Posts

Showing posts from March, 2015

कच्छ यात्रा का कुल खर्च

इस यात्रा का वृत्तान्त पढने के लिये यहां क्लिक करें । 12 जनवरी 2015 की सुबह दिल्ली से निकल पडा था। पहले दिन बाइक में 700 रुपये का पेट्रोल भरवाया। घर से खाकर चला था, दोपहर को नीमराना अशोक भाई के यहां खा लिया और शाम को पहुंच गया विधान के यहां। इस तरह इस दिन कोई खर्च नहीं हुआ। अब चर्चा करते हैं इस यात्रा के कुल खर्च की: 12 जनवरी: पेट्रोल (दिल्ली) 700 रुपये

कच्छ से दिल्ली वापस

Image
इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । अब बारी थी दिल्ली लौटने की। दिल्ली अभी भी 1000 किलोमीटर से ज्यादा थी और मेरे पास थे दो दिन। यानी प्रतिदिन 500 किलोमीटर के औसत से चलना पडेगा जोकि बाइक से कतई भी आसान नहीं है। उस पर भी आखिर के ढाई सौ किलोमीटर यानी जयपुर से आगे का रास्ता और ट्रैफिक जान निकाल देने वाला होगा। चलिये, देखते हैं क्या होगा? रापर से चला मैं सुबह साढे नौ बजे। पहली गलती। बल्कि पहली क्या... हमेशा की तरह आज भी गलती की कि इतनी देर से चला। सात बजे ही निकल जाना चाहिये था, अब तक सौ किलोमीटर दूर जा चुका होता। लेकिन रापर मुझसे भी सुस्त निकला। कोई दुकान खुली नहीं मिली, भूखे पेट ही निकलना पडा।

धोलावीरा- 2

Image
इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । पिछली बार आपको धोलावीरा के पुरातात्विक और ऐतिहासिक महत्व के बारे में बताया था, आज वहां की यात्रा करते हैं। यात्रा वृत्तान्त लिखते हैं। खास बात यह है कि धोलावीरा जाने का रास्ता भी कच्छ के सुन्दरतम रास्तों में से एक है। इसी वजह से कच्छ जाने वाला हर आदमी धोलावीरा की भी योजना बनाता है। भचाऊ में प्रभु आहिर ने बताया कि आप पहले एकल माता जाओ, वहां से दसेक किलोमीटर रन में चलना पडेगा और आप सीधे धोलावीरा पहुंच जाओगे। असल में धोलावीरा एक टापू पर स्थित है। इस टापू को खडीर बेट कहते हैं। इसके चारों तरफ समुद्र है जो बारिश के मौसम में भर जाता है और सर्दियां आते आते सूखने लगता है जैसा कि पूरे रन में होता है। गर्मियों में यह इतना सूख जाता है कि इस ‘समुद्र’ को आप गाडियों से भी पार कर सकते हैं। प्रभु ने कहा कि तुम एकल माता से सीधे रन में उतर जाना और सीधे चलते जाना। खडीर बेट आयेगा, तो वहां जल्दी ही आपको धोलावीरा वाली सडक मिल जायेगी जिससे आप धोलावीरा जा सकते हो।

