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सूरत से मुम्बई पैसेंजर ट्रेन यात्रा

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सूरत एक व्यस्त स्टेशन है। सात बजे जब मैं होटल से निकलकर स्टेशन पहुंचा, तब भी यहां कई ट्रेनें खडी थीं। आज 19 फरवरी थी और दिन था बुधवार। सबसे पहले निगाह पडी प्लेटफार्म नम्बर एक पर खडी पुरी-अजमेर एक्सप्रेस (18421) पर जो बिल्कुल ठीक समय पर चल रही थी। फिर प्लेटफार्म दो पर भुज-बान्द्रा कच्छ एक्सप्रेस (19132) आ गई। प्लेटफार्म तीन पर मुम्बई-अहमदाबाद पैसेंजर (59441) तो चार पर भुसावल पैसेंजर (59075)। मुम्बई-अहमदाबाद पैसेंजर में कुछ डिब्बे नन्दुरबार वाले भी लगे होते हैं। उन्हें इस ट्रेन से हटाकर भुसावल पैसेंजर में जोड दिया जायेगा। प्लेटफार्म दो से कच्छ एक्सप्रेस के जाने के बाद जयपुर-यशवन्तपुर गरीब रथ स्पेशल (06512) आ गई। सबसे आखिर में प्लेटफार्म तीन पर अपनी बोरीबली पैसेंजर (59440) आई। यह ट्रेन अहमदाबाद से आती है। मैंने वसई रोड तक का टिकट ले लिया। बीस मिनट की देरी से ट्रेन रवाना हुई।
सूरत से अगला स्टेशन उधना जंक्शन है। यहां से एक लाइन भुसावल जाती है। जब पैसेंजर उधना से चली तो भुसावल की तरफ से श्रमिक एक्सप्रेस (19052) आती दिखी। श्रमिक एक्सप्रेस मुज़फ़्फ़रपुर से आती है और वलसाड जाती है। यह ट्रेन सूरत नहीं जाती बल्कि उधना से ही वलसाड के लिये चल देती है। यहीं इसका इंजन इधर से उधर किया जाता है। और हां, यह ट्रेन साढे तीन घण्टे देरी से चल रही थी। यह ट्रेन तो वैसे पश्चिम रेलवे की है लेकिन पूरब का असर पडता जरूर है।
उधना से आगे के स्टेशन हैं- भेस्तान, सचीन, मरोली, गांधी स्मृति, हांसापोर, वेडछा, अंचेली, अमलसाड, बिलीमोरा जंक्शन, जोरावसण, डुंगरी, वलसाड, अतुल, पारडी, उदवाडा, बगवाडा, वापी, करमबेले, भिलाड, संजान, उमरगाम रोड, बोर्डी रोड, घोलवड, दहानू रोड, वानगांव, बोईसर, उमरोली, पालघर, केलवे रोड, सफाले, वैतरना, विरार, नाला सोपारा और वसई रोड।
भेस्तान में पैसेंजर एक तरफ खडी कर दी गई और सूरत की तरफ से आने वाली जयपुर-यशवन्तपुर गरीब रथ बडी तेजी से निकल गई। सचीन स्टेशन मेरे लिये कुछ खास था क्योंकि मैं मुम्बई सचिन से मिलने ही जा रहा था। उसे जब इस स्टेशन का फोटो दूंगा तो वो बडा खुश होगा। यहां दो ट्रेनें पास हुईं- पहले जोधपुर-बान्द्रा सूर्यनगरी एक्सप्रेस (12479) और इसके बाद जयपुर-मुम्बई दूरोन्तो (12240)। कुछ ट्रेनों के नाम बडे शानदार होते हैं। सूर्यनगरी नाम भी एक ऐसा ही नाम है। गौरतलब है कि जोधपुर को सूर्यनगरी भी कहते हैं- सूर्यवंशी राजवंश के कारण।
सचीन से निकले तो वलसाड-दाहोद एक्सप्रेस (12929) बराबर से गुजर गई। इसमें सभी साधारण श्रेणी के ही डिब्बे थे और सभी बुरी तरह भरे थे। भयंकर भीड। सुबह के समय बडे शहरों की तरफ बडी संख्या में लोग रोजी-रोटी के लिये जाते हैं। यहां का नजदीकी बडा शहर सूरत है तो सूरत की तरफ जाने वाली गाडियां इसी तरह दैनिक यात्रियों से भरी मिलेंगी।
