Monday, November 26, 2018

ग्रुप यात्रा: लोखंडी और मोइला बुग्याल

29 सितंबर 2018...
जब भी सिर मुंडाते ही ओले पड़ने लगें, तो समझना कि अपशकुन होगा। पता नहीं होगा या नहीं होगा, लेकिन हमें यह गाड़ी बिल्कुल भी पसंद नहीं आई। दिल्ली से ही राज कुमार सुनेजा जी, सिरसा से डॉ. स्वप्निल गर्ग सर, रोहिणी से डॉ. विवेक पाठक और उनके बच्चे, गुड़गाँव से निशांत खुराना, कानपुर से शिखा गुप्ता इतनी सुबह हमारे यहाँ आ चुके थे। जैसे ही इन्होंने बस में कदम रखा, सबसे पहले सामना टायर से हुआ। और आगे बढ़े तो सीट-कवर के चीथड़ों के बीच सीट ढूँढ़ना मुश्किल हो गया। सीटों पर पड़ी चूहों की गोल-गोल टट्टियों को कुछ फूँक से और कुछ हाथ से साफ करना पड़ा। ड्राइवर अभी-अभी उठकर आया था और तकिये में से सबसे ज्यादा मैली शर्ट निकालकर लाया था।
और कुछ ही देर में शालिनी जी भी आने वाली हैं...
हे भगवान! आज रक्षा करना। पहली बार टेम्पो ट्रैवलर में किसी ग्रुप को ले जा रहे हैं, और पहली ही बार यह दिन देखना पड़ रहा है।
साढ़े सात बजे बस चली तो मैं सबसे पीछे वाली सीट पर मुँह छुपाए बैठा था और बाकी सब चुप बैठे थे। शास्त्री पार्क मेट्रो स्टेशन से ठेके वाले तिराहे तक पहुँचते-पहुँचते मुझे थोड़ी अक्ल आई... जिसके माध्यम से यह बस बुक की थी, उसे फोन मिलाया और जान-बूझकर जोर-जोर से बोलने लगा, ताकि बस की सभी सवारियाँ समझ जाएँ कि हमारी आगे की यात्रा के लिए दूसरी बस आ रही है।


दूसरी बस का मालिक भी अरविंद था और ड्राइवर भी वही था। नहा-धोकर ड्राइवर वाली पोशाक में आया था। बस तो अच्छी थी ही, ड्राइवर भी अच्छा था। इससे पहले कि हम भूल जाएँ और आगे बढ़ें, आप अरविंद का फोन नंबर कहीं नोट कर लीजिए... 9013647949.

किसानों की रैली थी और दिल्ली की ओर कूच कर रही थी। अभी वे लोग मेरठ बाईपास पर थे और इस वजह से बाइपास पर जाम लगा था। विवेक पाठक जी अपनी गाड़ी में आगे-आगे चल रहे थे, हमें सब बताते जा रहे थे। वे जाम में फँस गए, हम मेरठ शहर से निकल गए। शहर से निकले तो अपने पुराने दिन याद आ गए। वे सिटी बसें भी दिखीं, जिनमें महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग केबिन बने होते हैं। तीन सौ को तीन से मल्टीप्लाई कीजिए, इतने घंटे हम साल में इन्हीं बसों में बिताया करते थे। अखबारों में हर दूसरे दिन छपा करता था, जिनका अर्थ होता था कि आपको चाहे बैलगाड़ी से कम स्पीड पर यात्रा करनी हो या विमान से भी तेज स्पीड पर यात्रा करनी हो, आपको इन बसों में बैठना चाहिए। ये खाली सड़क पर बैलगाड़ी जैसी चलती थीं और बेगमपुल से घंटाघर की व्यस्त सड़क पर हवाई जहाज जैसी।