धोलावीरा- सिन्धु घाटी सभ्यता का एक नगर

Image
इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । पहले धोलावीरा का थोडा सा परिचय दे देता हूं, फिर वहां घूमने चलेंगे। इतिहास की किताब में आपने पढा होगा- मैंने भी पढा है- कि कोई सिन्धु घाटी सभ्यता थी। इसका प्रमुख नगर हडप्पा था, इसलिये हडप्पा सभ्यता भी कहते हैं। मुझे याद है कि जब सातवीं-आठवीं में मास्टरजी इतिहास की किताब पढवाया करते थे तो कई सहपाठी हडप्पा शब्द को हडम्पा पढते थे। गौरतलब है कि हमारे यहां किसी महिला को नालायक कहने की बजाय हडम्पा कह देते हैं। खैर, हडप्पा के साथ एक और स्थान के बारे में हम पढते थे- वो है मोहनजोदडो। ये दोनों स्थान अब पाकिस्तान में हैं इसलिये हमारे लिये उतने सुलभ नहीं हैं। लेकिन कुछ स्थान ऐसे हैं जो उसी काल के हैं, उसी तरह के लोग वहां बसते थे, उसी तरह का आचरण था, वही नगर व्यवस्था थी और आज वे भारत में हैं। इनमें कुछ नाम हैं- धोलावीरा, कालीबंगा, लोथल और रोपड। रोपड तो आज का रूपनगर है जो पंजाब में है। स्थानीय लोग इसे अभी भी रोपड ही कहते हैं- रोप्पड। कालीबंगा राजस्थान के हनुमानगढ जिले में है जो पीलीबंगा रेलवे स्टेशन से कुछ ही दूर स्थित है। लोथल और धोलावीर

माण्डवी बीच पर सूर्यास्त

Image
इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । शाम साढे पांच बजे हम तीनों माण्डवी पहुंच गये। सुमित और गिरधर पहले ही काफी लेट हो चुके हैं, इसलिये उन्हें इन्दौर के लिये आज ही निकलना पडेगा जबकि मेरा इरादा आज यहीं माण्डवी में रुकने का है। कुछ देर बाद सूर्यास्त हो जायेगा, फिर अन्धेरा हो जायेगा, इसलिये माण्डवी मैं कल देखूंगा- ऐसा सोचा। सीधे समुद्र तट पर पहुंच गये। शहर में काफी भीड थी, लेकिन समुद्र तट अच्छा लगा। भूख लगी हो, आप कच्छ में हों और दाबेली न खायें, तो बेकार है। लेकिन हमने स्वयं को बेकार नहीं होने दिया। दबा के दाबेली खाईं।

यात्रा में आनन्द कैसे लें?

Image
वैसे तो आपको यात्राएं करने में आनन्द आता है, अच्छा लगता है, मन-मस्तिष्क तरोताजा हो जाता है लेकिन क्या वास्तव में ऐसा होता है? याद कीजिये जब आप पिछली बार कहीं गये थे, तो क्या सोचकर गये थे और वहां जाकर क्या वो सब मिला? सोचिये एक बार। बडी सिरदर्दी का काम होता है। पहले तो घर पर इतनी योजनाएं बनाओ, इतना सबकुछ सोचो; फिर वहां जाकर भी सारा समय योजनाएं बनाने में चला जाता है। बस, यही काम रह जाता है हमें- योजनाएं बनाते रहो, प्लानिंग करते रहो। नौकरी में भले ही मैनेजर न बन पायें हों, लेकिन यहां हम हमेशा मैनेजर होते हैं।

पिंगलेश्वर महादेव और समुद्र तट

Image
इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । मुझे पिंगलेश्वर की कोई जानकारी नहीं थी। सुमित और गिरधर के पास एक नक्शा था जिसमें नलिया और कोठारा के बीच में कहीं से पिंगलेश्वर के लिये रास्ता जाता दिख रहा था। मोबाइल में गूगल मैप में दूरी देखी, मुख्य सडक से 16 किलोमीटर निकली। तय कर लिया कि पिंगलेश्वर भी जायेंगे। बाइक का फायदा। एक बजे नारायण सरोवर से चल पडे और सवा दो बजे तक 70 किलोमीटर दूर नलिया पहुंच गये। सडक की तो जितनी तारीफ की जाये, उतनी ही कम है। नलिया में कुछ समय पहले तक रेलवे स्टेशन हुआ करता था। उस जमाने में भुज से मीटर गेज की लाइन नलिया आती थी। गेज परिवर्तन के बाद भुज-नलिया लाइन को परिवर्तित नहीं किया गया और इसे बन्द कर दिया गया। अब यह लाइन पूरी तरह खण्डहर हो चुकी है और इस पर पडने वाले स्टेशन भी। उस समय तक नलिया भारत का सबसे पश्चिमी स्टेशन हुआ करता था। इसे देखने की मेरी बडी इच्छा थी लेकिन शानदार सडक और इस पर बाइक चलाने के आनन्द के आगे यह इच्छा दब गई। नलिया ‘फिर कभी’ पर चला गया।

