जी को यह बात पता चली तो उन्होंने इस शहर का नाम रामदास नगर से बदलकर अमृतसर कर दिया।

Thursday, November 8, 2018

आज ब्लॉग दस साल का हो गया

साल 2003... उम्र 15 वर्ष... जून की एक शाम... मैं अखबार में अपना रोल नंबर ढूँढ़ रहा था... आज रिजल्ट स्पेशल अखबार में दसवीं का रिजल्ट आया था... उसी एक अखबार में अपना रिजल्ट देखने वालों की भारी भीड़ थी और मैं भी उस भीड़ का हिस्सा था... मैं पढ़ने में अच्छा था और फेल होने का कोई कारण नहीं था... लेकिन पिछले दो-तीन दिनों से लगने लगा था कि अगर फेल हो ही गया तो?...
तो दोबारा परीक्षा में बैठने का मौका नहीं मिलेगा... घर की आर्थिक हालत ऐसी नहीं थी कि मुझे दसवीं करने का एक और मौका दिया जाता... निश्चित रूप से कहीं मजदूरी में लगा दिया जाता और फिर वही हमेशा के लिए मेरी नियति बन जाने वाली थी... जैसे ही अखबार मेरे हाथ में आया, तो पिताजी पीछे खड़े थे... मेरा रोल नंबर मुझसे अच्छी तरह उन्हें पता था और उनकी नजरें बारीक-बारीक अक्षरों में लिखे पूरे जिले के लाखों रोल नंबरों में से उस एक रोल नंबर को मुझसे पहले देख लेने में सक्षम थीं... और उस समय मैं भगवान से मना रहा था... हे भगवान! भले ही थर्ड डिवीजन दे देना, लेकिन पास कर देना... फेल होने की दशा में मुझे किस दिशा में भागना था और घर से कितने समय के लिए गायब रहना था, यह भी मैं सोच चुका था...
और जैसे ही अपने रोल नंबर पर निगाह गई, हृदय-गति लगभग बंद पड़ गई... आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा और भागने का दम ही नहीं रहा...
रोल नंबर के आगे लिखा था... F

Wednesday, November 7, 2018

सिलीगुड़ी से दिल्ली मोटरसाइकिल यात्रा

19 फरवरी 2018
पूर्वोत्तर में इतने दिन घूमने के बाद अब बारी थी दिल्ली लौटने की और इस यात्रा के आखिरी रोमांच की भी। सिलीगुड़ी से दिल्ली लगभग 1500 किलोमीटर है और हमारे पास थे तीन दिन, यानी 500 किलोमीटर प्रतिदिन का औसत। यानी हमें पहले दिन मुजफ्फरपुर रुकना पड़ेगा और दूसरे दिन लखनऊ। गूगल मैप के सैटेलाइट व्यू में मैंने पहले ही देख लिया था कि इस्लामपुर शहर को छोड़कर पूरा रास्ता कम से कम चार लेन है। इसका साफ मतलब था कि हम एक दिन में 500 किलोमीटर तो आसानी से चला ही लेंगे।
लेकिन कुछ समस्याएँ भी थीं। यू.पी. और बिहार के बड़े पर्यटन स्थलों को छोड़कर किसी भी शहर में होटल लेकर ठहरना सुरक्षित और सुविधाजनक नहीं होता। अगर आप तीस की उम्र के हैं और आपकी पत्नी भी आपके साथ है, तब तो बहुत सारी अनावश्यक पूछताछ होनी तय है। हम इन सबसे बचना चाहते थे। हमारे रास्ते में बिहार में दरभंगा और मुजफ्फरपुर बड़े शहर थे, लेकिन वहाँ शून्य पर्यटन है; इसलिए निश्चित कर लिया कि बिहार में कहीं भी होटल लेकर नहीं रुकना। उससे आगे यू.पी. में गोरखपुर है, जहाँ ठहरा जा सकता है। तो हम आज कम से कम गोरखपुर तक पहुँचने की योजना बना रहे थे।