गणपति ढाबा... मुजफ्फरनगर। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि आपको यहाँ से निकलते समय इस ढाबे पर आलू के पराँठे अवश्य खाने चाहिए। इसके मालिक एक बाबाजी हैं, जो अपने फोटो को अपने ‘ट्रेडमार्क’ की तरह इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि इस ढाबे की सफलता से उत्साहित होकर कुछ और लोगों ने इसके अगल-बगल ‘गणपति ढाबे’ ही खोल लिए हैं। और एक कदम आगे बढ़ते हुए इस बाबाजी से मिलती-जुलती शक्ल वाले दूसरे बाबाजी का फोटो लगाकर भयंकर कम्पटीशन बना दिया है। अब इस बात के जवाब में पहले वाले बाबाजी ने अपने यहाँ क्या-क्या डायलोग लिखवा रखे हैं, आप केवल उन्हें पढ़ने भी यहाँ आ सकते हैं।
बाबाजी वाले गणपति ढाबे में चारों ओर से भगवानों की तस्वीरों से घिरे हुए, आरती-भजन के माहौल में, ‘जय श्री राम, जय शिव शंकर’ के बीच एक मुसलमान परिवार बैठा पूरी तल्लीनता से भोजन करने में जुटा था तो सिद्ध हो गया कि भारत में स्वाद पहली चीज है।

मुजफ्फरनगर से गागलहेडी शानदार सड़क, गागलहेडी से छुटमलपुर अच्छी सड़क, छुटमलपुर से बेहट अच्छी सड़क और बेहट से विकासनगर अच्छी सड़क... शाम पाँच बजे हम उदय झा जी के यहाँ थे। उन्होंने लाख मना करने के बावजूद भी हम सबके लिए अपने घर पर भोजन बनवाया था और साढ़े पाँच बजे हम उंगलियाँ चाटने में लगे पड़े थे। तारीफ के लिए शब्द नहीं सूझ रहे थे, फिर भी सबके मुँह से तारीफ पर तारीफ निकलती जा रही थी।
यहाँ हमें संजय जी भी मिल गए। उन्होंने कल गाजियाबाद से नंदादेवी एक्सप्रेस पकड़ी थी और आज दोपहर से यहीं विकासनगर में जमे थे। पता नहीं उन्होंने कितना भोजन किया होगा और कितनी बार किया होगा!... नसीब है जी अपना-अपना...

शालिनी जी पहले ही तय कर चुकी थीं कि वे आज चकराता रुकेंगी। वैसे तो चकराता से बीस किलोमीटर आगे लोखंडी में भी उनके लिए एक कमरा बुक था, लेकिन उनकी चिंता अपने चार साल के बेटे को लेकर थी। अगर किसी वजह से बेटे की तबियत खराब हो गई, तो क्या होगा? अच्छा अस्पताल चकराता में मौजूद है। इसलिए वे आज चकराता रुके और कल सुबह लोखंडी आ जाएंगे।
लोखंडी में हिमालयन व्यू होटल के मालिक रोहन राणा ने भोजन तैयार कर रखा था। केवल हमारे जाने भर की देर थी। वह यहीं का रहने वाला है और समुद्र तल से 2500 मीटर की ऊँचाई पर स्थित इस ‘रिज’ की बेस्ट लोकेशन पर उसने यह होटल बनाया है। सामने किन्नौर हिमालय की चोटियाँ दिखती हैं और पीछे बहुत दूर तक मध्य हिमालय की पहाड़ियाँ जाती दिखती हैं।
अगले दिन सुबह साफ मौसम था। मैंने रोहन से पूछा - “भाई जी, वे कौन-सी चोटियाँ हैं?”
और रोहन आपको हमेशा हँसता हुआ ही मिलेगा। हमेशा हँसता ही रहता है। सोते-सोते भी हँसता रहता होगा।
“पता नहीं जी।”
“अबे, तुम्हारे यहाँ लोग आते होंगे और पूछते भी होंगे, तो क्या बताते हो?”
“कभी तो हम कुछ भी बता देते हैं और कभी कुछ भी नहीं बताते।”
मैंने मोबाइल निकाला, गूगल मैप खोला और पर्याप्त जूम-आउट कर दिया। “ये देखो, यहाँ पर हम खड़े हैं। उधर सूरज निकला है यानी पूर्व दिशा उधर है। मोबाइल को मैं उत्तर दिशा में सेट कर लेता हूँ। उस दिशा में वे बर्फीली चोटियाँ दिख रही हैं। मोबाइल में भी उसी दिशा में देखो। यानी वह किन्नौर है। मतलब कि वे जो चोटियाँ हैं, सभी किन्नौर की चोटियाँ हैं। उनमें मुख्य किन्नर कैलाश भी दिख रहा होगा, लेकिन हमें पहचान नहीं है। अब थोड़ा और बाएँ देखो। एक और चोटी समूह दिख रहा है। नक्शे में देखो, तो यह चोटी-समूह रामपुर के उस तरफ है। ये देखो, यह रहा रामपुर। है ना? रामपुर के उस तरफ ही है ना? तो ये श्रीखंड महादेव के आसपास की चोटियाँ हैं। लेकिन ये सभी चोटियाँ हमसे सीधे 100 किलोमीटर से भी ज्यादा दूर हैं, इसलिए अच्छी तरह नहीं दिख रहीं। अगर मौसम पूरा साफ होता और अच्छे जूम का कैमरा होता, तो श्रीखंड महादेव भी दिख जाता। मैं उसे पहचान जाता।”

