एक कुमाऊंनी गाँव- भागादयूनी

March 11, 2011
इस यात्रा वृत्तांत को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें। 21 फरवरी को मैं और अतुल भागाद्यूनी गांव में थे। वैसे तो आज हमें यहां से सुबह को ही वापस चल देना था लेकिन यहां आकर ऐसा जी लगा कि प्रोग्राम बदल गया। अब कल यहां से जायेंगे। आज हमें पूरा गांव देखना था- कुमाऊंनी गांव। वैसे तो अतुल महाराज के लिये हर चीज नई थी जबकि मेरे लिये भी कुछ बातें नई थीं। गांव के एक कोने में ऊंचाई पर कुछ चट्टानें हैं। इनमें कुछ गुफाएं भी हैं। जब अतुल को बताया गया कि गुफाओं को देखने चलते हैं तो उसने सोचा कि वे गुफाएं बडी-बडी और गहरी गुफाएं होंगी। दो-चार ऋषि-महात्मा भी बैठे मिलेंगे। लेकिन जब असलियत खुली तो अतुल के शब्द थे- ‘ये गुफाएं हैं? यार, सारा एक्साइटमेंट खत्म हो गया।’ ये शब्द सुनकर तय हुआ कि थोडा नीचे एक गहरी गुफा है- सांपों वाली गुफा, वहां चलते हैं। अतुल फिर एक्साइटेड।



लेकिन नीचे उतरते हुए महाराज ऐसा फिसला कि पता नहीं घुटना टूटा या बच गया लेकिन पैण्ट जरूर फट गई। कभी अगले ने महान काम किये होंगे कि गिरने के बाद भी सही सलामत बच गया, नहीं तो रास्ता पतला सा था, अगर रास्ते से फिसलकर साइड में गिरा होता तो लुढकते-लुढकते कई सौ फुट नीचे चला गया होता। तब तक तो 206 की जगह 2006 हड्डियां बन गई होती। बन्दा कुछ देर तक तो फटी पैण्ट पर हाथ रखकर चलता रहा, लेकिन जब सोचा कि कब तक, तो हाथ हटा लिया। बडी गुफा की फरमाइश और योजना धरी की धरी रह गई।


यह है भागाद्यूनी गांव
जब मैं पिछली बार चार साल पहले यहां आया था तो रमेश ने हाथ से इशारा करके बताया था कि वहां नदी के किनारे कुछ ‘घट’ हैं। घट मतलब घराट यानी पनचक्की। पानी से चलने वाली पिसाई करने वाली चक्की। उस समय गांव में पांच चक्कियां थी लेकिन इस साल हुई जबरदस्त बारिश ने चार चक्कियों को बहा दिया। अब केवल एक ही चक्की बची हुई है। नदी के पानी को एक नाली या कहें कि नहर से गुजारकर चक्की के ऊपर तक ले जाया जाता है। फिर जब पानी चक्की के ब्लेडों पर तेजी से गिरता है तो ब्लेडों से जुडे पाट भी घूम पडते हैं। इससे गेहूं, चने आदि की पिसाई हो जाती है। कहीं-कहीं इसमें डायनमो लगाकर बिजली भी बनाई जाती है।


चक्की देखकर हम वापस घर की ओर चल पडे। रास्ते में एक किसान अपने खेतों में बैलों के साथ जुताई पर लगा पडा था। अतुल को तलब उठी कि बैलों के साथ फोटू खिंचवाऊंगा।



घर पहुंचे और खाना खाने लगे। मैंने कहा कि यार अतुल, रमेश की घरवाली बडी सुन्दर है। बोला कि ओये चुप कर। रमेश के सामने मत बोल देना ये बातें, नहीं तो हमें आज ही यहां से अपना बोरिया बिस्तर बांधना पड जायेगा। थोडी देर में रमेश खाना देने आया तो मैंने उससे भी कहा यार रमेश, भाभीजी बडी सुन्दर हैं। बोला कि तो फिर शरमा क्यों रहा है? उसके पास जा और बातें-वातें कर। बस, तभी से अतुल के मन में खटका हो गया कि जाट सही इंसान नहीं है। रमेश की घरवाली के पीछे पड रहा है। दोपहर बाद अतुल का मूड शेष गांव देखने का बना। इधर मैं भी देहाती ठहरा। गांव देखने में वो मजा नहीं आता जो शहरियों को आता है। मैंने जाने से मना कर दिया। तभी से अतुल का मुंह चढ गया। और अगले दिन दोपहर को अल्मोडा जाकर ही उतरा- ’यार मुझे कल गुस्सा नहीं करना चाहिये था।’ उस दिन अतुल और रमेश का चचेरा भाई गांव घूमने गये थे।


