Wednesday, April 24, 2019

किन्नर कैलाश की डिजीटल यात्रा


अभी कल्पा में हूँ और सामने किन्नर कैलाश चोटी भी दिख रही है और शिवलिंग भी। चोटी लगभग 6000 मीटर की ऊँचाई पर है और शिवलिंग लगभग 4800 मीटर पर। यात्रा शिवलिंग की होती है और लोग बताते हैं कि वे चोटी तक की यात्रा करके आए हैं। कुछ समय पहले तक मैं चोटी और शिवलिंग को एक ही मानता था और इसी चिंता में डूबा रहता था कि 6000 मीटर तक जाऊँगा कैसे? दूसरी चिंता ये बनी रहती थी कि वे कौन लोग होते हैं जो 6000 मीटर तक पहुँच जाते हैं?

6000 मीटर की ऊँचाई और ट्रैकिंग बहुत ज्यादा होती है... बहुत ही ज्यादा...। मेरी अपर लिमिट 5000 मीटर की है, हद से हद 5200 मीटर तक... बस। जिस दिन इससे ज्यादा ऊँचाई का ट्रैक कर लूँगा, उस दिन एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नोर्गे के बराबर मान लूँगा खुद को। 

पिछले साल गोयल साहब किन्नर कैलाश का ट्रैक करके आए... और आते ही सबसे पहले तो उन लोगों को खरी-खोटी सुनाई, जो बताते हैं कि यात्रा 6000 मीटर तक होती है। और फिर बताया कि यात्रा केवल 4800 मीटर तक ही होती है। यह सुनते ही मुझे बड़ा सुकून मिला। अभी तक जो किन्नर कैलाश मेरी अपर लिमिट से बहुत ऊपर था, अब अचानक अपर लिमिट के अंदर आ गया। इसका मतलब ये हुआ कि मैं इस यात्रा को कर सकता हूँ।

मैं 4800 मीटर की ऊँचाई तक आराम से जा सकता हूँ और इतनी ऊँचाई पर रात भी रुक सकता हूँ। मैंने पहले भी इतनी ऊँचाई के कई ट्रैक किए हैं, जिनमें रूपकुंड प्रमुख है... लेकिन जैसे ही ऊँचाई 5000 मीटर को पार करती है, मेरी साँसें उखड़ने लगती हैं।

Thursday, April 18, 2019

इन छुट्टियों में हिमाचल में तीर्थन वैली जाइए

हम आपको भारत के अल्पप्रसिद्ध स्थानों के बारे में बताते रहते हैं। लेकिन अब हमने बीड़ा उठाया है आपको इन स्थानों की यात्रा कराने का... वो भी एकदम सुरक्षित और सुविधाजनक तरीके से। तो चलिए, इसकी शुरूआत करते हैं तीर्थन वैली से।

दिल्ली-मनाली हाइवे पर मंडी से 40 किलोमीटर आगे और कुल्लू से 30 किलोमीटर पीछे एक स्थान है औट। यहाँ 3 किलोमीटर लंबी एक सुरंग भी बनी हुई है, जो किसी जमाने में भारत की सबसे लंबी सड़क सुरंग हुआ करती थी। इस सुरंग का एक छोटा-सा दृश्य ‘थ्री ईडियट्स” फिल्म में भी दिखाया गया है।
औट के पास ब्यास नदी पर एक बाँध बना हुआ है। और ठीक इसी स्थान पर ब्यास में तीर्थन नदी भी आकर मिलती है और यहीं से तीर्थन वैली की शुरूआत हो जाती है। अब अगर हम तीर्थन नदी के साथ-साथ चलें, तो सबसे पहले जो नदी इसमें मिलती है, उस नदी की घाटी को सैंज वैली कहते हैं। उसके बारे में हम फिर कभी बात करेंगे। फिलहाल तीर्थन वैली की ही बात करते हैं।
तो औट से चलने के 20 किलोमीटर बाद एक कस्बा आता है, जिसका नाम है बंजार। यह यहाँ का तहसील मुख्यालय भी है और तीर्थन वैली का सबसे बड़ा और सबसे मुख्य स्थान भी है। बंजार समुद्र तल से लगभग 1400 मीटर ऊपर है। यहाँ से सड़क तो तीर्थन वैली को छोड़कर सीधे जलोडी जोत और रामपुर की ओर चली जाती है, लेकिन एक अन्य सड़क तीर्थन वैली में भी जाती है, जो साईरोपा, गुशैनी होते हुए बठाहड़ तक जाती है। चलिए, हम भी इसी सड़क पर चलते हैं।