मोइला डांडा
30 सितंबर 2018
इसी साल जून में जब हम और सुमित यहाँ आए थे, तो यहाँ की सुंदरता देखकर अभिभूत हो गए थे। और यह मैदानों से भी बहुत नजदीक है। कालसी से पहाड़ शुरू होते हैं। कालसी से लोखंडी केवल 60 किलोमीटर है। आपको केवल 60 किलोमीटर पहाड़ी रास्ते पर चलना है और आप 2500 मीटर पर स्थित लोखंडी में होंगे। और 3-4 किलोमीटर आगे चलेंगे, डेढ़-दो किलोमीटर पैदल चलेंगे, तो आप 2700 मीटर की ऊँचाई पर मोइला बुग्याल में होंगे। सर्दियों में बर्फ भी पड़ती है।
इसलिए तय कर लिया था कि यहाँ तो अपने मित्रों को लाएँगे। और आज हमारे कई मित्र यहाँ थे। चकराता से शालिनी जी भी आ चुकी थीं।
रोहन को हर काम अच्छा आता है, बस आलू के पराँठे बनाने नहीं आते। कतई बनाने नहीं आते। हमें उसके साथ रसोई में लगना पड़ा, तब दो-चार ढंग के पराँठे निकले। और इसका खामियाजा उसे इस तरह भुगतना पड़ा - “रोहन भाई जी, आप हम सबके लिए लंच पैक करके मोइला टॉप पर लेकर आओगे।”
“जरूर सर, जरूर ले आऊँगा।”

