Monday, February 11, 2013

जांस्कर घाटी में बर्फबारी

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साढे तीन बजे चिलिंग पहुंच गये। यहां कहीं रुकने का ठिकाना ढूंढना था। इसमें ड्राइवर इब्राहिम ने काफी सहायता की। यहां कोई होटल नहीं है लेकिन होमस्टे है, जहां घर के सदस्यों के साथ मेहमान बनकर रुकना होता है। हमारे जाते ही घर की मालकिन ने कमरे के बीच में रखी अंगीठी सुलगा दी।
मैंने इब्राहिम से पूछा कि कितने पैसे हुए। लेह से चलते समय हमने पैसों के बारे में कोई बात नहीं की थी। बोला कि चौबीस सौ। मैं एक हजार तक के लिये तैयार था। चौबीस सौ रुपये देने मेरे बस से बाहर की बात थे। लेह से चिलिंग करीब सत्तर किलोमीटर दूर है।
आखिरकार मैं हजार से बढकर बारह सौ पर पहुंच गया, वो सोलह सौ तक आ गया। वो एक ही जिद पकडे रहा कि बारह सौ में उसे भयंकर घाटा हो जायेगा। मैंने कहा कि इससे ज्यादा देने में मुझे भयंकर घाटा होगा। उसने क्रोधित होकर कहा कि तुम कुछ मत दो, ये बारह सौ भी रख लो। मैंने उससे लेकर अपने पास रख लिये और सीधे कह दिया कि इससे ज्यादा बिल्कुल नहीं दूंगा। आखिरकार वो बारह सौ लेकर ही चला गया।
होमस्टे का मतलब है घर में मेहमान। बाल्टी भरकर सूखी लकडियां आ गईं, अंगीठी जलती रही। चाय भी आती रही। कमरे में जमीन पर ही तीन बिस्तरे बिछे थे। मुझे एक रजाई और मोटा कम्बल मिला रात में ओढने के लिये।
अगर कल विमान के उतरते समय तापमान माइनस दस डिग्री था, तो अब कम से कम माइनस बीस तक पहुंच गया होगा।
रात को खाने में राजमा चावल मिले। इस घर में बूढे-बुढिया के अलावा उनकी दो बेटियां और दो नाती भी थे। रात को कुछ समय उन सबके पास बैठने का मौका मिला। बौद्ध परिवार है, तो पूजा पाठ करने में ज्यादा समय लगता है। उस समय बूढा मन्त्रों वाला चक्र घुमाते हुए भजन गाने में व्यस्त था। बुढिया और एक बेटी सूत कात रही थीं। बच्चे किताब पढ रहे थे, होमवर्क कर रहे थे, हालांकि आजकल सर्दियों की छुट्टियां चल रही हैं। दूसरी बेटी खाना बनाने में लगी थी।
गुड नाइट कहकर मैं सो गया।