कोटेश्वर और नारायण सरोवर

Image
इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 18 जनवरी 2015 लखपत से नारायण सरोवर की दूरी करीब 35 किलोमीटर है। किले से निकलते ही एक सडक तो बायें हाथ भुज चली जाती है और एक दाहिने वाली जाती है नारायण सरोवर। नारायण सरोवर से दो किलोमीटर आगे कोटेश्वर है। जैसा कि कई अन्य स्थानों पर भी कथा प्रचलित है कि रावण ने तपस्या करी, शिवजी प्रसन्न हुए और शिवलिंग के रूप में रावण के साथ लंका जाने लगे। लेकिन शर्त लगा दी कि अगर शिवलिंग को जमीन पर रख दिया तो फिर उठाये नहीं उठूंगा। ऐसा ही कोटेश्वर में हुआ। रावण को लघुशंका लगी और शिवजी यहीं पर विराजमान हो गये। अब वर्तमान में मानचित्र देखें तो सन्देह होता है कि रावण शिवजी को कैलाश से ला रहा था या पुरुषपुर से। कैलाश-लंका के बीच में कोटेश्वर दूर-दूर तक भी नहीं आता।

लखपत-2

Image
इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । कल यहां हमें डरा दिया गया था कि ये मत करना, वो मत करना, सीमावर्ती इलाका है, बीएसएफ का बहुत दबाव है; तो हम लखपत किले के अन्दर ज्यादा घूमते हुए डर रहे थे कि कहीं बेवजह की पूछताछ न होने लगे। लेकिन जब सेना के जवान गुरुद्वारे में आये, साथ बैठकर आलू काटे तो उन्होंने बडी काम की बातें बताईं। उन्होंने बताया कि आप पूरे किले में कहीं भी घूम सकते हो। उधर बीएसएफ की चौकी है, वहां भी जा सकते हो; कोई दिक्कत नहीं है। हमारा हौंसला बढा और हमने गुरुद्वारे से निकलकर सबसे पहले उस चौकी पर ही जाना उचित समझा। मोटरसाइकिलें स्टार्ट कीं और लखपत के खण्डहरों से होते हुए सीधे बीएसएफ की चौकी के नीचे जा रुके। किलों की दीवारों पर जगह जगह काफी बडी जगह होती है जहां से चारों तरफ की रखवाली की जा सके। पता नहीं इसे क्या कहते हैं, शायद परकोटा कहते हैं। ऐसी ही एक जगह पर बीएसएफ की चौकी है। सीढियों से ऊपर चढे तो वहां दो जवान थे। एक जाट जींद का और दूसरा मराठा बुलढाणा का- जाट-मराठा संगम। हमसे पहले वहां एक घुमक्कड परिवार भी था। उनके जाने के बाद हमने जवानों से जी भरकर बा

लखपत में सूर्यास्त और गुरुद्वारा

Image
इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 17 जनवरी 2015 साढे तीन बजे हम थान मठ से निकल गये। अब जाना था हमें लखपत। यह भारत के सबसे पश्चिमी कुछ गांवों में से एक है और दुनिया का सर्वप्रथम गुरुद्वारा भी यहीं है। पश्चिमी होने के कारण यहां का सूर्यास्त देखना बनता था। इसलिये हमें छह बजे से पहले लखपत पहुंच जाना था। शीघ्र ही हम भुज-लखपत मुख्य सडक पर थे। खाली चौडी सडक पर जब हम 70 की रफ्तार से बढे जा रहे थे, तो हमें एक ऐसी चीज दिखी कि आपातकालीन ब्रेक लगाने पडे। यह था- कर्करेखा यहां से गुजरती है। मैंने पहले भी कहा था कि अपनी इस यात्रा में मुझे कई बार कर्करेखा पार करनी पडी। हिम्मतनगर-अहमदाबाद के बीच, भुज-खावडा के बीच, खावडा-नखत्राणा के बीच, नखत्राणा-लखपत के बीच, लखपत-नलिया के बीच और भचाऊ-रापर के बीच। लेकिन सूचना-पट्ट सिर्फ यहीं पर दिखा। सडक पर सफेद रेखा भी खिंची थी कि यह है कर्करेखा।