तीन किलोमीटर तक गाड़ी चली जाती है। जंगल वालों का एक रेस्ट हाउस है। फिर डेढ़-दो किलोमीटर पैदल चढ़ाई भरा रास्ता है। विवेक पाठक जी ने चश्मे के अंदर से ही बिना कुछ बोले पूछा - “हम चढ़ जाएँगे क्या?”
मैंने भी मुंडी हिलाकर बिना बोले कह दिया - “हाँ जी, चढ़ जाएँगे।”
और सब के सब लाइन बनाकर मोइला की ओर चल दिए। सबसे पीछे रह गए शालिनी जी के पति नरेंद्र और उनका चार साल का बच्चा और मैं। बच्चे ने चलने से मना कर दिया। शालिनी जी तब तक एक मोड पार कर चुकी थीं और नजरों से ओझल हो चुकी थीं। वन विभाग के एक कर्मचारी को बिना मोलभाव किए 500 रुपये में बच्चे को कंधे पर बैठाकर ले चलने को राजी किया, तो बच्चे ने उसके साथ भी जाने से मना कर दिया। और जब तक हम सब उसे समझाते, उसने होटल जाने की जिद करते हुए रोना शुरू कर दिया।
जब सारी कोशिशें नाकाम हो गईं, तो शालिनी जी को वापस बुलाने का निर्णय लेना पड़ा। अगर उनके आने पर बच्चा मान जाए, तो मोइला बुग्याल चलेंगे; अन्यथा उन्हें वापस चकराता जाना पड़ेगा। मैंने दौड़ लगा दी। तकरीबन आधा किलोमीटर आगे सभी साथियों के साथ धीरे-धीरे आगे चलते हुई वे मिल गईं। मेरे जाते ही उन्होंने पूछा - “कितना और बाकी है?”
“वन थर्ड आ गए।”
“क्या! मैंने वन-थर्ड रास्ता कवर कर लिया! केवल टू-थर्ड ही बचा है?”
“हाँ जी। और आगे तो इससे भी आसान है।”
“तब तो मैं आसानी से कवर कर लूँगी।”
“लेकिन एक समस्या है। बच्चे ने आने से मना कर दिया है और वह आपको बुला रहा है।”
सुनते ही वे वापस मुड़ ली, लेकिन उनके चेहरे के हाव-भाव से जाहिर था मानों वे कह रही हों - “क्या इतना नजदीक आकर वापस जाना पड़ेगा?”

बहुत समझाया, बहुत समझाया, बहुत ही ज्यादा समझाया; लेकिन बच्चे ने होटल चलने की अपनी जिद नहीं छोड़ी। आखिरकार उन्हें वापस जाना पड़ा।

तो यह कहने की आवश्यकता नहीं कि मोइला बुग्याल में सभी ने अपने-अपने तरीके से समय बिताया। मौसम ने भी साथ दिया। अक्सर दोपहर बाद मौसम खराब हो जाया करता है, लेकिन आज ऐसा नहीं हुआ।
और तीन बजे जब रोहन का फोन आया कि लंच ऊपर ही लेकर आऊँ या नीचे आ रहे हो, तो सभी ने नीचे की ओर दौड़ लगा दी। भयंकर भूख लगी थी। देवदार के जंगल में जमीन पर बैठकर भोजन करने का आनंद वाकई निराला था।

डॉक्टर विवेक पाठक जी कैलोरी का बड़ा हिसाब रखते हैं। अगर एक कैलोरी भी ज्यादा हो गई, तो वे मोटे होने लगते हैं, हदय को पंपिंग करने में समस्या होने लगती है, फेफड़े फड़फड़ाने लगते हैं और पैर इस एक्स्ट्रा कैलोरी को उठाने से मना कर देते हैं। और अगर एक कैलोरी कम रह जाती है, तो इसका उल्टा होने लगता है। इसलिए उन्हें बैलेंस बनाकर रखना पड़ता है। आज अप्रत्याशित रूप से बुग्याल तक पैदल जाने में और वापस लौटने में उनकी हजारों कैलोरी बर्न हो गई। इसकी भरपाई तो पता नहीं कब तक होगी, लेकिन शरीर का मामला बिगड़ जरूर गया।
“कत्तई नहीं।” विवेक पाठक जी अचानक बोले।
“क्या कत्तई नहीं?”
“पैदल तो कत्तई नहीं चलना। यह तो बहुत मुश्किल है। बुग्याल बेहद खूबसूरत था, लेकिन चढ़ाई बहुत हार्ड थी। चढ़ते-चढ़ते हार्ट-बीट इतनी बढ़ गई थी कि हार्ट जरूर डैमेज हो गया होगा। दिल्ली जाकर इसकी सर्विस और ओवरहॉलिंग करानी पड़ेगी।”
मैंने उनके बारह साल के लड़के से पूछा - “हाँ भाई, तुम्हें कैसा लगा?”
“पापा सही कह रहे हैं। चढ़ाई बहुत ज्यादा थी।”
“अबे, तू भी अपने पापा पर ही गया है। बड़ा होकर क्या बनेगा?”
“डॉक्टर बनूँगा।”
“ना, डॉक्टर मत बनना। मैकेनिकल इंजीनियर बनना।”
बाद में अकेले में इनके ड्राइवर से पूछा - “भाई, एक बात बता। तू पाठक जी के यहाँ कितने दिनों से काम कर रहा है?”
“कई साल हो गए। दस-बारह से ऊपर ही हो गए।”
“इनका लड़का रोजाना कितना पैदल चलता है?”
“हा हा हा... पैदल!!!... यह क्या होता है?”
“अबे, मजाक नहीं।”
“एक कदम भी नहीं। एक कदम भी पैदल नहीं चलता। और न ही ये लोग इसे पैदल चलने को प्रेरित करते हैं। आज आपने इन्हें ऊपर चढ़ा दिया, और वे चले भी गए, वो बहुत बड़ी... बहुत ही बड़ी बात है।”