मरोली में पहली बार खपरैल की छतें दिखाई दी। खपरैल की छतों का अर्थ होता है कि यहां बारिश ज्यादा होती है। वास्तव में अब हम जितना दक्षिण की ओर बढते जायेंगे, बारिश उतनी ही ज्यादा होती जायेगी। अब पश्चिमी घाट का इलाका आरम्भ होता है जो मुम्बई के बाद और ज्यादा विकट होता जायेगा और कोंकण तट भी कहलाने लगेगा।
नवसारी में प्लेटफार्म एक पर सूरत जाने वालों की भयंकर भीड ट्रेन का इंतजार कर रही थी। सूरत से दूर जाने के कारण हमारी ट्रेन इस तरह की भीड से बची हुई थी। जब हम मुम्बई के आसपास पहुंचेंगे तो कफी देर हो चुकेगी और दैनिक यात्री तब तक अपने-अपने काम-धंधों पर जा चुके होंगे। कुल मिलाकर यह ट्रेन भीड से बची रहेगी। जब ट्रेन नवसारी से निकल चुकी तो दूसरी लाइन पर वलसाड-भरुच पैसेंजर आती दिखी। यह बुरी तरह भरी थी। पता नहीं नवसारी का खचाखच भरा प्लेटफार्म इसमें कैसे समायेगा?
गांधी स्मृति और हांसापोर में यह ट्रेन नहीं रुकती। नवसारी के बाद सीधे वेडछा जाकर रुकी। यहां पन्द्रह मिनट की देरी से चल रही संजान-सूरत मेमू मिली।
बिलीमोरी जंक्शन से एक नैरो गेज की लाइन वघई जाती है जो गुजरात के एकमात्र हिल स्टेशन सापूतारा के नजदीक है। यहां सिकन्दराबाद-राजकोट एक्सप्रेस (17018) मिली। इसके अलावा यहां दो ट्रेनें भी पास हुईं- बीकानेर-दादर एक्सप्रेस (12489) और कर्णावती एक्सप्रेस (12934)।
वलसाड भी गुजरात का एक मुख्य औद्योगिक नगर है। यह राज्य का सबसे दक्षिणी जिला भी है। इसके बाद महाराष्ट्र शुरू हो जाता है। यहां बान्द्रा-सूरत इंटरसिटी (12935) क्रॉस हुई। ट्रेनों की तो लाइन लगी रहती है इस रूट पर। कैसी भी ट्रेन हो, बस दौडती ही रहती है। पता नहीं यहां आउटर जैसी चीज भी होती है या नहीं। हमारे यूपी में तो आउटर के बिना किसी स्टेशन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। छोटे स्टेशनों यहां तक कि हाल्ट पर भी आउटर होते हैं।
वलसाड के बाद है अतुल। एक चुटकुला याद आ रहा है। दिल्ली की डीटीसी की बस में मेरे जैसा कोई छोरा चढ गया। जब टिकट लेने की बारी आई तो देखा कि एक महिला ने मांगा- सरोजिनी नगर का टिकट दे दो। दूसरी ने कहा- कमला नगर का दे दो। तीसरी ने लक्ष्मी नगर का मांग लिया। छोरा बडा खुश हुआ। यहां तो अपने नाम से टिकट मांगे जाते हैं। उसने कहा- भाई, नीरज नगर का टिकट दे दो।
तो अगर यहां टिकट लेते समय मेरे सामने कोई अतुल का टिकट मांगता, फिर कोई सचीन का टिकट मांगता तो पक्का मैं नीरज का टिकट मांग बैठता।
पार्डी में महिलाएं चीकू बेच रही थीं- दस रुपये के बीस। मुझे चीकू अच्छे तो लगते हैं लेकिन मैं कभी इन्हें खरीदा नहीं करता। पहले कभी एक दो बार खरीदे भी थे तो उनमें से ज्यादातर खराब और कच्चे निकल आये थे तो स्वयं चीकू खरीदने बन्द कर रखे हैं। हां, कोई दूसरा अगर खरीदे तो खाने से पीछे नहीं हटता। कच्चे और खराब तब भी निकलते हैं लेकिन उसकी बुराई अपने सिर तो नहीं आती।
