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दैनिक जागरण... 25 नवंबर 2018







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डायरी के पन्ने- 30 (विवाह स्पेशल)

ध्यान दें: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं। 1 फरवरी: इस बार पहले ही सोच रखा था कि डायरी के पन्ने दिनांक-वार लिखने हैं। इसका कारण था कि पिछले दिनों मैं अपनी पिछली डायरियां पढ रहा था। अच्छा लग रहा था जब मैं वे पुराने दिनांक-वार पन्ने पढने लगा। तो आज सुबह नाइट ड्यूटी करके आया। नींद ऐसी आ रही थी कि बिना कुछ खाये-पीये सो गया। मैं अक्सर नाइट ड्यूटी से आकर बिना कुछ खाये-पीये सो जाता हूं, ज्यादातर तो चाय पीकर सोता हूं।। खाली पेट मुझे बहुत अच्छी नींद आती है। शाम चार बजे उठा। पिताजी उस समय सो रहे थे, धीरज लैपटॉप में करंट अफेयर्स को अपनी कापी में नोट कर रहा था। तभी बढई आ गया। अलमारी में कुछ समस्या थी और कुछ खिडकियों की जाली गलकर टूटने लगी थी। मच्छर सीजन दस्तक दे रहा है, खिडकियों पर जाली ठीकठाक रहे तो अच्छा। बढई के आने पर खटपट सुनकर पिताजी भी उठ गये। सात बजे बढई वापस चला गया। थोडा सा काम और बचा है, उसे कल निपटायेगा। इसके बाद धीरज बाजार गया और बाकी सामान के साथ कुछ जलेबियां भी ले आया। मैंने धीरज से कहा कि दूध के साथ जलेबी खायेंगे। पिताजी से कहा तो उन्होंने मना कर दिया। यह मना करना मुझे ब...

चूडधार की जानकारी व नक्शा

चूडधार की यात्रा कथा तो पढ ही ली होगी। ट्रेकिंग पर जाते हुए मैं जीपीएस से कुछ डाटा अपने पास नोट करता हुआ चलता हूं। यह अक्षांस, देशान्तर व ऊंचाई होती है ताकि बाद में इससे दूरी-ऊंचाई नक्शा बनाया जा सके। आज ज्यादा कुछ नहीं है, बस यही डाटा है। अक्षांस व देशान्तर पृथ्वी पर हमारी सटीक स्थिति बताते हैं। मैं हर दस-दस पन्द्रह-पन्द्रह मिनट बाद अपनी स्थिति नोट कर लेता था। अपने पास जीपीएस युक्त साधारण सा मोबाइल है जिसमें मैं अपना यात्रा-पथ रिकार्ड नहीं कर सकता। हर बार रुककर एक कागज पर यह सब नोट करना होता था। इससे पता नहीं चलता कि दो बिन्दुओं के बीच में कितनी दूरी तय की। बाद में गूगल मैप पर देखा तो उसने भी बताने से मना कर दिया। कहने लगा कि जहां सडक बनी है, केवल वहीं की दूरी बताऊंगा। अब गूगल मैप को कैसे समझाऊं कि सडक तो चूडधार के आसपास भी नहीं फटकती। हां, गूगल अर्थ बता सकता है लेकिन अपने नन्हे से लैपटॉप में यह कभी इंस्टाल नहीं हो पाया।

दिल्ली से सुन्दरनगर वाया ऊना

योजना थी कि 3 मई की सुबह निकल पडेंगे और दोपहर तक अम्बाला से आगे बनूड में अपनी एक रिश्तेदारी में रात रुकेंगे और अगले दिन सुन्दरनगर जायेंगे। लेकिन एक गडबड हो गई। नाइट ड्यूटी की थी, सुबह नींद आने लगी इसलिये नहीं निकल सके। मैं अक्सर नाइट ड्यूटी करके निकल पडता हूं लेकिन हमेशा थोडे ही ऐसा होता है। नींद तो आती ही है; कभी जल्दी, कभी देर से। इस बार जल्दी आ गई। फिर सोचा कि दोपहर तक सोकर फिर निकलेंगे और रात तक बनूड पहुंच जायेंगे। दोपहर को केशव का फोन आ गया। हम साथ में ही काम करते हैं। उसकी लडकी को देखने वाले आ रहे हैं। मिलने-जुलने का कार्यक्रम लडके वालों ने कहीं बाहर रखने को कहा था तो केशव को मैं याद आ गया। कई दिन पहले इस बारे में बात हो गई थी। अब जब फोन आया तो मैंने सोचा कि दो परिवार आयेंगे, तो कुछ खाने-पीने का भी कार्यक्रम बनेगा। इस मौके को क्यों छोडा जाये? दोपहर को भी निकलना नहीं हुआ।