Tuesday, April 9, 2019

तमिलनाडु से दिल्ली वाया छत्तीसगढ़

8 मार्च 2019
हम ऊटी में थे और आज पूरे दिन ऊटी में ही रहने वाले थे। ऊटी के कुछ दर्शनीय स्थलों की लिस्ट दीप्ति ने बना रखी थी और मुझे भी उन स्थलों पर जाना ही था। मुझे पहली नजर में ऊटी पसंद नहीं आया था, पता नहीं क्यों।
तो लिस्ट के अनुसार जहाँ-जहाँ भी गए, सभी जगहें दीप्ति को नापसंद होती चली गईं। और उसे ऊटी के भीड़-भरे टूरिस्ट स्पॉट्स भला पसंद भी क्यों आएँगे!
पहले ‘रोज गार्डन’ गए, लेकिन वहाँ एक ही क्यारी में कुछ फूल खिले थे। कर्मचारी कह रहे थे कि सभी फूल देखने अप्रैल में आना।
ऊटी लेक गए, तो यह देखकर हैरान रह गए कि अलग-अलग नाव ठेकेदारों ने झील के भी अपने-अपने हिस्से बाँट रखे हैं। मोटर बोट पैडल बोट के हिस्से में नहीं जा सकती और पैडल बोट चप्पू वाले हिस्से में नहीं जा सकती। यहाँ तक कि आप झील के किनारे पर भी तभी बैठ पाएँगे, जब आपने उस हिस्से वाली बोट का टिकट लिया हो। यहाँ से भी वापस भाग लिए।
वापस होटल आए और “हाय गर्मी, हाय गर्मी” कहते सो गए। हालाँकि ऊटी में गर्मी नहीं थी।

Monday, April 8, 2019

दक्षिण के जंगलों में बाइक यात्रा

6 मार्च 2019
हम मैसूर में थे और इतना तो फाइनल हो ही गया था कि अब हम पूरा केरल नहीं घूमेंगे और कन्याकुमारी तक भी नहीं जाएँगे। यहाँ गर्मी बर्दाश्त से बाहर होने लगी थी और हिमालय से बर्फबारी की खबरें आ रही थीं। मुझे चेन्नई निवासी शंकर राजाराम जी की याद आई। आजकल वे हिमालय में थे और जनवरी में हिमालय जाते समय वे हमारे यहाँ भी होकर गए थे। और उस समय वे चेन्नई की गर्मी से परेशान थे और बार-बार कह रहे थे कि उन्हें भी साउथ की गर्मी बर्दाश्त नहीं होती। अब जैसे-जैसे दिन बीतते जा रहे हैं, हमें शंकर सर भी याद आ रहे हैं और साउथ की गर्मी भी उतनी ही भयानक लगती जा रही है।
लेकिन दीप्ति की इच्छा ऊटी देखने की थी। ऊटी समुद्र तल से 2000 मीटर से ज्यादा ऊँचाई पर है और इतनी ऊँचाई पर तापमान काफी कम रहता है। लेकिन हम कितने दिन ऊटी में बिता सकते हैं? ऊटी के चारों तरफ ढलान है और चारों ही तरफ नीचे उतरने पर भयानक गर्मी है। हम दो-चार दिन ऊटी में रुक सकते हैं, लेकिन आखिरकार कहीं भी जाने के लिए इस भयानक गर्मी में एंट्री मारनी ही पड़ेगी। इसलिए मुझे ऊटी भी आकर्षक नहीं लग रहा था।
अब जब दीप्ति की इच्छा के कारण मैसूर से ऊटी जाना ही है, तो एक दिन और लगाकर कुछ जंगलों में बाइक राइडिंग करने की इच्छा होने लगी। कर्नाटक के इस हिस्से में दो नेशनल पार्क हैं - नागरहोल और बांदीपुर। नागरहोल कर्नाटक-केरल सीमा पर है और बांदीपुर कर्नाटक-केरल-तमिलनाडु सीमा पर। कर्नाटक से बाहर सीमा के उस तरफ केरल और तमिलनाडु में भी नेशनल पार्क और वाइल्डलाइफ सेंचुरी हैं। यानी यह क्षेत्र घने जंगलों वाला क्षेत्र है।
तो फाइनल डिसीजन ये लिया कि हम नागरहोल नेशनल पार्क से होते हुए केरल के वायनाड जिले में प्रवेश करेंगे। एक रात वायनाड में कहीं पर रुककर बांदीपुर नेशनल पार्क होते हुए वापस कर्नाटक आएँगे और फिर मैसूर-ऊटी सड़क पकड़कर तमिलनाडु स्थित मुदुमलई नेशनल पार्क से होते हुए ऊटी जाएँगे।