बगवाडा में विरार-सूरत लोकल मिली। ज्यादा भीड नहीं थी लेकिन गाडी फिर भी पूरी भरी थी। वापी भी एक बडा औद्योगिक नगर है। इसके बाद भिलाड में मुम्बई-फिरोजपुर जनता एक्सप्रेस मिली। संजान में मुम्बई-अहमदाबाद डबल डेकर मिली। इसी तरह उमरगाम रोड स्टेशन पर मुम्बई-पोरबन्दर एक्सप्रेस जाती दिखी।
उमरगाम रोड के बाद गुजरात समाप्त और महाराष्ट्र राज्य शुरू हो जाता है। महाराष्ट्र का पहला स्टेशन है बोर्डी रोड। बोर्डी रोड के बाद घोलवड आता है। यहां नारियल के पेड दिखने शुरू हो गये। समुद्री जलवायु धीरे धीरे प्रभाव दिखाने लगी। वैसे देखा जाये तो सूरत से बल्कि वडोदरा से ही रेलमार्ग समुद्री तटरेखा के साथ साथ ही है लेकिन वह एक खाडी है- खम्भात की खाडी। जैसे जैसे दक्षिण की ओर बढते जायेंगे, यह खाडी अरब सागर में विलीन होती जायेगी और अब समुद्री असर दिखने लगा।
दहानू रोड पर ट्रेन पूरी तरह खाली हो गई। अब इसमें बोरीवली तक कोई नहीं चढेगा। दहानू रोड से विरार तक काफी संख्या में लोकल ट्रेनें चलती हैं। विरार से आगे मुम्बई और चर्चगेट तक मुम्बई लोकल का नेटवर्क है। कोई धीरे धीरे चलने वाली इस पैसेंजर ट्रेन को क्यों पकडेगा, जबकि हर दस-दस पांच-पांच मिनट में लोकल ट्रेनें हैं? अब तो इसमें जो भी बची खुची सवारियां हैं, वे भी उतरती जायेंगी।
सफाले के बाद वैतरना नदी पार करनी होती है। समुद्र पास होने के कारण नदियां काफी चौडी हैं और इनमें पानी भी बहुत होता है। वैतरना पर दो बडे-बडे पुल हैं। जिस समय ट्रेन पुल पार कर रही थी, उस समय नदी में बडी तेजी से ऊपर की ओर पानी बह रहा था। पहले तो मैं हैरत में पड गया कि पानी विपरीत दिशा में क्यों बह रहा है लेकिन शीघ्र की पता चल गया कि यह ज्वार के कारण है। नदी पार करते ही वैतरना स्टेशन है। वैतरना के बाद विरार है जहां से लोकल ट्रेनें चलती हैं।
ठीक डेढ बजे ट्रेन वसई रोड पहुंच गई। मैंने दो साल पहले चर्चगेट से वसई रोड तक की यात्रा कर रखी थी इसलिये अब इस मार्ग पर आगे जाने की जरुरत नहीं थी। इसके अलावा अब यहां से दिवा वाली लाइन पर यात्रा करूंगा। दिवा लोकल दो घण्टे बाद यानी साढे तीन बजे है। अब दो घण्टे तक स्टेशन पर ही रहना है।
दोपहर होने के कारण स्टेशन पर भीड नहीं थी। एक खाली पडे प्लेटफार्म पर वडा-पाव खाकर एक बेंच पर जाकर लेट गया। थोडी थोडी देर बाद जब यहां से लोकल ट्रेन गुजरती तो आंख भी खुल जाती। पूरे समय आवाज गूंजती ही रही- यहां से वहां जाने वाली लोकल, बारह डिब्बों वाली, सोलह डिब्बों वाली, धीमी लोकल, तेज लोकल...।
मुम्बई में लोकल की दो मुख्य लाइनें हैं- पश्चिम रेलवे की लाइन और मध्य रेलवे की लाइन। दोनों को क्रमशः वेस्टर्न लाइन और सेंट्रल लाइन कहते हैं। पश्चिमी लाइन चर्चगेट से विरार तक है। मध्य लाइन सीएसटी से शुरू होती है और आगे जाकर कई लाइनों में बंट जाती है। मुख्य तो कल्याण वाली ही है। दादर में दोनों लाइनें बहुत नजदीक से गुजरती हैं, इतनी नजदीक से कि लगता है कि दोनों लाइनें एक ही स्टेशन से गुजर रही हैं। इसके बाद पश्चिमी लाइन उत्तर की ओर चली जाती है और मध्य लाइन उत्तर-पूर्व की ओर। इनमें पहला कनेक्शन है मध्य