Monday, November 19, 2018

अमृतसर वाघा बॉर्डर यात्रा (विमल बंसल)

मूलरूप से समालखा हरियाणा के रहने वाले और वर्तमान में चंडीगढ़ में रह रहे विमल बंसल जी ने अपना एक यात्रा वृत्तांत भेजा है... इसका पहला भाग (डलहौजी-खजियार यात्रा) उनकी फेसबुक वाल पर प्रकाशित हो चुका है, इसलिए हम उसे अपने ब्लॉग पर प्रकाशित नहीं कर सकते... तो आप आनंद लीजिए इस भाग का...

तो दोस्तों, अमृतसर यात्रा शुरू करने से पहले इस शहर के पुराने नाम, इतिहास और देखने योग्य स्थानों के बारे में बता दूं।
अमृतसर का पुराना नाम रामदास नगर था जो कि सिखों के गुरु रामदास के नाम पर था, जिन्होंने सबसे पहले 1577 में 500 बीघा जमीन में गुरुद्वारे की नीव रखी थी। बाद में गुरु रामदास ने ही इसका नाम बदलकर अमृतसर रखा। यह नाम किसलिए बदला, इसके बारे में भी एक कथा प्रचलित है कि यही वो धरती है, जहां पर ऋषि वाल्मीकि जी ने रामायण की रचना की थी और यहीं पर माता सीता ने लव को जन्म दिया था। एक दिन माता सीता जब नहाने के लिये गईं तो लव को ऋषि वाल्मिकी जी के पास छोड़ गईं। बालक लव खेलता-खेलता ना जाने कहां चला गया। जब ऋषि वाल्मीकि को काफी देर तक खोजने पर भी लव नही मिला तो उन्होंने सोचा कि अब सीता को क्या जवाब दूंगा। तब उन्होंने कुशा नामक घास के तिनको में प्राण डालकर कुश को प्रगट किया था। तो दोस्तों, कुश का जन्म माता सीता की कोख से नही बल्कि ऋषि वाल्मीकि के वरदान से हुआ था। घास को कुशा भी कहा जाता है इसीलिए माता सीता के दूसरे पुत्र का नाम कुश रखा। कहते हैं कि अमृतसर की स्थापना भगवान वाल्मीकि के अमृत से हुई है। जब पुरुषोत्तम श्री राम जी ने अश्वमेध यज्ञ के लिये घोड़ा छोड़ा था तो उसको लव कुश ने पकड़ लिया था। उसके बाद राजा राम की सेना और लव कुश के मध्य युद्ध हुआ जिसमें लव कुश ने राम की सेना को मौत के घाट उतार दिया। बाद में जब खुद श्रीराम युद्ध करने आये तो खुद महाकवि वाल्मीकि जी ने आकर भगवान राम और लव कुश के मध्य युद्ध होने से रोका। तब श्री राम की याचना पर मरे हुये सैनिकों को जीवित करने के लिये वाल्मीकि जी ने वहां पर अमृत की वर्षा की और प्रभु श्री राम की समस्त सेना को जीवित कर दिया। बाद में श्री राम की सेना के जीवित होने के बाद महर्षि वाल्मीकि ने उस अमृत को वहीं पर दबा दिया। जब सिखों के गुरु रामदास जी को यह बात पता चली तो उन्होंने इस शहर का नाम रामदास नगर से बदलकर अमृतसर कर दिया।
अगर किसी भी भाई को मेरी दी गई जानकारी से आपत्ति हो या इसमें दी गई जानकारी में कुछ भी झूठ लगता हो, तो सभी को बताना चाहता हूं कि ये सब जानकारी google से और अमृतसर की लोकल पब्लिक से ली गई है। मैं इसकी सच्चाई पर कोई दावा नही करता। आप ये सब जानकारी google पर check कर सकते हैं।
आज का अमृतसर शहर काफी बड़ा हो चुका है, लेकिन 1947 से पहले ये शहर चारों तरफ से 12 दरवाजों से घिरा हुआ था और उसी के अन्दर सारा अमृतसर बसा हुआ था। उन दरवाजों के नाम इस प्रकार हैं:
1. हाल गेट
2. हाथी गेट
3. लौहगढ़ गेट
4. हकीमा गेट
5. भगतावाला गेट
6. गढ़वाली गेट
7. चट्टी विंड गेट
8. सुल्तानविंड गेट
9. शेरवाला गेट
10. मानसिंह गेट
11. लाहौरी गेट
12. खजाना गेट
देखने योग्य स्थान अमृतसर में:
1. स्वर्ण मन्दिर (golden temple)
2. जलियांवाला बाग
3. वाघा बॉर्डर
4. दुर्गयाणा temple
5. गोबिंदगढ़ किला
6. model town में शिवालय temple
7. रामतीर्थ (वाल्मीकि temple)