18 जनवरी 2013
आज मुझे चादर ट्रेक की शुरूआत कर देनी थी। चिलिंग गांव से आठ किलोमीटर आगे तक सडक बनी है, उसके बाद असली ट्रेक शुरू होता है। रात घर के सदस्यों से मैंने बात की कि सुबह मुझे कुछ दिनों के लिये एक आदमी चाहिये, जो चादर ट्रेक में साथ देगा। जो भी पैसे बनेंगे, उसे मिल जायेंगे। घरवालों ने, सुबह पता करेंगे, ऐसा कह दिया।
बिस्तर के पास ही एक बडी खिडकी थी जिस पर पर्दा लटका था। सुबह आठ बजे आंख खुली। पर्दा हटाकर खिडकी से बाहर झांका तो होश उड गये। बाहर सबकुछ सफेद था। बरफ पड रही थी। जैसे ही पैरों को पता चला कि बाहर बर्फबारी हो रही है, तो और ज्यादा सिकुड गये। मेरे पैर कभी भी बर्फ पर चलने के लिये राजी नहीं हुए हैं। मैं हमेशा बर्फ पर चलने से कतराता हूं।
यह बर्फबारी अप्रत्याशित थी। दूर-दूर तक उम्मीद भी नहीं थी कि यहां बरफ भी पड सकती है। कल जब लेह में था तो पिताजी ने फोन करके बताया था कि मेरठ में जबरदस्त ओले पड रहे हैं। रात सपना दिखाई दिया कि मेरठ में बर्फ के फाहे गिर रहे हैं। आंख खुली तो सपना सच मिला। मेरठ की बजाय लद्दाख ही सही।
सर्दियों में उत्तर भारत में पछुवा हवाएं चलती हैं। इन्हें पश्चिमीं विक्षोभ भी कहते हैं। ये यूरोप व साइबेरिया की तरफ से आती हैं, तो जाहिर है कि ये जबरदस्त ठण्डी होती है। जब ये भूमध्य सागर के ऊपर से गुजरती हैं, तो इनमें पर्याप्त नमी भी हो जाती है। जैसे ही ये अफगानिस्तान पार करके पाकिस्तान व पंजाब में घुसती हैं तो हिमालय के पहाडों के कारण दो भागों में विभक्त हो जाती हैं। एक भाग पंजाब, हरियाणा, यूपी के मैदानों से होकर दक्षिण पूर्व की ओर बढने लगता है और कभी कभी ओलावृष्टि कर देता है।
दूसरा भाग हिमालय में घुस जाता है। कश्मीर, डलहौजी, मनाली, शिमला व उत्तराखण्ड में इसी की वजह से बर्फबारी होती है। लद्दाख हिमालय के पार की धरती है। ये हवाएं अक्सर हिमालय को पार नहीं कर पातीं, इसलिये लद्दाख इनके प्रकोप से सालभर बचा रहता है। फिर भी कुछ दुस्साहसी हवाएं हिमालय के छह छह हजार मीटर ऊंचे पहाडों को पार कर जाती हैं व लद्दाख में पहुंच जाती हैं। कल मेरठ में जो ओले पडे थे, आज यहां जो बर्फ पड रही हैं, ये सब सहोदर हैं।
अभी तक तकरीबन चार इंच बर्फ पड चुकी है। अत्यधिक ठण्ड की वजह से यह बर्फ अगले एक महीने तक पिघलने वाली भी नहीं है। इस बर्फबारी की वजह से मुझे गांव में कोई सहयात्री भी नहीं मिला। अब मुझे या तो अकेले आगे चादर ट्रेक पर जाना है या वापस लेह लौट जाना है।
चादर ट्रेक के लिये मेरी योजना जङला (Zangla) तक जाने की थी। वैसे तो चादर ट्रेक सौ किलोमीटर से भी ज्यादा होता है और ट्रेकर जांस्कर के मुख्यालय पदुम तक चले जाते हैं। कुछ लोग आधा चादर करते हैं जो करीब चालीस किलोमीटर का होता है और नेरक या लिङशेड (Lingshed) तक जाते हैं। नेरक और लिङशेड जांस्कर नदी के किनारे आमने-सामने स्थित दो गांव हैं। नेरक से करीब बीस किलोमीटर आगे जङला है।