रेलवे की माहिम लिंक। यह हार्बर लाइन से पश्चिम रेलवे के माहिम स्टेशन को जोडती है। इसके बाद दूसरा कनेक्शन है वसई रोड-दिवा लिंक। यह पश्चिम रेलवे के वसई रोड को मध्य रेलवे के दिवा से जोडती है। दिवा से आगे यही लाइन आगे पनवेल की ओर चली जाती है। वडोदरा, सूरत की ओर से पुणे, मडगांव की ओर जाने वाली ट्रेनें इसी वसई रोड-दिवा लिंक का प्रयोग करती हैं। इस लाइन पर लम्बी दूरी की ट्रेनें तो काफी हैं लेकिन लोकल ट्रेनें गिनी-चुनी ही हैं।
वसई रोड पर प्लेटफार्म नम्बर 6 और 7 दिवा की तरफ जाने और उधर से आने वाली ट्रेनों के लिये हैं। 7 पर तिरुनेलवेली-हापा एक्सप्रेस आ गई जो काफी देर तक खडी रही। हमारी ट्रेन प्लेटफार्म छह पर आई। इसमें आठ डिब्बे थे। इंजन बीच में लगा था। वैसे नाम तो इसका डीएमयू है लेकिन यह किसी भी तरह डीएमयू नहीं है। डीएमयू यानी डीजल मल्टीपल यूनिट, लेकिन इसमें एक ही इंजन होने के कारण यह मल्टीपल यूनिट नहीं है। यह कल्याण का WDG3A#13620 इंजन था। हालांकि दोनों सिरों पर डिब्बों की संरचना में परिवर्तन करके एक चालक-केबिन बना दिया है जिससे इंजन में जाने की जरुरत नहीं पडती। देखने में डीएमयू ही लगती है। किसी ट्रेन में बीच में इंजन पहली बार देखा।
वसई रोड के बाद जूचन्द्र, कामन रोड, खारबाव, भिवंडी रोड, कोपर और दिवा जंक्शन हैं। कोपर नाम के दो स्टेशन हैं- एक तो यह लिंक लाइन पर और दूसरा इसके नीचे मुख्य मुम्बई-कल्याण लाइन पर। यह कोपर समुद्र तल से 14.8 मीटर ऊपर है तो मुख्य लाइन वाला कोपर 7.13 मीटर ऊपर।
दिवा स्टेशन पर सचिन मिल गया। फिर हम लोकल में बैठकर डोम्बिवली पहुंचे। सचिन डोम्बिवली में ही रहता है। एक ऑटो में बैठकर दस मिनट दूर सचिन के घर पहुंच गये। मेरी ट्रेन अब रात साढे ग्यारह बजे मुम्बई सेंट्रल से वडोदरा एक्सप्रेस थी इसलिये मेरे पास सचिन से गपशप करने को चार घण्टे से ज्यादा थे।
कुछ दिन पहले मैं और सचिन साइकिलों पर मिज़ोरम के बीहडों में घूम रहे थे। उससे पहले हमने कुछ समय लद्दाख साइकिल यात्रा में भी साथ बिताया था। अब मैं सचिन के वातानुकूलित घर में था, भाभी के हाथ का बना स्वादिष्ट भोजन खा रहा था, सचिन की बनाई डॉक्यूमेंट्री देख रहा था, तो मेरी खुशी का अन्दाजा आप लगा सकते हैं। जिस समय लद्दाख की डॉक्यूमेंट्री में मढी के दृश्य में सचिन ने बताया कि एक भले मानस ने मुझे रुकने को अपना टैंट ऑफर किया तो गर्व से मेरा सीना चौडा हो गया। वो भला मानस मैं जो था।
दस बजे के आसपास हमने एक दूसरे को अलविदा कहा। टैंट मेरे साथ था ही। डोम्बिवली से सेंट्रल का टिकट मांगा तो सीएसटी का टिकट दे दिया। खैर, लोकल आई तो आराम से बैठने को सीट मिल गई। दादर तक की एक घण्टे की यात्रा थी, आंख लग गई। खुली तो ट्रेन दादर पर ही खडी थी। उठकर भागने की जल्दी नहीं की। अगले स्टेशन परेल उतर गया। इससे मिलकर ही पश्चिमी रेलवे का एलफिंस्टन रोड है। वहां से सेंट्रल की ट्रेन पकड ली। मुम्बई सेंट्रल जाकर फुट-ओवर-ब्रिज पर चढा तो सामने ही वडोदरा एक्सप्रेस खडी दिख गई।


