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दैनिक जागरण... 25 नवंबर 2018







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हल्दीघाटी- जहां इतिहास जीवित है

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । हल्दीघाटी एक ऐसा नाम है जिसको सुनते ही इतिहास याद आ जाता है। हल्दीघाटी के बारे में हम तीसरी चौथी कक्षा से ही पढना शुरू कर देते हैं: रण बीच चौकडी भर-भर कर, चेतक बन गया निराला था। राणा प्रताप के घोडे से, पड गया हवा का पाला था। 18 अगस्त 2010 को जब मैं मेवाड (उदयपुर) गया तो मेरा पहला ठिकाना नाथद्वारा था। उसके बाद हल्दीघाटी। पता चला कि नाथद्वारा से कोई साधन नहीं मिलेगा सिवाय टम्पू के। एक टम्पू वाले से पूछा तो उसने बताया कि तीन सौ रुपये लूंगा आने-जाने के। हालांकि यहां से हल्दीघाटी लगभग पच्चीस किलोमीटर दूर है इसलिये तीन सौ रुपये मुझे ज्यादा नहीं लगे। फिर भी मैंने कहा कि यार पच्चीस किलोमीटर ही तो है, तीन सौ तो बहुत ज्यादा हैं। बोला कि पच्चीस किलोमीटर दूर तो हल्दीघाटी का जीरो माइल है, पूरी घाटी तो और भी कम से कम पांच किलोमीटर आगे तक है। चलो, ढाई सौ दे देना। ढाई सौ में दोनों राजी।

दिल्ली से सुन्दरनगर वाया ऊना

योजना थी कि 3 मई की सुबह निकल पडेंगे और दोपहर तक अम्बाला से आगे बनूड में अपनी एक रिश्तेदारी में रात रुकेंगे और अगले दिन सुन्दरनगर जायेंगे। लेकिन एक गडबड हो गई। नाइट ड्यूटी की थी, सुबह नींद आने लगी इसलिये नहीं निकल सके। मैं अक्सर नाइट ड्यूटी करके निकल पडता हूं लेकिन हमेशा थोडे ही ऐसा होता है। नींद तो आती ही है; कभी जल्दी, कभी देर से। इस बार जल्दी आ गई। फिर सोचा कि दोपहर तक सोकर फिर निकलेंगे और रात तक बनूड पहुंच जायेंगे। दोपहर को केशव का फोन आ गया। हम साथ में ही काम करते हैं। उसकी लडकी को देखने वाले आ रहे हैं। मिलने-जुलने का कार्यक्रम लडके वालों ने कहीं बाहर रखने को कहा था तो केशव को मैं याद आ गया। कई दिन पहले इस बारे में बात हो गई थी। अब जब फोन आया तो मैंने सोचा कि दो परिवार आयेंगे, तो कुछ खाने-पीने का भी कार्यक्रम बनेगा। इस मौके को क्यों छोडा जाये? दोपहर को भी निकलना नहीं हुआ।

जाटराम की पहली पुस्तक: लद्दाख में पैदल यात्राएं

पुस्तक प्रकाशन की योजना तो काफी पहले से बनती आ रही थी लेकिन कुछ न कुछ समस्या आ ही जाती थी। सबसे बडी समस्या आती थी पैसों की। मैंने कई लेखकों से सुना था कि पुस्तक प्रकाशन में लगभग 25000 रुपये तक खर्च हो जाते हैं और अगर कोई नया-नवेला है यानी पहली पुस्तक प्रकाशित करा रहा है तो प्रकाशक उसे कुछ भी रॉयल्टी नहीं देते। मैंने कईयों से पूछा कि अगर ऐसा है तो आपने क्यों छपवाई? तो उत्तर मिलता कि केवल इस तसल्ली के लिये कि हमारी भी एक पुस्तक है। फिर दिसम्बर 2015 में इस बारे में नई चीज पता चली- सेल्फ पब्लिकेशन। इसके बारे में और खोजबीन की तो पता चला कि यहां पुस्तक प्रकाशित हो सकती है। इसमें पुस्तक प्रकाशन का सारा नियन्त्रण लेखक का होता है। कई कम्पनियों के बारे में पता चला। सभी के अलग-अलग रेट थे। सबसे सस्ते रेट थे एजूक्रियेशन के- 10000 रुपये। दो चैप्टर सैम्पल भेज दिये और अगले ही दिन उन्होंने एप्रूव कर दिया कि आप अच्छा लिखते हो, अब पूरी पुस्तक भेजो। मैंने इनका सबसे सस्ता प्लान लिया था। इसमें एडिटिंग शामिल नहीं थी।