और आखिर में हिमालय दर्शन

अगला भाग: कौसानी

कुमाऊं यात्रा
1. एक यात्रा अतुल के साथ
2. यात्रा कुमाऊं के एक गांव की
3. एक कुमाऊंनी गांव- भागाद्यूनी
4. कौसानी
5. एक बैजनाथ उत्तराखण्ड में भी है
6. रानीखेत के पास भी है बिनसर महादेव
7. अल्मोडा यात्रा की कुछ और यादें

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25 Comments

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March 11, 2011 at 8:39 AM delete

मजा आ गया फिर...बहुत उम्दा तस्वीरें और वर्णन...अब उसका पैर ठीक है कि नहीं??

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March 11, 2011 at 9:05 AM delete

भाई आज तुम्हारी पूरी पोस्ट पढ़ रहा हूँ, पिछला वाला पार्ट भी और जबरदस्त मजा आ रहा है.....:)
अतुल महराज और आपकी जोड़ी खूब जम रही है...

मस्त पोस्ट...फोटोज तो एक से एक हैं....

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March 11, 2011 at 9:58 AM delete

वाह इतनी शानदार तस्वीरें? तब तो जगह और भी अच्छी होगी घूमने के लिये। शुभकामनायें।

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March 11, 2011 at 11:18 AM delete

ातुल नै बुल्लदां के बारे म्है नहीं पूछा - "ये क्या है"
फोन आया था मेरे पास पूछ रहा था "खागड" क्या होता है। आपकी पिछली पोस्ट में पढा होगा।
इस बार कुछ फोटो लगता है गलत एंगल से खींचे गये हैं। फिर भी धन्यवाद
सांप वाली गुफा दिखाई के नहीं?

जै राम जी की

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March 11, 2011 at 12:06 PM delete

hmmmmm good enjoy... all pic's are good... nice blog dear
Visit my blog plz
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March 11, 2011 at 12:34 PM delete

बहुत अच्छे फोटो हैं. यात्रा वृतान्त पढकर अच्छा लगा. बहुत बहुत धन्यवाद

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March 11, 2011 at 1:26 PM delete

सार्थक प्रस्तुति, बधाईयाँ !

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March 11, 2011 at 3:08 PM delete

एक और जोरदार संस्मरण...अतुल से कहियो के भाई ज्यादा छलांगे न लगाया करे...फोटो तो हमेशा की तरह लाजवाब हैं जी...

नीरज

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March 11, 2011 at 3:51 PM delete

शानदार जर्नी और जानदार लोग ! यानि आप और अतुल महाशय !
अतुल का ब्लोक खूब खोजा पर मिला नही एक दिन फोन भी आया था पर नम्बेर सेव कर नही सकी--उसका लिंक देने की कृपा करे --
जरा जल्दी वृतांत को आगे बढाए --अतुल के कारनामे देखने है --जिसमे उसने कहा हे की बड़ा मजा आया --

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March 11, 2011 at 4:00 PM delete

गुफा के चक्कर में पूरी पोस्ट पढ़ा दी चौधरी ! गुफा कहाँ है ...??

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March 11, 2011 at 6:50 PM delete

जय हो आपका, एक नया आनन्द।

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March 11, 2011 at 7:08 PM delete

बहुत ही तिलस्मी.

रामराम.

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March 11, 2011 at 9:48 PM delete

तस्वीरों कि भूख इस बार मिटी. बेहद सुन्दर फोटोग्राफी.

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March 11, 2011 at 11:44 PM delete

बहुत सुंदर विवरण यात्रा का, ओर चित्र भी बहुत सुंदर लगे,

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March 12, 2011 at 6:38 AM delete

वो फ़टी पैंट सिमाई के नहीं? नुंए फ़टी हूई ही पहने घुमते रहे।

फ़ोटो बढिया है ।

मि्लते हैं ब्रेक के बाद।

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March 12, 2011 at 8:50 AM delete

मजेदार, सूचना पट पर नई सूचना डाल दो

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March 12, 2011 at 6:29 PM delete

वाह. मेरे घर सा है सबकुछ.

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Anonymous
March 15, 2011 at 10:07 PM delete

BAHUT AACHHA HAI

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March 15, 2011 at 10:09 PM delete

AAPKI YATRA DEKH KE AAPNI YATRA YAD AATA HAI

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April 9, 2011 at 8:06 PM delete

फोटो तो एक दम वालपेपर सरीखे लग रहे है | जन्नत के नज़ारे है |

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May 25, 2011 at 8:22 PM delete

सुंदर फोटो, रोचक विवरण.

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