नवसारी स्टेशन पर सूरत की तरफ जाने वाले यात्री ट्रेन के इंतजार में

बिलीमोरा से एक नैरो गेज की लाइन वघई जाती है।



उमरगाम रोड स्टेशन पर मुम्बई-पोरबन्दर एक्सप्रेस गुजरती हुई

उमरगाम रोड गुजरात का आखिरी स्टेशन है।

गुजरात-महाराष्ट्र सीमा

बोर्डी रोड महाराष्ट्र का पहला स्टेशन है।

वैतरना नदी

वैतरना

वैतरना

वैतरना



वसई रोड-दिवा डीएमयू। इसमें इंजन बीच में लगा है।


वसई-दिवा लोकल

मुम्बई-कल्याण मुख्य लाइन



सचिन के साथ मुम्बई की प्रसिद्ध ‘भीडवाली’ लोकल में।



अगला भाग: वडोदरा से रतलाम पैसेंजर ट्रेन यात्रा

गुजरात मुम्बई ट्रेन यात्रा
1. वीरमगाम से सूरत पैसेंजर ट्रेन यात्रा
2. सूरत से मुम्बई पैसेंजर ट्रेन यात्रा
3. वडोदरा से रतलाम पैसेंजर ट्रेन यात्रा

7 comments:

  1. वाहा नीरज भाई सचिन से मिलकर पुरानी यादें ताजा हो गयी होंगी। आपने तो टैंट को वापस लाना भी यादगार बना दिया। क्या सचिन भी ब्लॉगर है क्या हम भी उनकी बनाई डॉक्यूमेंट्री देख सकते है यदि हाँ तो कैसे।

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  2. बहुत बढिया, सचिन से मिलकर खूप खुशी झाली :)

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  3. नीरज जी यात्रा वाकई शानदार रही.सचीन नाम का स्टेशन देखकर मुझे भी बहुत गर्व हुआ अपने
    नाम पर. नीरज जी मै जहा तक जानता हुं की सचिन ब्लॉगर तो नही है पर क्या हम उनकी बनाई डॉक्यूमेंटरी youtube पर देख सकते है??

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  4. साधारण सफर को असाधारण बनाना तो कोई आपसे सीखें, धन्यवाद लिखने के लिये।।

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  5. नीरज जी, प्रणाम एवम् घूमक्कडी ज़िंदाबाद!!

    आपका विवरण वाकई अतुल्य है! आप जो भी यात्रा करते है, अतुल्य होती है! Incredible! मै कुछ समय वसई में रहा था| फिर भी कुछ चीजें नही जानता था जैसे डिएमयु का इंजन तथा वैतरणा का विपरित प्रवाह! आप यात्रा के मामले में भारत के कॅप्टन कूक से बिलकुल कम नही हो! सब कुछ जानते हो| जैसे ज्ञानकोष| :) :)

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  6. ओहो ! तो उस दिन जो फ़ोन मुझे आया था जब मैं शॉपिंग के लिये बॉम्बे गई थी तो जनाब वसई में दिवा गाड़ी का इंतज़ार कर रहे थे ---

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  7. वसई रोेड का बोर्ड़ देख्कर दिल खुश हो गया --- और दिवा गाडी भी --

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