8. साडा पिण्ड वाघा बॉर्डर के रास्ते में
9. सबसे स्पेशल वाघा बॉर्डर तक डबल डेकर बस की सवारी, जिसकी टिकट 250 रुपये है।

तो दोस्तों, अब अपनी अमृतसर यात्रा शुरु करते है:
पिछले भाग में आपने पढ़ा कि रात को डलहौज़ी में खाना खाने के बाद मैं 10 बजे तक सो गया, क्योंकि सुबह 5 बजे अमृतसर की बस पकडनी थी। तो दोस्तों, सुबह मैं 10-11-2018 को 4 बजे ही उठ गया और नित्यकर्म से निवृत्त होकर 5 बजे बस अड्डे पहुंच गया, लेकिन यहां आकर पता लगा कि बस चलने में अभी आधा घंटा बाकी है, तो इतना मैंने वहीं एक होटल में 2 आलू के परांठे और 1 कप चाय के लिये बोल दिया। वास्तव में आलू के परांठे बड़े ही स्वादिष्ट थे और मेरा सबसे पसंदीदा खाना आलू के परांठे ही है इसीलिए खा-खा के खुद भी आलू जैसा हो गया हूं। लेकिन क्या करूं, आलू के परांठे देखते ही मुँह मे पानी आ जाता है और मैं इन्हें खाये बिना नही रह पाता। तो मैंने 2 पराठे और चाय के 70 रुपये दिये और बस में बैठ गया जिसने मुझे 12 बजे अमृतसर बस अड्डे उतार दिया। यहां से मैं अपने होटल hotel sallow international के लिये चल दिया जोकि बस अड्डे के सामने ही है। इसका कार्ड मुझे मेरे डलहौज़ी वाले दोस्त ने दिया था। इसका किराया रूम का 600 और single bed का 300 रुपये है और इसमें ज्यादातर विदेशी रुकते हैं। इस hotel के mobile no 98889-80469, 8427202611 हैं। इसको आप make my trip और oyo app से भी बुक कर सकते हैं। इतने सस्ते में आलीशान hotel में रुककर मजा आ गया।
Hotel से ठीक 12:30 बजे मैं जलियांवाला बाग के लिये चल दिया जोकि बस अड्डे से मात्र 1 km की दूरी पर है और इसी के साथ golden temple(स्वर्ण मंदिर) है।
जलियांवाला बाग से 300 मीटर पहले partision museum है जिसकी 10 रुपये की टिकट है। इस museum के अंदर 1947 विभाजन की दर्दनाक तस्वीरें और उस टाईम की दर्दनाक बातें बताते स्तंभ पर बने लेख हैं, जिसको देखकर आंखों में पानी आये बिना नही रहता। आप कभी भी अमृतसर जाओ तो इसको जरूर देखना। इसके बाद मैं जलियांवाला बाग गया। वहां पर अब भी उस कुएं और दीवारों पर जनरल डायर की गोलियों के निशान हैं, जिसने उसे 13 अप्रैल 1919 को निहत्थे भारतीय आन्दोलनकारियों पर चलवाया था। यहां पर पहले कोई बाग नही था, लेकिन जब 1919 में ये हत्याकांड हुआ तब all india congress की मीटिंग में फैसला लेकर और आम जनता से चन्दा एकत्रित कर इस भूमि को इसके मालिकों से 5,65,000 में खरीदा गया।
जब मैं जलियांवाला बाग देखकर बाहर निकला तो वाघा बॉर्डर के लिये taxi वाले आवाज लगा रहे थे जिसमे auto से जाने पर किराया 150 रुपये प्रति सवारी और कार से 250 रुपये था। मैने कार बुक की। वह ठीक 2:15 पर गाड़ी लेकर चल पड़ा। सबसे पहले वह हमें दुरगियाणा temple ले गया, जोकि लौहगढ़ गेट के पास है। मन्दिर काफी हद तक स्वर्ण मंदिर की तरह बना हुआ है, यह 16वीं शताब्दी में बना था, लेकिन इसका मौजूदा स्वरूप 21वीं शताब्दी में बनकर तैयार हुआ, जिसका उद्घाटन खुद राजनेता पण्डित मोहन मालवीय ने किया था। इस मंदिर को बनाने के लिये ज्यादातर संगमरमर का प्रयोग हुआ है और यह मंदिर माता दुर्गा को समर्पित है। इसके बाद वह हमें Gobindgarh किले में ले गया। इस किले को देखने की टिकट 290 रुपये थी जिसमें पूरा किला घूम सकते हैं। और इसमें 2 show दिखाये जाते हैं, जिनमें पहले में इस किले की सारी जानकारी दिखाई जाती है कि ये कब बना, कैसे बना, किसने बनवाया