“तो पाठक सर, पैदल चला कीजिए और अपने बेटे को भी पैदल चलने की आदत डालिए।”
“अच्छा, हमें पैदल चलने को कह रहे हो? तुम कितना चलते हो?”
“हाँ, हाँ, ठीक हैं, ठीक है।”




विकासनगर में उदय झा जी के यहाँ हमारी पूरी पाल्टी ग्रुप फोटो खिंचवाने को बमुश्किल खड़ी हुई है... जैसे ही क्लिक की आवाज आई, सब के सब टूट पड़े...
और वे रहे झा साहब... पुरुषों में सबसे बाएँ...

लोखंडी होटल की खिड़की से सुबह-सुबह का नजारा


किन्नौर हिमालय की बर्फीली चोटियाँ

एक और ग्रुप फोटो... मोइला बुग्याल की पैदल यात्रा से जस्ट पहले

मोइला बुग्याल पर...





ये खड़े हैं राज कुमार सुनेजा जी... और गुफा से निकलते स्वप्निल गर्ग जी..

संजय एंड फैमिली...

सबसे दाहिने विवेक पाठक जी... फिर मोबाइल वाले राज कुमार सुनेजा जी, एकदम बीच में स्वप्निल गर्ग जी और... और पाठक जी का लड़का...



और उधर झाड़ियों से कौन निकल रहा है?... ओहो... श्री और श्रीमति निशांत खुराना हैं...











9 comments:

  1. बड़ा सुहावना सफर

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  2. शानदार एवं सुहाना विवरण

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  3. शानदार और जानदार; ऐसे सफर हमेशा ही बेहतरीन होते है

    मुज़फ्फरनगर के सिर्फ गणपति के आलू के परांठे ही नहीं और भी कुछ प्रसिद्ध है जैसे इन पराठों क साथ मक्खन और उसके साथ थोड़ा सा गुड़ मिल जाये बस

    भाई, मुज़फ्फरनगर का सिर्फ नाम ख़राब है नहीं तो ये शहर अपने आप में दिल दरिया है और अपने आप में एक इतिहास समेटे बैठा है

    खैर, आपकी आगे की यात्रा के विवरण का इंतज़ार रहेगा


    धन्यवाद

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  4. गणपति ढाबे के आसपास मुस्लिम बहुल गाँव है और जब उन्हें अच्छे वेज खाने की ज़रूरत होती हैं तो यही से पैक किया जाता है। वैसे भी बाबा का सभी आस पड़ोस के मुस्लिमो में अच्छी पैठ हैं।

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  5. होटल का फोटो डालना चाहिए था। हो सकता है अगले अंक में देखने को मिले।

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  6. सफर मजेदार रहा,,,,आपकी लेखनी कमल है नीरज भाई जी

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