मुझे चूंकि बर्फ पर चलने में डर लगता है। पहले भी मैंने कई ट्रेक किये हैं, बर्फ पर चलने की मजबूरी आई तो या तो लम्बा रास्ता काटकर बर्फ से बचकर निकला हूं या कभी कभी वापस भी लौटा हूं। कई बार रो-रोकर बर्फ पर चलना भी पडा है। चूंकि नदी जम जाती है, इसलिये पैरों ने कभी भी इस जमी नदी पर चलना मंजूर नहीं किया। नदी से कुछ ऊपर चिलिंग से नेरक और आगे जङला तक जाने के लिये पगडण्डी है। इसी पगडण्डी पर जाने की मेरी योजना थी। जमीन वृक्ष-वनस्पति विहीन है, इसलिये नीचे नदी में बर्फ की वजह से कैसी संरचना बन रही है या कोई जमा हुआ झरना है, सब ऊपर पगडण्डी से देखा जा सकता है। जरुरत पडी तो फोटो खींचने के लिये पगडण्डी से नीचे नदी पर उतरना भी मंजूर हो गया।
अब बर्फबारी की वजह से यह पगडण्डी और भी खतरनाक हो गई होगी। सीधे खडे पहाडों पर पतली सी पगडण्डी और उस पर जमी बर्फ, इस तथ्य से पैरों ने इस पगडण्डी पर चलने से इंकार कर दिया। नीचे जमी हुई नदी पर चलना पहले से ही निषिद्ध था। इसलिये चादर पर चलना खटाई में पडने लगा।
अङमो (Angmo)- घर की एक सदस्या- ने दो-तीन घण्टे तक बाहर बर्फबारी के बीच सडक पर घूमने के लिये हामी भर ली। कुछ दूर तक बच्चे भी साथ चले, लेकिन फिर वे लौट आये। जब हम गांव से चलकर सडक पर पहुंचे तो बर्फ से ढकी सडक पर गाडी के पहियों के निशान दिखे। यानी कुछ देर पहले कोई गाडी यहां से गुजरी है। यह गाडी तिलत यानी सडक के आखिरी बिन्दु तक गई होगी। इस मौसम में यहां चादर ट्रेक बेहद लोकप्रिय होता है, तो ट्रेकर लेह से सुबह गाडी से आते हैं और दो किलोमीटर नदी पर चलकर तिलत सुमडो नामक जगह पर पहुंचकर तम्बू लगाकर आराम करते हैं।
बर्फबारी मैंने पहले भी देखी है लेकिन बेहद अल्प समय तक के लिये। इतना अल्प कि उससे बर्फ की सफेद चादर बिछना तो दूर जमीन पर बर्फ का कोई निशान भी नहीं रहता है। हालांकि पुरानी जमी बर्फ पर काफी चला हूं। आज पहला मौका था बिल्कुल ताजी बर्फ पर चलने का। पक्की सडक पर चल रहा था तो पैरों के पास सन्देश गया कि बर्फ पर चलना कोई खतरनाक काम नहीं है, वो भी सडक पर। रेत भरी सडक पर चलने के मुकाबले बर्फ भरी सडक पर चलना ज्यादा सुरक्षित होता है। बर्फ में चिपकने का गुण जो होता है।
चार किलोमीटर आगे एक छोटी सी बस्ती मिली, इसे काठमाण्डू कहते हैं। यह कोई गांव नहीं है। असल में निम्मू से पदुम होते हुए दारचा तक सडक बनाने का प्रोजेक्ट चल रहा है। दारचा लेह-मनाली रोड पर है। उसी प्रोजेक्ट का एक केन्द्र यहां काठमाण्डू में भी है। कुछ ट्रक और मशीनें यहां हैं। मजदूरों के रहने के लिये छोटे छोटे तम्बू और घर भी बने हैं। इसके अलावा काठमाण्डू का एक और महत्व है। यह स्थान मारखा नदी और जांस्कर नदी के संगम पर है। मारखा घाटी अपने सौन्दर्य के लिये काफी प्रसिद्ध है। मारखा घाटी में जो भी गांव हैं, उनके लिये बाहरी दुनिया से सम्पर्क करने का यह पहला स्थान है। जांस्कर के उस तरफ जाने के लिये पुल तो नहीं है, लेकिन तारगाडी जरूर है। पुल का काम चल रहा है। लेह से सप्ताह में दो दिन रविवार और गुरूवार को आने वाली बस यहां तक आती है।
काठमाण्डू से एक किलोमीटर आगे भी इसी तरह की एक बस्ती है। यहां ज्यादातर सेना के लोग रहते हैं या सीमा सडक संगठन के लोग। हमें देखते ही पांच छह कुत्ते हम पर भौंकते हुए दौडे, जिससे अङमो काफी डर गई। तुरन्त बर्फ उठाकर गोला बनाकर फेंकने से ये कुत्ते हमसे दूर ही रहे।