और दूसरा दिल्ली वाले अक्षरधाम की तरह lazer light show दीवारों पर दिखाया जाता है, जिसमें कैसे जनरल डायर ने जलियांवाला बाग में बेकसूर लोगों पर गोलियां चलवाई थी। यह सब देखने में ऐसा लगता है जैसे सब कुछ अपनी आंखो के सामने हुआ हो ये हत्याकांड। इसके अलावा इसमें पंजाब का लोकनृत्य भी दिखाया जाता है। इसके अन्दर 1 मार्किट भी है। ये किला मैंने नही देखा, क्योंकि इसमें जनरल डायर वाले show का time 7:30 बजे रात में था और हमें वाघा बॉर्डर भी जाना था, इसीलिए इस किले को अगली अमृतसर यात्रा में देखा जायेगा। ये किला 1760 मे गुजर किला के नाम से जाना जाता था और इसका निर्माण गुजर सिंह भंगी ने ईंट और चूने से करवाया था। इसके दो गेट हैं। मुख्य द्वार का नाम हरि सिंह नलवा के नाम पर नलवा गेट है और दूसरे गेट का नाम जो किले के back side मे है का नाम खूनी द्वार है और इसके पास से ही एक सुरंग लाहौर जाती थी जो कि 42 km लम्बी थी। बाद मे महाराजा रणजीत सिंह ने 1805 में इस किले को अपने कब्जे में लेकर इसका पुन: निर्माण करवाया और इसका नाम बदलकर गोबिंदगढ़ रखा।
इसके बाद गाड़ी वाला हमें Model Town में स्थित वैष्णोंदेवी temple ले गया। इस मंदिर में कटरा वैष्णोंदेवी की तरह गर्भजून गुफा बनाई गई है जिसको कुछ दूर तक लेटकर पार करना पड़ता है। फिर पानी में होकर गुफा से बाहर निकलते हैं। इस मंदिर में लगभग सभी प्रसिद्ध मंदिरों के स्थानों की मूर्ति लगी हुई है। इस मंदिर के दर्शन करने में लगभग 50 मिनट का समय लगा।
इसके बाद वह हमें वाघा बॉर्डर ले गया। यहां पर उसने बताया कि अगर आपके पास power bank या और कुछ भी सामान है तो यहीं गाड़ी में रख दो क्योंकि stadium के अन्दर केवल पर्स और मोबाइल ही लेकर जा सकते हैं। इसके बाद हम stadium के अन्दर चले गये। यहां पर 60000 लोगों के बैठने की जगह है, लेकिन कम से कम 70000 के करीब पब्लिक आयी हुई थी। यहां से सामने ही पाकिस्तान का गेट है, जिस पर पाकिस्तान के संस्थापक जिन्ना की फोटो लगी हुई है और लाहौर यहां से सिर्फ 22 km की दूरी पर है। सबसे पहले कुछ स्कूली बच्चों ने अपने करतब दिखाये। उसके बाद BSF के जवानों ने और पाकिस्तान साइड से उनके जवानों ने देशभक्ति गानों के बीच अपनी परेड शुरू की, जो कि 5:30 बजे खत्म हुई। मेरी घुमक्कड़ी जीवन की सबसे अच्छी यात्रा वाघा बॉर्डर की परेड देखनी रही। यहां पर एक बात और बताना चाहूंगा कि जहां भारतीय stadium में 60000 लोगों के बैठने की सुविधा है, वहीं पाकिस्तान साइड का stadium बहुत ही छोटा है। उसमें लगभग 30 से 35 हजार लोगों के बैठने की ही सुविधा है। एक बात और, जहां भारतीय पब्लिक रंग बिरंगे कपडे पहनकर आयी थी, वहीं पाकिस्तान की पब्लिक ज्यादातर कुर्ता पायजामा और टोपी पहनकर आयी हुई थी।
इसके बाद गाड़ी वाला हमें साडा पिंड ले गया, जहां अन्दर जाने की टिकट 700 रुपये थी और इसमें पंजाबी खाना फ़्री था और म्यूज़िकल show देखना भी फ़्री था, लेकिन हममें से किसी ने भी इतनी महंगी टिकट होने की वजह से इसको नहीं देखा। इसके बाद उसने कहा कि आप सब रामतीर्थ देखने चलोगे। वही तीर्थ जहां पर लव कुश का जन्म हुआ था, लेकिन उसके लिये आपको प्रति सवारी 100 रुपये अलग से देने होंगे। मैने तो हां कर दी थी, लेकिन बाकी सवारी ने मना कर दिया। इसके बाद वह गाड़ी लेकर वापिस चल पडा और ठीक 8 बजे उसने हमें अमृतसर Golden Temple पर उतार दिया। इसके बाद मैं अपने होटल के