Skip to main content

पराशर झील- जानकारी और नक्शा

पराशर झील हिमाचल प्रदेश के मण्डी जिले में समुद्र तल से करीब 2600 मीटर की ऊंचाई पर है। यहां जाने से कम से कम चार रास्ते हैं:

1. सडक मार्ग से: पराशर झील तक पक्की मोटर रोड बनी हुई है यानी अपनी गाडी से या टैक्सी से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। मण्डी के बस अड्डे से जब कुल्लू की तरफ चलते हैं तो हमारे बायें तरफ ब्यास नदी बहती है। मण्डी शहर से बाहर निकलने से पहले ब्यास पर एक पुल आता है। कुल्लू वाली सडक को छोडकर पुल पार करना पडता है। पुल पार करके यह रोड जोगिन्दर नगर होते हुए कांगडा चली जाती है। इसी कांगडा वाली रोड पर थोडा आगे बढें तो सीधे हाथ की ओर एक और सडक निकलती दिखाई देती है। यह कटौला होते हुए बजौरा चली जाती है और उसी मण्डी-कुल्लू मुख्य राजमार्ग में जा मिलती है। इस सडक पर मण्डी से कटौला तक बहुत सारी बसें भी चलती हैं।
कटौला से चार किलोमीटर आगे निकलने पर एक सडक दाहिने नीचे की ओर जाती दिखाई देती है। अब हमें मुख्य सडक छोडकर इस नीचे की ओर जाती सडक पर चल देना है। यहां से चार किलोमीटर चलने पर बागी गांव आता है। मण्डी से बागी तक गिनी चुनी बसें ही चलती हैं। बागी से यही सडक 18 किलोमीटर का सफर तय करके पराशर झील तक पहुंचती है। वैसे आखिर में गाडी से नीचे उतरकर करीब आधा किलोमीटर पैदल भी चलना पडता है।

2. बागी से पैदल रास्ता: मण्डी से बागी तक बसें भी चलती हैं। आगे जाने के लिये या तो टैक्सी करो या फिर पैदल जाओ। पैदल दूरी करीब 5 किलोमीटर है। और ये 5 किलोमीटर घने जंगल से होकर जाते हैं तथा बडी भयानक चढाई है। बागी की समुद्र तल से ऊंचाई 1730 मीटर है जबकि पराशर करीब 2600 मीटर। हम अपनी यात्रा में इस रास्ते से नीचे उतरे थे।

3. देवरी से पैदल रास्ता: देवरी जाने के लिये पहले पण्डोह जाना पडेगा। पण्डोह मण्डी से करीब 15-20 किलोमीटर आगे मनाली हाइवे पर स्थित है। पण्डोह में ब्यास नदी पर एक बांध भी है। पण्डोह कस्बे में घुसते ही ब्यास पर एक पतला सा लोहे का पुल है। इस पुल से एक बार में केवल एक ही गाडी निकल सकती है। पुल पार करके यह सडक शिवाबधार नामक गांव तक जाती है। पण्डोह से इसी सडक पर 6 किलोमीटर आगे एक तिराहा है। यहां से एक तीसरी टूटी-फूटी सडक 3 किलोमीटर दूर देवरी तक जाती है। पण्डोह से शिवाबधार तक दिन भर में दो-तीन बसें ही चलती हैं, शायद देवरी तक एक भी नहीं चलती हो या फिर हो सकता है कि शिवाबधार वाली बस ही छह किलोमीटर का आना-जाना कर लेती हो। हमने पण्डोह से ही एक टैक्सी कर ली थी- डेढ सौ रुपये लिये थे, तीन जने थे। देवरी से पैदल रास्ता शुरू हो जाता है। दूरी करीब 11 किलोमीटर है। अच्छी-खासी चढाई है। रास्ते में लहर और बांदल नामक दो छोटे छोटे गांव भी पडते हैं। रास्ते में जंगल नहीं के बराबर है, लोगों की आवाजाही लगी रहती है, रास्ता भटकने का डर नहीं है।

4. ज्वालापुर से पैदल रास्ता: मण्डी-कुल्लू के बीच में सुरंग पार करने के बाद ज्वालापुर गांव है। यहां से भी पराशर झील तक पहुंचा जा सकता है। इसके लिये पहले दुर्दांत चढाई चढकर 3000 मीटर की ऊंचाई पर तुंगा माता तक जाना होता है, वहां से फिर धीरे धीरे नीचे उतरते हुए पराशर झील तक। यह रास्ता मेरा देखा हुआ नहीं है लेकिन बताया जाता है कि रास्ता ठीक-ठाक बना हुआ है। इस रास्ते में जंगल भी है और कोई आदमजात नहीं मिलती। 

मुझे उम्मीद है कि एक पांचवा रास्ता भी है जो हणोगी माता से आता है। इस रास्ते के बारे में हमने कोई पूछताछ नहीं की, मेरा मात्र अन्दाजा ही है। 

ठहरने के लिये पराशर झील के पास निर्माण विभाग और जंगलात वालों के रेस्ट हाउस हैं। इसके अलावा मन्दिर की धर्मशाला भी है लेकिन धर्मशाला में ठहरने के लिये ब्राह्मण या क्षत्रिय ही होना चाहिये। अब बात मौसम की। सालभर में कभी भी जाया जा सकता है। हर मौसम में पराशर का रूप अलग होता है। सर्दियों में जनवरी-फरवरी में बर्फ भी पडती है।

यह नक्शा अपने साथ ले जाये गये जीपीएस युक्त मोबाइल से प्राप्त डाटा के आधार पर बनाया गया है। हमने यात्रा देवरी से शुरू की थी और बागी की तरफ नीचे उतरे थे। नक्शे को देखने पर पता चल रहा है कि देवरी के मुकाबले बागी की तरफ से ज्यादा तेज चढाई है। हालांकि देवरी के मुकाबले बागी पहुंचना ज्यादा आसान है क्योंकि मण्डी से बागी के लिये बसें चलती हैं।



पराशर झील ट्रैक
1. पराशर झील ट्रेकिंग- दिल्ली से पण्डोह
2. पराशर झील ट्रेकिंग- पण्डोह से लहर
3. पराशर झील ट्रेकिंग- लहर से झील तक
4. पराशर झील
5. पराशर झील ट्रेकिंग- झील से कुल्लू तक
6. सोलांग घाटी में बर्फबारी
7. पराशर झील- जानकारी और नक्शा

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

स्टेशन से बस अड्डा कितना दूर है?

आज बात करते हैं कि विभिन्न शहरों में रेलवे स्टेशन और मुख्य बस अड्डे आपस में कितना कितना दूर हैं? आने जाने के साधन कौन कौन से हैं? वगैरा वगैरा। शुरू करते हैं भारत की राजधानी से ही। दिल्ली:- दिल्ली में तीन मुख्य बस अड्डे हैं यानी ISBT- महाराणा प्रताप (कश्मीरी गेट), आनंद विहार और सराय काले खां। कश्मीरी गेट पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास है। आनंद विहार में रेलवे स्टेशन भी है लेकिन यहाँ पर एक्सप्रेस ट्रेनें नहीं रुकतीं। हालाँकि अब तो आनंद विहार रेलवे स्टेशन को टर्मिनल बनाया जा चुका है। मेट्रो भी पहुँच चुकी है। सराय काले खां बस अड्डे के बराबर में ही है हज़रत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन। गाजियाबाद: - रेलवे स्टेशन से बस अड्डा तीन चार किलोमीटर दूर है। ऑटो वाले पांच रूपये लेते हैं।

ट्रेन में बाइक कैसे बुक करें?

अक्सर हमें ट्रेनों में बाइक की बुकिंग करने की आवश्यकता पड़ती है। इस बार मुझे भी पड़ी तो कुछ जानकारियाँ इंटरनेट के माध्यम से जुटायीं। पता चला कि टंकी एकदम खाली होनी चाहिये और बाइक पैक होनी चाहिये - अंग्रेजी में ‘गनी बैग’ कहते हैं और हिंदी में टाट। तो तमाम तरह की परेशानियों के बाद आज आख़िरकार मैं भी अपनी बाइक ट्रेन में बुक करने में सफल रहा। अपना अनुभव और जानकारी आपको भी शेयर कर रहा हूँ। हमारे सामने मुख्य परेशानी यही होती है कि हमें चीजों की जानकारी नहीं होती। ट्रेनों में दो तरह से बाइक बुक की जा सकती है: लगेज के तौर पर और पार्सल के तौर पर। पहले बात करते हैं लगेज के तौर पर बाइक बुक करने का क्या प्रोसीजर है। इसमें आपके पास ट्रेन का आरक्षित टिकट होना चाहिये। यदि आपने रेलवे काउंटर से टिकट लिया है, तब तो वेटिंग टिकट भी चल जायेगा। और अगर आपके पास ऑनलाइन टिकट है, तब या तो कन्फर्म टिकट होना चाहिये या आर.ए.सी.। यानी जब आप स्वयं यात्रा कर रहे हों, और बाइक भी उसी ट्रेन में ले जाना चाहते हों, तो आरक्षित टिकट तो होना ही चाहिये। इसके अलावा बाइक की आर.सी. व आपका कोई पहचान-पत्र भी ज़रूरी है। मतलब...

पिंगलेश्वर महादेव और समुद्र तट

इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । मुझे पिंगलेश्वर की कोई जानकारी नहीं थी। सुमित और गिरधर के पास एक नक्शा था जिसमें नलिया और कोठारा के बीच में कहीं से पिंगलेश्वर के लिये रास्ता जाता दिख रहा था। मोबाइल में गूगल मैप में दूरी देखी, मुख्य सडक से 16 किलोमीटर निकली। तय कर लिया कि पिंगलेश्वर भी जायेंगे। बाइक का फायदा। एक बजे नारायण सरोवर से चल पडे और सवा दो बजे तक 70 किलोमीटर दूर नलिया पहुंच गये। सडक की तो जितनी तारीफ की जाये, उतनी ही कम है। नलिया में कुछ समय पहले तक रेलवे स्टेशन हुआ करता था। उस जमाने में भुज से मीटर गेज की लाइन नलिया आती थी। गेज परिवर्तन के बाद भुज-नलिया लाइन को परिवर्तित नहीं किया गया और इसे बन्द कर दिया गया। अब यह लाइन पूरी तरह खण्डहर हो चुकी है और इस पर पडने वाले स्टेशन भी। उस समय तक नलिया भारत का सबसे पश्चिमी स्टेशन हुआ करता था। इसे देखने की मेरी बडी इच्छा थी लेकिन शानदार सडक और इस पर बाइक चलाने के आनन्द के आगे यह इच्छा दब गई। नलिया ‘फिर कभी’ पर चला गया।