Monday, November 5, 2018

दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे के साथ-साथ

All Information about Darjeeling Himalayan Railway
18 फरवरी 2018
हम दार्जिलिंग केवल इसलिए आए थे ताकि रेलवे लाइन के साथ-साथ न्यू जलपाईगुड़ी तक यात्रा कर सकें। वैसे तो मेरी इच्छा न्यू जलपाईगुड़ी से दार्जिलिंग तक इस ट्रेन में ही यात्रा करने की थी, लेकिन बहुत सारी योजनाओं को बनाने और बिगाड़ने के बाद तय किया कि दार्जिलिंग से न्यू जलपाईगुड़ी तक मोटरसाइकिल से ही यात्रा करेंगे, ट्रेन के साथ-साथ।
दार्जिलिंग से न्यू जलपाईगुड़ी की एकमात्र ट्रेन सुबह आठ बजे रवाना होती है। हम छह बजे ही उठ गए थे। यह देखकर अच्छा लगा कि होटल वालों ने हमारी मोटरसाइकिल बाहर सड़क किनारे से हटाकर होटल के अंदर खड़ी कर दी थी। वैसे तो उन्होंने कल वादा किया था कि रात दस-ग्यारह बजे जब रेस्टोरेंट बंद होने वाला होगा, तो वे मोटरसाइकिल अंदर खड़ी करने के लिए हमें जगा देंगे। पता नहीं उन्होंने आवाज लगाई या नहीं, लेकिन मोटरसाइकिल हमें भीतर ही खड़ी मिली।
हमें शहर अच्छे नहीं लगते, इसलिए दार्जिलिंग भी नहीं घूमना था। लेकिन जब छह बजे उठ गए तो क्या करते? बाजार में चले गए। कल भी इधर आए थे और मीट की बड़ी-बड़ी दुकानें देखकर नाक सिकोड़ते हुए लौट गए थे। अब सुबह-सुबह का समय था और सभी दुकानें बंद थीं। टैक्सी स्टैंड तक पहुँच गए। कलिम्पोंग, गंतोक और सिलीगुड़ी जाने वाली शेयर्ड टैक्सियाँ तैयार हो चुकी थीं। यहीं चाय की एक दुकान खुली थी और अच्छा इंटरनेट भी चल रहा था। चाय भी पी और इंटरनेट भी चलाया।

Friday, November 2, 2018

उत्तर बंगाल यात्रा - लावा से लोलेगाँव, कलिम्पोंग और दार्जिलिंग

17 फरवरी 2018
आज शाम तक हमें दार्जिलिंग पहुँचना था। यहाँ से दूरी 80 किलोमीटर है। सड़क ठीक होगी तो कुछ ही देर में पहुँच जाएँगे और अगर खराब हुई, तब भी शाम तक तो पहुँच ही जाएँगे। लेकिन लोलेगाँव देखते हुए चलेंगे।
लोलेगाँव में क्या है?
यह जरूरी नहीं कि कहीं ‘कुछ’ हो, तभी जाना चाहिए। यह स्थान लगभग 1700 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है और फरवरी के महीने में इतनी ऊँचाई वाले स्थान दर्शनीय होते हैं। फिर इसके पश्चिम में ढलान है, यानी कोई ऊँची पहाड़ी या चोटी नहीं है। तो शायद कंचनजंघा भी दिखती होगी। और अब तक आप जान ही चुके हैं कि कंचनजंघा जहाँ से भी दिखती हो, वो स्थान अपने-आप ही दर्शनीय हो जाता है। फिर वहाँ ‘कुछ’ हो या न हो, आपको चले जाना चाहिए।
हमें लावा से लोलेगाँव का सीधा और छोटा रास्ता समझा दिया गया। और यह भी बता दिया गया कि मोटरसाइकिल लायक अच्छा रास्ता है।
चलने से पहले बता दूँ कि यह पूरा रास्ता जंगल का है और झाऊ के पेड़ों की भरमार है। मुझे झाऊ की पहचान नहीं थी। यह मुझे कभी चीड़ जैसा लगता, तो कभी देवदार जैसा लगता। कल फोरेस्ट वालों ने बताया कि यह झाऊ है।
और अब चीड़ भी झाऊ जैसा लगने लगा है और देवदार भी।