यहां से आगे जांस्कर नदी पूरी तरह जमी हुई दिखती है। तीन किलोमीटर आगे वो स्थान है जहां तक सडक बनी है। यहां हमें वो गाडी खडी मिल गई। एक ग्रुप आज ट्रेकिंग की शुरूआत कर रहा था, जबकि एक अन्य ग्रुप का आज आखिरी दिन है। शुरूआत करने वाले लोग आज लेह से आये हैं और खत्म करने वाले लोग इसी गाडी से लेह चले जायेंगे। यहां से करीब दो किलोमीटर आगे तिलत सुमडो है, जहां कैम्पिंग ग्राउंड और एक गुफा है। ये दो किलोमीटर जमी नदी पर चलकर तय करने होते हैं। यहां सुमडो दो नदियों के संगम को कहते हैं। आम बोलचाल में इस जगह को तिलत ही कहकर काम चल जाता है।
चिलिंग से तिलत की दूरी आठ किलोमीटर है। हमें ढाई घण्टे लगे यहां तक आने में। आखिरी दो किलोमीटर तय करने में मेरे पैरों में खासकर घुटने और ऊपर वाले जोड में दर्द होने लगा।
दस पांच मिनट रुककर मैं और अङमो वापस चल पडे। कुत्ते फिर भौंके, काठमाण्डू में एक नेपाली दुकान में चाय और मैगी खाये गये। मना करने पर भी चाय-मैगी के सत्तर रुपये अङमो ने दिये। शाम पांच बजे अन्धेरा होने तक चिलिंग पहुंच गये। दो घण्टे के लिये निकले थे, पांच घण्टे लगा दिये।
इस वापसी की यात्रा में तो जान ही निकल गई। घुटनों का दर्द बढता ही रहा। हर कदम आगे बढाना मुश्किल हो रहा था। जब चिलिंग पहुंचे तो बडा आराम मिला।
खाने में सुबह रोटी मिली थी। लेकिन सब्जी नहीं। बल्कि मक्खन और कई तरह के जैम मिले। रोटी पर मक्खन और जैम लगाकर रोल बनाकर खाने में आनन्द आ गया। चाय भी मक्खन डालकर पी, स्वादिष्ट लगी।
अब शाम के खाने में दाल चावल मिले। साथ में आमलेट भी। एक थाली में चावल, उसके ऊपर दाल, फिर आलू गोभी की थोडी सी सब्जी और सबसे ऊपर आमलेट। मैं चूंकि आमलेट खा लेता हूं इसलिये मुझे कोई परेशानी नहीं हुई। अगर कोई आमलेट ना खाने वाला होता, तो वो समूची थाली को वापस फेर देता। मैंने घरवालों से इसके लिये आपत्ति जताई और उन्हें समझाया कि हमारे मैदानों के सभी लोग अण्डा नहीं खाते। आपको पहले पूछना चाहिये था कि अण्डा खा लेते हो या नहीं। मान लो कि मैं अण्डा नहीं खाता तो आपके चावलों के ऊपर से आमलेट हटा लेने पर भी मैं ये चावल नहीं खा सकता था क्योंकि ये आमलेट के सीधे सम्पर्क में थे। 
शरीर के सभी अंगों में बहस होने लगी कि चादर ट्रेक करना है या नहीं। इस ट्रेक में पैरों को सबसे ज्यादा आपत्ति थी, ये अभी भी जमी नदी पर चलने को राजी नहीं थे। फिर थके भी बहुत ज्यादा थे, आज दर्द भी था। दिमाग ने पैरों को आदेश दिया कि आज सोलह किलोमीटर बर्फ पर चले हो, आदत पड गई है, कल चादर पर चलना ही होगा, सुबह तक दर्द भी ठीक हो जायेगा। सर्दियों में लद्दाख आने का एक मकसद यह भी था। पैरों का तर्क था कि कई फीट चौडी सडक पर चार पांच इंच बर्फ में चलना अलग बात है और नदी पर जमी बर्फ की चादर पर अलग बात। उस बर्फ के नीचे नदी बह रही है, पता नहीं कहां कमजोर चादर हो और टूट जाये, उस मामले में हमें ही सर्वाधिक नुकसान होगा।
आखिरकार निर्णय आत्मा पर छोड दिया गया- अन्तरात्मा पर।
निर्णय आया- चूंकि ट्रेकिंग का मकसद पगडण्डी पर चलने का था, ना कि नदी पर। अब पगडण्डी बन्द हो गई है तो और खराब परिस्थियों को देखते हुए चादर ट्रेक रद्द किया जाये। घुमक्कडी कोई दौड नहीं है कि जो जीता वही सिकन्दर। चादर के मुहाने तक पहुंच गये, जनवरी में लद्दाख में घूमना मिल रहा है, यही बहुत बडी उपलब्धि है।
सभी अंगों ने आत्मा के इस निर्णय का स्वागत किया। सबसे पहले पैरों ने।
आज शुक्रवार था, परसों लेह जाने वाली बस आयेगी। कल यहीं रुककर यहां का जनजीवन देखेंगे, परसों लेह चले जायेंगे।