लिये वापिस चल दिया, क्योंकि आज काफी घूम चुके थे। होटल में जाकर मैं अपने बिस्तर पर लेटा ही था कि कुछ forn country के लोग मेरे पास आकर english में आकर बात करने लगे। अब मुझे तो इतनी english आती नहीं, तो उनको अपनी तरफ से जितना भी हो सकता था, english में जवाब दिया, लेकिन जब पानी सिर से ऊपर हो गया तो उनको हिन्दी के कुछ ऐसे शब्द सिखाये कि जब वो उन शब्दों को आपस में एक दूसरे को बोल रहे थे तो मेरे साथ-साथ जो और लोग भी रुके हुए थे और साथ में होटल वाले भी जोर-जोर से हँसने लगे और अब वो अंग्रेज मेरी तरफ ऐसे देख रहे थे कि पता नही मैने ऐसा क्या सिखा दिया कि सब उन पर हँस रहे है। अच्छा है, अब पता चला? और बोलो मेरे सामने english. इस सब मजाक के बाद मैंने खाने की थाली मंगवायी - 150 रुपये की, जिसमें 2 पनीर की सब्ज़ी, 1दाल मखनी, चावल, रायता, 2 रोटी और साथ में पापड़ था। खाना खाकर मैं बाहर घूमने निकल गया और 1 सिगरेट पीकर आकर सो गया।
अगले दिन सुबह 6 बजे उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर मैं रानी बाग स्थित प्राचीन शिवालय देखने चला गया जो कि अमृतसर बस अड्डे से मात्र 2 km की दूरी पर है। यह मंदिर करीब 250 साल पुराना है। इसको शेखपुरा के महाराजा बलदेव सिंह ने बनवाया था। एक बार राजा को कुष्ठ रोग हो गया था। कई वैद्यों से इलाज़ करवाने के बाद भी जब राजा की हालत नही सुधरी तो पंडितों ने उन्हे शिवलिंग की स्थापना की सलाह दी। तब राजा ने विधि विधान से इस जगह पर शिवलिंग की स्थापना की और 1 महीने तक यज्ञ करवाया और भंडारा लगाया। राजा की रानी चन्द्रकान्ता रोज इस शिवलिंग की पूजा करने आती थी। बाद में राजा ने रानी के नाम पर इस मंदिर के आस-पास बाग बनवाया, जिससे ये जगह रानी के बाग के नाम से प्रसिद्ध हो गई। यहां पर एक पीपल का वृक्ष भी है जो हजारों साल पुराना है। इस सिद्धेश्वर मंदिर का शिवलिंग साल में 2 बार अपना रंग बदलता है। सर्दियों मे सफेद और गर्मी में गुलाबी हो जाता है।
इसके बाद मैं स्वर्ण मंदिर देखने चला गया। यहां मंदिर के बाहर मुख्य गेट के पास शानदार फव्वारे वाला जलाशय बना हुआ है। गेट के अन्दर जाने पर मंदिर परिसर में सरोवर बना हुआ है। यहां से मंदिर तक जाने के लिये काफी बड़ी लाईन लगी हुई थी। इसके बाद मैं भी लाईन में लग गया। मंदिर के दर्शन करने में मुझे लगभग 2 घंटे लगे। ये पूरा मंदिर सोने से बना हुआ है, इसीलिए इसे स्वर्ण मंदिर (Golden Temple) कहते हैं। ताजमहल के बाद सबसे ज्यादा लोग इसी मंदिर को देखने आते हैं। मंदिर में से हलवे का प्रसाद खाकर मैं वापिस अपने होटल की तरफ चल पड़ा। रास्ते में मार्किट से लगभग 2 हजार रुपये की खरीदारी की। जिसमें अपने लिये पंजाबी जूती, घर के लिये अमृतसर के बने हुए 10 तरह के पापड़, 5 तरह की गजक और बेटियों के लिये खिलौने आदि लिये। इसके बाद होटल में आकर 1 पनीर डोसे का ऑर्डर दिया, जिसका मूल्य 140 रुपये था। डोसा खाने के बाद मैंने कुछ देर आराम किया और ठीक 3 बजे होटल से checkout किया। बस अड्डे के बाहर से ही एक volvo ac बस चंडीगढ़ के लिये जा रही थी, जिसका किराया 610 रुपये था, लेकिन मैने कंडक्टर से बात करके सिर्फ 400 रुपये दिये। बस ने मुझे 7:30 बजे sec 43 चंडीगढ़ बस अड्डे पर उतार दिया। यहां से मैंने 120 रुपये में घर तक ola cab बुक की और ठीक 8 बजे मैं अपने घर पहुंच गया।।।
समाप्त The END






























1 comment: