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किन्नर कैलाश की डिजीटल यात्रा


अभी कल्पा में हूँ और सामने किन्नर कैलाश चोटी भी दिख रही है और शिवलिंग भी। चोटी लगभग 6000 मीटर की ऊँचाई पर है और शिवलिंग लगभग 4800 मीटर पर। यात्रा शिवलिंग की होती है और लोग बताते हैं कि वे चोटी तक की यात्रा करके आए हैं। कुछ समय पहले तक मैं चोटी और शिवलिंग को एक ही मानता था और इसी चिंता में डूबा रहता था कि 6000 मीटर तक जाऊँगा कैसे? दूसरी चिंता ये बनी रहती थी कि वे कौन लोग होते हैं जो 6000 मीटर तक पहुँच जाते हैं?

6000 मीटर की ऊँचाई और ट्रैकिंग बहुत ज्यादा होती है... बहुत ही ज्यादा...। मेरी अपर लिमिट 5000 मीटर की है, हद से हद 5200 मीटर तक... बस। जिस दिन इससे ज्यादा ऊँचाई का ट्रैक कर लूँगा, उस दिन एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नोर्गे के बराबर मान लूँगा खुद को। 

पिछले साल गोयल साहब किन्नर कैलाश का ट्रैक करके आए... और आते ही सबसे पहले तो उन लोगों को खरी-खोटी सुनाई, जो बताते हैं कि यात्रा 6000 मीटर तक होती है। और फिर बताया कि यात्रा केवल 4800 मीटर तक ही होती है। यह सुनते ही मुझे बड़ा सुकून मिला। अभी तक जो किन्नर कैलाश मेरी अपर लिमिट से बहुत ऊपर था, अब अचानक अपर लिमिट के अंदर आ गया। इसका मतलब ये हुआ कि मैं इस यात्रा को कर सकता हूँ।

मैं 4800 मीटर की ऊँचाई तक आराम से जा सकता हूँ और इतनी ऊँचाई पर रात भी रुक सकता हूँ। मैंने पहले भी इतनी ऊँचाई के कई ट्रैक किए हैं, जिनमें रूपकुंड प्रमुख है... लेकिन जैसे ही ऊँचाई 5000 मीटर को पार करती है, मेरी साँसें उखड़ने लगती हैं।

फिर क्यों किन्नर कैलाश शिवलिंग की यात्रा को अत्यंत कठिन बताते हैं? इसकी तह में मैं पहले भी गया हूँ और आज फिर हम इसके बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे। आगे बढ़ने से पहले बता दूँ कि मैंने कभी भी किन्नर कैलाश की यात्रा नहीं की है, लेकिन दूसरों के फोटो देखकर और गूगल मैप के टैरेन मोड का अध्ययन करके काफी कुछ जानने की कोशिश की है। आज यहाँ कल्पा में हूँ, तो नीचे सतलुज नदी से लेकर कैलाश शिवलिंग और कैलाश चोटी तक का सारा नजारा आँखों के एकदम सामने दिख रहा है। 


तो चलिए, किन्नर कैलाश की डिजीटल यात्रा पर चलते हैं...

हिमालय में लगभग 3200 मीटर की ऊँचाई तक ट्री-लाइन समाप्त हो जाती है और उसके बाद घास के मैदान शुरू होते हैं, जिन्हें उत्तराखंड में बुग्याल और हिमाचल में थाच कहते हैं। थाच 3200 मीटर से शुरू होकर 4000 मीटर तक चले जाते हैं। 4000 मीटर के बाद यह घास भी समाप्त हो जाती है और पत्थरों और बोल्डरों का साम्राज्य शुरू हो जाता है, जिसमें अक्सर कोई हरियाली नहीं होती। यह रूल हिमालय के सभी ट्रैकों में लागू किया जा सकता है। इसे हम किन्नर कैलाश के ट्रैक पर भी लागू कर सकते हैं...

लेकिन...

यहाँ की यात्रा तंगलिंग नामक गाँव से शुरू होती है, जो लगभग 2200 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। यहाँ से अगर नक्शे में शिवलिंग की तरफ सीधी लाइन खींचे, तो यह केवल 6 किलोमीटर ही दूर स्थित है... इस 6 किलोमीटर में ऊँचाई 2200 से 4800 मीटर तक पहुँच जाती है। यानी प्रति किलोमीटर 450 मीटर का एलीवेशन। लेकिन पैदल रास्ता कुछ जिग-जैग होता है, इसलिए दूरी बढ़ जाती है। गोयल साहब बताते हैं कि तंगलिंग से पैदल मार्ग से शिवलिंग की दूरी 14 किलोमीटर है। यानी पैदल मार्ग पर भी प्रति किलोमीटर लगभग 200 मीटर की चढ़ाई है, जो बहुत बहुत बहुत ज्यादा होती है और किसी का भी दम निकालने के लिए काफी होती है। 

तो जब हम कल्पा में खड़े होकर कैमरे को जूम करके देखते हैं, तो बर्फ में एक जगह एक झौपड़ी दिखाई पड़ती है। यह झोपड़ी ट्री-लाइन के जस्ट ऊपर है। इसे गूगल मैप पर देखेंगे, तो इसकी ऊँचाई 3600 मीटर दिखाई पड़ती है। यानी यहाँ 3600 मीटर पर पेड़ पूरी तरह समाप्त हो जाते हैं। बताते हैं कि यहाँ एक गुफा भी है, जिसमें यात्रा के समय यात्री लोग रात बिताते हैं। 