चिलिंग में बर्फबारी




योकमापा- लद्दाख इको होमस्टे (चिलिंग)

घर का एक सदस्य



घर का दूसरा सदस्य

रोटी, मक्खन और जैम

चाय की चुस्की


जांस्कर घाटी के भ्रमण पर निकल पडे


यह है सडक। एक गाडी के पहियों के निशान दिख रहे हैं।


अङमो और उसका भानजा

काश! यह सडक नेरक तक बनी होती। वैसे भी नेरक की दूरी यहां बहुत कम लिखी हुई है। नेरक यहां से कम से कम चालीस किलोमीटर दूर है।


जांस्कर नदी




जांस्कर नदी- कहीं बह रही है, कहीं जम गई है।



यह कोई सांप वगैरा नहीं है। इससे सिद्ध होता है कि बर्फ में चिपकने का गुण होता है।




यहीं तक सडक बनी है। यहां से करीब दो किलोमीटर आगे तिलत सुमडो है। तिलत तक जाने के लिये नीचे नदी के ऊपर से होकर जाना पडता है।

पूर्णरूपेण जमी जांस्कर नदी।

फिर वापस चिलिंग में

लाल लाल फूलों के ऊपर जमा बर्फ


अगला भाग: चादर ट्रेक- गुफा में एक रात

लद्दाख यात्रा श्रंखला
1. पहली हवाई यात्रा- दिल्ली से लेह
2. लद्दाख यात्रा- लेह आगमन
3. लद्दाख यात्रा- सिन्धु दर्शन व चिलिंग को प्रस्थान
4. जांस्कर घाटी में बर्फबारी
5. चादर ट्रेक- गुफा में एक रात
6. चिलिंग से वापसी और लेह भ्रमण
7. लेह पैलेस और शान्ति स्तूप
8. खारदुंगला का परमिट और शे गोनपा
9. लेह में परेड और युद्ध संग्रहालय
10. पिटुक गोनपा (स्पिटुक गोनपा)
11. लेह से दिल्ली हवाई यात्रा

22 comments:

  1. बहुत सुंदर नज़ारे .....

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  2. अहा,
    श्वेत धवल हिमगिरि शिखरों पर..

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  3. सहोदर भ्राता क्या है ? आजकल लगता है हिंदी की क्लास अटेंड हो रही है और साथ ही भूगोल की भी हवाओं का वर्णन मजेदार लगा ..और बर्फीला माहौल तो लाजवाब है ...बर्फ के फोटू बहुत सुंदर है ..बर्फ देखने में ही अच्छी लगती है वहाँ जाने पर क्या हालत होती है यह तुम अच्छी तरह से जान गए हो ....पर कुते कैसे बर्फ पर खुले में रहते है आश्चर्य है ..हमारा शेडो तो ऐ सी में भी कंवल ओढ़कर सोता है ..पर यहाँ के लोगो को सलाम कोई सुविधा नहीं है फिर भी रह रहे है ..तुम्हारा निर्णय ठीक ही था ..जान बचेगी तो फिर चले जाना ...कौन -सा लधाख दूर है

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  4. भाईसाहाब, आप अद्भुत इन्सान हो. . . . . बहुत बहुत धन्यवाद. . .

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  5. मजा आ गया अच्छा वर्णन

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  6. फिल्मों में देखे हैं हमने तो ऐसे नजारे
    प्रणाम

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  7. नीरज भाई, बहुत अच्छा निर्णय था आपका जो ट्रेकिंग नहीं की, हमेशा ही अंतरात्मा की आवाज सुननी चाहिए ! जितना अच्छा पोस्ट है उससे भी अच्छा फोटो ! धन्यवाद् लदाख घुमाने के लिए!