Saturday, April 6, 2019

प्राचीन मंदिरों के शहर: तालाकाडु और सोमनाथपुरा

All Information about Somanathapura Temple, Karnataka
5 मार्च 2019

कुछ दिन पहले जब हमारे एक दोस्त मधुर गौर मैसूर घूमने आए थे, तो उन्होंने अपनी वीडियो में तालाकाडु और सोमनाथपुरा का भी जिक्र किया था। इससे पहले इन दोनों ही स्थानों के बारे में हमने कभी नहीं सुना था। फिर जब हम विस्तार से कर्नाटक घूमने लगे और बादामी, हंपी, बेलूर, हालेबीडू जैसी जगहों पर घूमने लगे, तो बार-बार सोमनाथपुरा और तालाकाडु का नाम सामने आ ही जाता।

तो इसी के मद्देनजर हम आज जा पहुँचे पहले तालाकाडु और फिर सोमनाथपुरा।

तालाकाडु कावेरी नदी के किनारे स्थित है और मैसूर से लगभग 50 किलोमीटर दूर है। किसी जमाने में यह एक अच्छा धार्मिक स्थान हुआ करता था, लेकिन कालांतर में कावेरी में आई बाढ़ों के कारण यह पूरा शहर रेत के नीचे दब गया, जो आज भी दबा हुआ है। कुछ मंदिर रेत के नीचे से झाँकते दिखते हैं, जिनमें पातालेश्वर मंदिर, कीर्तिनारायण मंदिर, मरालेश्वर मंदिर और वैद्येश्वर मंदिर प्रमुख हैं।

तालाकाडु से 25 किलोमीटर और मैसूर से 33 किलोमीटर दूर सोमनाथपुरा स्थित है। इसे होयसला राजाओं ने 13वीं शताब्दी में बनवाया था। मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है और इसकी दीवारों व छतों पर बनी हुई मूर्तियाँ मूर्तिकला की उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

Thursday, April 4, 2019

मैसूर पैलेस: जो न जाए, पछताए

Mysore Palace Full Information
3 मार्च 2019
मैसूर रिंग रोड पर हमें एक मल्टी-स्टार होटल में 600 रुपये में अत्यधिक शानदार कमरा मिल गया। इसे हमने तीन दिनों के लिए ले लिया। ओयो की मेहरबानी थी, अन्यथा हम इसकी तरफ कभी न देखते। दूर से ही साष्टांग नमस्कार कर लेते।

तो जिस समय हम धूप में जल-भुनकर कूर्ग से मैसूर आए तो शाम होने वाली थी और मेरी इच्छा एसी रूम में कम्पलीट रेस्ट करने की थी, जबकि दीप्ति को मैसूर पैलेस देखने की जल्दी थी। मैंने उसे टालने को तमाम तरह के बहाने बनाए, मसलन “बड़ी लंबी लाइन लगी मिलेगी टिकट की।”
“मैं लेडीज लाइन में जाकर जल्दी टिकट ले लूँगी।”
“शहर में भयानक जाम लगा मिलेगा।”
“ज्यादा दूर नहीं है। पाँच-छह किलोमीटर ही दूर है। वैसे भी गूगल मैप सड़क खाली दिखा रहा है।”
“शाम पाँच बजे तक ही एंट्री होती है। ये देख, गूगल मैप पर।”