थान मठ, कच्छ

Image
इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । फॉसिल पार्क से डेढ-दो किलोमीटर आगे थान मठ है। एक धर्मनाथ नाम के योगी थे जिन्होंने बारह वर्ष तक सिर के बल खडे होकर तपस्या की थी। कहते हैं कि उनकी तपस्या से भगवान प्रसन्न हुए और वर मांगने को कहा। उन्होंने वर तो मांगा नहीं, बल्कि अ-वर मांग लिया- मैं सीधा होकर जहां भी देखूं, वो स्थान बंजर हो जाये। भगवान ने कहा तथास्तु और कच्छ का एक बडा इलाका बंजर हो गया। यह मठ एक पहाडी के नीचे बना हुआ है। इस पहाडी का नाम है धीणोधार पहाडी। यह एक ज्वालामुखी था जो अब सुप्त हो चुका है। सैटेलाइट से देखने पर इसकी चोटी पर ज्वालामुखी जैसा मुख भी दिखता है हालांकि लाखों साल बीत जाने के कारण काफी टूट-फूट हो चुकी है। ऊपर पहाडी पर भी एक मन्दिर बना है जहां केवल पैदल ही जाया जा सकता है। एक रास्ता तो यहां मठ से ही है जो लम्बा है। इसके अलावा दूसरा रास्ता पहाडी के दूसरी तरफ से है जो छोटा और सुविधाजनक है। समयाभाव के कारण हम वहां नहीं जा पाये। कच्छ आने का दूसरा बहाना मिल गया।

डायरी के पन्ने- 30 (विवाह स्पेशल)

Image
ध्यान दें: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं। 1 फरवरी: इस बार पहले ही सोच रखा था कि डायरी के पन्ने दिनांक-वार लिखने हैं। इसका कारण था कि पिछले दिनों मैं अपनी पिछली डायरियां पढ रहा था। अच्छा लग रहा था जब मैं वे पुराने दिनांक-वार पन्ने पढने लगा। तो आज सुबह नाइट ड्यूटी करके आया। नींद ऐसी आ रही थी कि बिना कुछ खाये-पीये सो गया। मैं अक्सर नाइट ड्यूटी से आकर बिना कुछ खाये-पीये सो जाता हूं, ज्यादातर तो चाय पीकर सोता हूं।। खाली पेट मुझे बहुत अच्छी नींद आती है। शाम चार बजे उठा। पिताजी उस समय सो रहे थे, धीरज लैपटॉप में करंट अफेयर्स को अपनी कापी में नोट कर रहा था। तभी बढई आ गया। अलमारी में कुछ समस्या थी और कुछ खिडकियों की जाली गलकर टूटने लगी थी। मच्छर सीजन दस्तक दे रहा है, खिडकियों पर जाली ठीकठाक रहे तो अच्छा। बढई के आने पर खटपट सुनकर पिताजी भी उठ गये। सात बजे बढई वापस चला गया। थोडा सा काम और बचा है, उसे कल निपटायेगा। इसके बाद धीरज बाजार गया और बाकी सामान के साथ कुछ जलेबियां भी ले आया। मैंने धीरज से कहा कि दूध के साथ जलेबी खायेंगे। पिताजी से कहा तो उन्होंने मना कर दिया। यह मना करना मुझे ब