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  8. सभी फोटो बहुत ही सुन्दर हैं... नीरज जी कौन सा कैमरा है?

    दर्शन जी... सहोदर भाई मतलब Half Brother...

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    1. प्रयास जी,
      जी नहीं, सहोदर का मतलब Half brother कतई नहीं होता है बल्कि सगा भाई या बहन होता है। सहोदर का संधी विच्छेद होता है सह+उदर। सह मतलब साथ में और उदर मतलब पेट अतः इस शब्द का अर्थ हुआ ऐसे भाई या बहन जिन्होनें एक ही उदर (कोख) से जन्म लिया हो मतलब सगे भाई (Blood brother/sister or Sibling)। कृपया नॉलेज शेयर करने से पहले उसकी औथेंटीसिटी (प्रामाणिकता) परख लें।

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  9. तेरे यात्रा वृतांत और तस्वीरों ने मन मोह लिया, काश हमे भी ले चलता, एक बार तेरे को इस बारे में कहा भी था.

    रामराम.

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  10. मजा आ गया अच्छा वर्णन ......................फोटो बहुत ही सुन्दर हैं.

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  11. ye jo har taraf barf bichi hui h, ye bhi chadar trek hi tha bhai, aise mausam me yaha itna paidal chalna hi badi baat h,1 baar m bhi 5 ghante bahut bhari taza barf k beech guzar chuka hu,aur photos to bahut hi kamal ki h. lajawab.

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  12. बहुत सुन्दर नीरज जी। भयंकर बर्फीले चित्रों को देखकर ही कंपकंपी छुट रही है..............पता नहीं आपने कैसे इतनी भीषण ठण्ड सहन की होगी।

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  13. हम तो आह भर सकते है तेरी किस्मत पे फक्र कर सकते है पर अफसोस की हम नहीं थे वंहा कोई बात नहीं तुम्हे इन हसीं लम्हों के साक्षी बनने की बधाई .........

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  14. vizag ki garmi me ye mast barf dekh raha hoon.

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  15. बर्फ़ देखकर ही सर्दी का अहसास होने लगा। मुझे फ़ोटुओं में ही अच्छी लगती है।

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  16. अदभुत, रोमांचक व मज़ेदार यात्रा....अगला भाग जल्द छापो

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  17. maza a gya lekh padhkar or barf se dhaki sundar ghati ke chitra dekhkar..... Gajab hain bhai