तो अगर तंगलिंग (2200 मीटर) से चला जाए, तो एक दिन में यहाँ (3600 मीटर) तक पहुँचा जा सकता है। एक दिन में 1400 मीटर की चढ़ाई बहुत ज्यादा होती है और मेरा तो दम के साथ-साथ और भी कुछ निकल जाता है। मेरी एक दिन में चढ़ने की लिमिट 800 मीटर ही है, जिसे रो-पीटकर 1000 मीटर तक पहुँचा सकता हूँ... इससे ज्यादा नहीं... लेकिन थोड़ा-बहुत और रो-पीट लूँगा, तो शायद पहले दिन 1400 मीटर चढ़कर यहाँ तक पहुँच सकता हूँ। पत्थरों की झोपड़ी होने का यह भी मतलब हो सकता है कि शायद यहाँ यात्रा टाइम में भंडारा भी लगता हो। 

कल्पा से दिखता शिवलिंग

3600 मीटर की ऊँचाई पर एक झोपड़ी, जो यात्रा सीजन में काम आती होगी...

देखिए, मुझे नहीं पता कि एग्जैक्ट रास्ता कहाँ से है, इसलिए हमें अपनी तरफ से अंदाजा लगाना पड़ेगा। अगर गूगल मैप देखें, तो शिवलिंग तक जाने के लिए एक नाला पार करना पड़ेगा। यह नाला यहाँ कल्पा से भी दिखाई पड़ता है। दूसरी बात, शिवलिंग के नीचे 4500 मीटर की ऊँचाई पर काफी बड़ा समतल क्षेत्र दिखाई पड़ रहा है। यह समतल क्षेत्र तीन तरफ से दीवार से घिरा है... इसी दीवार पर एक तरफ शिवलिंग है, तो दूसरी तरफ कैलाश चोटी। यानी यहाँ ग्लेशियर होने के प्रबल चांस हैं। हो सकता है कोई झील भी हो। वैसे भी कैलाश के साथ झील होना अनिवार्य होता है। तो अगर किन्नर कैलाश के साथ भी कोई झील है, तो यहीं 4500 मीटर पर होनी चाहिए। और अगर झील नहीं भी है, तब भी ऐसी दुर्गम और कठिन यात्रा के लिए यह समतल मैदान बहुत काम का है। यात्री इस मैदान का इस्तेमाल जरूर करेंगे और इससे होकर ही आगे बढ़ेंगे... ऐसा मेरा पूर्ण विश्वास है।

अब अगर 3600 मीटर से इस 4500 मीटर तक जाना हो, तो यह चढ़ाई रोंगटे खड़े कर देने वाली दिख रही है। इसमें लगातार चढ़ाई तो है ही, लेकिन एक और भी समस्या दिख रही है। 3600 से 4200 मीटर तक तो रिज के साथ-साथ चढ़ा जा सकता है, लेकिन 4200 से 4500 मीटर तक पहुँचना जान जोखिम में डालने वाला है। लगभग 2 किलोमीटर के इस रास्ते में न केवल आपको ऊपर चढ़ना होगा, बल्कि एक सीधी दीवार पर लटक-लटककर चलना होगा, जिसमें आपकी जरा-सी गलती आपको हजारों फीट नीचे गिरा सकती है। इतनी ऊँचाई पर बोल्डरों के अलावा कुछ और मिलेगा भी नहीं।

तो आप 4500 मीटर पर स्थित उस मैदान में पहुँच जाएँगे, जिसमें मुझे ग्लेशियर और झील होने का अनुमान है। और यहाँ से चलकर आप 4600 मीटर तक भी आराम से पहुँच जाएँगे, क्योंकि गूगल मैप में मुझे ज्यादा ग्रेडियेंट नहीं दिख रहा है। 

और 4600 मीटर से 4800 मीटर शिवलिंग तक एकदम खड़ी सीधी दीवार है। मुझे इसे मैप में देखकर ही पसीने छूट रहे हैं। मुझे पूरा यकीन है कि इस यात्रा पर आने वाले 80% यात्री इस दीवार पर नहीं चढ़ पाते होंगे। ज्यादातर यात्री 3600 मीटर से सुबह अंधेरे में ही चलकर दोपहर तक यहाँ आ जाते हैं और शाम तक वापस 3600 मीटर तक पहुँच जाते हैं। यानी 4600 मीटर तक आते-आते वे 1000 मीटर चढ़ चुके होते हैं। मेरी फिटनेस एक औसत मनुष्य से अच्छी फिटनेस है... तो जब मैं एक दिन में 1000 मीटर चढ़ते ही टैं बोल जाता हूँ, तो यह मानने में कोई बुराई नहीं है कि 80% यात्री भी टैं बोल जाते होंगे। सुबह से 1000 मीटर चढ़ने के बाद 200 मीटर की खड़ी दीवार पर चढ़ने में मैं विद्रोह कर दूँगा।

यह आखिर का 200 मीटर एलीवेशन का सेक्शन वास्तव में अत्यधिक मुश्किल होगा। शायद इसी सेक्शन की वजह से लोग-बाग किन्नर कैलाश की यात्रा को श्रीखंड महादेव (5200 मीटर) से भी ज्यादा खतरनाक मानते हैं। 

खैर, फिलहाल तो कल्पा से ही देखकर मन बहला रहे हैं... शायद इस अगस्त में जाने की हिम्मत बन जाए...






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