Tuesday, April 2, 2019

कूर्ग में एक दिन

All Information about Coorg in Hindi
2 मार्च 2019

अब तक गर्मी इतनी ज्यादा होने लगी थी कि हमने यात्रा में बदलाव करने का पक्का मन बना लिया था। अब हम न केरल जाएँगे, न तमिलनाडु। लेकिन कूर्ग का लालच अभी भी हमें यात्रा जारी रखने को कह रहा था, अन्यथा उडुपि से दिल्ली चार-पाँच दिन की मोटरसाइकिल यात्रा पर स्थित है। उधर हिमालय से बर्फबारी की खबरें आ रही थीं और हम गर्मी में झुलस रहे थे, तो बड़े गंदे-गंदे विचार मन में आ रहे थे।
क्या सोचकर गर्मी में साउथ का प्रोग्राम बनाया था?
हम नहीं लिखेंगे इस यात्रा पर किताब। और अगर किताब लिख भी दी, तो उसमें गर्मी के अलावा और कुछ नहीं होगा।

और फिर...
भारत वास्तव में विचित्रताओं का देश है। इधर से उधर या उधर से इधर आने में ही कितना कुछ बदल जाता है! न इधर के लोगों को उधर के मौसम का अंदाजा होता है और न ही उधर के लोगों को इधर के मौसम का। सबकुछ जानते हुए भी हम एक जैकेट लिए घूम रहे थे, जिसका इस्तेमाल घर से केवल नई दिल्ली रेलवे स्टेशन तक पहुँचने में किया गया था। वातानुकूलित ट्रेन थी और हमने जैकेट निकालकर बैग में रख ली थी और ट्रेन में मिलने वाला कंबल ओढ़कर सो गए थे। गोवा उतरे तो सर्दी दूर की चीज थी। दो दिनों तक तो वह जैकेट बैग में ऊपर ही रखी रही, इस आस में कि शायद कहीं से शीतलहर आ जाए, लेकिन तीसरे दिन उसे बैग के रसातल में जाते देर नहीं लगी।
और आज हम यह सोचकर हँसे जा रहे थे कि इतनी गर्मी में हम जैकेट भी लिए घूम रहे हैं।

Monday, April 1, 2019

सैंट मैरी आइलैंड की रहस्यमयी चट्टानें


1 मार्च 2019

जैसे ही प्रतीक ने सैंट मैरी आइलैंड का नाम लिया, तुरंत गूगल किया और मेरे सामने थे आइलैंड के बहुत सारे फोटो। जितना पढ़ सकता था, पढ़ा और फाइनली तय किया कि यहाँ जरूर जाएँगे।

हम उडुपि में थे और हमें दक्षिण की ओर जाना था। लेकिन प्रतीक ने हमें उडुपि के उत्तर में 50 किलोमीटर दूर मरवंते बीच जाने का भी लालच दे दिया। गर्मी बहुत ज्यादा होने लगी थी और हम दक्षिण की इस यात्रा को विराम दे देना चाहते थे। उडुपि से मरवंते जाकर फिर से उडुपि लौटना पड़ता। हम जाना भी चाहते थे और नहीं भी जाना चाहते थे।

लेकिन सैंट मैरी आइलैंड के बारे में कोई कन्फ्यूजन नहीं था।

होटल से सीधी सड़क जाती थी, नाक की सीध में। पहले उडुपि शहर और उसके बाद मालपे। मालपे पार करने के बाद हमारे सामने समुद्र था और यहीं पर एक पार्किंगनुमा जगह पर कुछ गाड़ियाँ खड़ी थीं, जिनमें दो बसें भी थीं। इन बसों से अभी-अभी स्कूली छात्र उतरे थे, जो सैंट मैरी आइलैंड जाएँगे। 300 रुपये प्रति व्यक्ति टिकट था आने-जाने का। मैंने 1000 रुपये देकर दो टिकट लिए और बाकी 400 रुपये लेना भूल गया, लेकिन जल्द ही कन्नड, हिंदी और इंगलिश में आवाजें लगाकर मुझे 400 रुपये दे दिए गए।

फेरी चल पड़ी साढ़े चार किलोमीटर की समुद्री यात्रा पर। इसमें डी.जे. लगा था और सभी के पास नाचने का बहाना भी था। सभी स्कूली छात्र नाचने लगे। इनके साथ कुछ अन्य यात्री भी लग लिए। हमारे अलावा कुछ बुजुर्ग यात्री और कुछ मुसलमान यात्री इन्हें नाचते देखते रहे।