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  18. स्वामी जी ओमानन्द सरस्वती की लिखी पुस्तक "मांस मनुष्य का भोजन नहीं " में शाकाहारी जाटों के बारे में बहुत कुछ लिखा है । पूरी पुस्तक http://www.jatland.com/home/Human_Beings_are_Vegetarians पर उपलब्ध है । पुस्तक के कुछ अंश :
    दुग्धाहारी अमेरिकन सिंहनी
    अमेरिका के एक चिड़ियाघर में एक सुन्दर सिंहनी थी । वह शेरनी वहां से ऊब गई थी और अपने बच्चे का पालन पोषण भी नहीं करती थी । चिड़ियाघर वाले उसके बच्चों को जीवित रखना चाहते थे । वहां जॉर्ज नामक एक व्यक्ति था, जो जानवरों से बड़ा प्रेम करता था । उसने जंगल में घोड़े, खच्चर, मोर, बिल्ली, मुर्गे, बत्तख और मृग आदि बहुत पाल रखे थे । शेरनी का प्रसव का समय था । चिड़ियाघर वालों ने जॉर्ज को बुलाया । शेरनी के प्रसव होने पर उसका बच्चा पिंजरे में बंद करके उसे सौंप दिया । बच्चे की आंखें बन्द तथा एक टांग टूटी हुई थी । उससे वह सिंह शावक बड़ा दुःखी था । उसे जॉर्ज ले आया । उसने उसका इलाज किया । उसे भोजन के रूप में वह गोदुग्ध देता रहा । टांग अच्छी हो गई । शेरनी का बच्चा नर नहीं, मादा था । जब इसका जन्म हुआ, उस समय इसका भार तीन पौंड था जो एक मनुष्य के बच्चे से भी बहुत थोड़ा था । किन्तु जब यह दस सप्ताह की आयु का हो गया तो उसका भार ६५ पौंड हो गया । अब तक जॉर्ज इसको गाय का दूध ही दे रहा था । अब उसने सोचा कि इसे ठोस भोजन दिया जाये । उसने इसे मांस खिलाने का विचार किया क्योंकि शेर प्रायः जंगल में मांस का ही आहार करते हैं । शेर के बच्चे के आगे मांस परोसा गया, किन्तु उसने इसको नहीं खाया । इसकी दुर्गन्ध से शेर का बच्चा रोगी हो गया । फिर जॉर्ज ने एक चाल चली । उसने मांस से तैयार किये हुये अर्क के १०, १५ और ५ बूंदें दूध में क्रमशः डाल कर जब जब उसे पिलाना चाहा, तब तब उस शेरनी के बच्चे ने दूध भी नहीं पीया । अब वे विवश हो गये । उन्होंने मांस के शोरबे की एक बूंद उसकी बोतल में रखी । किन्तु उसे भी उसने नहीं छुआ । कितनी ही बार वह भूखा रहा किन्तु उसने माँस अथवा माँस से बने किसी भी पदार्थ को नहीं खाया । वे उसे बूचड़ की दुकान पर ले गये कि वह अपनी इच्छानुसार किसी मांस को चुनकर खा लेगी । किन्तु वह शेरनी किसी प्रकार का भी मांस नहीं खाना चाहती थी । मांस, खून की दुर्गन्ध भी उसे व्याकुल कर देती थी । वह शेरनी सारे संसार में प्रसिद्ध हो गई क्योंकि वह निरामिषभोजी शाकाहारी शेरनी थी । वह अपने साथी अन्य जीवों बिल्ली, मुर्गी, भेड़, बत्तख आदि सबसे प्रेम करती थी । भेड़ के बच्चे उसकी पीठ पर निर्भयता से बैठे रहते थे । उसने कभी किसी को कोई पीड़ा नहीं दी । उसे गाड़ियों में घूमना, गाना सुनना बड़ा अच्छा लगता था । वह गायों, घोड़ों के साथ घूमती थी । उसमें बड़ी होने पर ३५२ पौंड भार हो गया था । उसके चित्र अमेरिका के सभी प्रसिद्ध समाचारपत्रों के प्रथम पृष्ठ पर छपते थे । अन्य देशों के पत्रों में भी उसके चित्र छपे । बच्चे उसकी पीठ पर सवारी करते थे । सिनेमा में भी उसके चित्रपट बना कर दिखाये गये । वह शेरनी ज्यों ज्यों बड़ी होती गई, त्यों त्यों अधिक विश्वासपात्र, सभ्य और सुशील होती चली गई । वह दूध और अन्न की बनी वस्तुओं को ही खाती थी । वह १० फीट ८ इंच लम्बी हो गई थी । वह चिड़ियाघर में सदैव खुली घूमती थी । किस प्रकार मांसाहारी शेर शेरनी हिंसक पशु शाकाहारी निरामिषभोजी अहिंसक हो सकते हैं, उपर्युक्त सच्चे उदाहरण इसके जीते जागते प्रतीक हैं । फिर मांस खाने वाले मनुष्य अस्वाभाविक भोजन मांस का परित्याग नहीं कर सकते ? अवश्य ही कर सकते हैं । थोड़ा सा गम्भीरता से विचार करें, मांसाहार की हानियां समझकर दृढ़ संकल्प करने मात्र की आवश्यकता ही तो है । संसार में असम्भव कुछ भी नहीं । केवल मनुष्य की अपनी दृढ़ शक्ति चाहिये और उसके क्रियान्वयन के लिये आत्मबल । फिर बड़े से बड़ा कार्य सुगम हो जाता है । मांसाहार छोड़ने जैसे तुच्छ से साहस की तो बात ही क्या ?

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